व्यवस्था ने जिन्हें बीहड़ों में जाने को मजबूर किया  

राकेश कबीर

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 वे अपनी संवेदनाओं और समझ से रॉबिनहु भी बने और आततायी भी

अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सन 1830 में ठगी एवं डकैती विभाग का गठन किया तथा 1836 में उनकी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए कानून भी बना दिया. साहित्य में भी डाकुओं को स्थान मिला. सुरेन्द्र मोहन पाठक का उपन्यास पैंसठ लाख की डकैती तथा बर्मा के डाकुओं के ऊपर रुडयार्ड किपलिंग की किताब द टेकिंग ऑफ़ लुंगतुंगपेन लिखी गयी. बर्मा के डाकुओं के जीवन पर ही साक्स रोह्मर ने डॉ फू मांचू नामक किताब लिखी थी. बॉलीवुड फिल्मों में डकैती वाली फिल्मों ने अलग जेनर ही स्थापित किया. काले कुरते और सफेद धोती में माथे पर काला टीका लगाये अपने घोड़े पर सवार जय माँ भवानी का उद्घोष करते डाकू की छवि दर्शकों के जेहन में बस गयी. गब्बर एक आधुनिक डाकू के रूप में सामने आया जो आर्मी और पुलिस की तरह ड्रेस पहने सिल्वर स्क्रीन पर अवतरित हुआ और इतना लोकप्रिय हुआ कि मिथक ही बन गया. डाकू, अंडरवर्ल्ड, गुंडे और बदमाशों पर फ़िल्में बनती हैं तो दूसरी तरफ उनको समाप्त करने के लिए पुलिस, पैरामिलिट्री और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के लिए फिल्म में जगह बन ही जाती है. रामगोपाल वर्मा ने जंगली डाकुओं से लेकर स्वयम्भू सरकारों और अंडरवर्ल्ड डॉन तक सभी के उपर फ़िल्में बनाई जो भारत राष्ट्र-राज्य और कानूनों के सामने चुनौती खड़े करते रहे. बॉलीवुड फिल्मों के कुछ डाकुओं जैसे गब्बर सिंह (शोले), जगीरा (चाइनागेट) और गुर्जर (मेला) को छोड़कर ज्यादातर डाकू भारतीय समाज में व्याप्त गरीबी, असमानता, अत्याचार, भेदभाव, शोषण और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और निर्णायक लड़ाई लड़ने के लिए बागी होकर हथियार उठाते हैं. इतिहासकार रंजीत गुहा के ‘सबालटर्न पर्सपेक्टिव’ ने ग्रामीण पृष्ठभूमि के इन डाकुओं को पीजेंट इन्सर्जेंट कहा. भारतीय जातीय स्तरीकरण में निहित ऊँच-नीच के भेदभाव और शोषण ने कमजोर वर्ग/जाति के लोगों को डाकू बनने को मजबूर किया. अन्य अपराधियों और डाकुओं में एक विशेष अंतर यह है कि डाकू समाज से अलग होकर जंगलों और बीहड़ों में शरण ले लेते हैं. वे खुद को बाग़ी कहते हैं. पान सिंह तोमर का डाकू पान सिंह कहता भी है ‘बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत तो पार्लियामेंट में मिलते हैं’. ये बागी/डाकू प्रायः रात के अँधेरे में अपने पूर्व निर्धारित लक्ष्य पर हमला करते हैं. उनकी अपनी एक गुप्तचर व आपूर्ति व्यवस्था भी होती है जो सूचनाएं, हथियार, गोला-बारूद एवं खाद्य-रसद की आपूर्ति भी करती है. लूटे हुए माल को बाजार में विक्रय करने के लिए भी वे अपना एक नेटवर्क विकसित करते हैं. वे जंगल या बीहड़ में जाकर एक गैंग के साथ रहते हैं. उनका टार्गेट एक वर्ग विशेष होता हैं. अर्थात डाकू वर्ग चेतना से लैस व्यक्तियों का समूह होता है जो एक उदेश्य से प्रेरित होकर काम करता है. कुछ डाकू गैंग अपने घर छोडकर नहीं जाते हैं परन्तु उनका भी एक गैंग होता है और वे कभी-कभी अपने सदस्यों को  एकत्र करके रात के अँधेरे में किसी गाँव में कुछ घरों में डकैती डालते हैं जहां कम समय और संसाधन खर्च करके ज्यादा पैसा, गहने और बंदूके लूटी जा सकें. समृद्ध ग्रामीण परिवारों में धन, गहने और बंदूकें लूटने की कहानियाँ हमारे गाँव-घरों में आज भी कही सुनी जाती हैं. ऐसे डाकुओं का अब समाज में घोर अभाव है. सभी डाकूओं का उदेश्य लूटपाट और अपने टारगेट के व्यक्तियों, जातीय समूहों या धर्म के लोगों की हत्या करना भी होता है. कुछ डाकू रॉबिनहुड टाइप के होते हैं जो लूटपाट करने के बाद अपने और अपने गैंग के सद्स्यों कि जरूरतों के बाद बचे धन को गरीबों और जरूरतमंदों में बाँट देते हैं. नदियों किनारे के निर्जन और बीहड़ क्षेत्र तथा सघन वन क्षेत्र अपनी दुर्गमता की वजह से डाकुओं के सुरक्षित आश्रय स्थल होते हैं. डाकुओं को फिल्मी कलाकार भी पसंद होते हैं. वीरप्पन ने तो साउथ फिल्मों के सुपरस्टार राजकुमार का ही अपहरण कर लिया था.

