दस मार्च के परिणाम का संभावित असर (डायरी 7 मार्च, 2022)

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सूचनाओं के निहितार्थ भी कमाल के होते हैं और हर सूचना के पीछे समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि होती है। ये सूचनाएं आज के समय में कितनी कारगर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तकरीबन हर मुल्क में इसके जरिए सरकारें बन रही हैं या बिगड़ रही हैं। हालांकि हर सूचना के मामले में एक ठोस आधार का होना आवश्यक नहीं है। जैसे एक सूचना यह कि यदि 10 मार्च को परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं हुए तब संसद में प्रचंड बहुमत के बावजूद देश का अगला राष्ट्रपति विपक्षी दलों का होगा।

मध्य भारत में भी भाजपा के दिन अच्छे नहीं हैं। महाराष्ट्र और राजस्थान में भाजपा की स्थिति बहुत कमजोर है। अन्य राज्यों यथा छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल आदि राज्य जहां के विधायकों का मान ठीक-ठाक है, भाजपा कमजोर है।

अब इसी सूचना पर विचार करते हैं। हालांकि इस सूचना में निश्चितता नहीं है, लेकिन इसके बावजूद यह सूचना है और जब हम इसे एक खास तरीके से प्रस्तुत करते हैं तो यही सूचना एक खबर बन जाती है। मसलन, राष्ट्रपति के निर्वाचन में विधानसभाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। हर विधायक का एक महत्व होता है। इस महत्व का निरूपण संख्या के रूप में किया जाता है। उदाहरण के लिए देश में सबसे अधिक महत्व उत्तर प्रदेश के विधायकों का है। संख्या के रूप में इसका मान 208 है और सबसे कम 7 मणिपुर के एक विधायक का। पंजाब के विधायक का मान 116 और उत्तराखंड के एक विधायक का मान 64 है। वहीं गोवा के विधायक का मान 20 है।

अब देश पर निगाह डालें तो हम समझ सकते हैं कि इस सूचना का महत्व किस तरह से है। शुरुआत बिहार से करते हैं। बिहार में विपक्षी दलों की संख्या लगभग बराबर है। भाजपा वहां कमजोर स्थिति में है। अब यदि वहां जदयू भाजपा से अलग हो जाय तो उसके लिए मुसीबत और बढ़ जाएगी। उत्तर प्रदेश में यदि भाजपा को हार मिलती है या फि उसकी सीटों की संख्या में कमी आती है तो निश्चित रूप से विपक्षी दलों का पलड़ा भारी होगा। दक्षिण के राज्यों की बात करें तो केवल एक कर्नाटक को छोड़कर भाजपा कहीं भी सुखद स्थिति में नहीं है। मध्य भारत में भी भाजपा के दिन अच्छे नहीं हैं। महाराष्ट्र और राजस्थान में भाजपा की स्थिति बहुत कमजोर है। अन्य राज्यों यथा छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल आदि राज्य जहां के विधायकों का मान ठीक-ठाक है, भाजपा कमजोर है।

मौत के साये में वे किसी तरह जान बचाकर यूक्रेन से बाहर निकल सके। बाहर निकलने के बाद केवल औपचारिकता के लिए भारत सरकार द्वारा हवाई जहाज का प्रबंध किया गया। वह भी तब जब भारत में इसके खिलाफ एक अभियान चलाया गया कि छात्रों को वापस लाने के एवज में विमानन कंपनियां मनमाना रेट क्यों वसूल रही हैं।

तो इस लिहाज से यदि हम देखें तो हम पाते हैं कि समग्र भारत के स्तर पर नरेंद्र मोदी हुकूमत के खिलाफ लहर है। यह लहर और तेज हो जाएगी यदि 10 मार्च को आनेवाला परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया।

