जूते और किताबें

देवेन्द्र कुमार मिश्रा

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उसे बाजार से कुछ किताबें खरीदनी थी और अपने लिए जूते भी। वह कई दुकानों में गया। लेकिन उसे अपनी पसन्द के जूते नहीं मिले। उसनें सोचा बड़े शोरूम में ही मनमुताबिक जूते मिलेंगे। किताब की दुकानें पास में ही थीं। उसने दुकानदार को कुछ किताबों के नाम बताये। किताब बेचने वाले ने कहा -‘‘मैं इस तरह की पुस्तकें नहीं रखता। आप आगे की दुकानों पर देख लीजिए।‘‘

‘‘आप क्यों नहीं रखते ?‘‘ उसने पूछा।

‘‘बिकती नहीं है।‘‘ दुकानदार ने कहा।

‘‘तो आपके यहाँ कौन सी किताबें बिकती हैं ? ‘‘ उसने पुनः पूछा।

‘‘जो लोगों का मनोरंजन करती हैं। जैसे जासूसी, सेक्स और  अपराध की कहानी वाली पुस्तकें।’’ दुकानदार ने उत्तर दिया।  हालाँकि उस समय उसकी दुकान खाली थी। वह इकलौता ग्राहक था। रविवार का दिन था। शाम का समय था।

‘‘क्या किताबों के पढ़ने वाले कम हो गये हैं। हर दुकानों में ग्राहक दिख रहे हैं। लेकिन आपकी दुकान पर … ’’उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

‘‘हाँ, कम होना स्वाभाविक ही है। अब मनोरंजन के बहुत से विकल्प मौजूद हैं। घर-घर में टी.वी. है। कम्प्यूटर, इन्टरनेट है। हर हाथ में मोबाइल है। एक मिनट में गूगल पर जाकर आदमी अपनी पसन्द की चीज खोज लेता है। फिर किताबों पर क्यों खर्च करें आदमी ?’’

डसने धन्यवाद दिया और बाहर निकल गया। दूसरी दुकान में दो-एक ग्राहक थे। जो पुस्तक खरीदी पर डिस्काउन्ट मांग रहे थे। दुकानदार उन्हें समझा रहा था ‘‘इनमें कोई कमीशन नहीं है। मुझे ही कुछ ज्यादा नहीं बचता। आपको कैसे दें?’’

ग्राहक ने कहा – ‘‘जब आपको कुछ नहीं बचता तो ये किताबें रखते क्यों हो?’’

दुकानदार ने कहा – ‘‘ताकि ज्ञान जीवित रहे। बौद्धिक खुराकें मिलती रहे लोगों को। जो आज के जमाने में जरुरी है।’’

ग्राहक ये कहकर बाहर निकल गया कि बिना लाभ के व्यापार में बर्बादी होती है। ऐसी चीजें रखते ही क्यों हो? और रखते हो तो बेचने के लिए कोई स्कीम तो चलानी चाहिए।’’

इस दुकान में उसे अपने मतलब की कुछ किताबें मिली। लेकिन जो सूची उसके पास थी किताबों की, उस सूची की पूरी किताबें नहीं थी। वह सोच में पड़ गया कि एक-दो किताब खरीद ले या जहाँ एक साथ पूरी किताबें मिले वहां से खरीदे। उसने दुकानदार को पुस्तकों की सूची दिखाई। दुकानदार ने खुश होते हुए कहा- ‘‘शुक्र है इन किताबों को पढ़ने वाले मौजूद हैं अभी। आप ऐसा करिये। आगे एक चौराहा पड़ेगा। वहां एक व्यक्ति किताबें बेचता है। उसके पास पुरानी किताबों का शानदार कलेक्शन मिल जायेगा । आपको रास्ते में ही मिल जायेगी। आप वहीं चले जाइये।”

वह निकलकर चौराहे की तरफ बढ़ा। रास्ते में उसे कई जूतों की बड़ी-बड़ी दुकानें दिखाई दी। बड़ी-बड़ी कम्पनियों के जूतों की दुकानें। दुकानें कहना ठीक नहीं होगा। कोई किराना या साधारण जनरल स्टोर की दुकानें नहीं थी। शोरूम थे बड़े-बड़े चमकते कांचों के अन्दर जूते बड़े ही सुन्दर तरीके से रखे हुए थे। इन भव्य शोरूम में भव्य लाइटें लगी हुई थी। कालीन बिछे हुए थे। उसे जूते खरीदने ही थे उसने सोचा क्यों न जूते देख लिए जाएँ? वह एक शोरूम में दाखिल हुआ। शोरूम के मालिक ने उससे पूछा – ‘‘आपको क्या चाहिए ? जूते या चप्पल।’’

