Wednesday, July 15, 2026
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राजनीति

नेहरू को कोसते कोसते नेहरू ही बेंचमार्क बन गए

हमारे देश का लोकतांत्रिक सिस्टम अविश्वसनीय हो गया है। देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता खत्म कर दी गई है — संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और सभी जांच एजेंसियों तक। आज सभी संवैधानिक संस्थाएं सिर्फ़ BJP और RSS के इशारे पर काम कर रही हैं। आज से दो हफ़्ते बाद, 25 जून को, जब 1975 में 19 महीने की इमरजेंसी और सेंसरशिप लागू होने के 51 साल पूरे हो जाएंगे, तो RSS और BJP के लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी और 19 महीने की तानाशाही पर चर्चा करेंगे। 51 साल पहले हम भी उस इमरजेंसी के शिकार हुए थे। लेकिन 19 महीने की इमरजेंसी की तुलना में, हम पिछले 12 सालों से — यानी एक दशक से ज़्यादा समय से — अघोषित इमरजेंसी और सेंसरशिप का सामना कर रहे हैं।

जॉर्ज फर्नांडिस के बहाने विवादों की सियासत को मुड़कर देखना

जॉर्ज फर्नांडिस राजनीतिक जीवन विवादों से भरा रहा। 1974 की रेल हड़ताल को सरकार ने देशद्रोह कहा। दो करोड़ रेलकर्मी हड़ताल पर गए, रेल सेवा ठप हुई। विपक्ष ने इसे अराजकता कहा, सरकार ने बर्बादी। आपातकाल के दौरान 'बड़ौदा डायनामाइट केस' में उन पर बम विस्फोट की साजिश का आरोप लगा। बाद में आरोप साबित नहीं हुए, पर सरकार विरोध के नाम पर हिंसा की राह चुनने की आलोचना हुई। रक्षामंत्री रहते 2001 में 'तहलका डॉट कॉम' स्टिंग ऑपरेशन हुआ। उनके ऑफिस के लोगों को रक्षा सौदों में रिश्वत लेते दिखाया गया। आरोपों के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बाद में क्लीन चिट मिली, पर छवि धूमिल हो चुकी थी। आलोचक कहते हैं वे सत्ता विरोध के नाम पर टकराव की राजनीति करते थे। IBM/कोका-कोला को भगाने से भारत में निवेश और टेक्नोलॉजी आने में देरी हुई। सिद्धांत की जिद में कई बार व्यावहारिक फैसले पीछे छूट गए। कई मुलाकातों की याद और जॉर्ज फर्नांडिस की लंबी तथा विवादभरी राजनीतिक पारी का विश्लेषण करते हुये उनकी 99वीं जयंती पर जाने-माने चिंतक, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ सुरेश खैरनार।

सुनाली के ऊपर अत्याचार करनेवाले किस भ्रूण हत्या की बात कर रहे हैं और किन नारियों का वंदन ?

भाजपा ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को हर रूप में चुनाव जीतने का औज़ार बना लिया। जो अधिनियम तीन साल पहले पारित हो गया था उसे एक बार फिर परिसीमन के लिए संसद में लाया गया। मौजूदा संख्या में भागीदारी न देने की बेईमानी को परिसीमन की आड़ में छुपाने की संघी-भाजपाई मंशा का पर्दाफाश हो गया तब बेहिसाब पैसा खर्च करके प्रधानमंत्री मोदी भ्रूण हत्या का रोना रो रहे हैं। लेकिन सवाल कई और भी हैं। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की निवासी तीन महीने की गर्भवती घरेलू सहायिका सुनाली को जबरन बांग्लादेश की सीमा पार कराया गया। बिना किसी अपराध को उसे बांग्लादेश की जेल में रहना पड़ा। वहीं जेल में उसने अपने बच्चे को जन्म दिया। एक जटिल कानूनी लड़ाई के बाद वह अपने देश वापस आ पाई है। मोदी ने महिलाओं की गरीबी, लाचारी और भावनाओं का दोहन किया और उन्हें एकमुश्त वोटर के रूप देखा। आज देश में महिलाओं की दुर्दशा का कोई अंत नहीं। सबसे बड़ी बात कि संसद की मौजूदा स्थिति में महिलाओं को आरक्षण भाजपा देने को ही तैयार नहीं। ऐसे में किस भ्रूण हत्या की बात करके रोना-पीटना चल रहा है इसे समझा जाना चाहिए। जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक डॉ सुरेश खैरनार की खुली चिट्ठी।

क्या अब साम्राज्यवाद का सरगना नहीं रह पाएगा अमेरिका

क्यूबा के मौजूदा ऊर्जा संकट को पैदा करने और अब खुद क्यूबा पर कब्ज़ा जमाने की चाह रखने वाले ट्रंप के बयान को देखने के बाद, यह कहावत याद आ गई - 'नंगे से तो भगवान भी डरते हैं।' हालाँकि, इस 'नंगे' द्वारा शोषित की गई लड़कियों का गुस्सा अब पूरी दुनिया एपस्टीन फाइलों के ज़रिए देख रही है। फिर भी, इस 'नंगे' को रोकना ही दुनिया की सभ्यता पर मंडराता सबसे बड़ा खतरा है। आखिर किसी में भी इस बारे में खुलकर बोलने की हिम्मत क्यों नहीं है?

