बढ़ती लैंगिक असमानता के बीच अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का क्या अर्थ है

डॉ. राजू पाण्डेय

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पिछले कुछ वर्षों में बाजार की पैनी नजर रही है और इसे बहुत चतुराई से एक बाजार संचालित उत्सव में बदल दिया गया है। इस दिवस के आयोजन के पीछे निहित मूल भावना से एकदम विपरीत दृष्टिकोण रखने वाली सरकारों और कॉरपोरेट्स द्वारा इस अवसर पर किए जाने वाले भव्य आयोजन अनेक बार वितृष्णा उत्पन्न करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1975 में मान्यता दिए जाने के बाद वैश्विक स्तर पर नियमित रूप से आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की 2022 की थीम ‘जेंडर इक्वालिटी टुडे फॉर ए सस्टेनेबल टुमारो’ चुनी गई है। किंतु भारत में लैंगिक समानता एक असंभव स्वप्न की भांति लगती है।

आर्थिक अवसरों, राजनीति, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्त्रियों की भागीदारी को आधार बनाने वाली वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 भारत में स्त्रियों की उत्तरोत्तर दयनीय होती स्थिति की ओर संकेत करती है। हम विगत वर्ष की तुलना में 28 पायदानों की गिरावट के साथ 156 देशों में 140वें स्थान पर पहुंच गए हैं। इस गिरावट के लिए कोविड जन्य परिस्थितियों को उत्तरदायी माना गया है।

विशेषज्ञों द्वारा किए गए अध्ययन हमारी 35 करोड़ घरेलू महिलाओं के श्रम के मूल्य को 613 अरब डॉलर तक आंकते हैं। इन सारे आंकड़ों की विचित्रता यह है कि पुरुष चाहे अनपढ़ हो या उच्च शिक्षित घरेलू कार्य से दूरी बनाकर रखता है और उच्च शिक्षित महिला पर भी अनपढ़ महिला जितना ही घरेलू कार्य का बोझ रहता है।

यह जांचा-परखा सिद्धांत भी है कि महामारी और युद्ध की मार उन वर्गों पर सबसे ज्यादा पड़ती है जो सर्वाधिक कमजोर हैं जैसे महिलाएं। लिंकेडीन अपॉर्चुनिटी इंडेक्स दर्शाता है कि कोविड-19 का नकारात्मक प्रभाव भारत की महिलाओं पर शेष विश्व की महिलाओं की तुलना में अधिक पड़ा। उन्हें एशिया प्रशांत देशों में सर्वाधिक लैंगिक भेदभाव झेलना पड़ा और वे समान वेतन तथा समान अवसरों के लिए संघर्ष करती नजर आईं।

वर्ल्ड जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 कहती है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो दुनिया को लैंगिक समानता का लक्ष्य हासिल करने में 135.6 वर्ष लग जाएंगे। भारत के संबंध यह अवधि कितनी होगी इसकी कल्पना करते भी भय लगता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का प्रारंभिक इतिहास सीधे-सीधे कामकाजी महिलाओं और श्रमिकों से जुड़ता है जब 8 मार्च 1908 को न्यूयॉर्क की सड़कें 15000 महिलाओं के विरोध-प्रदर्शन की गवाह बनी थीं। इनकी मांगें काम के घण्टों में कमी और वेतन वृद्धि से जुड़ी थीं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की लंबी यात्रा के बावजूद नारी श्रम को स्वीकृति और सम्मान नहीं मिल पाया है।