उसने कहा – ‘‘जूते ’’

‘‘हमारे यहाँ सभी बड़ी ब्रान्डेड कम्पनी के जूते हैं। आप देख लीजिए।’’ शोरूम के मालिक ने कहा।

तुरन्त एक कर्मचारी ने कहा – ‘‘आइये सर, इस तरफ आइये।” और वह जूते दिखाने लगा। उनकी कीमत बताने लगा। एक कर्मचारी कांच के गिलास में पानी लेकर आया। दूसरा कर्मचारी चाय लेकर आ गया। पूरा शोरूम वातानुकूलित था। उसे शोकेस के अन्दर एक जूता पसन्द आया। क्या डिजाइन थी? क्या कारीगरी थी? कितने जबरदस्त लग रहे थे। उसने कहा – ‘‘मुझे यह जूते चाहिए। ’’

कर्मचारी ने ओढ़ी हुई विनम्रता से कहा – ‘‘सर, आपका नम्बर क्या है? ’’ उसने कहा – ‘‘शायद आठ’’

‘‘सर, आप इस पर पैर रखिये।”  पैरों की नाम लेने का स्केल था वह।

उसने पैर रखना चाहा लेकिन कर्मचारी ने कहा – ‘‘सर इस कुर्सी पर बैठिये। फिर पैर रखिये ताकि आपको कोई असुविधा न हो।’’ वह कुर्सी पर बैठ गया। पैर रखे उसने सामने बने स्केल पर।

‘‘सर, ठीक कहा था आपने। आठ नम्बर ही है।’’ फिर उसने आठ नम्बर के जूते निकालकर उसने सामने रख दिया और कर्मचारी जूतों के बंध खोलकर उसे अपने हाथों से पहनाने लगा। जूतों के बंध भी कर्मचारी ने ही अपने हाथों से बांधे। फिर कहा – ‘‘सर, आप थोड़ा चलकर देखिये।’’ वह चला। उसे जूते सुविधाजनक लगे  उसनें कीमत पूछी।

कर्मचारी ने कहा – ‘‘सर, सात हजार रूपये।” वह चौंक गया। उसका बजट जूते के जिए मात्र  पांच हजार का था। उसे भी मालूम था कि जूतों की कीमत आजकल ज्यादा होती है। फिर ब्रांडेड कम्पनी के जूते तो महंगे होते ही हैं। वह कुछ कहता इससे पहले उसे शोरूम के मालिक की तेज आवाज सुनाई दी। वह किसी ग्राहक को डांट रहा था।

‘‘ब्रांडेड जूतों का शोरूम है। कोई सब्जी भाजी नहीं है। यहाँ  मोल-भाव नहीं होता। कम्पनी की तरफ से डिस्काउन्ट दिया ही जा रहा है।’’

उसे वह ग्राहक लज्जित दिखाई दिया और जूते खरीदकर वह बाहर निकला ही होगा कि शोरूम के मालिक का फिर स्वर सुनाई दिया। ‘‘औकात रहती नहीं और चले आते हैं शोरूम में जूते खरीदने।’’ अब वह सोच रहा था कि यदि मैं मोलभाव करता हूँ या कम कीमत के जूते दिखाने को कहता हूँ  तो निश्चित  ही ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। और वह इतने बड़े शोरूम में जूतों के कारण लज्जित नहीं होना चाहता था। कर्मचारी ने कहा – ‘‘आइये सर।’’ वह कर्मचारी के साथ चलते हुए काउन्टर पर पहुंचा। मालिक ने कम्प्यूटर से बिल बनाकर देते हुए कहा – ‘‘20 प्रतिशत डिस्काउन्ट के साथ सात हजार में। और कुछ चाहिए आपको।’’

‘‘फिलहाल नहीं, धन्यवाद’’ उसने कहा ।

‘‘सर, अभी इन जूतों का पाॅलिश उपलब्ध है। आप ले जाइये। बाद में शायद न मिले। अच्छी चीज पहन रहे हैं तो पाॅलिश भी जरूरी है। ’’ दुकानदार ने पाॅलिश की डिब्बी निकालकर सामने रख दी। न जाने क्यों शोरूम की चमक के सामने वह कुछ बोल नहीं पाया। पाॅलिस की कीमत पांच सौ रूपये थी। वह इंकार न कर सका। यंत्रचलित सा उसने पांच सौ का नोट निकालकर शोरूम के मालिक के सामने रखा। तत्काल उसे बिल थमा दिया गया। नकली मुस्कराहट के साथ मालिक ने कहा – ‘‘फिर आइयेगा।’’

