मेहनतकश इंसानों की जीजिविषा और संघर्ष की आवाज बनती कविताएँ

मधुलिका बेन पटेल

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हाल ही में कारक के चिन्ह संतोष पटेल का नया काव्य संग्रह आया है। इनकी चिंता के केंद्र में एक ऐसा तबका है जिसे संगठित और सचेत करने की ज़रुरत अभी भी बाकी है। अपने हितों को साधने के लिए किसी खास वर्ग द्वारा सदियों से बुनी जा रही साजिशों से कवि को शिकायत है। वे दूसरे के अधिकारों को चतुरता से हथियाने वाली बर्बर ताकतों की शिनाख्त करते हैं और सहज मनुष्यता से भरे हुए कमजोर समझे जाने वाले तबकों को अपने ज़हन का हिस्सा बनाते हैं। समय के निरंतर और अधिक जहरीले होते चले जाने के बावजूद हमारी निश्चिंत बेरुखी और सब कुछ जानते हुए भी जन संघर्ष में न शामिल होने वाले बुद्धिजीवियों का कायर आचरण आज चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे समय में समाज की घिनौनी हरकतों पर कवि की पैनी नजर है। ब्राह्मणवादी मकड़जाल से मुक्ति के लिए वे बहुजन को अपने अधिकारों के प्रति सजग व सतर्क करना चाहते हैं। इस अनैतिक लंपट दौर में दहशतगर्दी से मुठभेड़ के लिए आमजन की चेतना को जगाने की बेहद ज़रूरत है। सामंतवादी, पूंजीवादी, बाजारवादी ताकतों के खिलाफ़ कवि अपना प्रतिरोध दर्ज कराते हैं। पाखंडों का विरोध करते हैं और तानाशाही के खिलाफ़ आक्रामक तेवर के साथ आवाज उठाते हैं। इनकी कविताएँ कल्पनालोक में नहीं भटकाती। ये खलिश वास्तविकता की उपज हैं। यहां कोई बनावट का भाव नहीं है। कवि  अपनी बातों को सीधे ढंग से कहने के आदी हैं। इनमें सादगी से भरा बेबाकपन है।

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फुले, अंबेडकरवादी चिंतन पर आधारित इनकी कविताएं अतीत और वर्तमान की सामाजिक राजनैतिक सांस्कृतिक आलोचना भी करती हैं। आज जबकि परंपरागत सामंती ब्राह्मणवादी दमन पद्धति लगातार नए-नए रूप धारण कर उत्पीड़ित समाज के लिए कठिन चुनौती बनी हुई है ऐसे समय में कवि दमन के सूक्ष्म और जटिल रूपों की पहचान कर विध्वंसकारी मनुष्यता को खतरे में डालने वाली प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व की बात करते हैं। हमारे समाज और परिवेश की विकृतियों को कविता का विषय बनाते हैं– ‘मैं अम्बेडकर हूँ/ जीवित हूँ उनमें/ जो करते हैं ‘जाति का विनाश’/ और करते हैं अंतर्जातीय विवाह/ मैं अम्बेडकर हूँ/ प्राणवान हूँ उनमें/ जो साथ देते हैं महिलाओं की प्रगति में/ और उनके विकास के हैं साथी/ मैं अम्बेडकर हूँ/ चेतनशील हूँ उनमें/ जिनमें शील है, प्रज्ञा है, करुणा और दया है/ बुद्ध की भांति/ मैं अम्बेडकर हूँ/ जीवंत हूँ संविधान में/ जो बांध कर रखता है/ हम सभी को एक सूत्र में। (1)