“सदरलैंड का सफेदपोश अपराध/अपराधी की अवधारणा के फ्रेम में देखें तो समाज में रहकर माफियागिरी करने वाले  गुंडा तत्व प्रभाव और सम्मान और धन अर्जित करते रहते हैं. वे योजनबद्ध तरीके से काम करते हुए आगे भी बढ़ते रहते हैं. उनके काले कारनामे जानते हुए भी कोई डर के मारे उनके खिलाफ मुंह नहीं खोलता है. बदमाशी का काम चौराहे की दादागिरी और दबंगई से लेकर अंडरवर्ल्ड डॉन तक फैला हुआ है. गाँव, शहर लेकर महानगर तक और उससे भी आगे अन्तराष्ट्रीय स्तर एक निरन्तरता बनाती है. फिल्मों ने इन सबको परदे पर जगह दिया है.” ]

डाकुओं का भी जाति और वर्ग-चरित्र होता है

 गुंडे-माफिया और भांति-भांति के अपराधी जो शिक्षा, शराब, केबल चैनेल, प्रोपर्टी डीलिंग, ठेकेदारी आदि के क्षेत्र में अवैध तरीके से कार्य करते हैं लेकिन उनके डर और प्रभाव से कोई भी व्यक्ति उनके कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर पाता. वे अपने पूरे प्रभाव से समाज में रहकर कार्य करते हैं और गैर-कानूनी तरीकों से खूब धनार्जन करते हैं. उन्हें अपना घर परिवार छोड़कर किसी बीहड़ या जंगल में नहीं जाना पड़ता. बीच-बीच में कुछ दिनों के लिए वे जेल जरुर जाते हैं लेकिन जैसे-जैसे उनके विरुद्ध मुकदमों की संख्या बढ़ती जाती है और पुलिस थाने में हिस्ट्री शीट रूपी उनका बायोडाटा समृद्ध होता रहता है उसी अनुपात समाज में उनके प्रभाव में वृद्धि होती जाती है. इस वर्ग के अपराधी जैसे जैसे बदनाम होते जाते हैं उनका काम आसान होता जाता है. वे बड़ी आसानी से किसी की जमीन और घर कब्जा कर लेते हैं, कम दामों में खरीद लेते हैं. उनकी पंचायतों में बड़े-बड़े मामले बिना किसी कोर्ट या वकील के निपट जाते हैं. फैसला किसके पक्ष में जाएगा इसको जानने के लिए बहुत दिमाग लगाने की जरूरत नहीं होती है. उनके दरबार में हर काम का दाम तय होता है. डाकुओं की प्रवृत्ति और उनके उद्देश्यों को देखते हुए उनकी कुछ श्रेणियां बनायी जा सकती हैं:

प्रभुत्वशाली डाकू –मजबूत कद काठी वाले लोग छोटी मोटी चोरी, राहजनी करते-करते बड़े अपराधी और डाकू बन जाते हैं. अपने स्थानीय क्षेत्रों में प्रभावशाली रहे लोग आसानी से धन कमाने और लोगो पर अपना रौब गाठने के लिए गिरोह बना लेते हैं. गिरोह के डर के सहारे वे अपनी सत्ता और परम्परागत प्रभुत्व को बनाये रखने का प्रयास करते हैं. 

जातीय द्वंद आधारित डाकू गैंग—मल्लाह गैंग, ठाकुर गैंग. बॉलीवुड फिल्मों में अक्सर यह दिखाया जाता है कि दो परिवारों या जातियों में आपसी संघर्ष होने पर किसी एक जाति के सताए गए लोग प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर डाकू बन जाते हैं. उनका मुख्य उद्देश्य अपने विपक्षियों से संहार या अपमान का बदला लेना होता है. चम्बल के बीहड़ों में मल्लाह, यादव और ठाकुर गैंग सामने आते रहे हैं. इन डाकुओं के जीवन पर बायोपिक फ़िल्में बंटी रही हैं जैसे कि डाकू मान सिंह, बैंडिट क्वीन (फूलन देवी), पान सिंह तोमर, तानाशाह (ददुआ)

“उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा पर गंडक नदी के दोनों तरफ जंगल पार्टी के डाकुओं का खूब राजनीतिक दखल रहा. संजीव के उपन्यास ’जंगल जहाँ शुरू होता है’ इन डाकुओं का बृहद चित्रण है.”

महिला गैंग– चम्बल के बीहड़ में कई महिला डाकुओं के नेतृत्व में भी गैंग बने. फूलन देवी, सीमा परिहार, पुतलीबाई, कुसुमा नाइन, रेणु यादव इनमें कुछ प्रमुख महिला डाकू हैं.