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नारी श्रम को तुच्छ, महत्वहीन और नगण्य समझना पुरुषवादी अर्थ व्यवस्था की सहज प्रवृत्ति है। एनएफएचएस-5 के अनुसार पिछले 12 महीनों में 15-49 आयु वर्ग की काम करने वाली महिलाओं में से केवल 25.4 प्रतिशत को नकद भुगतान मिला। ऑक्सफेम की 2019 की ‘माइंड द गैप : स्टेट ऑफ एम्प्लायमेंट इन इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार भारतीय महिलायें समेकित रूप से प्रतिदिन 1640 करोड़ घंटो का ऐसा कार्य करती हैं जिसके बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलता। ओईसीडी के आंकड़े कहते हैं कि भारतीय पुरुष प्रतिदिन केवल 56 मिनट घरेलू कार्य को देते हैं जबकि महिलाओं के लिए यह अवधि 353 मिनट प्रतिदिन है। भारत सरकार का टाइम यूज़ सर्वे 2019 बताता है कि कामकाजी आयु की 92 प्रतिशत महिलाएं औसतन प्रतिदिन पांच घण्टे पन्द्रह मिनट घरेलू कार्यों में व्यतीत करती हैं। विशेषज्ञों द्वारा किए गए अध्ययन हमारी 35 करोड़ घरेलू महिलाओं के श्रम के मूल्य को 613 अरब डॉलर तक आंकते हैं। इन सारे आंकड़ों की विचित्रता यह है कि पुरुष चाहे अनपढ़ हो या उच्च शिक्षित घरेलू कार्य से दूरी बनाकर रखता है और उच्च शिक्षित महिला पर भी अनपढ़ महिला जितना ही घरेलू कार्य का बोझ रहता है।

हाल ही में हुए कुछ सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि अनेक मानकों पर हमारी महिलाओं की स्थिति जरा बेहतर हुई है। एनएसएस (75वां दौर, जुलाई 2017 – जून 2018) के अनुसार अब भारत की महिलाओं में साक्षरता दर 70 प्रतिशत है। भारत सरकार का आल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन 2019-20 कहता है कि उच्च शिक्षा में भी महिलाओं का नामांकन पुरुषों के समान स्तर पर पहुंच रहा है और उच्च शिक्षा में नामांकित विद्यार्थियों में महिलाओं की संख्या अब 39 प्रतिशत है। लेकिन यह भी गौरतलब है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग की शिक्षा में महिलाओं की उपस्थिति नगण्य-सी ही है।

नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के पैरोकार यह मानते हैं कि यह आर्थिक समृद्धि का द्योतक है। परिवार में कमाने वाले पुरुषों की आय बढ़ी है, इस कारण महिलाओं को काम पर जाने की जरूरत नहीं है। इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली एवं कुछ अन्य संस्थाओं के सर्वेक्षण बताते हैं कि यदि परिवार में पुरुष की कमाई ठीक ठाक है तो लगभग 40 प्रतिशत पुरुष और महिलाएं दोनों यह चाहते हैं कि महिलाएं घर पर रहें।

एनएफएचएस-5 के आंकड़े भी कुछ क्षेत्रों में महिलाओं की बेहतर स्थिति का संकेत देते हैं। एनएफएचएस-4 के अनुसार 84 प्रतिशत विवाहित भारतीय महिलाएं परिवार के महत्वपूर्ण निर्णयों में हिस्सेदारी करती थीं जबकि अब यह  88.7 प्रतिशत हैं। एनएफएचएस-4 के अनुसार 45.9 प्रतिशत महिलाओं के पास मोबाइल फोन था जो अब बढ़कर 54 प्रतिशत हो गया है। जबकि वे महिलाएं जिनके  बैंक खाते हैं उनकी संख्या एनएफएचएस-4 के 53 प्रतिशत से बढ़कर 78.6 प्रतिशत हो गई है।

किंतु इन तमाम मानकों में आए मामूली सुधार का असर महिलाओं की बढ़ती आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक शक्ति के रूप में क्यों नहीं दिखता, इसका अन्वेषण आवश्यक है।

यदि विगत कुछ वर्षों के एनएसएसओ और पीरियाडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे को आधार बनाया जाए तो पिछले तीन दशकों के दौरान लेबर फ़ोर्स में महिलाओं की उपस्थिति में भारी कमी आई है। कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 1999-2000 में 41 प्रतिशत थी जो 2011-12 में घटकर 32 प्रतिशत रह गई और 2019 के आंकड़ों के अनुसार यह 20.3 प्रतिशत है। बांग्लादेश और श्रीलंका के लिए यह आंकड़े क्रमशः 30.5 और 33.7 प्रतिशत हैं। मैकिंसी की 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार कार्यबल में महिलाओं की संख्या में दस प्रतिशत की वृद्धि हमारी जीडीपी में 770 बिलियन डॉलर का इजाफा कर सकती है।