इस व्यवस्था में सदियों से एक बड़े वर्ग को असम्मान का पात्र बनाया गया। वह दुःख, पीड़ा झेलता हुआ ब्राह्मणवादी व्यवस्था का शिकार बना हुआ है। मानव रक्तचूसक व्यवस्था को ध्वस्त किये बगैर उसकी मुक्ति संभव नहीं है। सड़ी-गली परम्पराओं, खोखली मान्यताओं को मिटाना आज बेहद ज़रूरी है। पीड़ित वर्ग की व्यथा, सामाजिक भेदभाव जनित पीड़ा को बड़ी इमानदारी से कवि ने अपनी कविता का विषय बनाया है। खास वर्ग के हिस्से आई वेदना, यातना तथा शोषक वर्ग की प्रवृत्ति और खांटी सच को वे अपनी कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। इनकी कविताएँ समाज में परिवर्तन का माहौल पैदा करने के साथ ही हमारे मन, मस्तिष्क पर भी अपना स्थाई प्रभाव छोड़ती हैं। वर्चस्वशाली वर्ग के गौरवमयी तिलिस्म को छिन्न-भिन्न करती सवर्णी बर्बरता और उनकी शतरंजी चालों को भी उजागर करती हैं। इनमें सदियों की पुरानी जड़ता, दबंगई के विरुद्ध तीव्र आक्रोश व्यक्त किया गया है। कवि ने इस अतार्किक, अमानवीय संकीर्ण समाज व्यवस्था में परिवर्तन के लिए खुलकर हल्ला बोला है- कर्ता ‘ने’/ मतलब उन्होंने/ जिन्होंने सदियों से खटमल की तरह/ चूसा है खून और/ पकड़ रखा है सारे अवसर/ कर्म ‘को’/ अपने भाइयों और बिरादरी वालों को/ करण ‘से’/ समस्त सरकारी संसाधनों से/सम्प्रदान के लिए/ अपनी जातीय एकता बनाये रखने के लिए/ अपादान ‘से’/ अलग करके दूसरों से/ संबंध का के की/ अपनों का अपनों के अपनों की/अधिकरण में पर/ अपने संस्थानों/ विश्वविद्यालयों/ अकादमियों में/ समस्त अपने हड़पे मंचों पर/ जमे रहने की व्यवस्था है। (2)

सही मायने में साहित्य का काम आमजन के जीवन में परिवर्तन लाना उन्हें चेतनशील बनाना, प्रेरणा देना और भविष्य की राह को आसान बनाना है। संतोष पटेल ने कविता को यथार्थ की जमीन से जोड़कर उसे और भी जीवंत तथा सशक्त बनाया है। वे सचेत चिंतक हैं। उनकी कविताएं गहन चिंतन का ही परिणाम हैं। ये किसी रहस्य का आवरण नहीं बनाती, बल्कि आक्रोशित करती हैं, फटकारती हैं और सचेत भी करती हैं।

दमनकारी शक्तियां कदम-कदम पर रास्ता रोक हीनता बोध पैदा करने के लिए षड्यंत्र रचती हैं। इनसे जूझते हुए कुछ नया रचने के लिए दृढ़ आत्मविश्वास का होना बेहद ज़रूरी है। तमाम तरह के शोषण चक्र और उसको जीवित रखने तथा पोषित करने वाली जाहिल मानसिकता की बुनियाद पर वार करना उसे तोड़ने की लगातार कोशिश करना आज आवश्यक हो गया है। कवि समझौता नहीं बल्कि संघर्ष के कठिन पथ को चुनने की वकालत करते हैं। गुलामी के खिलाफ शोषण चक्र को तोड़ना चाहते हैं। उनकी कविताएं स्वाभिमान और मुक्ति के लिए संघर्ष की भाव भूमि तैयार करती हैं। हमारी संवेदनाओं को झकझोरती हैं। दूसरों का शोषण कर जीवन जीने वाले निकृष्ट परजीवियों को वे आईना दिखाते हैं। वर्णवादी, ब्रह्मणवादी, सामंतवादी व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। तमाम संसाधनों पर जड़ जमा कर बैठे मठाधीशों को चेतावनी भी देते हैं- रखे रहो अपना मंच, माला, माइक/ रखे रहो अपनी मचान/ रखे रहो अपना छल ज्ञान/ रखे रहो अपना धर्मग्रन्थ-पुराण/ है हमारे पास हमारी भाषा/ है हमारे पास हमारा नृत्य/ है हमारे पास हमारा गान/ खुद हैं जो नकलची और बनते ज्ञानी/ पर हमारे ज्ञान की नहीं है कोई सानी/ क्या चित्रकारी, क्या लोकगान, क्या किसानी/ दुनिया ने हमारी हैसियत मानी/ यह लोकतन्त्र है दोस्तों/ अब किसी के सिर पर ताज नहीं है/खुद बनायेंगे अपना अवसर/ हम किसी के मोहताज नहीं हैं। (3)