सदरलैंड का सफेदपोश अपराध/अपराधी की अवधारणा के फ्रेम में देखें तो समाज में रहकर माफियागिरी करने वाले  गुंडा तत्व प्रभाव और सम्मान और धन अर्जित करते रहते हैं. वे योजनबद्ध तरीके से काम करते हुए आगे भी बढ़ते रहते हैं. उनके काले कारनामे जानते हुए भी कोई डर के मारे उनके खिलाफ मुंह नहीं खोलता है. बदमाशी का काम चौराहे की दादागिरी और दबंगई से लेकर अंडरवर्ल्ड डॉन तक फैला हुआ है. गाँव, शहर लेकर महानगर तक और उससे भी आगे अन्तराष्ट्रीय स्तर एक निरन्तरता बनाती है. फिल्मों ने इन सबको परदे पर जगह दिया है.

डाकूओं पर आधारित फ़िल्में

दो आंखें बारह हाथ (1957), मदर इंडिया (1957), जिस देश में गंगा बहती है (1960), गंगा जमुना (1961), मुझे जीने दो (1963), मेरा गांव मेरा देश (1971), डाकू मान सिंह (1971), रेशमा और शेरा (1971), सुल्ताना डाकू -1972, पुतली बाई-1972, बिंदिया और बंदूक(1973), कच्चे धागे (1973), शोले (1975), चम्बल की कसम (1980), डकैत (1987), डाकू हसीना (1987), दाता (1989) खलनायक -1993, बैंडिट क्वीन (1994), चाइना गेट-1998, मेला (2000), जंगल (2000), आँखें (2002), धूम (2004 तीन फ़िल्में), वुंडेड (2006-सीमा परिहार),पान सिंह तोमर (2010), किक (2014), वीरप्पन (2016), दद्दा मलखान सिंह (2016), सोन चिड़िया (2019), तानाशाह (2020).पाइरेट्स ऑफ़ द कैरेबियन (2003 कुल 5 फ़िल्में)

“फूलन देवी की जीवनी इंडिया’स बैंडिट क्वीन: द ट्रू स्टोरी ऑफ़ फूलन देवी’ की लेखिका माला सेन लिखती हैं, ‘’ग्रामीण भारत के इतिहास में कभी भी एक निम्न जाति की महिला ने इतनी बड़ी संख्या में पुरुषों की हत्या नहीं की’’. ब्रिटेन के ब्रिक्सटन मार्किट में फूलन देवी के चित्र के साथ ‘वाइल्ड वूमन’ लिखे टी-शर्ट बेचकर उनके विद्रोह के प्रति सम्मान व्यक्त किया. दुनिया भर के फेमिनिस्टों ने भी उन्हें सम्मान से याद किया. रिचर्ड शेयरस एवं इसाबेल गिडले ने ‘देवी: द बैंडिट क्वीन’ नाम से किताब लिखी. राजेश्वरी सुंदर राजन लिखती हैं कि, ‘’सन 1994 में उनके जेल से छूटने के बाद ‘आई, फूलन देवी: द ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ इंडिया’स बैंडिट क्वीन’ भी छपी जो ग्वाटेमाला के डाकू पर गवाही के आधार पर लिखी गयी पुस्तक ‘आई, रिगोबर्ता मेंचू’ की याद दिलाती है’’.

डाकुओं के जीवन पर बनी बायोपिक फिल्मों के अतिरिक्त अन्य फिल्मों की भी मिलती जुलती कहानियाँ रही हैं. फिल्म पत्थर और पायल (1974) में दो भाइयों के माता-पिता को झूठी गवाही के कारण कोर्ट से फांसी की सजा होने के बाद प्रतिशोध में उनके डाकू बनने की कहानी है. धर्मेन्द्र विनोद खन्ना और हेमा मालिनी इस फिल्म में मुख्य भूमिकाओं मे थे. मदर इंडिया 1957 में जमींदार के अंतहीन शोषण से तंग आकर एक किसान का बेटा बिरजू (सुनील दत्त) डाकू बन जाता. वह अनपढ़ लड़का डाकू बनने के पहले गांव के साहूकार-जमींदार की पोथी को पढने की इच्छा रखता है और अपनी प्रेमिका से कहता है कि मैं जानना चाहता हूँ कि इन लाल पोथियों में कौन सी विद्या लिखी है कि हर साल खलिहान से सारा अनाज लाला को देने की बाद भी उसका कर्ज कभी खत्म ही नहीं होता. डाकू बनने के बाद बिरजू सुखीलाला की पोथियों को जला देता है ताकि वह अपन परिवार और गाँव के गरीब किसानों को लाला के शोषण से हमेशा के लिए मुक्त कर सके. धर्मेन्द्र अनीता राज और मिथुन अभिनीत फिल्म गुलामी में भी जमींदार की पोथियों को जलाने का दृश्य है. जिस तरह गाँव-गाँव किसानों जमींदारों और साहूकारों में संघर्ष हुए फिल्मी पर्दे पर भी उनके संघर्षों को जगह मिली. ये फ़िल्में अपने समय की दस्तावेज हैं और आगे आने वाली पीढ़ियों को अन्याय से लड़ने की प्रेरणा देती हैं.