इस गिरावट की अनेक व्याख्याएं हैं। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के पैरोकार यह मानते हैं कि यह आर्थिक समृद्धि का द्योतक है। परिवार में कमाने वाले पुरुषों की आय बढ़ी है, इस कारण महिलाओं को काम पर जाने की जरूरत नहीं है। इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली एवं कुछ अन्य संस्थाओं के सर्वेक्षण बताते हैं कि यदि परिवार में पुरुष की कमाई ठीक ठाक है तो लगभग 40 प्रतिशत पुरुष और महिलाएं दोनों यह चाहते हैं कि महिलाएं घर पर रहें। गरीबी और भुखमरी के तांडव तथा बढ़ती बेरोजगारी एवं घटती पगार के बीच यह व्याख्या पूर्णतः अस्वीकार्य है।

महिला श्रमिकों की घटती संख्या के सरकारी आंकड़ों पर चर्चा करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह क्षेत्र जिनमें महिला श्रमिकों की संख्या सर्वाधिक है इन आंकड़ों का हिस्सा नहीं है। यदि घरेलू कार्य विषयक आंकड़ों का ही समावेश इनमें कर दिया जाए तो महिलाओं का लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन 81 प्रतिशत हो जाएगा।

दरअसल लेबर पार्टिसिपेशन रेट में गिरावट को सरल शब्दों में समझाएं तो यह कहा जा सकता है कि भारत में कार्य करने योग्य आयु की 80 प्रतिशत महिलाएं जीविकोपार्जन न करते हुए घरेलू तथा अन्य अवैतनिक कार्यों में लगी हुई हैं। कृषि महिलाओं को रोजगार देने का सबसे बड़ा जरिया था किंतु कृषि के निजीकरण ने यंत्रीकरण को बढ़ावा दिया है और मानव श्रम की आवश्यकता कम हुई है। कृषि में महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए रोजगार के अवसर कम हुए हैं। पुरुष तो छोटे-मझोले शहरों एवं महानगरों को पलायन कर प्रवासी मजदूर बन गए हैं, महिलाएं गांवों में छूट गई हैं। बड़ी संख्या में सस्ते पुरुष श्रमिक, महिलाओं के सम्मुख चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं और महिलाओं के लिए आरक्षित समझे जाने वाले कार्यों को छोड़कर अन्य कार्यों में उन्हें महिलाओं पर वरीयता भी मिल रही है। कृषि के बाद टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट्स इंडस्ट्री महिलाओं को रोजगार देने के मामले में दूसरे क्रम पर हैं, जहाँ कार्यरत साढ़े चार करोड़ श्रमिकों में 75 प्रतिशत महिलाएं हैं किंतु वहां भी बड़े खिलाड़ियों के प्रवेश ने रोजगार घटाए हैं। अनेक कार्य कानूनन और अन्य अनेक कार्य परंपरा द्वारा पुरुषों के लिए आरक्षित हैं और इनमें महिलाओं को अवसर देने पर विचार तक नहीं किया जाता।

नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमी रिसर्च का आकलन है कि भारत में 97 प्रतिशत महिला श्रमिक असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं। आईएलओ के विशेषज्ञों के अनुसार असंगठित क्षेत्र हेतु निर्मित की वाली नीतियों की सबसे बड़ा दोष यह है कि इनके निर्माण के पूर्व विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं की संख्या से सम्बंधित डाटा एकत्र नहीं किया जाता है। महिला श्रमिकों की घटती संख्या के सरकारी आंकड़ों पर चर्चा करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह क्षेत्र जिनमें महिला श्रमिकों की संख्या सर्वाधिक है इन आंकड़ों का हिस्सा नहीं है। यदि घरेलू कार्य विषयक आंकड़ों का ही समावेश इनमें कर दिया जाए तो महिलाओं का लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन 81 प्रतिशत हो जाएगा।

