संवेदना की एक मरी हुई नदी…

संजय कुमार सिंंह

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परसों अजय की बाइसवीं बरसी है। राम सुदेश बाबू गणेशी को लेकर अमवाड़ी में साफ-सुथरा करवा रहे हैं। हर वर्ष उन्हें यह दिन याद रहता है। इस बार फिर किसी शरारती ने अजय की मूर्त्ति की नाक तोड़ दी है। उस समय शहीद के सम्मान में बहुत ताम-झाम हुआ था, पर अब यह बोझ उनके सिर पर रह गया है… साफ कराओ, धुलाई-पुछाई के साथ टूटे-फूटे हिस्से की मरम्मत करो और फूल-माला चढ़ाकर अकेले इस फजीहत से गुजरो…। उन्हें दुख और आक्रोश तो होता है, पर करें क्या…

उस समय विजयोन्माद में दर्प की बारूद उड़ रही थी मुल्क में…। लहू में इतना तप्त आवेग कि उस बावल में सब कुछ भूल गए थे वे…। पत्नी और बहू की पछाड़ खाती चीखें तक….। फिजां में एक आवाज गूंज रही थी…। नहीं यह दुख मनाने का समय नहीं है। आँसू का एक पूरा पहाड़ स्तब्ध होकर जम गया था… बहादुर बेटे का बहादुर बाप… कोई रोएगा तो बट्टा लगेगा बेटे के बलिदान को… फिर वीर जवान मरते कहाँ है… अमर हो जाते हैं… मरते हैं कायर और बुजदिल…पहाड़ पर चढ़ कर दुश्मन के दाँत खट्टे करने वाला अजय मर कैसे सकता है… उसने माटी का मोल चुकाया… दूध का कर्ज उतारा… कहाँ है वह वीरांगना जिसके सुहाग को उसने वीरता के आलोक से जगमगा दिया… ऐ हटो! मीडिया वालों को बात करने दो…  आपको कैसा पति चाहिए?…हर जन्म में शहीद अजय जैसा….

जब तक सूरज चाँद रहेगा

अजय तेरा नाम रहेगा…

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उन्हें याद है… इतनी भीड़ थी, इतना जयघोष… कि दो-चार लोगों के रोने का कोई मतलब नहीं रह गया था…उस रेल-पेल और शोर में रोने की आवाजें गुम हो गयी थीं… अंतिम-दर्शन के बाद…। मातमी धुन बजा और फिर सलामी दी गयी और फिर मंत्रोच्चारों और जयकारों के बीच लाश को आग के हवाले कर दिया गया…।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। 

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥

अब बारी थी  उस अभागिन माँ की… भग्न-हृदय से हड्डी को तोड़ कर बह रहे आँसू के प्रपात को पहले ही रोक दिया गया था। रोएगी तो वीर-प्रसू माँ बेटे का अपमान करेगी… दर्द मरोड़ खा रहा था… शरीर में थरथराहट हो रही थी, पर उसने कलेजा मीस कर कहा, “मुझे गर्व है अपने बेटे पर… मेरा दूसरा बेटा भी होता, तो देश पर निछावर कर देती…।”

कट! कट! कट!

जिन्दाबाद! जिन्दाबाद! भारतमाता जिन्दाबाद!

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दूसरे-तीसरे दिन ही अजय की मूर्त्ति लग गयी थी समाधि-स्थल पर…। अब जब भी देश में वीरों का इतिहास लिखा जाएगा… जीवछ पुर गाँव का अजय होगा वहाँ… गाँव-जबार का नाम भी उसके साथ अमर हो गया…।

गर्व से  उनका भी सीना फूल गया था! रोने और त्रास की आवाजें उन्हें दूर से आती लगीं… किसी दूसरे ग्रह-नक्षत्र से… उन्होंने आँखें फाड़ कर देखा… स्वर्ग के हिम-शिखर पर एक उद्दीप्त भाल था… रक्तिम… गोलियाँ सिर को भले फाड़ गयी थीं.. पर एक अद्भुत सौंदर्य था  खिले हुए उस रक्त-कमल का…।