जिस देश में गंगा बहती है (1960) ने डाकुओं पर फिल्म निर्माण का एक ट्रेंड शुरू किया था. इस फिल्म में प्रख्यात अभिनेता प्राण ने राका डाकू की भूमिका की थी.  आवारा (1951) फिल्म में भी डाकू जग्गा की कहानी फिल्माई गयी थी. मुझे जीने दो (1963) चम्बल घाटी के डाकू मान सिंह के जीवन पर केन्द्रित थी. यह फिल्म चम्बल किनारे स्थित मध्य प्रदेश के भिंड और मुरैना जनपदों के बीहड़ में शूट की गयी थी. बॉलीवुड के सभी बड़े हीरो ने परदे पर डाकू की भूमिका की. दिलीप कुमार ने आजाद (1955) और गंगा जमना (1961), राजेन्द्र कुमार ने सूरज (1966), सुनील दत्त ने मुझे जीने दो (1963) और रेशमा और शेरा (1971), प्राण जाये पर वचन न जाए (1974), हीरा(1973), सहित कुल 17 फिल्मों में डाकू का रोल किया. उनकी दमदार आवाज और प्रभावी व्यक्तित्व, डरावनी आँखें और घनी मूंछें डाकू की भूमिका में जान डाल देती थीं. फिरोज खान ने भी मेला (1971) फिल्म में डाकू शक्ति सिंह की भूमिका अदा की. अमीर खान अभिनीत मेला फिल्म में डाकू निर्भय सिंह गुज्जर मौजूद था. धर्मेन्द्र ने समाधि (1972) और पत्थर और पायल (1974) में तो अमिताभ ने गंगा की सौगंध (1978) में डाकू बने. राजेश खन्ना जैसे रोमांटिक छवि के अभिनेता ने भी  फिल्म भोला भाला (1978) और धर्म कांटा (1982) में डाकू बनकर इस जेनर की फिल्मों में अपना नाम दर्ज कराया. सन्नी देओल डकैत () तथा संजय दत्त जय विक्रान्ता (1995) फिल्म में डाकू बने. वास्तविक जीवन के साथ फिल्मी परदे के डाकुओं में दो तरह के चरित्र मिलते हैं एक अच्छे दिल वाले और दूसरे निर्मम हत्यारे डाकू. राका (जिस देश में गंगा बहती है 1960), जग्गा (आवारा 1951), शमशेर सिंह (ज्वाला डाकू-1981) और ‘गंगा और सूरज’ (1980) फिल्मों के ये डाकू बहुत ही निर्दयी और बुरी प्रवृत्ति के हैं जो लूट करने के साथ ही निर्दोष लोगों की हत्या और महिलाओं का बलात्कार तक करते हैं. विनोद खन्ना ने मेरा गाँव मेरा देश, पत्थर और पायल तथा कच्चे धागे जैसी फिल्मों में डाकू की भूमिका करके काफी प्रसिद्धि अर्जित की.

सुल्ताना डाकू, फूलन देवी और वीरप्पन के जीवन पर आधारित फ़िल्में बनी. अनुराग कश्यप द्वारा निर्मित गैंग्स ऑफ़ वासेपुर (2012) अत्यधिक सफल और चर्चित फिल्म थी जिसने झारखंड के कोयला खदानों के आसपास विकसित माफिया गैंगों को फिल्मी पर्दे पर प्रस्तुत किया था. सुल्ताना डाकू की प्रेमिका और पत्नी पुतलीबाई के नाम पर सन 1972 और 1999 में दोबार फ़िल्में बनी. शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन (1996) फूलन देवी के जीवन पर बनी फिल्म थी तो  तिग्मांशु धुलिया निर्देशित पान सिंह तोमर (2012) में इरफ़ान खान को लीड रोल की अदाकारी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. चम्बल के एक बागी डाकू जीवन पर आधारित इस फिल्म का निर्माण ‘हासिल’ फेम तिग्मांशु धुलिया ने किया था. पान सिंह तोमर सन 1981 में एक पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था. दक्षिण भारत के सत्यमंगलम जंगलों के चन्दन तस्कर और क्रूर डाकू वीरप्पन के जीवन पर मशहूर फिल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा ने वीरप्पन (2016) फिल्म बनाया था. उसके पूर्व जंगली डाकुओं के जीवन पर जंगल (2000) नाम से एक फिल्म पहले भी बना चुके थे. इस फिल्म में सुशांत सिंह ने डाकू की भूमिका करके कई पुरस्कार जीते थे. महिला डाकू सीमा परिहार के जीवन पर वुंडेड (2006) नाम से फिल्म बनी थी जिसमे सीमा परिहार ने खुद डाकू की भूमिका की थी. शोले (1975) फिल्म का गब्बर जनता का सर्वाधिक प्यार और प्रसिद्धि पाने वाला डाकू है. गब्बर सिंह का चरित्र रियल लाइफ के एक डाकू ‘गबरा’ के जीवन से प्रेरित था. मध्य प्रदेश के भिंड जिले का निवासी गबरा डाकू सन 1950-60 के दशक में सक्रिय था. शोले फिल्म के सम्वाद सलीम-जावेद की मशहूर जोड़ी ने लिखा था. सलीम साहब के पिताजी इंदौर सम्भाग के पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआइजी) थे और उन्होंने ही सलीम खान को गब्बर सिंह डाकू के बारे में उन्हें बताया था. गब्बर सिंह एक खूंखार डाकू होने के बावजूद अपने स्टाइल, सम्वाद अदायगी, तम्बाकू के बटुवे, तम्बाकू खाकर थूकने और पहनावे के कारण अम्र चरित्र बन गया. सुल्ताना डाकू और गब्बर सिंह के नाम पर गाँव में नौटंकी खेलना हमने बचपन में देख रखा है.

