सेचुरेशन पॉयन्ट पर पहुंचने के बाद औरत के संबंध महज एक औपचारिकता भर रह जाते हैं – 3

सुधा अरोरा

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मन्नू जी ने सचमुच आत्मकथा लिखी ही कहां! लिखना संभव ही नहीं था। मन्नू जी के साथ दिक्कत यह है कि उन्होंने अपनी त्रासदी को एक निजी प्राइवेट त्रासदी के रूप में देखा – यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि यह त्रासदी एक बड़े सामाजिक परिवेश में औरत के अंर्तजगत और मन के साथ किए गए खिलवाड़ का प्रतिनिधि परिदृश्य है जिससे अकेले दम पर जूझना, निबाहना और फिर विस्फोट के निर्णय का ब्यौरा लाखों औरतों के लिए रोल मॉडल हो सकता था।

कहने को एक कहानी यह भी आत्मकथा के नाम से ही बिक रही है, पर वह सचमुच उनकी लेखकीय यात्रा ही है। उनके भीतर के लेखक ने हमेशा उनके भीतर की औरत को ढांपे रखा, सिर उठाने नहीं दिया वर्ना इतनी छूट कहां कोई औरत दे पाती। यह उस परंपरावादी खांटी घरेलू लेखिका के ही बूते का था कि अपने पति के लेखन को सबसे ऊंचा दर्जा देती रही और सारी छूट भी लेखिका ने ही दी – यह मानते और स्वीकार करते हुए कि लेखिका को लिखने के लिए चाहे प्रेमी पुरुष और पहाड़ों के रिसॉर्टों पर जाने की जरूरत महसूस न हो पर उंगलियों में अदा से सिगार पकड़ने वाले लेखक की दैहिक भावनात्मक जरूरतें एक आम सामान्य पुरुष से अलग और ज्यादा है और विशिष्ट पुरुष को जीवनसाथी बनाने का चुनाव भी तो उनका अपना ही था, फिर शिकायत कैसी और किससे? फिर तो यह चुनौती सी जान पड़ी कि इस विशिष्ट प्राणी को सहेज कर, संभालकर रखना है। जैसा भी है, जितना भी अपने हिस्से यह विशिष्ट पुरुष आ पड़ा है, उसे पोषक खुराक  उपलब्ध करवाकर खुश रखना है।

उपेक्षा, संवादहीनता, असंवेदनशीलता और चुप्पी की हिंसा को झेलने में ही मन्नू जी की उर्जा चुक गई, उन घटनाओं को दुबारा याद कर आत्मकथा लिखने की ताकत कहां से लाएं। उनकी जीवनी लिखी जानी चाहिए। उनकी केस हिस्ट्री स्त्री के सामाजिक परिवेश की और समाज विज्ञान में केस स्टडी की एक बेहद महत्वपूर्ण किताब हो सकती है। मन्नू जी का जीवन स्त्री संघर्ष का एक सम्पूर्ण दस्तावेज है।

मन्नू जी से अलग हाने के बाद मन्नू जी के बारे में तो राजेंद्र यादव ने बहुत से अपमानजनक बयान दिए। यादव जी में सार्वजनिक रूप से सच बोलने का साहस ही नहीं है। यही है - पुरुष का थोथा अहंकार - यह उससे जो जो न करवाए कहलवाए, वो कम है। वह भूल जाता है कि हर औरत कभी न कभी अपने जीवन में एक सेचुरेशन पॉयन्ट पर पहुंच जाती है जिसके बाद संबंध महज एक औपचारिकता भर रह जाता है, भावनात्मक तंतु धीरे धीरे टूटते चले जाते हैं।