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया

कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं

सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

इलाके में उनका मान-सम्मान बहुत बढ़ गया था, जो लोग कभी किसी फौजी के बाप का सम्मान नहीं करते थे, झुकने लगे थे श्रद्धा से उनके सामने… दूर शहर से भी लोग मिलने आते… और मिलकर जाते… अजय का जयगान हर तरफ हो रहा था… शुरु-शुरु में बुढ़िया रोज फूलों की माला बनाती और वे पहना आते… उन्हें आश्चर्य होता… वहाँ उनके पहुँचने से पहले कई मालाएँ होतीं… जैसे रात में स्वर्गलोक से देवता आते हों फूल चढ़ाने… इच्छा होती जाग कर देखें, पर नहीं… उन्हें लगता उन्हें ऐसी भूल नहीं करनी चाहिए… शायद वे फिर न आएँ… पर अब?… चल-विचल मन:स्थिति में वे दरवाजे पर इसी तरह अपने अकेलेपन के बीच सोचते रहते हैं… उनका दुख सीना फाड़कर फिर से बाहर निकलना चाहता है… सब वक्त का धोखा था… चाँदी के बरक के पीछे खून की नदी छिपा दी थी उन लोगों ने… आँखों को अपने शब्दों के सतरंगे इन्द्रधनुष में उलझाकर  अंधा बना दिया था…। पाँच-छ: वर्षों में ही सारी सच्चाई बदल गयी… बदलने लगी… मृत्यु का वह झूठा जयगान नहीं था, तो क्या था? राजनीति की बिसात पर अब नई चालें थीं… नये मोहरे थे…। संवेदना की एक मरी हुई नदी…  रह-रहकर वे सिसकने लगते हैं… एक रुन्धी हुई वेदना चीरने लगती है आत्मा को…।

एक दिन फिर किसी ने कहा था… क्या कहा था? हाँ, कामरेड हरिहर प्रसाद ने।बुजुर्ग हरिहर प्रसाद जी ने! सुराजी हरिहर प्रसाद जी ने कहा था!सुराज की लड़ाई में एक आँख चली गयी थी हरिहर काका की पुलिस की मार से…सुराज के बाद यही इनाम मिला था उन्हें… आँख गँवा कर उपहास का पात्र बन कर घूम रहे थे गाँव  में….पर कोई कुछ कहे वे उसी जज्बे से लबरेज रहते थे….

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“तुम रो काहे रहे हो राम सुदेश? फौजी के बाप को रोना नहीं चाहिए… इस से उसकी वीरता का अपमान होता है… हम देश के लिए मरने वाले लोग हैं… हम रोएँगे तो देश कैसे चलेगा? क्या तुमने भगत सिंह के बाप को रोने की बात सुनी है? चंद्रशेखर आजाद…. सुखदेव…. किसी के….।” एक दर्प से बुझी वैसी ही आवाज फिर उनके ध्यान को भंग कर रही थी…. पर वे विरक्त थे शब्दों की इन चोटों से  उनका दिल टूटा हुआ था…।

“कक्का!” राम सुदेश बाबू ने आँखें पोंछकर कहा था,” क्या इसी दिन के लिए आपने आजादी का लड़ाई लड़ी थी? देश में सुराज आया, पर टिकट मिला आपको? अंग्रेज की पूँछ उठाने वाले लोग राज कर रहे हैं…। उस समय तो अजय की शहादत का हंगामा था…। अब आता भी है कोई हुलकी मारने…?  मुझे कहने दीजिए… उस समय जो कहने नहीं दिया गया… वह सच कहने दीजिए…। इस अभागत पर रोऊँ नहीं, तो क्या उत्सव मनाऊँ? कहूँ गर्व से कि मुझे कोई दुख नहीं है? मेरा तो मुकद्दर ही डूब गया… जब रोने को हुआ, तो किसी ने आँसू उठा लिए… मुँह दबाकर कुछ कहलवा लिया…। मूर्च्छा में… बेहोशी में… पर जो अब मैं भोग रहा हूँ…. वह कहने दीजिए… रोने दीजिए…. लोग भगत सिंह और आजाद को भूल गए, तो अजय को क्या याद रखेंगे…? अपने आप को कब तक झूठी तसल्ली दीजिएगा… अजय तो सरकार का चाकर था… भूख और गरीबी से हार कर गया था फौज में…।”

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“राम सुदेश!”कक्का चेहरा आरक्त हो उठा था,” जी को कड़ा करो। अजय की शहादत को वक्त के तराजू पर मत तौलो… मैं अगले जन्म में भी वहाँ पैदा होना चाहूँगा…। जाहाँ आजादी की जंग लड़ी जाएगी।” जोर से कंधा दबा कर वे चले गए थे…।