“ऐसी फिल्मों को देखकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दर्शकों को अन्याय, अपमान और अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने की प्रेरणा मिलती है. यही सिनेमा की सार्थकता भी है. सुनील दत्त अकेले 17 फिल्मों में डाकू बने हैं. ‘मदर इण्डिया’ एवं ‘रेशमा और शेरा’ फिल्मों में वे डाकू बनकर जनता के हित में लड़ते दिखाई देते हैं. विनोद खन्ना भी कई फिल्मों में डाकू की भूमिका में दिखे हैं. संजय दत्त खलनायक फिल्म में डाकू की भूमिका में थे”

डकैतों के जीवन पर कुछ महत्वपूर्ण फिल्में

डकैत (1987) फिल्म चम्बल के बीहड़ में स्थित एक गाँव की कहानी है जहां आजादी के बाद लोग खुली हवा में सांस लेना चाहते हैं लेकिन पूर्व जमींदार भैरव सिंह को ये हरगिज बर्दाश्त नही कि लोग उसके सामने सिर उठाकर चलें, उसे जवाब दें या जमीन के मालिक बनकर खेती करें. वह एक-एक कर गाँव के सभी किसानों को अपने कर्ज के जाल में फंसाकर तथा साम, दाम, दण्ड, भेद किसी भी तरीके से उनकी जमीनों को अपने कब्जे में ले लेना चाहता है. अर्जुन यादव शहर में पढ़ लिखकर गाँव में लौटता है तो कुछ आधुनिकतावादी और संवैधानिक मूल्यों की वकालत करता है. इलाके के एसपी के कहने से वह अपने बचपन के साथी डाकू माखन मल्लाह से वापस गाँव में लौटने का संदेश लेकर जाता है. वह एक मीटिंग में जमींदार से भी बड़ी विनम्रता से नियम कानून और बराबरी वाला व्यवहार करने की सलाह देता है लेकिन घमंडी और जातिवादी जमींदार भैरो सिंह अर्जुन को सबक सिखाने के लिए इलाके के भ्रष्ट दरोगा पांडे का सहारा लेता है. इस कार्यवाही के बाद अर्जुन के तेवर बागी हो जाते हैं. इसी बीच ठाकुर पूरे गाँव के सामने अर्जुन की माँ और बहन की बेईज्जती करता है. उसके बड़े भाई की हत्या हो जाती है. बेहोश पड़े अर्जुन को उसके बचपन का साथी डाकू माखन मल्लाह आकर जान बचाता है. माखन मल्लाह भी  ठाकुर के अत्याचार से बागी होकर बीहड़ में जाकर अपना गैंग बनाने को मजबूर हुआ था. जमींदार के अत्याचार और अपमान से पागल हो चुकी माँ को गाँव में अकेला छोडकर अर्जुन माखन मल्लाह के गैंग में शामिल हो जाता है. फिल्म में एक प्राइमरी स्कूल के मास्टर को डाकुओं के खबरी की भूमिका में दिखाया गया है. वह पुलिस वालों से कारतूस लेकर डाकुओं को देता है और डाकुओं से गाँव वालों को एक बूढ़े ग्रामीण (ए के हंगल) के माध्यम से खबर भेजता है. अर्जुन और माखन के साथ आने से उनका गैंग और मजबूत हो जाता है. पुलिस पर डाकुओं के खिलाफ कार्यवाही के लिए दबाव बढ़ने पर स्थानीय थाने का भ्रष्ट दरोगा पांडे व्यवसायी लाला के साथ मिलकर एक रात धोखे से माखन मल्लाह को गोली मार देता है. इसके बाद डाकू गैंग की कमान अर्जुन यादव के हाथ में आ जाती है. अर्जुन यदाव जमींदार, दरोगा, लाला सभी को एक-एक कर खत्म कर देता है. इलाके के तथाकथित बड़े लोग पुलिस अधीक्षक पर दबाव बनाते हैं कि वे डाकू अर्जुन यादव से सभ्य और सफेदपोश लोगों की जान बचाएं. एसपी अपने मिशन में लग जाते हैं और अर्जुन यादव अपने मिशन में. जमींदार भैरव सिंह की हत्या करने के बाद डाकू अर्जुन पुलिस द्वारा मार दिया जाता है. बैंडिट क्वीन (1994) बागी महिला डाकू फूलन देवी के जीवन पर आधारित है. पुरुष वर्चस्व वाले समाज में महिला का स्थान दोयम दर्जे का होता है. यदि वह महिला होने के साथ ही भारतीय जाति व्यवस्था में निचले पायदान पर स्थित किसी जाति में पैदा हुई हो तो उसका संघर्ष और बड़ा हो जाता है. फूलन ने केवल अपने परिवार में शोषण की शिकार हुई बल्कि जातीय भेदभाव आधारित शोषण की शिकार हुई. भयानक यौन हिंसा और बर्बरता की शिकार होने के बाद वह बागी होकर बीहड़ों में चली गयी. बागी बनकर उसने अपने शोषणकर्ताओं से बदला लिया. जालौन, इटावा, औरैया और यमुना-चम्बल के इस बीहड़ क्षेत्र में उसकी दहशत रही. फूलन देवी की जीवनी इंडिया’स बैंडिट क्वीन: द ट्रू स्टोरी ऑफ़ फूलन देवी’ की लेखिका माला सेन लिखती हैं, ‘’ग्रामीण भारत के इतिहास में कभी भी एक निम्न जाति की महिला ने इतनी बड़ी संख्या में पुरुषों की हत्या नहीं की’’. ब्रिटेन के ब्रिक्सटन मार्किट में फूलन देवी के चित्र के साथ ‘वाइल्ड वूमन’ लिखे टी-शर्ट बेचकर उनके विद्रोह के प्रति सम्मान व्यक्त किया. दुनिया भर के फेमिनिस्टों ने भी उन्हें सम्मान से याद किया. रिचर्ड शेयरस एवं इसाबेल गिडले ने ‘देवी: द बैंडिट क्वीन’ नाम से किताब लिखी. राजेश्वरी सुंदर राजन लिखती हैं कि, ‘’सन 1994 में उनके जेल से छूटने के बाद ‘आई, फूलन देवी: द ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ इंडिया’स बैंडिट क्वीन’ भी छपी जो ग्वाटेमाला के डाकू पर गवाही के आधार पर लिखी गयी पुस्तक ‘आई, रिगोबर्ता मेंचू’ की याद दिलाती है’’.