इधर मन्नू जी की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब रहने लगी थी। फोन पर उनकी दिनचर्या – मैंने अब बस, मन बना लिया है ऑपरेशन का। भला गोलियां खा-खा के जिन्दा रहना भी कोई जिन्दगी है। क्वालिटी ऑफ लाइफ जीरो हो गई है। इतना सेडेटिव और पेन किलर खाना कि बस सारा दिन नींद में ही पड़े रहो। भला यह जीना भी कोई जीना है। थोड़ी-सी आंख खुलती है तो बस तुझे फोन कर लेती हूं। और किसी के पास वक्त ही नहीं। आज नींद खुली तो बहुत सोच में पड़ी – किसको फोन करूँ। कभी-कभी निर्मला जी फोन करके खबर ले लेती हूँ। और इन्दौर से साधना। रोज सोचती हूं कि आज तेरे लिए उपन्यास का अंश ठीक करूंगी, पर कुछ काम ही नहीं होता। दिमाग चलता ही नहीं। कल किसी का फोन आया कि आपका बंटी पर फिल्म बनानी है, कितनी देर बात करता रहा। तुझे बताने के लिए फोन किया तो जितेन ने उठाया। बड़ी देर बात करते रहे। अब नाम ही नहीं याद आ रहा उस बंदे का जो फिल्म बनाना चाहता है ….. परेशान हो गई हूं …..

मैंने कहा – हटाइए मन्नू दी। नाम नहीं याद आ रहा तो आ जाएगा। क्यों दिमाग पर जोर डाल रही हैं, कोई इनाम मिलने वाला है? नाम याद आ भी गया तो क्या हो जाएगा?

पर नहीं, उन्हें जबतक नाम न याद आए, उन्हें राहत नहीं मिलने वाली।

एक दिन मन्नू जी का फोन आया – सुधा, भारती जी के पहले उपन्यास का क्या नाम था, जरा बताना, याद नहीं आ रहा। मैंने कहा – गुनाहों का देवता ? तो बोलीं – ले, इतना आसान सा नाम और न पूछती तुझसे तो नींद नहीं आने वाली थी आज।

कभी फोन करतीं – इस शब्द का हिन्दी अनुवाद बताना। उनके हर मर्ज का इलाज उनकी सुधा।

बस, वे जब भी फोन करें तो मेरा फोन खाली मिलना चाहिए। उनके पहले डायल पर मेरे फोन की घंटी बजनी चाहिए और रिसीवर उठते ही मेरी आवाज कानों में पड़नी चाहिए। फोन अगर इंगेज्ड मिला तो मेरी खैर नहीं। एकदम उखड़ी हुई नाराज आवाज में डांट लगाएंगी – किसकी जान को लगी हुई थी तू ? कब से फोन मिला रही हूं – मिल ही नहीं रहा। किससे बात कर रही थी ?

कई बार तो इतनी जोर से डांट देतीं कि एकदम मुझे बीजी – अपनी मां – याद आ जाती।

कुछ साल पहले कथादेश में ओमा शर्मा ने राजेंद्र यादव का साक्षात्कार लिया था, जिसमें मन्नू जी के लिए खांटी घरेलू औरत  का खिताब पढ़कर ममता कालिया ने तो इसी शीर्षक से कविताओं की पूरी किताब ही लिख डाली। मैंने भी प्रतिक्रिया में लिखा – कलाकार की पत्नी होना अंगारों भरी डगर पर नंगे पांव चलने जैसा है!  लेखक और कलाकर जितना आत्ममुग्ध और अहंकारी जीव होता है, उसे झेल पाना आसान बात नहीं है। वह घर की सुविधाएं जरूर चाहता है – घर लौटे तो मेज पर खाना लगा हुआ मिले, पत्नी इंतजार करती हो कि इतनी देर कहां लगा दी, सुबह उठने के साथ साथ चाय का कप हाजिर मिले, नहाने जाए तो धुला हुआ तौलिया बाथरूम में और पहनने के लिए कपड़े प्रेस किए मिलें। इन सुविधाओं के साथ साथ वह लंपट होने की आजादी भी चाहता है और गर्व से इतराता है कि वह कलाकारनुमा एक बोहिमियन जिंदगी जी रहा है।

मन्नू जी एक ओर घोर नैतिकतावादी थीं – संस्कारों और मूल्यों के प्रति गहरा सरोकार और लगाव लेकिन अपने टूटने की कीमत पर संस्कारों और मूल्यों को बचाने का सवाल हो तो वे बेहद निर्मम होकर अपने को बचाने की कोशिश करतीं, अपने जीने की कीमत पर वह मूल्यों के लिए अड़ नहीं जातीं। ….और संस्कारों और अपने आत्मसम्मान के इस संतुलन ने ही उन्हें सिर उठाकर अपने मूल्यों को भी बचाकर रखते हुए जीने की ताकत दी थी। यह ताकत उनकी अपनी कमाई हुई थी – किसी के कहे से या किसी दबाव के तहत नहीं आई थी।