अब सवाल यह कि ऐसा हुआ कैसे? जाहिर तौर पर यह एक दिन में नहीं हुआ है। दरअसल, नरेंद्र मोदी जिस तरीके की राजनीति करते हैं, उसे अब इस देश के लोग समझने लगे हैं। एक उदाहरण यह कि यूपी में उसने चुनावी वर्ष में कोरोना की तीसरी लहर के दौरान लोगों को पांच-पांच किलो राशन उपलब्ध कराए। जबकि शेष भारत में इस तरह की योजना नहीं चलाई गई। वहीं इसके पहले के दो बार के लॉकडाउन के दौरान भी लोगों को राशन देने की जरूरत नहीं समझी गई। हालांकि सरकारों का दावा है कि उसने उपलब्ध कराया। लेकिन उनके दावे केवल कागजी हैं। पहली लहर के दौरान पलायन करते मजदूरों की तस्वीरें और दूसरी लहर में गंगा में तैरती लाशों का भयानक मंजर पूरे देश ने देखा है।

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दरअसल, आज का भारत वैसा नहीं है जो 2014 और 2019 के दौरान था। नरेंद्र मोदी के दावों की असलियत समय के साथ सामने आयीं। मसलन, एक घोषणा कि हर किसी के खाते में 15-15 लाख भेजे जाएंगे, को अमित शाह ने जुमला के रूप में स्वीकार किया। वहीं रही-सही कसर किसान आंदोलन ने पूरी कर दी है। दक्षिण के राज्यों में तो पहले से ही नरेंद्र मोदी के खिलाफ लहर थी। पूर्वी भारत में भी अब यह साफ-साफ देखने को मिल रहा है। हालत यह हो गयी है कि एक-एक कर भाजपा के हाथ से राज्य निकलते जा रहे हैं।

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लोगों में नरेंद्र मोदी सरकार के इकबाल के खात्मे की वजह नरेंद्र मोदी का बड़बोलापन है। अब कल ही उन्होंने एक निजी शिक्षण संस्थान के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कह दिया कि यह भारत के बढ़ते प्रभाव का ही परिणाम है कि यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को निकालने के लिए शुरू किया गया आपरेशन गंगा सफल रहा। जब मोदी यह बात कह रहे थे, तब उन्हें इस बात का अहसास भी नहीं था कि वे किन छात्रों के सामने बोल रहे थे। वे बच्चे जान रहे थे यूक्रेन में अभी भी हजारों की संख्या में भारतीय छात्र फंसे हैं। जो छात्र यूक्रेन से वापस आए हैं, उन्होंने भी अपने बयानों में नरेंद्र मोदी के दावों की धज्जियां उड़ा दी है। वे यह बता रहे हैं कि उन्हें यूक्रेन से बाहर निकलने में भारत सरकार ने कोई मदद नहीं की। मौत के साये में वे किसी तरह जान बचाकर यूक्रेन से बाहर निकल सके। बाहर निकलने के बाद केवल औपचारिकता के लिए भारत सरकार द्वारा हवाई जहाज का प्रबंध किया गया। वह भी तब जब भारत में इसके खिलाफ एक अभियान चलाया गया कि छात्रों को वापस लाने के एवज में विमानन कंपनियां मनमाना रेट क्यों वसूल रही हैं।

बहरहाल, यह मौसम बदलाव का है। कल ही बनारस में रिपोर्टिंग कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार से फोन पर बात हो रही थी। उनका कहना था कि 2017 के विधानसभ चुनाव में बनारस में नरेंद्र मोदी के नाम का सिक्का चला था। जिले के सभी आठ सीटों पर भाजपा और उसके गठबंधन वाले दल ने कब्जा किया था। अब इस बार लोग यह सोच रहे हैं कि भाजपा तीन सीटें जीतेगी या चार सीटें।

खैर, कल का दिन खास रहा। नींद महत्वपूर्ण रही। एक कविता भी सूझी–

रोज करता हूं उद्यम ताकि

मेरे हिस्से हो इत्मीनान की नींद।

बोलो, तुम्हें क्या चाहिए 

जंग लड़नेवाले हुक्मरानों?

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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