“जब तक इन निर्जन-दूरस्थ स्थानों पर बसे कमजोर समुदाय के लोगों के साथ अन्याय और अत्याचार होता रहेगा बीहड़ों और जंगलों में बाग़ी पैदा होते रहेंगे. सरकार की उपस्थिति, अन्याय अपमान और अत्याचार से संरक्षण, सरकारी योजनाओं का लाभ, नौकरी और रोजगार में हिस्सेदारी जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को सुनिश्चित कराकर ही लोगों के मन में कानून के प्रति सम्मान पैदा किया जा सकता है. लोकतंत्र की सभी संस्थाए जैसे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अपनी पहुंच के साथ-साथ भरोसा पैदा करके इन क्षेत्रों में बसे लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने और बागी होने से रोक सकती हैं. इक्कीसवी सदी में डाकुओं का प्रभाव लगातार कम हुआ है जो एक सकारात्मक सन्देश है तथा लोकतंत्र में बढ़ते भरोसे का भी संकेत है.”

शोले (1975) यह फिल्म एक पुलिस अधिकारी ठाकुर बलदेव सिंह और खूंखार डकैत गब्बर सिंह (गुर्जर) के बीच विकसित हुई दुश्मनी पर मुख्य रूप से केन्द्रित है. इस फिल्म में जाति और वर्ग विभेद या शोषण-शोषित की बाइनरी भी स्पष्ट रूप से नहीं दिखती है. अपनी नौकरी के कर्तव्य निभाते हुए ठाकुर द्वारा गब्बर सिंह को गिरफ्तार करके जेल भेजा जाता है. जेल से भागने के बाद डाकू पुलिस अधिकारी के पूरे परिवार को खत्म कर देता है. छोटे बच्चों और महिलाओं की निर्मम हत्या दिल दहलाने वाली घटना होती है. परन्तु एक डाकू द्वारा बार-बार एक ही गाँव रामगढ़ पर आक्रमण कर लूटपाट की जाती है निर्दोष लोगों की हत्या की जाती है. डाकू या खलनायक जितनी क्रूरता से निर्दोष लोगों का दमन करता है, अत्याचार या अपमान करता है दर्शकों में उतना ही क्रोध और घृणा का भाव उत्पन्न होता है. शोले फिल्म के विषय वस्तु पर विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं. लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के समाजशास्त्री कौशिक बनर्जी का कहना है कि शोले ने जय और वीरू के उदाहरणों के माध्यम से “नकली पौरूष के सहानुभूतिपूर्ण निर्माण” का प्रदर्शन किया. इस फिल्म में वैधता और आपराधिकता के बीच की नैतिक सीमा धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। फिल्म विद्वान एम. माधव प्रसाद के अनुसार जय और वीरू एक हाशिए वाली आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो परंपरागत समाज में पेश की जाती है. प्रसाद ने यह भी कहा कि, जय और वीरू की आपराधिकता को किनारे करते हुए बदला लेने के तत्वों के माध्यम से जिस तरह कहानी में उन्हें शामिल किया गया, यह प्रतिक्रियात्मक राजनीति को दर्शाती है. फिल्म के खलनायक गब्बर सिंह को उसकी क्रूरता के बावजूद दर्शकों से अच्छी प्रतिक्रियाऐं प्राप्त हुई. इस फिल्म में डाकू गब्बर सिंह के चरित्र को संवाद और व्यवहार से इस कदर पेश किया गया था कि दर्शक उससे मोहित हों. इसीलिए आज भी गब्बर और उसके सम्वाद और देहभाषा को लोग पसंद करते हैं. एक खूंखार डाकू के निर्दयी  कारनामों पर पर्दा डालकर उसे प्रसंशा दिलाने का काम किसी भारतीय ड्रामा फ़िल्म में पहली बार हुआ था। सांस्कृतिक आलोचक और इस्लामवादी विद्वान