भारत में बड़े पैमाने पर किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के दौर में पाखंड बर्बरता का और अधिक विस्तार हुआ है। साहित्य आज वह नहीं रह गया, जिसके बारे में प्रेमचंद ने कहा था कि वह राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। साहित्य में मूल्यों, सामाजिक सरोकारों की बात करने वाले को महत्व नहीं दिया जा रहा। यह दुखद स्थिति है। इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

सही मायने में साहित्य का काम आमजन के जीवन में परिवर्तन लाना उन्हें चेतनशील बनाना, प्रेरणा देना और भविष्य की राह को आसान बनाना है। संतोष पटेल ने कविता को यथार्थ की जमीन से जोड़कर उसे और भी जीवंत तथा सशक्त बनाया है। वे सचेत चिंतक हैं। उनकी कविताएं गहन चिंतन का ही परिणाम हैं। ये किसी रहस्य का आवरण नहीं बनाती, बल्कि आक्रोशित करती हैं, फटकारती हैं और सचेत भी करती हैं। इनकी कविता का मूल स्वर मनुष्यता है। जब मनुष्यता होगी तभी समाज में शांति, सद्भाव, आत्मविश्वास होगा और जीवन का अन्धकार मिटेगा। वे जीवन के जटिल संघर्षों को, राजनीतिक, सामाजिक विकृतियों को पहचानते हैं और उसे अभिव्यक्त भी करते हैं। अंधकार पर विजय प्राप्ति के लिए लगातार संघर्ष को और अधिक धार देने में जुटे हुए हैं। मेहनतकश लोगों के जीवन संघर्षों और उनकी गहन पीड़ा को देख आहत होते हैं। आमजन को अपने परिवेश के प्रति सचेत और जागरूक करने की कोशिश करते हैं। उनका सशक्त लेखन इस बात का गवाह है – होता है जुल्म किसानों पर/ हम बस चुप रहते हैं/ होता रहता है शोषण मजदूरों का/ हम बस चुप रहते हैं/ होती रहती हैं बेआबरू स्त्रियाँ/ हम बस चुप रहते हैं/ खेल करता है सत्ता और सत्तासीन/ तब भी हम चुप रहते हैं/ बेदखल होते आदिवासी अपनी जमीं से/ जल और जंगल से/ फिर भी हम चुप रहते हैं/ दुष्कर्म होता रहता है बच्चियों के साथ/ पर हम चुप रहते हैं/ हाँ हम जब बोलते हैं/ तब होता है कोई प्रायोजित जलसा/ या हो कोई साजिशन हंगामा/ हाँ जब टूटती है हमारी चुप्पी/ तब हमारा बोलना/ बन जाता है किसी के फायदे का हथियार। (4)

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भारत में बड़े पैमाने पर किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के दौर में पाखंड बर्बरता का और अधिक विस्तार हुआ है। साहित्य आज वह नहीं रह गया, जिसके बारे में प्रेमचंद ने कहा था कि वह राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। साहित्य में मूल्यों, सामाजिक सरोकारों की बात करने वाले को महत्व नहीं दिया जा रहा। यह दुखद स्थिति है। इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। अगर हमारा साहित्य साधारण जन की समस्याओं से नहीं जुड़ता आम आदमी के जीवन संघर्ष से नहीं जूझता तो वह महज हवाई कलाबाजी ही कहा जाएगा। चिंता की बात है कि खेतिहर समाज श्रमिक बेरोजगारों का तिल तिल संघर्ष, जीवन संकट आज हमारे कवियों को समस्या के रूप में नहीं दिख रहा। मेहनतकश इंसानों के संकट और संघर्ष को देखने कि आज किसी को फुर्सत नहीं। जहां आमजन रोटी के लिए एक टुकड़ा जमीन और आत्मसम्मान के लिए कठिन संघर्ष कर रहा है, वहीं लाभ के गणित में रमी पूंजीपतियों की हृदयहीन दुनिया संपूर्ण प्रकृति से सहजता, मासूमियत सोख उसे बंजर बनाने में लगा हुआ है। कवि संतोष पटेल अपनी कविताओं के माध्यम से जुल्म के खिलाफ़ आवाज उठाते हैं। समता, स्वतन्त्रता, बन्धुत्व की स्थापना के स्वर के साथ ही अधिकारहीन, श्रमशील वर्ग के वजूद की ये कविताएँ जुल्म के खिलाफ़ एक आवाज हैं। इनकी मारक क्षमता अद्भुत है- नहीं सुनाई देती तुम्हें/ किसानों की बात/उनकी वाज़िब मांग/ उनका हक हुकूक/ नहीं दिखाई देती/ तुम्हें किसानों की तकलीफ़/ उनकी दर्द और परेशानी/ उनकी आत्महत्या/ उनकी मृत्यु/ नहीं बोल सकते तुम/ मूर्तिवत हो गये हो तुमलोग/ मूर्ति तो लगते हो/ किसान आन्दोलन के प्रणेता का/ विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति/ नाम एकता की देते हो/ पर काम क्या है तुम्हारा/ किसानों को घोषित करना आतंकवादी/ ख्लिस्तानी, पाकिस्तानी। (5)

