Saturday, July 4, 2026
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राजनीति

नेहरू को कोसते कोसते नेहरू ही बेंचमार्क बन गए

हमारे देश का लोकतांत्रिक सिस्टम अविश्वसनीय हो गया है। देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता खत्म कर दी गई है — संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और सभी जांच एजेंसियों तक। आज सभी संवैधानिक संस्थाएं सिर्फ़ BJP और RSS के इशारे पर काम कर रही हैं। आज से दो हफ़्ते बाद, 25 जून को, जब 1975 में 19 महीने की इमरजेंसी और सेंसरशिप लागू होने के 51 साल पूरे हो जाएंगे, तो RSS और BJP के लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी और 19 महीने की तानाशाही पर चर्चा करेंगे। 51 साल पहले हम भी उस इमरजेंसी के शिकार हुए थे। लेकिन 19 महीने की इमरजेंसी की तुलना में, हम पिछले 12 सालों से — यानी एक दशक से ज़्यादा समय से — अघोषित इमरजेंसी और सेंसरशिप का सामना कर रहे हैं।

जॉर्ज फर्नांडिस के बहाने विवादों की सियासत को मुड़कर देखना

जॉर्ज फर्नांडिस राजनीतिक जीवन विवादों से भरा रहा। 1974 की रेल हड़ताल को सरकार ने देशद्रोह कहा। दो करोड़ रेलकर्मी हड़ताल पर गए, रेल सेवा ठप हुई। विपक्ष ने इसे अराजकता कहा, सरकार ने बर्बादी। आपातकाल के दौरान 'बड़ौदा डायनामाइट केस' में उन पर बम विस्फोट की साजिश का आरोप लगा। बाद में आरोप साबित नहीं हुए, पर सरकार विरोध के नाम पर हिंसा की राह चुनने की आलोचना हुई। रक्षामंत्री रहते 2001 में 'तहलका डॉट कॉम' स्टिंग ऑपरेशन हुआ। उनके ऑफिस के लोगों को रक्षा सौदों में रिश्वत लेते दिखाया गया। आरोपों के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बाद में क्लीन चिट मिली, पर छवि धूमिल हो चुकी थी। आलोचक कहते हैं वे सत्ता विरोध के नाम पर टकराव की राजनीति करते थे। IBM/कोका-कोला को भगाने से भारत में निवेश और टेक्नोलॉजी आने में देरी हुई। सिद्धांत की जिद में कई बार व्यावहारिक फैसले पीछे छूट गए। कई मुलाकातों की याद और जॉर्ज फर्नांडिस की लंबी तथा विवादभरी राजनीतिक पारी का विश्लेषण करते हुये उनकी 99वीं जयंती पर जाने-माने चिंतक, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ सुरेश खैरनार।

सुनाली के ऊपर अत्याचार करनेवाले किस भ्रूण हत्या की बात कर रहे हैं और किन नारियों का वंदन ?

भाजपा ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को हर रूप में चुनाव जीतने का औज़ार बना लिया। जो अधिनियम तीन साल पहले पारित हो गया था उसे एक बार फिर परिसीमन के लिए संसद में लाया गया। मौजूदा संख्या में भागीदारी न देने की बेईमानी को परिसीमन की आड़ में छुपाने की संघी-भाजपाई मंशा का पर्दाफाश हो गया तब बेहिसाब पैसा खर्च करके प्रधानमंत्री मोदी भ्रूण हत्या का रोना रो रहे हैं। लेकिन सवाल कई और भी हैं। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की निवासी तीन महीने की गर्भवती घरेलू सहायिका सुनाली को जबरन बांग्लादेश की सीमा पार कराया गया। बिना किसी अपराध को उसे बांग्लादेश की जेल में रहना पड़ा। वहीं जेल में उसने अपने बच्चे को जन्म दिया। एक जटिल कानूनी लड़ाई के बाद वह अपने देश वापस आ पाई है। मोदी ने महिलाओं की गरीबी, लाचारी और भावनाओं का दोहन किया और उन्हें एकमुश्त वोटर के रूप देखा। आज देश में महिलाओं की दुर्दशा का कोई अंत नहीं। सबसे बड़ी बात कि संसद की मौजूदा स्थिति में महिलाओं को आरक्षण भाजपा देने को ही तैयार नहीं। ऐसे में किस भ्रूण हत्या की बात करके रोना-पीटना चल रहा है इसे समझा जाना चाहिए। जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक डॉ सुरेश खैरनार की खुली चिट्ठी।

