तौफीक बसर और निर्वासन में तुर्की सिनेमा

राकेश कबीर

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फातिह अकीन ने जर्मनी में बसे तुर्क समुदाय की दूसरी पीढ़ी की समस्याओं पर कई बेहतरीन फिल्में बनायीं। उसी परंपरा में कई अन्य फिल्मकार मसलन टुंक ओकन, अर्डेन किराल, टुन्सेल कुर्टिज, ईलमाज अर्सलान, इनीस गुनाय, रासिम कोनयार, और तौफीक बसर वगैरह प्रमुख हैं। कई महिला डाक्यूमेन्ट्री फिल्ममेकर भी हैं जिनमें जेनिन मीराफेल, सिराप बेर्राक्काराशु एवं मर्लिन स्पेलाखन अग्रणी हैं। तुर्की मूल के इन सभी फिल्मकारों के सामूहिक प्रयासों से ’निवार्सन में तुर्की सिनेमा’ (Turkish cinema in Exile) की एक धारा स्थापित होती है। तुर्की मूल के लोग जर्मनी के विभिन्न शहरों में बसे हैं लेकिन उनकी सर्वाधिक संख्या बर्लिन में है, जो दुनिया में सबसे बड़ी प्रवासी आबादी यानी तुर्क लोगों की संख्या है (Kinzer 1997)। बर्लिन में बसे तुर्क प्रवासियों में एथनिक, धार्मिक, राष्ट्रीय और राष्ट्रवादी राजनीतिक नजरिये के हिसाब बहुत अधिक विविधता है। इनमें 5 लाख कुर्द समुदाय की जनसंख्या है जो तुर्की, सीरिया, ईरान और इराक के रहने वाले हैं। इनकी जातीय पहचान (Ethnic Identidy) इनकी राष्ट्रीयता के ऊपर भारी पड़ती है। वे खुद को राष्ट्रवादी कुर्द (Nationalist Kurds) बोलते हैं, जर्मन नहीं, क्योंकि वे अपनी पहचान को लेकर ज्यादा आग्रही हैं (Leggewie 1996)।

तौफीक बसर की फ़िल्म फेयरवेल स्ट्रेंजर 1991 में रिलीज हुई जिसमें जर्मन महिला करीन और तुर्की से भागकर आये कवि डेनीज़ की प्रेम कहानी है। करीन अपने पति को छोड़कर अपने बचपन के गांव में अकेले रह रही है। उस द्वीप जैसी जगह पर पाकिस्तान, अफ्रीका और तुर्की से आये अवैध अप्रवासियों की भीड़ है। बाहरी लोगों की भीड़ में करीन अपने ही गांव में अजनबी महसूस करती है।

जर्मनी में बसे तुर्की लोग अपनी भाषा, धर्म और पहचान को लेकर बहुत ज्यादा प्रयास करते है। एक फिल्म निर्देशक एरिक ने अपने इंटरव्यू में बताया कि कुर्द समुदाय के लोगों को तुर्की में कुर्दिश भाषा बोलने-सीखने पर सख्त मनाही है लेकिन बर्लिन में कुर्दिश भाषा को इतनी सख्ती से सिखाया जाता हैं कि इन स्कूलों को torture chambers for Kurdish children कहा जाता है। इसी कारण जर्मनी में बसे हम कुर्द लोग तुर्की में बसे कुर्द समुदाय से ज्यादा कुर्दिश और टर्किश बन जाते हैं (नफीसी 1997)