साम्राज्यवाद के नए दौर की शुरुआत है ईरान पर हमला

घटनाओं में भारत की भूमिका उसकी बदलती विदेश नीति के बारे में आँखें खोलने वाली है। शुरुआत में भारत गुटनिरपेक्ष था, और उसके ईरान के साथ बहुत सौहार्दपूर्ण संबंध थे। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान बेहतरीन था। अब हम देखते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने युद्ध से ठीक पहले इज़राइल का दौरा किया। इस दौरे का उद्देश्य देश को पता नहीं था। उन्हें इज़राइल का सर्वोच्च सम्मान मिला, और उन्होंने यह वचन दिया कि भारत हर सुख-दुख में इज़राइल के साथ खड़ा रहेगा। अगले ही दिन, I-A ने ईरान पर हमला कर दिया। श्री मोदी ने ईरान के सर्वोच्च नेता के निधन पर कोई ट्वीट नहीं किया, और एक ऐसा गोलमोल बयान जारी किया जिसमें हमलावर और पीड़ित देश, दोनों को एक ही तराज़ू में तौला गया।

ग्वालियर के भाजपाई सांसद बनाम सिंधिया : अपने ही गिरा रहे हैं नशेमन पे बिजलियाँ

ग्वालियर के सांसद भरत सिंह कुशवाह की शिकायत है कि ग्वालियर का सांसद होते हुए भी उन्हें एक सांसद की तरह काम नहीं करने दिया जा रहा है, सांसद के रूप में सम्मान की तो बात ही अलग है। वे केंद्र की जिन तमाम योजनाओं के लिए भागदौड़ करते हैं, उनके स्वीकृत होते ही उन सब योजनाओं को लाने का श्रेय युवराज लूट लेते हैं और प्रशासन भी उनकी मदद करता है।

आरएसएस मुख्यालय में मोदी: क्या ऐंठन ढीली होने लगी है?

हाल ही में आरएसएस मुख्यालय नागपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जाना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हो गया गया। आमतौर पर कयास लगाया जा रहा है कि इस वर्ष 75 वर्ष पूरे करने जा रहे मोदी की यह फेयरवेल यात्रा है। दस वर्ष के अपने दो कार्यकालों में मोदी ने नागपुर का रुख नहीं किया लेकिन तीसरे कार्यकाल में जब उनका अपराजेय होने का भ्रम टूट गया है तब संघ के शरण में उनका जाना यह संकेत कर रहा है कि शायद संघ की मदद से वह अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं जिससे वे नेहरू के कार्यकाल के करीब जा सकें। आरएसएस और भाजपा के बीच कोई विवाद या असहमति नहीं है। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि दोनों के बीच हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए अपनाई जाने वाली रणनीति के मामले में कुछ मतभेद हों। पढ़िये डॉ राम पुनियानी की यह टिप्पणी ।

क्या आरएसएस भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति का असर पुलिस पर भी पड़ने लगा है?

आज ही मैंने एक वीडियो देखा, जिसमें एक यात्री यू पी के रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर शायद चादर ओढ़कर रात में अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा है और वहीं वर्दी में एक पुलिसकर्मी अपने जूते से उसके पैर को रगड़कर जगा रहा है। क्या यह अमानवीयता शरीर पर वर्दी पहनने के बाद आती है? या फिर पुलिस की ट्रेनिंग भी इसी तरह दी जाती है? क्या आरएसएस की गतिविधियों के प्रति उदार हो चुकी पुलिस भी नफ़रत की भावना से भर चुकी है?

आखिर इतने तमतमे वाले नरेंद्र मोदी को क्यों संघ मुख्यालय जाना पड़ा

प्रधानमन्त्री बनने के लगभग 12 साल बाद नागपुर के संघ कार्यालय में मोदी पहुंचना, ताक़त का प्रदर्शन तो नहीं है? जबकि भाजपा ने स्वयं को सक्षम  घोषित कर दिया था, फिर ऐसा क्या हुआ कि पहले नड्डा और अब मोदी खुद नागपुर पहुंच गए।

आपके लिए इतिहास से सबक सीखना जरूरी है कि उनसे बदला लेना

औरंगजेब का दानवीकरण राजनैतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है और हिंसा और गौमांस, लव जिहाद जैसे मुद्दों के जरिए मुसलमानों के एक वर्ग को आतंकित और एक दायरे में सिमटने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। औरंगजेब को आज के असहाय मुस्लिम समुदाय से जोड़ना कैसे न्यायोचित है। मुस्लिम राजाओं के जुल्मों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से हिन्दू राष्ट्र के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में दो तरह से मदद मिलती है। एक ओर इसके जरिए धार्मिक अल्पसंख्यकों पर निशाना साधा जाता है और दूसरी ओर, अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे हिन्दू राष्ट्रवाद के आधार, ब्राम्हणवादी व्यवस्था, द्वारा समाज के कमजोर तबकों पर ढहाये गए अत्याचारों पर पर्दा पड़ता है।

ट्रंप के बदले तेवर के पीछे की राजनीति और अर्थनीति क्या है?

आज़ एलेन मस्क व डोनाल्ड ट्रम्प का तेवर किसी ताकत का नही बल्कि कमजोरी का प्रदर्शन है। आज़ अमेरिकी पूंजी अपने सारे लोकतांत्रिक खोल उतार फेंकना इसी लिए चाह रही है। 80 के दशक में अपनाए गए वैश्वीकरण की नीतियों को, जो खुद सामराजी पूंजी ने अपने लिए ही बनाए थे, उन नीतियों को और उनसे जुड़े वैश्विक संस्थाओं को भी बर्दाश्त करने की स्थिति नही रह गई है, तथाकथित ग्लोबलाइजेशन को एक बार फिर से नये तरह के डी ग्लोबलाइजेशन में बदला जा रहा है।
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