Wednesday, July 15, 2026
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सामाजिक न्याय

उन्नीसवीं सदी में फुले जितना साहसी, त्यागी और निडर नेता दूसरा कोई नहीं हुआ

 पिछले कुछ वर्षों से भारत में हिंदुत्ववादी ताकतों के एजेंडे के अनुसार जातिवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को आक्रामक रूप से बढ़ावा दिया गया है। महात्मा जोतीबा फुले का जन्म लगभग आज से 200 वर्ष पूर्व हुआ था और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का जन्म फुले की मृत्यु के एक वर्ष बाद हुआ था। कहने का मतलब कि इनकी जयंती और पुण्यतिथि मनाने के अलावा, वस्तुतः कोई सक्रिय जाति-विरोधी या सांप्रदायिक-विरोधी आंदोलन मौजूद नहीं है। अपने जीवन का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा इन आंदोलनों में सक्रिय रूप से बिताने के बावजूद, मैं 11 और 14 अप्रैल को उनकी जयंती के अवसर पर यह लेख इन दो महान विभूतियों को एक आत्म-निरीक्षणात्मक श्रद्धांजलि के रूप में लिख रहा हूँ।

हिन्दुत्व के खतरनाक दौर में कहाँ खो गया जाति के विनाश का एजेंडा

आज जब हम डॉ. अंबेडकर को याद करते हैं, तो हमें इस बात का भी भान होना चाहिए कि सामाजिक समानता की ओर बढ़ने की प्रक्रिया में आने वाला - चाहे वह प्रत्यक्ष हो या सूक्ष्म - अधिकांश विरोध, RSS जैसी गहरी पैठ रखने वाली संस्था की ओर से आता है। RSS विभिन्न माध्यमों से अपने प्रतिगामी (पिछड़ेपन वाले) एजेंडे का प्रसार कर रहा है। जहाँ एक ओर RSS का मुस्लिम-विरोधी एजेंडा बिल्कुल स्पष्ट और सबके सामने है, वहीं उसका दलित-विरोधी एजेंडा कहीं अधिक सूक्ष्म है; और 'जाति-विहीन समाज' के सपने को साकार करने के लिए इस सूक्ष्म एजेंडे का मुकाबला करना बेहद ज़रूरी है।

महाड़ सत्याग्रह के सौ वर्ष बाद शूद्रों की मुक्ति का हासिल

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने यह स्पष्ट किया था कि जाति-व्यवस्था को खत्म करने का सबसे असरदार तरीका केवल अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाह ही हैं। लेकिन मौजूदा दौर में, जिस तरह भारतीय सरकार—'लव जिहाद' की आड़ में—ऐसे विवाहों को रोकने के लिए कानून बना रही है, और इसके लिए ऐसे अवैज्ञानिक तर्कों का सहारा ले रही है कि मनुस्मृति के अनुसार मिश्रित विवाहों के परिणाम आने वाली पीढ़ियों के लिए बुरे होंगे। 99 साल पहले, 25 दिसंबर 1927 को, महाड तालाब के पानी के लिए आयोजित सत्याग्रह आंदोलन के वर्ष में, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 'मनुस्मृति दहन' कार्यक्रम का आयोजन किया, जो 25 दिसंबर को शाम 4:30 बजे शुरू हुआ। इसमें यह घोषणा की गई कि सभी स्त्री और पुरुष जन्म से ही समान दर्जे के हैं और मृत्यु तक समान ही रहेंगे। जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और चिन्तक डॉ सुरेश खैरनार का महत्वपूर्ण लेख

यूजीसी एक्ट के खिलाफ क्यों अपनी कुंठा और विद्वेष लहरा रहे हैं भारतीय सवर्ण?