एक तरफ जो तुर्क लोग एक या दो पीढ़ीयों से जर्मनी में स्थायी रूप से बस चुके हैं वे खुद को पूरी तरह जर्मन मानते हुए भी, होस्ट कन्ट्री में पूरी तरह स्वीकृत नहीं हो सके हैं तो दूसरी तरफ तुर्क समुदाय स्वयं को दबाव समूह (Pressure group) मानते हुए चुनावों में इस शर्त पर वोट करता है और संपत्ति का अधिकार प्राप्त करता है कि वह अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और राष्ट्रीयता को बचाते हुए, उसी पहचान के साथ निवास करेगा। प्रवास की ये जटिल स्थितियां डायस्पोरा फिल्म निर्माता/निर्देशकों के सिनेमा में प्रस्तुत होती रहती हैं। अब हम जर्मन-टर्किश फिल्मकार तौफीक बसर की फिल्मों की विषयवस्तु के माध्यम से प्रवासी तुर्क समुदाय,  उनकी भावनाओं, समस्याओं और अपेक्षाओं को समझने का प्रयास करेंगे। भारत की ही तरह तुर्की एक पुरुष सत्ता प्रधान देश हैं जहाँ महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है। उनकी भूमिका घर के भीतर सीमित कर उनका शोषण और अपमान सामान्य बात है।

‘फेयरवेल टू अ फाल्स पैराडाइज’ फिल्म के पोस्टर के साथ कलाकार

तौफीक बसर और उनकी फिल्में

तौफीक बसर का जन्म सन 1951 में तुर्की के कांकीरी नामक स्थान पर हुआ। उन्होंने क्रमशः इंगलैण्ड, तुर्की और जर्मनी में फोटोग्राफी, ग्राफिक डिजाइन, और सिनमैटोग्राफी की ट्रेनिग ली और जर्मनी में बस गए। प्रारंभ में उन्होंने कई पुरस्कृत डाक्यूमेन्ट्री फिल्में बनाई। उनकी दो प्रमुख फिल्में- 40 स्क्वायर मीटर जर्मनी (1986) एवं फेयरवेल टू अ फाल्स पैराडाइज (1988) हैं। ये दोनों फिल्में क्रमशः एक छोटे से कमरे और जेल में अत्यंत तंग जगह में फिल्मायी गयीं लेकिन इनमें चित्रित विषय वैश्विक और मार्मिक होने के साथ अपीलिंग भी था। उनकी पहली फिल्म 40 स्क्वायर मीटर जर्मनी एक तुर्की गेस्ट वर्कर (लेबरर) की जवान पत्नी (दुर्ना) की कहानी है जो अपने पति (अधेड़ दुर्सुन) के साथ तुर्की से जर्मनी आयी है। उसका उम्रदराज पति (दुर्सुन) जब सुबह काम पर जाता है घर का दरवाजा बाहर से लॉक कर देता है। एक रात घर लौटने पर पत्नी इस बात पर लड़ाई करती है कि उसको जानवरों की भांति घर में ताला बंद करके क्यों रखा जा रहा है।

एक बंद कमरे में रहने की घुटन (Claustrophobic) पित्तृसत्ता की शिकार अकेली महिला से बेहतर कौन समझ सकता है। 40 स्क्वायर मीटर जर्मनी की नायिका और उसके मजदूर पति का वार्तालाप सब कुछ स्पष्ट कर देता है :

दुर्ना (पत्नी)- (कपड़े धोते हुए, काम से लौटे पति से पूछती है) तुमने मुझे लाॅक क्यों किया ? क्या मैं कोई जानवर हॅू?

दुर्सुन (कुर्सी पर बैठकर खाते हुए जबाव देता है) सुनो, मुझे गुस्सा मत दिलाओ। यह जर्मनी है, अपना घर (तुर्की) नहीं है। तुम नहीं जानती कि जर्मनी का आदमी कितना धूर्त (Sly) होता है। तुम्हे बंद कमरे में रहने में क्या परेशानी है? क्या तुम छोड़कर जाना चाहती हो, तो जाओ चली जाओ, शायद तुम्हे कोई गंदगी का ढे़र (Pile of Shit) मिल जाए।

’40 स्क्वायर मीटर जर्मनी’ फिल्म का एक दृश्य

दुर्ना- मुझे कहीं नहीं जाना। मैं तो दरवाजे के सामने की सफाई करना चाहती थी।

दुर्सुन (उसे कामुक नजरों से देखते हुए)- आओ, मेरे पास आओ। मुझे लगता है तुम भी थक गयी हो।