ज़ियाउद्दीन सरदार ने अपनी पुस्तक ‘द सीक्रेट पॉलिटिक्स ऑफ अ डेजर्स: इनोसेंस, कल्पपेबिलिटी एंड इंडियन पॉपुलर सिनेमा’ में शोले में मुस्लिम और महिला पात्रों की रूढ़िवादीता पर प्रहार किया, जिसे उन्होंने “निर्दोष ग्रामीणों के मजाक” कहा। फिल्म में दो प्रमुख मुस्लिम पात्र थे; सूरमा भोपाली और दूसरा डकैतों का एक असहाय शिकार (इमाम); इसके अतिरिक्त एक मादा चरित्र (राधा) का एकमात्र कार्य मौन रहकर भाग्य का सामना करना है, जबकि दूसरी महिला पात्र (बसंती) एक खूबसूरत ग्रामीण महिला के अलावा कुछ भी नहीं है’। दक्षिण भारतीय सिनेमा में निदेशक विनोद ने दो साल के गहन शोध के बाद डाकुओं के ऊपर तमिल फिल्म ‘थिरन अधिगारम ओंदारू’ शीर्षक से बनाया था. अन्य भारतीय भाषाओँ में भी डाकुओं के जीवन पर फ़िल्में बनी हैं.

ऐसी फिल्मों को देखकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दर्शकों को अन्याय, अपमान और अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने की प्रेरणा मिलती है. यही सिनेमा की सार्थकता भी है. सुनील दत्त अकेले 17 फिल्मों में डाकू बने हैं. ‘मदर इण्डिया’ एवं ‘रेशमा और शेरा’ फिल्मों में वे डाकू बनकर जनता के हित में लड़ते दिखाई देते हैं. विनोद खन्ना भी कई फिल्मों में डाकू की भूमिका में दिखे हैं. संजय दत्त खलनायक फिल्म में डाकू की भूमिका में थे. चाइना गेट फिल्म में भी रिटायर्ड सैनिक एक खूंखार डाकू जगीरा के खिलाफ जंग लड़ते हैं. इस फिल्म का डाकू भी बहुत डरावना और निर्दयी है. अभी गोली चली नहीं और कांव-कांव करन लगे-जगीरा चम्बल के डाकू अन्याय अत्याचार गैर-बराबरी और अपमान का बदला लेने के लिए बीहड़ जाते हैं. चम्बल में घड़ियाल, मगरमच्छ, बड़े-बड़े कछुए पाए जाते हैं जिनकी तस्करी में भी स्मगलर्स लगे रहते हैं. भारतीय मिथकों के अनुसार महाभारत की द्रौपदी ने अपने अपमान से दुखी होकर चम्बल नदी को श्राप दिया था कि आने वाली पीढियां बदला लेंगी. ऐसा कहा जाता है कि  चम्बल के पानी की तासीर ही ऐसी है कि इसको पीने वाले बाग़ी हो जाते हैं.

बीहड़ से बाहर भी डाकू

चम्बल और यमुना के बीहड़ों के अलावा गंगा नदी की सुनसान दूर-दूर तक फैली कटरियों में भी कई डाकुओं ने अपने गैंग बनाये और दहशत के पर्याय बने. छविराम और कल्लू यादव जैसे डाकू एटा, फर्रुखाबाद बदायूं और शाहजहांपुर में गंगा नदी के दोनों किनारों पर फैली रेतीली जमीन में वर्षों तक अपना दबदबा बनाये रखा था. कायमगंज के लोग बताते थे कि डाकू कल्लू यादव गंगा किनारे बैठकर मछलियों को दाना खिलाया करता था. यदि वह किसी को नदी में मछली मारते देख लेता था तो उसकी खैर नही थी. सन 1997-2007 के दशक में रामबाबू-दयाराम गडरिया नाम के डाकुओं ने शिवपुरी के जंगलों में आतंक बरपाया.  ददुआ, ठोकिया, बलखड़िया, बबली कोल चित्रकूट के जंगलों के भयानक डाकू रहे. डाकुओं का राजनीतिक दखल रहा और दोनों के आपसी सहयोग वाले सम्बन्ध रहे. उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा पर गंडक नदी के दोनों तरफ जंगल पार्टी के डाकुओं का खूब राजनीतिक दखल रहा. संजीव के उपन्यास ’जंगल जहाँ शुरू होता है’ इन डाकुओं का बृहद चित्रण है.