क्या अब साम्राज्यवाद का सरगना नहीं रह पाएगा अमेरिका

क्यूबा के मौजूदा ऊर्जा संकट को पैदा करने और अब खुद क्यूबा पर कब्ज़ा जमाने की चाह रखने वाले ट्रंप के बयान को देखने के बाद, यह कहावत याद आ गई - 'नंगे से तो भगवान भी डरते हैं।' हालाँकि, इस 'नंगे' द्वारा शोषित की गई लड़कियों का गुस्सा अब पूरी दुनिया एपस्टीन फाइलों के ज़रिए देख रही है। फिर भी, इस 'नंगे' को रोकना ही दुनिया की सभ्यता पर मंडराता सबसे बड़ा खतरा है। आखिर किसी में भी इस बारे में खुलकर बोलने की हिम्मत क्यों नहीं है?

साम्राज्यवाद के नए दौर की शुरुआत है ईरान पर हमला

घटनाओं में भारत की भूमिका उसकी बदलती विदेश नीति के बारे में आँखें खोलने वाली है। शुरुआत में भारत गुटनिरपेक्ष था, और उसके ईरान के साथ बहुत सौहार्दपूर्ण संबंध थे। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान बेहतरीन था। अब हम देखते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने युद्ध से ठीक पहले इज़राइल का दौरा किया। इस दौरे का उद्देश्य देश को पता नहीं था। उन्हें इज़राइल का सर्वोच्च सम्मान मिला, और उन्होंने यह वचन दिया कि भारत हर सुख-दुख में इज़राइल के साथ खड़ा रहेगा। अगले ही दिन, I-A ने ईरान पर हमला कर दिया। श्री मोदी ने ईरान के सर्वोच्च नेता के निधन पर कोई ट्वीट नहीं किया, और एक ऐसा गोलमोल बयान जारी किया जिसमें हमलावर और पीड़ित देश, दोनों को एक ही तराज़ू में तौला गया।

ब्रिटिश राजसत्ता और औपनिवेशवाद

एक मजबूत लोकतंत्र होने के बावजूद भी यूनाइटेड किंगडम अभी भी राजशाही के साथ क्यों चिपका हुआ है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के लिए यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जहाँ राजशाही विरोधी भावनाएँ भी बढ़ रही हैं फिर भी 'दायरे' का हिस्सा बनी हुई हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में रूढ़िवादी लॉबी आक्रामक रूप से राजशाही समर्थक बनी हुई है और बाजार की ताकतों ने उनकी 'लोकप्रियता' का दोहन किया है।

न्यूज़क्लिक के पत्रकारों पर फिर हुई छापेमारी, सरकार को रास नहीं आ रही है जनसरोकार की आवाज

जो जुबान बादशाह के गीत नहीं गाएगी वह जुबान काट दी जाएगी, जो सर बादशाह की खिदमत में नहीं झुकेगा वह सर कलम किया...

शांति, सद्भाव, सशक्त लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के संकल्प के साथ शुरू हुई पदयात्रा

समाज में शांति सद्भाव की स्थापना लोकतंत्र की मजबूती और सामाजिक न्याय का माहौल स्थापित करने के लिए संघर्ष का संकल्प लेते हुए दस...

सादगी और ईमानदारी की मिसाल थे लाल बहादुर शास्त्री

नेहरू जी के निधन के उपरांत सर्वसम्मति से शास्त्री जी को प्रधान मंत्री बनाया गया था। किंतु यह एक मिथक भर लगता है। उस समय के राजनीतिक भूगोल पर शास्त्री जी जैसा बेदाग न कोई चाँद था और न ही तारा। इन्दिरा गान्धी अभी अपरिपक्व थीं। परिणामत: काँग्रेस के सामने शास्त्री जी को प्रधान मंत्री बनाने के अलावा कोई विकल्प ही न था।

देवरिया में संपर्क मार्ग को लेकर शुरू हुये संघर्ष में छः लोगों की हत्या

भूमि विवाद को लेकर लंबे समय से चली आ रही इस शत्रुता में सबसे पहले जिला पंचायत सदस्य प्रेम यादव की पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी और उसके बाद प्रतिद्वंद्वी गुट के सत्य प्रकाश दुबे की पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी। अन्य मृतकों में दो बच्चे, एक महिला और एक पुरुष शामिल हैं। तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए इलाके में पुलिस टीमें और अर्धसैनिक बल तैनात किए गए हैं।

तमाशे के लिए कहीं घर ही न जला दें अजय राय

उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों पर चुनावी तैयारी की बात भले ही कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कर रहे हैं, पर सच्चाई यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में I.N.D.I.A. गठबंधन की कमान अखिलेश यादव के हाथ में ही रहेगी।
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