दुर्ना अपने पति की शारीरिक इच्छाओं को बिना मन के भी पूरा करती है। दर्द झेलती है, शर्म और अपमान सब बर्दाश्त करती है। वह अपने पति से बातचीत कम कर देती है, उससे नजरें भी नहीं मिलाती। वह खूब मेहनत करके कपड़े धोती है, खाना पकाती है और घर की सफाई करती है। इस तरह उसका स्पेस कम होता जाता है। वह 40 स्क्वायर मीटर की चारदीवारी में शक्तिहीनता और अलगाव का शिकार हो जाती है। वह छोटा सा घर भी उसका नहीं है। उसके पास केवल अपना शरीर है और बचपन की कुछ खूबसूरत यादें हैं। एक सूटकेस है, और उस अपार्टमेंट में रखे तुर्की के कपड़े, सामान और स्मृति चिन्ह हैं।

एक दिन दुर्ना पाती है कि उसके कमरे में लॉक बंद नहीं है वह बाहर निकलकर अंधेरी सीढ़ियों से उतरती है लेकिन थोड़ी देर में बापस लौट जाती है। शायद उसे जर्मन समाज के प्रति एक डर और संदेह का भाव है। वह खुद को एक अनजान देश में असमर्थ/कमतर महसूस करती है क्योंकि उसे यहाॅं की भाषा नहीं पता, कोई कार्य नहीं आता और सबसे बड़ा डर उसे अपने पति से है। कारावास या एक बंद कमरे की जिंदगी, एक झूठे कम्फर्टजोन (false comfortzone) का आभास देती है। हामिद नफीसी लिखते हैं “Confinement this reveals its janus face, that is, its ability to genevate a sense of (false) comfort compression in and expansion together constitute the dual Chronotopes of the accented Cinema.”

’40 स्क्वायर मीटर जर्मनी’ फिल्म का एक दृश्य

इस फिल्म के अंत में जब टुर्ना का पति दुर्सुन एक हर्ट अटैक के कारण मर जाता है तो दुर्ना को अंधेरे बंद कमेरे से बाहर निकलकर अनिश्चितताओं भरी जर्मनी की दुनिया में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। पितृसत्तात्मक समाज एक औरत को इस कदर परमुखापेक्षी बना देता है कि पुरुष की अनुपस्थिति में वह कुछ भी कर पाने या निर्णय ले पाने में खुद को असहाय पाती है।

तौफीक बसर की दूसरी फिल्म फेयरवेल टू फाल्स पैरादाइज (Farewell to false paradise) भी प्रवासी तुर्की महिलाओं के कारावास या छोटे स्थानों पर बंदीकरण (Space of confinement) और सुरक्षा की भावना को चित्रित करती है। ज्यादातर प्रवासी वर्ग के सिनेमा में जेल/ बंदीगृह को नकारात्मक ढंग से चित्रित किया गया है। लेकिन बसर ने इसके उलट जेल को फिल्म की मुख्य महिला पात्र एलिफ के लिए एक जन्नत की तरह प्रस्तुत किया है। अपने दुराचारी पति की हत्या के जुर्म में एलिफ चार साल के लिए जेल में है और बंदी के दौरान वह आत्महत्या का प्रयास भी करती है। लेकिन जेल से बाहर आने का समय नजदीक आने पर वह सोचती है कि जेल में रहने पर वह जर्मन और टर्किश दोनों समाजों से बच सकती है क्योंकि उसे दोनों से खतरा है। एक प्रवासी और एक महिला दोनों रूपों में वह कमज़ोर (vulnerable) है। जेल में रहने से वह एक तरफ जर्मनी के नव-नाजीवादियों से बच सकती है तो दूसरी तरफ अपने पित्तृसत्तावादी तुर्की रिश्तेदारों के हमलों से भी। बंदीगृह उसके लिए सुरक्षित जन्नत की तरह है जहाँ जीवन में अपेक्षित सामान्यता और निरंतरता है। यह एलिफ की अपनी सोच है किन्तु जेल एक झूठी जन्नत (False paradise) है क्योंकि वह उसे जर्मनी और टर्की दोनों संस्कृतियों से दूर कर देती है। एलिफ़ अकेली महिला है, वह अलगाव की शिकार है और फिल्म के ज्यादातर हिस्से में वह चुप रहती है। उसकी चुप्पी भयावह है और पूरी दुनिया में उसका कोई नहीं है। उसके पुरुष रिश्तेदार डरावनी धमकी भरी चिट्ठियां भेजते हैं। जो उससे मिलने आते हैं वे भी धमकियां देते हैं। एलिफ की स्थिति बहुत नाजुक है। वह न वापस तुर्की जा सकती है, न जेल में रह सकती है और न ही वह स्वयं को रिलीज कराना चाहती है।