डाकुओं का निपटारा  

शोषण से तंग आकर बगावत करने वाले बागी डाकुओं को अकादमिक शब्दों में ‘सोशल बैंडिट’ कहा जाता है. ये विद्रोही डाकू अक्सर पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे जाते हैं तो कुछ जननेताओं के आह्वान पर समर्पण करके समाज की मुख्यधारा में वापस लौट आते हैं. फूलन देवी और ददुआ के भाई और बेटे तो राजनीति में भी सक्रिय हुए. 13 फरवरी 1983 को भिंड जिले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने फूलन देवी ने समपर्ण किया था. सन 1982 में डाकू मलखान सिंह का सरेंडर भी अर्जुन सिंह की सरकार ने कराया था. फर्रुखाबाद-बदायूं की गंगा की कटरी में कल्लुआ का आतंक रहा. उसने एक बार गंगा की कटरी में कई पुलिस वालों को मार डाला था. उसके आतंक को खत्म करने के लिए उधर के निर्जन क्षेत्र में पंजाबी सरदारों को खेती करने के लिए बसाया गया. पट्टे की जमीने भी उन्हें आवंटित की गयीं. उन्होंने अपनी मेहनत से गंगा की दूर तक फैली वीरान कटरी को फसले उगाकर हरा भरा कर दिया और बाद में उनके सहयोग से डाकुओं का सफाया हो सका. जब तक इन निर्जन-दूरस्थ स्थानों पर बसे कमजोर समुदाय के लोगों के साथ अन्याय और अत्याचार होता रहेगा बीहड़ों और जंगलों में बाग़ी पैदा होते रहेंगे. सरकार की उपस्थिति, अन्याय अपमान और अत्याचार से संरक्षण, सरकारी योजनाओं का लाभ, नौकरी और रोजगार में हिस्सेदारी जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को सुनिश्चित कराकर ही लोगों के मन में कानून के प्रति सम्मान पैदा किया जा सकता है. लोकतंत्र की सभी संस्थाए जैसे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अपनी पहुंच के साथ-साथ भरोसा पैदा करके इन क्षेत्रों में बसे लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने और बागी होने से रोक सकती हैं. इक्कीसवी सदी में डाकुओं का प्रभाव लगातार कम हुआ है जो एक सकारात्मक सन्देश है तथा लोकतंत्र में बढ़ते भरोसे का भी संकेत है.

संदर्भ

बैनर्जी, पौलोमी (2017) इंस्पायर्ड बाय चम्बल’स आउटलॉज़: फिल्म्स दैट हैव डिफाइंड द डाकोइट फोर अस इन हिंदुस्तान टाइम्स आन नवम्बर 26, 2017.

चक्रबर्ती, मृदुल नाथ (2015) ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर ! : द डाकोइट, द इन्सर्जेंट एंड द लॉन्ग आर्म ऑफ़ द लॉ, इन जर्नल ऑफ़ साउथ एशियन स्टडीज, वालुम 38, 2015, इशू 1. 

घोष, तपन के. (2013) बॉलीवुड बैडिज: विलेन्स, वैम्पस एंड हेंचमैन इन हिंदी सिनेमा, सेज पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली.

रिचर्ड शेअर्स एंड इसाबेल गिडले(1984) देवी: द बैंडिट क्वीन, जार्ज आलें & उन्विन, लन्दन.

राजेश्वरी सुंदर राजन (2003) द स्कैंडल ऑफ़ द स्टेट: वुमन लॉ एंड सिटीजनशिप इन पोस्ट कोलोनियल इंडिया, ड्युक यूनिवर्सिटी प्रेस, यूएसए.

सेन, माला (1991) इंडिया’स बैंडिट क्वीन: द स्टोरी ऑफ़ फूलन देवी, हार्पर कोलिन्स लंदन.

विट्टल, बालाजी & भट्टाचार्जी, अनिरुद्ध (2019) दीज बॉलीवुड फिल्म्स हैव स्टोलेन हर्ट्स विथ डाकोइटस, इन द हिन्दू, आन 30 जनवरी 2019.

चक्रवर्ती , मृदुल नाथ (2015) ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर: द डाकोइट, द इंसर्जेंट एंड द लांग आर्म ऑफ द लॉ, इन साउथ एशिया जर्नल ऑफ साउथ एशियन स्टडीज.

7 Comments
  1. Sanjay Kumar says

    बेह्तरीन लेख

  2. DHARMENDRA VEERODAY says

    बहुत बढ़िया विश्लेषण….शोध करने वाले छात्रों के लिए बहुत कुछ है इस लेख में।

  3. Ghanshyam kushwaha says

    बेहतरीन विश्लेषण।

  4. के के आजाद says

    व्यवस्था की खामियां व उसके भयानक परिणाम बीहड़ो में दशकों से दिखाई दे रहे है। आपने इस व्यवस्था को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करने की हिम्मत दिखाई इसके लिए आपको सादर अभिवादन।

  5. HEMANT MOHAN says

    वाह! बेहतरीन लेख

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