वह कृत्रिम मुस्कुराहट के साथ बाहर निकल गया। उसके पास अब कुल तीन सौ रूपये बचे थे। सौ रूपये उसे ऑटो के लिए घर पहुंचने के लिए लगने थे। शेष दो सौ रूपये में वह किताबें खरीदने की सोच रहा था। वह जानता था कि दो सौ रूपये में मेरी सूची की किताबें नहीं आ पाएंगी। फिर भी वह चौराहे वाली दुकान पर पहुंचा। चौराहे पर पहुंचकर उसने देखा कि वहां  कोई पुस्तक की दुकान नहीं थी। हाँ, एक आदमी जमीन पर सैकड़ों किताबें रखकर बैठा हुआ था और स्वयं एक किताब पढ़ने में मग्न था। किताबें सड़क के किनारे रखी हुई थी। इसलिए उनपर धूल का गुबार चढ़ा हुआ था। उसे दुकान के सामने खड़ा हुआ देखकर दुकानदार ने पढ़ने पर से ध्यान हटाते हुए कहा – ‘‘आइये बाबूजी, क्या चाहिए?” किताब बेचने वाले की हालत किताबों की तरह ही थी। बिखरी दाढ़ी, बिखरे बाल। चेहरे पर छाई अजीब सी खामोशी।

‘‘रस्ते का माल सस्ते में। ज्ञान-ध्यान, भक्ति, वैराग्य, साहित्य, संस्कृति, से भरपूर किताबें आधे दाम में।’’ पुस्तक विक्रेता ने कहा।

वह किताबों की तरफ देखने लगा और मन ही मन सोचने लगा। जूते कांच के आलीशान एयरकंडीशन शोरूम में और किताबें धूल खाती हुई सड़क पर।

‘‘कौन सी किताब चाहिए आपको?’’

उसने पुस्तकों की सूची पकड़ा दी। दुकानदार ने सूची पर नजर डाली और कहा – ‘‘आपको ये सारी किताबें मिल जायेगी हमारे यहाँ।’’

‘‘कितने की होगी?’’

दुकानदार ने उसे सिर से पैर तक देखा और रूखे स्वर में कहा – ‘‘आपके जूतों से कम ही कीमत की होगी।”

उसे दुकानदार की बात का बुरा लगा लेकिन चुप रहा। दुकानदार ने हिसाब लगाकर कहा – ’’आपकी पूरी दस किताबें मात्र पांच  सौ रुपये में।’’

‘‘ठीक-ठीक लगाकर ही बात रहा हूँ। पुरानी होने के कारण ही आधे में दे रहा हूँ। अन्यथा एक किताब की कीमत पांच सौ रूपये है।’’

उसे लगा कि सड़क किनारे बैठा पुरानी पुस्तकें बेच रहा है। ऐसी पुस्तकें तो रद्दी में बिकती हैं किलो के भाव। शायद बूढ़ा दुकानदार मान जाये। उसने कहा – ‘‘दो सौ रूपये में देना हो तो बोलो।’’

पुस्तक विक्रेता बुजुर्ग ने किताबें वापिस रखते हुए कहा – ‘‘बेटा तुम्हें ज्ञान की नहीं जूतों की जरूरत ज्यादा थी। जो तुमने खरीद लिए। जाओ यहाँ से। समय बर्बाद मत करो।’’ और बूढ़ा दुकानदार पुनः पुस्तक पढ़ने में लीन हो गया।

बूढ़े दुकानदार की बातों से उसे चोट लगी। लेकिन उसने कहा कुछ नहीं। क्योंकि बूढ़ा पुस्तक विक्रेता सच बोल रहा था। उसनें ऑटो  किया और ऑटो में बैठकर उसके सामने दोनों दृश्य तैर रहे थे। काॅंच के शोरूम में सजे हुए जूते और सड़क किनारे धूल खाती हुई किताबें। हमें ज्ञान की नहीं जूतों की जरूरत ज्यादा है। हर तरफ से जूते खाने के बाद भी जूते कीमती है आदमी के लिए । किताबें नहीं।

 

लेखक छिन्दवाड़ा में रहते हुए स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं ।

 

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