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आज आमजन के शोषण, दमन लूट की स्थितियों में बेतहासा विस्तार हुआ है। विचारों को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। बाजार और मीडिया के मायाजाल ने शब्दों का आशय बदल दिया है। सच्चाई के उलट झूठ को स्थापित करने में पूरी कुब्बत लगा दी है। मन मस्तिष्क पर कब्जा करने की उनकी कोशिश लगातार जारी है। भेदभाव से भरी हुई समाज व्यवस्था के खिलाफ़ बोलने की जगह मौन बने रहना भी किसी न किसी रूप में उसका समर्थन ही है। सत्ता की चालबाजियों से वाकिफ कवि लिखते हैं- हमें पता है कि तुम क्या क्या नाम दोगे/ क्या-क्या आरोप लगाओगे/ हमें पता है कि तुम्हारा भोपू मीडिया/ कितना सत्य बोलेगा/… वह ज़हर घोल रहा है/ पूरे वातावरण में/ वह ती कीटनाशक नहीं/ मानवता का ही नाशक है। (6)

सामाजिक बदलाव में कविताओं की अहम भूमिका होती है। कविता और साहित्य आदमी को इंसान बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता आया है। आज ठहरे पानी की तरह सड़ी और दुर्गन्ध मारती ब्राह्मणवादी मानसिकता का इलाज करना बेहद जरुरी हो गया है। ऐसे में कवि संतोष पटेल वर्चस्वशाली सभ्यता और संस्कृति के लंबे इतिहास पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर कविता और उसके सौंदर्य बोध को नए रूप में चेतना से लैश कर हथियार की तरह प्रस्तुत करते हैं। वे कविताओं के माध्यम से समाज के बीच पैदा की गई गहरी खाईयों को पाटने की कोशिश करते हुए समता स्थापना के लिए बेचैन प्रतीत होते हैं। अपने समय की समस्याओं के पर्दाफाश करने का साहस है उनमें। आत्मचिंतन करने के लिए बाध्य करती ये कविताएं श्रमशीलों के वजूद और जुर्म के खिलाफ दूर तक गूंजने वाली आवाज हैं। यह कृति हमारी सोच को एक नई दिशा में ले जाने की पहल करती है और कवि को एक क्रांतिकारी, प्रतिबद्ध और समर्पित व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

  1. पटेल, डॉ. संतोष – कारक के चिह्न, नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली,पेज-9
  2. पटेल, डॉ. संतोष – कारक के चिह्न, नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, पेज- 10
  3. पटेल, डॉ. संतोष – कारक के चिह्न, नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, पेज-17
  4. पटेल, डॉ. संतोष – कारक के चिह्न, नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, पेज-25-26
  5. पटेल, डॉ. संतोष – कारक के चिह्न, नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, पेज-36
  6. पटेल, डॉ. संतोष – कारक के चिह्न, नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, पेज-51

डॉ. मधुलिका बेन पटेल

डॉ. मधुलिका बेन पटेल , हिन्दी विभाग तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर में सहायक प्राध्यापक हैं।

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