घर उसके लिए संकट का  संसार (State of Crisis) में है। वह कुछ भी तय कर पाने की स्थिति में नहीं है। जर्मनी उसे आगे शरण देने को तैयार नहीं है और अच्छे आचरण के कारण जेल से एलिफ को रिहा किया जाना है। वह विकल्पहीनता की स्थिति में आत्महत्या का प्रयास करती है लेकिन बच जाती है। वह अपना घर छोड़कर दूसरे देश में जाते हैं, वहां अपने ही पति के शोषण का शिकार होती हैं। शोषण, अपमान और अत्याचार बर्दाश्त से बाहर होता है तो पति की हत्या करनी पड़ती है। फिर एलिफ इतनी Vulnerable हो जाती है कि कहीं भी खाने और बसने, नया जीवन शुरू करने के विकल्प समाप्त हो जाते हैं। दुनिया डरावनी लगने लगती है। एलिफ महिला है इसलिए स्थितियां और मुश्किल भरी हो जाती हैं। गुरिन्दर चढडा (Britesh Indian) की फिल्म Bride  & prejudice की भी यही कहानी है। एक पंजाबी लड़की किरणजीत अहलूवालिया जब शादी के बाद ब्रिटेन में बसती है तो उसका शराबी, झगड़ालू और बदचलन पति जुर्म की इंतहा करता है। किरणजीत को अपने पति की हत्या करनी पड़ती है। एलिफ की तरह किरणजीत को भी जेल बेहतर जगह लगती है क्योंकि वह अपनी साथिन कैदियों के साथ इनसान की तरह जी पाती है। घर और जेल में अगर एक महिला को जेल ज्यादा सुरक्षित और बेहतर जगह लगती है तो लानत है पित्तृसत्तात्मक समाज और उसकी सोच पर।

तौफीक बसर की फ़िल्म फेयरवेल स्ट्रेंजर 1991 में रिलीज हुई जिसमें जर्मन महिला करीन और तुर्की से भागकर आये कवि डेनीज़ की प्रेम कहानी है। करीन अपने पति को छोड़कर अपने बचपन के गांव में अकेले रह रही है। उस द्वीप जैसी जगह पर पाकिस्तान, अफ्रीका और तुर्की से आये अवैध अप्रवासियों की भीड़ है। बाहरी लोगों की भीड़ में करीन अपने ही गांव में अजनबी महसूस करती है। वहीं उसकी मुलाकात तुर्की से आये कवि डेनीज़ से होती है। दोनों एक दूसरे की भाषा न समझते हुए भी साथ रहते हैं और प्यार करते हैं लेकिन जर्मनी की सरकार डेनीज़ को अपने देश में रहने की अनुमति नहीं देती है क्योंकि उसे तुर्की की सरकार ने 128 साल की जेल की सज़ा दी है। जर्मन सरकार डेनीज़ को तुर्की में डिपोर्ट कर देती है। डेनीज़ की जेल में ही मौत हो जाती है।