पर राम सुदेश बाबू को शांति नहीं मिली थी उनकी बातों से। अजय की शहादत के दूसरे ही साल बहू सारे पैसे लेकर नैहर चली गयी थी, फिर उसने दूसरा विवाह कर लिया था। उन्हें लगा था कि दूसरी गोली लगी हो उनके परिवार को…। पर कक्का ने कहा था, “यह ठीक हुआ राम सुदेश… समझो मेरी आँखों की रौशनी लौट आयी है… तुम दोनों जने जाकर  आशीर्वाद दे आओ… कोई नहीं जाएगा तो मैं चलूँगा तुम्हारे साथ…।”

“दुर अधपगला है …इसकी बातों का क्या… जो जी में आए …. कहता है…।” वे बुदबुदा कर रह गए थे…

सूरज की रौशनी आम की डालियों के पीछे छिप रही थी। गणेशी लगातार अपने काम में लगा था। राम सुदेश बाबू पत्थर पर बैठे हलफ रहे थे…. स्मृति थी कि एक पल के लिए कल नहीं लेने दे रही थी…।

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“मालिक” गणेशी ने खैनी चुनियाते हुए कहा, “एक बात कहूँ…”

“कहो..” वे चौंक कर कहते हैं। जाने कब से भरम रहे थे…

“नुनू बाबू  (अजय) की मूर्त्ति यहाँ से हटाकर दुरा पर ले चलिए…”

“काहे?” कुदाल उछटकर जैसे लगी हो सीने पर…

“यहाँ देखते नहीं हैं… आदमी सब बगल में बिष्ठी कर देते हैं…” गणेशी खैनी फांककर कुदाल पटकते हुए बोला, “कितना भी साफ करिए साल भर फिर नरक में रहेंगे नुनू बाबू… कोई नाक तोड़ेगा, तो कोई… कोई हाथ… हम लोग क्या कर लेंगे…”

“ठीक कहता है गणेशी…”मन में लहर उठती है विक्षोभ की… पिछले साल किसी ने माला तोड़ कर फेंक दी थी…।

अचानक उन्होंने कहा, “हाँ गणेशी… तोड़ो… नुनू बाबू की मूर्त्ति दुरा पर तो नहीं ले जाएँगे… मगर आज किसी नदी में जरूर बहा देंगे…। इसको अंतिम बरसी समझो… बहुत ढो लिया…। मेरा भी जी भर गया है….।”

गणेशी ठिठक कर हैरत से उनका चेहरा निहारने लगता है,” यह आप क्या कह रहे हैं….? वहाँ दुरा पर रोज पूजा होगी…तो…।”

“मैं ठीक कह रहा हूँ…।” वे आगे बढ़ने लगे गणेशी की तरफ…।

“मालकिन से पूछ लेते…” वह विलम कर कहता है,” उनका जी नहीं कलकेगा…? ऐसा भला हम कैसे कर सकते हैं…? आप तो एकदम उल्टा बोल रहे हैं…।”

“लाओ कुदाल.. अब किसी से कुछ नहीं पुछूँगा….तुमने मेरे दिल की बात कह दी है… बेटा एक जनम मरा… ठीक…. हम उसे अब यहाँ सौ जनम नहीं मरने देंगे…। अब जिसका जी कलके… कलकने दो…।” उन्होंने गणेशी के हाथ से कुदाल लेकर अजय की मूर्त्ति पर मारी, ठनाक! आग की चिनगारी फूटी। फिर उन्होंने कुदाल उठायी, ठनाक! इस बार किसी ने पीछे से हाथ पकड़ लिया।” राम सुदेश पागल हो गए हो क्या…? यह क्या कर रहे हो? अपने बेटे की समाधि का इतना अनादर नहीं करो…।”

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“बाप का अंतिम फर्ज अदा कर रहा  हूँ कक्का…।” उन्होंने रुष्ट हो कर कहा।” अब और बिष्ठा साफ नहीं करूँगा… हर साल नाक-हाथ नहीं जोडूँगा….।”

कुदाल राम सुदेश बाबू के हाथों से छीनकर वे: अगल-बगल की गंदगी टोकड़ी में जमा करने लगे। समाज की गंदगी को साफ करना हमारा धर्म है…। इस दुनिया को बदलने की ज़रुरत है राम सुदेश… लोगों के हिसाब से नहीं चलो, हमें अजय के हिसाब से चलना है…।”

राम सुदेश बाबू अकबक हरिहर प्रसादजी को देख रहे थे । उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करें। गणेशी भी काठ की तरह चुप खड़ा था।

 

संजय कुमार सिंंह पूर्णिया महिला काॅलेज में प्रिंसिपल हैं।
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