सरकार ने नवंबर 2018 में घोषणा भी की कि अब वह महिलाओं को मिलने वाले मातृत्व अवकाश के 7 हफ्ते का वेतन कंपनियों को लौटाएगी। किंतु वस्तुस्थिति यह है कि हर वर्ष लगभग तीन करोड़ महिलाएं गर्भवती होती हैं लेकिन इस कानून का लाभ केवल एक लाख महिलाओं को मिलता है।

समान मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व अवकाश एवं मातृत्व से जुड़ी अन्य सुविधाएं तथा यौन शोषण से सुरक्षा तो असंगठित क्षेत्र में कार्य करने वाली महिलाओं के लिए एक सपना भर हैं। वैसे भी हमारी न्याय व्यवस्था एवं कानूनों में पितृसत्ता की गहरी छाप है किंतु कुछ कानून जो महिलाओं के पक्ष में बनाए भी गए हैं उनके क्रियान्वयन को भी व्यवस्था में व्याप्त पुरुष वर्चस्व बाधित करता है और इन्हें अप्रभावी बना देता है।

अध्ययनों के अनुसार हमारा श्रम बाजार पुरुषों की तुलना में  महिलाओं को उनके श्रम की आधी कीमत ही देता है। यहां तक कि निजी क्षेत्र में सुपरवाइजर स्तर पर भी महिलाओं को भी उनके पुरुष समकक्षों से 20 प्रतिशत कम वेतन मिलता है।

मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 में 26 हफ्ते के सवैतनिक प्रसूति अवकाश के साथ-साथ अनिवार्य क्रैच सुविधा का प्रावधान किया गया है। इसका परिणाम यह देखने में आया कि निजी क्षेत्र के नियोक्ता महिलाओं को काम पर रखने से परहेज करने लगे और गर्भवती महिलाओं के लिए ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने लगे कि वे नौकरी छोड़ दें। सरकार ने नवंबर 2018 में घोषणा भी की कि अब वह महिलाओं को मिलने वाले मातृत्व अवकाश के 7 हफ्ते का वेतन कंपनियों को लौटाएगी। किंतु वस्तुस्थिति यह है कि हर वर्ष लगभग तीन करोड़ महिलाएं गर्भवती होती हैं लेकिन इस कानून का लाभ केवल एक लाख महिलाओं को मिलता है।

भारत में लैंगिक समानता की राह इस कारण भी कठिन है कि एक तो स्त्रियों का प्रतिनिधित्व राजनीति में कम है दूसरे जो महिलाएं राजनीति के शीर्षस्थ पदों पर मौजूद हैं वे भी सत्ता संचालन में पुरुषवादी दृष्टिकोण का आश्रय लेती हैं। वर्तमान संसद में केवल 14 प्रतिशत महिलाएं हैं। इनमें से कुछ केंद्र सरकार में वरिष्ठ पदों पर भी हैं।

ह्यूमन राइट्स वॉच (अक्टूबर-2020) का एक सर्वेक्षण  यौन उत्पीड़न कानून लागू करने के सीमित सरकारी प्रयासों की चर्चा करता है और यह विशेष उल्लेख करता है कि  अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र की महिलाओं एवं सरकारी के कल्याणकारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में लगे महिला कार्यबल की तो इस संबंध में लगभग अनसुनी ही की जाती है। लगभग यही नतीजे इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन द्वारा कराए गए सर्वेक्षण (2017) के हैं। इसके अनुसार रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों में यौन उत्पीड़न की मौजूदगी है। अधिकतर महिलाएं लांछन, प्रतिशोध के भय, लज्जा, रिपोर्ट दर्ज कराने विषयक नीतियों के बारे में जागरूकता के अभाव अथवा निराकरण तंत्र के प्रति अविश्वास के कारण उत्पीड़न की रिपोर्ट ही दर्ज नहीं करातीं।