1994 में जब मन्नू जी ने राजेंद्र जी से अलग रहने का निर्णय लिया तो राजेंद्र जी ने इसे उसी तरह लिया जैसे मन्नू जी पहले भी कई बार रो-कलप कर उन्हें अलग रहने का निर्णय सुना चुकी थीं। राजेंद्र जी को लगा – कुछेक दिनों-महीनों की बात है, खांटी घरेलू औरत आखिर जाएगी कहां! पर उन्हें नहीं मालूम था खांटी घरेलू औरत अब बागी हो चुकी है। और बगावत का यह रास्ता उन ज्यादतियों ने ही खोला है जो मन पर निरंतर प्रहार से जाग जाती हैं। इस बार मन्नू जी ने बाकायदा दान दहेज के साथ विदा किया जैसे एक मां अपनी बेटी को विदा करती है। किशन को उनके साथ कर दिया जो बीवी की तरह खाने पीने, कपड़ों का जुगाड़ करने से लेकर गाड़ी तक चलाने की जिम्मेदारी निभा देगा। इससे ज्यादा की उन्हें जरूरत भी नहीं थी। लेकिन दस किशन हो पर घर तो घर है।

लेखक और कलाकर जितना आत्ममुग्ध और अहंकारी जीव होता है, उसे झेल पाना आसान बात नहीं है। वह घर की सुविधाएं जरूर चाहता है - घर लौटे तो मेज पर खाना लगा हुआ मिले, पत्नी इंतजार करती हो कि इतनी देर कहां लगा दी, सुबह उठने के साथ साथ चाय का कप हाजिर मिले, नहाने जाए तो धुला हुआ तौलिया बाथरूम में और पहनने के लिए कपड़े प्रेस किए मिलें। इन सुविधाओं के साथ साथ वह लंपट होने की आजादी भी चाहता है और गर्व से इतराता है कि वह कलाकारनुमा एक बोहिमियन जिंदगी जी रहा है।

परित्यक्त राजेद्र जी घर छोड़ते ही फौरन ‘संवाद हीनता’ छोड़कर ‘अतिरिक्त संवाद’ पर उतर आए, एकाएक आत्मीय हो उठे, लोगों के बीच आवाज़ देते – मन्नू, यह किताब देखो, मन्नू, इधर आओ – यह दिखाने के लिए कि हमारे बीच सब सही सलामत है, कोई टूट फूट नहीं हुई है। औरत जात – आखिर तो पसीजेगी। मन्नू जी को राजेंद्र जी का यह बदलाव बेहद भाया। मन्नू जी कैसे भूल सकती थीं कि जो आदमी साथ रहते पैंतीस साल में कभी ढंग से बात नहीं करता था, हारी-बीमारी कभी पूछता नहीं था, अचानक तवज्जो देने लगे तो किसे अच्छा नहीं लगेगा। वह अकेलापन ज्यादा खलता होगा जहां शाम को कमरे में कोई और न मिले तो राजेंद्र जी अपने पीर,बावर्ची, भिश्ती, ड्राइवर गोपाल को ही बिठाकर हंसी-ठट्ठा कर लेते थे पर जैसे ही मन्नू जी कमरे में पहुंचतीं तो सन्नाटा ऐसे पसर जाता, जैसे सबको सांप सूंघ गया हो, जैसे कोई अवांछित व्यक्ति घुस आया हो कमरे में। ….