तौफीक बसर की तीनों फिल्में उनके जर्मन नागरिक बनने के बाद की फिल्में हैं। फेयरवेल स्ट्रेंजर फ़िल्म में वे फ़ातिह अकीन की तरह तुर्किश-जर्मन बनने और ज्यादा कॉस्मोपॉलिटन होने की तरफ अग्रसर दिखते हैं। वे दोनों देशों के लोगों और संस्कृतियों को करीब लाने और स्वीकार करने की तरफ बढ़े हैं। लेकिन बसर की फिल्में अकेलेपन, खासकर महिलाओं के अकेलेपन और  जेल या बंद कोठरियों की दुनिया को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करती हैं।

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तौफीक बसर पहली पीढ़ी के जर्मन-टर्किश फिल्मकार हैं और उनकी फिल्मों की महिला पात्र तुर्की से आती हैं। तुर्की और जर्मनी की भिन्न संस्कृतियों और पित्तृसत्ता से वे मुठभेड़ करती हैं। विकल्प ढूंढ़ती हैं जो कि आसान नही है। जहाँ फातिह  अकीन दूसरी पीढ़ी के जर्मन-टर्किश फिल्मकार हैं और खुद को जर्मन कहलाना पंसद करते हैं। उनकी फिल्में भी Moderate हैं, वहीं तौफीक बसर की समस्याएं पहली पीढ़ी के गेस्ट वर्कर्स की पत्नियों या कहें महिलाओं की हैं,  जो अपनी स्थितियों को लेकर संघर्षरत हैं। बसर के सिनेमा के पात्र और  विषय इस अर्थ में Universal हैं कि पित्तृसत्तात्मक समाजों में स्त्रियों की हैसियत और भूमिका (Status and role) में समानता, बराबरी की पैरवी करना जरूरी है क्योंकि अभी भी उन्हें दोयम दर्ज़े  का नागरिक समझा जाता है।

जिस समय मैं यह लेख लिख रहा हूँ संयोगवश इतिहासकार सुभाषचंद्र कुशवाहा तुर्की का दौरा कर रहे हैं और वहाँ के जनजीवन – समाज, खेती-किसानी पर लगातार हमें अपडेट कर रहे हैं। इंतजार रहेगा कि वे वहाँ के सिनेमा पर भी कुछ टिप्पणी करेंगे।

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सन्दर्भ :
Berghahn, Daniela (2006) No Place Like Home? Or Impossible Homecomings in the Films of Fatih Akin, in New cinemas: Journal of Contemporary film, Vol.4, Number 3.
Burns, Rob (2013) From Migration to Mainstream: Thirty Years of Turkish-German Cinema, at https://warwick.ac.uk.
Kinzer, Stephen (1997) Turks say bonn is encouraging racist attacks, in new York times, on April 5, p.3.
Leggewie, Claus (1996) How Turks Became Kurds, Not Germans, in Dissent, Summer, pp79-83.
Naficy Hamid (2001) an accented cinema: exilic and diasporic filmmaking, Princeton University Press, USA.

5 Comments
  1. Ghanshyam kushwaha says

    बेहतरीन लेख🌻

  2. Tarkeshwar Patel says

    यह लेख पुरुष प्रधानता वह उसूलों की है। जिसमें महिलाओं की स्थिति काफी दयनीय है ।आपने सबसे अधिक महत्वपूर्ण और सार्थक शब्दों और बुद्धिमता से परिपूर्ण तर्कों का साथ इस लेख के माध्यम से तुर्की से निर्वाचित होकर जर्मनी में आए लाखों लोगों की दुख _ पीड़ा से रूबरू कराया। यह लेख पठनीय और ज्ञानवर्धक है। बहुत-बहुत धन्यवाद एवं शुभकामनाएं।👌👌👌🙏🙏🙏🙏

  3. Gulabchand Yadav says

    गंभीर और समीचीन विषय पर अंतरराष्ट्रीय सिनेमा की नई धारा पर केंद्रित बढ़िया और शोधपूर्ण आलेख। राकेश जी बहुत श्रम के साथ अपना आलेख प्रस्तुत करते हैं। बधाई।

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