यौन उत्पीड़न के विषय में न तो कोई प्रामाणिक अध्ययन किया गया है, न ही कोई अधिकृत आंकड़े इसके विषय में हैं। परिवार में इसका जिक्र डर के कारण नहीं किया जाता, डर इस बात का कि अधिकतर मामलों में परिवार नौकरी ही छुड़वा देता है। यह बताना भी कठिन है कि यौन उत्पीड़न कितने प्रतिशत महिलाओं के नौकरी छोड़ने हेतु उत्तरदायी है।

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इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पापुलेशन साइंसेज (नोडल एजेंसी, एनएफएच 4) और आईसीएफ, यूएसए के अनुसार, भारत में कामकाजी महिलाओं के शारीरिक हिंसा का सामना करने की आशंका अधिक है। शारीरिक हिंसा झेलने वाली ग़ैर–कामकाजी महिलाओं की संख्या 26 प्रतिशत है जबकि 40 प्रतिशत कामकाजी महिलाओं को शारीरिक हिंसा झेलनी पड़ी है।

एक भ्रम यह भी फैलाया जाता है कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था महिलाओं की आर्थिक मुक्ति का कारण बनेगी। जबकि सच्चाई यह है कि इसके कारण संगठित क्षेत्र सिकुड़ा है और असंगठित क्षेत्र की शोषणमूलक प्रवृत्तियां खुलकर अपनाई जा रही हैं। ठेका पद्धति और संविदा नियुक्ति की परिपाटी बढ़ी है और महिलाएं इनका आसान शिकार बनीं हैं क्योंकि निरीह, असंगठित महिलाओं से कम वेतन पर मनमाना काम लिया जा सकता है और जब चाहे इन्हें नौकरी से हटाया जा सकता है। रैंडस्टड का जेंडर परसेप्शन सर्वे 2019 दर्शाता है कि 63 प्रतिशत महिलाओं ने निजी क्षेत्र में नौकरी पर रखते समय लैंगिक भेदभाव का या तो सामना किया है या वे ऐसी किसी महिला को जानती हैं जो नियुक्ति के दौरान लैंगिक भेदभाव का शिकार हुई है। यह भेदभाव वेतनवृद्धि और पदोन्नति में भी देखा गया है।

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हमारे देश में मात्र 20% उद्यमों पर महिलाओं का स्वामित्व है। केवल 6% महिलाएंँ भारतीय स्टार्टअप्स की संस्थापक हैं। महिला संस्थापकों वाले स्टार्टअप्स सकल इन्वेस्टर फंडिंग का सिर्फ 1.43% भाग ही प्राप्त कर सके। 69 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि सांस्कृतिक एवं निजी अवरोध एक उद्यमी के रूप में उनकी यात्रा को कठिन बनाते हैं। एक विश्लेषण के अनुसार उद्योगों में महिला नेतृत्वकर्ताओं की संख्या पुरुषों की तुलना में आधे से भी कम है।

भारत में लैंगिक समानता की राह इस कारण भी कठिन है कि एक तो स्त्रियों का प्रतिनिधित्व राजनीति में कम है दूसरे जो महिलाएं राजनीति के शीर्षस्थ पदों पर मौजूद हैं वे भी सत्ता संचालन में पुरुषवादी दृष्टिकोण का आश्रय लेती हैं। वर्तमान संसद में केवल 14 प्रतिशत महिलाएं हैं। इनमें से कुछ केंद्र सरकार में वरिष्ठ पदों पर भी हैं। किंतु यह भी उस विचारधारा का समर्थन करती दिखती हैं जो हमारे संविधान को मनुस्मृति से प्रतिस्थापित करने का स्वप्न रखती है, वही मनुस्मृति जिसके अनुसार महिलाओं को बाल्यावस्था में पिता, वयस्क होने पर पति और वृद्धावस्था में बेटों के नियंत्रण में रखना आवश्यक है।

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डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र लेखन करते हैं और रायगढ़ में रहते हैं।

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