यदि यह जानने का प्रयास हो कि मानव जाति के हजारों साल के इतिहास में इस धरती पर ऐसा कौन सा समाज मौजूद रहा है ,जिसमें अपने ही धर्म के बहुसंख्य लोगों को आथिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक शक्ति के सभी स्रोतों में रत्ती भर भी हिस्सेदार बनाने की मानसिकता नहीं रही है बल्कि इसके उलट जब-जब राज्य द्वारा बहुसंख्य वंचितों को कुछ अधिकार देने का प्रयास हुआ, तब-तब उस समाज ने देश को एक रणभूमि में तब्दील कर दिया हो तब इसका एकमात्र जवाब है कि वह ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों से युक्त भारत का सवर्ण समाज होगा! लाख प्रयास के बावजूद ऐसे किसी अन्य समाज का नाम नहीं ढूँढा जा सकता, जिसकी सवर्णों जैसी अपने ही सहधर्मियों को अधिकार- शून्य देखने की तीव्र चाह हो। जाने-माने एक्टिविस्ट लेखक और बहुजन डायवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष एच एल दुसाध इस लेख में कहते हैं कि ‘यह समाज शुद्रातिशूद्रों के रूप में विद्यमान देश की 85 प्रतिशत आबादी के अधिकारों के इतना खिलाफ रहा कि उसे बहुसंख्य आबादी को अच्छा नाम रखने, शिक्षा पाने एवं मोक्ष के लिए आध्यात्मानुशीलन का अधिकार देना भी कभी गंवारा नहीं रहा। दुनिया के इतिहास में सबसे क्रूर माने जाने वाले एटिला द हूण, चंगेज खां जैसे शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को अच्छा नाम रखने, शिक्षा ग्रहण करने एवं दुःख मोचन के लिए देवालयों में जाकर अपने भगवानों से प्रार्थना करने से कभी नहीं रोका। ऐसी बर्बरता का परिचय समग्र इतिहास में सिर्फ सवर्णों ने दिया।’

नांदेड़ : राजनीति और शासन जाति की सड़ांध से प्रेमियों को नहीं बचा सकते

इस कहानी का सबसे बुरा हिस्सा यह है कि सक्षम और आंचल के रिश्ते के बारे में परिवार में सभी जानते थे और उन्होंने उनके रिश्ते को स्वीकार करने का नाटक किया, लेकिन यह परिवार की एक चाल थी और आखिरी दिन उन्होंने सक्षम की हत्या कर दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई, आंचल ने अपना विरोध दिखाया और सक्षम की लाश से शादी कर ली। 'सिंदूर' लगाया और मांग की कि उसके माता-पिता और भाइयों को फांसी दी जाए।

सामंती दमन के खिलाफ 18 वर्ष चले मुकदमे में जीत, संघर्ष की मिसाल हैं डॉ विजय कुमार त्रिशरण

आज दलितों के ऊपर जो भी अत्याचार हो रहे हैं, उसका मूल कारण उनका आर्थिक रूप से कमजोर होना है। वर्तमान बीजेपी की सरकार के कार्यकाल में दलितों के ऊपर अत्याचार की घटनाओं में इजाफा हुआ है ।

कर्पूरी ठाकुर की जन्म शताब्दी पर उन्हें याद करते हुए

जिस बिहार में अस्सी के दशक की शुरुआत में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से पहली बार  भारत में कांग्रेस की सरकारों को केंद्र से...

22 जनवरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो मासूम बच्चों को ज़िंदा जलाने का काला दिन भी था

फादर ग्राहम स्टेंस और उनके मासूम बच्चों की हत्या को हिन्दू जाति-व्यवस्था के ऊपरी सतह पर रहनेवाले लोगों की धार्मिक घृणा का परिणाम मानना चाहिए। इस घृणा का राजनीतिक स्वरूप यह है कि वर्तमान समय में तथाकथित हिंदुत्ववादी धर्मसंसद खुलेआम अल्पसंख्यकों की हत्या को अपना एजेंडा बनाकर पेश करती है। वह संसद से लेकर संविधान की धज्जियाँ उड़ा रही है। इनके खिलाफ शांति-सद्भावना के साथ सर्वधर्म समभाव को मानने वाले लोगों ने इकठ्ठा होकर सक्रिय रूप से गतिशील होने की जरूरत है।

शासन-प्रशासन के भरोसे सामाजिक एकता की कामना दिवास्वप्न है

अगर आपको यह लगता है कि भारत में जातिवाद खत्म हो गया है, तो शायद आप गलत सोच रहे है। ताजा उदाहरण है लाइन...

भाजपा सरकार ने बिलकिस बानो के अपराधियों को बचाने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल किया – सुभाषिनी अली

आख़िरकार एक लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बिल्क़ीस बानो मामले में दोषियों की सज़ा माफ़ करने के (गुजरात सरकार के ग़ैर-कानूनी)...

सावित्री बाई फुले पहली महिला शिक्षिका ही नहीं, क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव की मिसाल थीं

आज से 193  वर्ष पहले भारत जैसे रूढ़िवादी, अंधविश्वास और पारंपरिक देश में सावित्री बाई फुले ने सामाजिक बदलाव की शुरुआत की। जब देश...
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