मन्नू जी आहत होकर बाहर आ जातीं कि उनकी हैसियत घर के नौकर-ड्राइवर से भी गयी गुजरी है जिसके साथ और जिसके सामने कोई हंसी-मजाक किया ही नहीं जा सकता। सबके बीच होते हुए भी अकेले होने का बोध किस कदर सालता है, यह कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है, सो धीरे-धीरे मन्नू जी अकेलेपन से निकलकर उस एकांत में रमने लगीं – जहां वे सिर्फ अपने साथ होती थीं – जहां वे जानती थीं कि देह की सारी बीमारियों से उन्हें अकेले ही जूझना है। जब अपनों से अपेक्षाएं मिट जाती हैं, जीना धीरे धीरे आसान लगने लगता है। …. तो अलग होने के बाद राजेंद्र जी के फोन भी आने लगे।  शायद अलग होने के बाद ही उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने क्या खो दिया है ….या शायद न भी किया हो क्योंकि हर व्यक्ति अपनी प्राथमिकताएं तय करता है। राजेंद्र जी के जीवन में मन्नू जी कभी प्राथमिक नहीं रहीं, सिवाय एक औपचारिक संबंध के, सो यह पहचान अपने आत्मसम्मान पर हथौड़े सी चोट तो करती ही थी। अब मन्नू जी को उनका बात करना, परवाह करना — या कम से कम ऐसा दिखाना अच्छा लगने लगा, तभी उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा – पता होता तो पहले ही अलग हो जाती।

अलग होते ही अगर उनके पति संवाद निरंतर बनाए रखना चाहते हैं तो उसके पीछे बड़े ठोस कारण है। कोई नई वजह तो पैदा नहीं हुई थी। सबसे कहते रहे कि मन्नू का गुस्सा कुछ दिनों में उतर जाएगा। आखिर पैंतीस साल के लंबे अरसे तक गुस्सा आता और जाता रहा, कभी स्थायी रूप नहीं ले पाया। सो राजेंद्र जी कुछ आत्मीयता दिखाकर, 103, हौज खास के दरवाजे खुलने का इंतजार करते रहे। अपने साक्षात्कारों में छिपाते रहे कि उनमें अलगाव हुआ है। कभी कुछ, कभी कुछ कारण लिखते-बताते रहे – लिखने के लिए अलग ठिकाना लिया है, मन्नू को मेरे दोस्तों का घर आना पसंद नहीं था वगैरह वगैरह।

अब जब घर लौटने के लिए दरवाजे उढ़के हुए मिले तो कहने लगे -‘मैं कई बार छह महीने बाहर रहा ताकि रोज-रोज का क्लेश मिटे, मुझे विवाह और आजादी में से एक को चुनना था, विवाह के आचरण की आचार संहिता में मेरा दम घुटता था। हमने अलग रहने के प्रयोग किए। ’यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी। कैसी विशिष्टता है और क्या उसका बयान। जैसे राजेंद्र जी अपनी आजादी के लिए खुद अलग हुए हों। वे साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि अलग रहना दोनों की आपसी सहमति से लिया गया निर्णय नहीं था। यह मन्नू जी का एकल निर्णय था जिसे राजेंद्र जी को स्वीकृति देने पर मजबूर होना पड़ा।

हां, जिन्हें उनकी आदतोें के बारे में मालूम है या मन्नू जी से पता चल सकता था, उनके सामने दबी जबान में बोल पड़े – निर्मला जी से खुद स्वीकारोक्ति की कि मेरी हरमजदगी इसका कारण है।

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मन्नू जी से अलग हाने के बाद मन्नू जी के बारे में तो राजेंद्र यादव ने बहुत से अपमानजनक बयान दिए। यादव जी में सार्वजनिक रूप से सच बोलने का साहस ही नहीं है। यही है – पुरुष का थोथा अहंकार – यह उससे जो जो न करवाए कहलवाए, वो कम है। वह भूल जाता है कि हर औरत कभी न कभी अपने जीवन में एक सेचुरेशन पॉयन्ट पर पहुंच जाती है जिसके बाद संबंध महज एक औपचारिकता भर रह जाता है, भावनात्मक तंतु धीरे-धीरे टूटते चले जाते हैं। एक बार उस अकेलेपन को साधना पड़ता है, एकांत में ढालना पड़ता है, बस। सो मन्नू जी ने साध लिया। …और एक बार साध लिया तो सारी नकारात्मक स्थितियां पॉजिटिव में बदलनी शुरू हो गईं।

