Thursday, June 4, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

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सेचुरेशन पॉयन्ट पर पहुंचने के बाद औरत के संबंध महज एक औपचारिकता भर रह जाते हैं – 3

मन्नू जी ने सचमुच आत्मकथा लिखी ही कहां! लिखना संभव ही नहीं था। मन्नू जी के साथ दिक्कत यह है कि उन्होंने अपनी त्रासदी...

नहीं रहीं कथाकार मन्नू भण्डारी

हिन्दी की शीर्षस्थ कथाकारों में शुमार मन्नू भण्डारी ने आज नब्बे वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कहा। उन्हें कुछ दिन पहले...

पीढ़ियों का अन्तराल जहाँ बाहरी बदलाव करता है वहीँ सोच और परिभाषाएँ भी बदल जाती हैं (चौथा और अंतिम भाग)

चौथा और अंतिम भाग एम.ए. करते ही मुझे कलकत्ता में ही नौकरी मिल गई तो अब साल में कुल दो बार छुट्टियों के दौरान...

मैं कभी किसी कहानी आंदोलन का हिस्सा नहीं रही

बातचीत का पहला हिस्सा आप अपने बचपन के बारे में कुछ बताएं! पुराने घर की कुछ स्मृतियां? कलकत्ता में बीते बचपन की पुरानी स्मृतियों में एक...

भेड़ियों की गाथाओं के बीच हिरणों की आत्मकथा की तरह

उर्मिलेश पेशे से पत्रकार हैं। जिस प्रकार की ईमानदारी और साहस का परिचय वह पत्रकारिता में देते हैं, वैसा ही इन संस्मरणों में। संस्मरण में आये सभी किरदारों का उर्मिलेश जैसा विश्लेषण करते हैं उससे उर्मिलेश के व्यक्तित्व और उनकी पक्षधरता का भी पता चलता है। निस्संदेह, उर्मिलेश जनपक्षधर पत्रकार और बुद्धिजीवी हैं। उर्मिलेश की भाषा-शैली, वर्णन-शैली अद्वितीय है। इन सभी संस्मरणों में एक रोचकता भी है। वास्तव में, 'गाज़ीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल' न सिर्फ़ संस्मरण भर है, बल्कि अत्यंत सुसंगत और तथ्यों पर आधारित वाम और बहुजन वैचारिकी की सच्ची आलोचना भी है जिसे स्वीकार करके ही इन दोनों महत्वपूर्ण खेमों का सुसंगठित विकास सम्भव है।

कोई बिगड़े तो ऐसे, बिगाड़े तो ऐसे! (राजेन्द्र यादव का मूल्यांकन और स्मरण)

(राजेन्द्र यादव का मूल्यांकन और स्मरण)कोई बिगाड़ने वाला हो तो साहित्यकार राजेंद्र यादव एवं उनकी हंस जैसा, और बिगाड़े तो ऐसे जैसे राजेन्द्र दा...

राजेंद्र यादव को मैं इसलिए भंते कहता हूँ कि उन्होंने साहित्य में दलितों और स्त्रियों के लिए जगह बनाई

राजेंद्र यादव के बारे में मैं जब भी सोचता हूँ, प्रसिद्ध शायर शहरयार की ये पंक्तियाँ मेरे जेहन में उभरने लगती हैं - उम्र भर...

आपकी स्वतन्त्रता ही हमारी गुलामी है – राजेंद्र यादव

(राजेंद्र यादव को दिवंगत हुये आठ वर्ष हो गए। बेशक इन आठ वर्षों में सुसंबद्ध और निर्भीक ढंग से भारत की संघर्षशील जनता की...

राजेंद्र यादव और मैंने 1857 की अवधारणा पर सवाल उठाया

मैंने समाजवादी पार्टी की आलोचना की तो कुछ यादवों को मेरे यादव जाति में पैदा होने पर ही शक हो गया(बातचीत का चौथा और...

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