दरअसल मन्नू जी राजेंद्र जी के लिए हमेशा से बहुत बड़ी चुनौती रहीं। न सिर्फ चुनौती। उनकी कुंठा का कारण भी रहीं। कमातीं वे। घर चलातीं वे। बच्चे की पूरी जिम्मेदारी उठातीं वे। इस सारे चूल्हे-चक्की और कॉलेज की कक्षाओं में पिसती खपती और पति की आवारगी को झेलती हुई मन्नूजी लिखती भी रहीं और जो भी लिखा, पाठकों-दर्शकों, नाट्य और फिल्म निर्देशकों ने हाथों हाथ लिया। बदले में राजेंद्र जी ने ऐसी उपेक्षा और अवमानना दी कि मन्नू जी का शरीर बीमारियों से लैस होता गया। …और अपनी ही दी हुई बीमारियों की वे देखभाल या परवाह क्यों करें? आखिर पत्नी के प्रति ऐसी कृतज्ञता क्यों? जो उसने किया, उसका फर्ज था। फर्ज के एवज में पत्नी कोई अपेक्षा रखे तो इसे उसकी बेवकूफी ही कहा जाएगा। अपने तईं मन्नू जी अपनी तथाकथित आत्मकथा में इसका विश्लेषण करती हैं –

‘यों तो हर व्यक्ति के भीतरी और बाहरी दो रूप होते हैं लेकिन किसी के व्यक्तित्व के इन दो रूपों में बहुत बहुत फासला होता है – इतना कि अगर दोनों को सामने रख दिया जाए तो आप पहचान भी न सकें कि ये एक ही व्यक्ति के दो रूप हैं। राजेंद्र के बाहरी रूप को जानने वाले कभी विश्वास ही नहीं करेंगे कि इनके बहुत भीतरी व्यक्तित्व का एक ऐसा भी हिस्सा है जो बहुत निर्मम, कठोर और अमानवीयता को छूने की हद तक क्रूर भी रहा है और इसकी मार झेली है उन लोगों ने जो बहुत अंतरंग होकर उनके प्यार की सीमा में होने का भ्रम पालते रहे। हकीक़त तो यह है कि आत्मकेन्द्रित और आत्मतोष के खोजी राजेन्द्र ने ज़िन्दगी में न अपने सिवाय किसी को प्यार किया, न कर सकते हैं !’

                                                                                                                                                एक कहानी यह भी  पृष्ठ 206

मनोवैज्ञानिक भाषा में इसे आत्ममुग्ध व्यक्तित्व का असंतुलन कहा गया है और यह असामान्यता रचनाशील कलाकार किस्म के लोगों में ज़्यादा पाई जाती है।

मन्नू जी के पास अतीत की स्मृतियों का पैंडोराज़ बॉक्स था। खोलते ही पूरा माहौल उन घटनाओं के ब्यौरों से गूंजने लगता। अपने घर अजमेर, इंदौर की, आगरा में बाई यानी अपनी सास की, देवरों – ननदों की सैंकड़ों घटनाएं उन्हें याद थीं  और हर बार वे भूल जाती थीं कि यह घटना वह पहले भी बता चुकी हैं। सब घटनाएं मुझे भी ज़बानी याद हो गई थीं और शायद उनकी सभी मित्रों को भी – अर्चना वर्मा, निर्मला जैन, राजी सेठ सबको ….क्योंकि उनकी जमा-पूंजी यही अतीत था। उनके इर्द-गिर्द मित्रों की भीड़ नहीं थी। बड़े शहरों का यही रोना है। यहां की भीड़ में हर कोई अकेला है।  सब अपने-अपने गोरखधंधों में व्यस्त हैं।

वैसे मन्नू जी की मित्रमंडली बहुत बड़ी थी जिसमें कलकत्ता के स्कूल बालीगंज शिक्षा सदन – जहां वे पढ़ाती थीं, से लेकर मिराण्डा हाउस की सहकर्मी और प्रशंसिकाओं की एक लंबी कतार थी। इस फैन क्लब की शोध छात्राएं और पाठिकाएं डरते डरते एक बड़ी लेखिका से मिलने आती थीं और एक खांटी घरेलू लेखिका से मिलकर ऐसी तृप्त हो जाती थीं कि बार-बार आती थीं क्योंकि ईमानदारी, पारदर्शिता, साफगोई और शालीनता को किसी एक व्यक्ति में ढाल दो तो वो थीं मन्नू भंडारी।

10 अप्रैल 2010

मन्नू दी का फोन। एक घटना सुनाने के मूड में थीं। बड़े विस्तार से सुनाना उन्हें अच्छा लगता था।

राजेंद्र जी का फोन आया। बोले – मन्नू, मुझे आजकल दौरे पड़ते हैं। मन्नू जी घबराईं – तबीयत तो ठीक है? किस बात के दौरे पड़ते हैं?

बोले – कृतज्ञता के।

– अच्छी बात है। पर किसके लिए। मन्नू दी मन ही मन सोच रही होंगी कि उनके प्रति अब कृतज्ञता महसूस कर रहे हैं।

– टिंकू के लिए। वह कहां डी.एल.एफ. से आकर यहां मयूर विहार में मेरे लिए फ्लैट तैयार करवा रही है।

मन्नू दी ने कहा – चलो, अच्छा है, किसी के लिए तो कृतज्ञ महसूस करते हैं आप! मेरे लिए तो कभी कृतज्ञता महसूस नहीं की।

बोले – अरे नहीं, तुम्हारे लिए तो आज भी कृतज्ञ हूं। पहले भी था। हमेशा रहा हूं ।

मन्नू दी बोलीं – अरे, झूठ तो मत बोलो अब। अब चाहे हो गये हो मेरे प्रति भी कृतज्ञ। पहले तो कभी नहीं थे।

बोले – नहीं, शुरू से रहा हूं।

मन्नू दी कहां छोड़ने वाली थीं – देखो, फालतू की बातें तो करो मत मुझसे। टिंकू के प्रति कृतज्ञ हो तो टिंकू के प्रति क्रुएल हो सकते हो? नहीं न? जिसके प्रति कृतज्ञ होते हैं, उसके प्रति क्रूर नहीं होते।

– तुम्हारे प्रति भी कब क्रूर रहा हूं? कभी नहीं।

– व्वाह! व्वाह! प्रसंग गिनाऊं। दर्जन भर तो अभी गिना दूं!

चिल्लाकर बोले – अब हटाओ। पुरानी बातें जब देखो, दोहराने बैठ जाती हो।

मन्नू दी ने कहा – देखो, जो लात मारता है न, वह तो लात मार कर चला जाता है, उसे याद भी नहीं रहता कि उसने क्या किया है पर जो लात खाता है, वह जिन्दगी भर उस चोट को नहीं भूलता। तो मैं भूली नहीं हूं। आप नहीं चाहते तो याद नहीं दिलाऊंगी।

फिर मन्नू दी मुझसे बोलीं – ‘मैं कहना तो चाहती थी कि जो प्रसंग मैंने नहीं लिखे, वह भी सुधा लिख रही है, याद रखना। पर कहा नहीं !’

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कहते हैं – इच्छाशक्ति से आप अपना भाग्य, अपना जीवन बदल सकते हैं। मन्नू जी इसकी अद्भुत मिसाल हैं। हर वक्त बीमारियां उनके पीछे पीछे दौड़ती रहती हैं और वे बीमारियों को मात देतीं उनसे पीछा छुड़ातीं उनसे चार कदम आगे दौड़ती रहती थीं।

उनसे अक्सर लंबी बातें होती रहीं। उन्हें सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से होती कि वे सबकुछ भूल जाती थीं, उनकी याददाश्त बहुत कमजोर हो गई थी। जो पढ़ती थीं, वह याद नहीं रहता, किसी से मिलीं तो अगली बार उससे मिलने पर उसका नाम भी भूल जाती थीं। उनका एक वाक्य जो हर किसी ने सुना होगा – वह है -‘बस, मुझे कुछ याद नहीं रहता’ मैंने उनकी इस याद न रहने की बात पर कुछ पंक्तियां लिख डालीं! कहती तो वह हंसकर ही थीं। हंसना तो उनका स्थायी भाव था पर उस हंसने में कितनी तकलीफ छिपी थी, यह सिर्फ वे ही जानते हैं जो उनके करीब थे।

sudha arora

 

 

 

 

सुधा अरोड़ा जानी-मानी कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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