Sunday, May 26, 2024
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अर्थव्यवस्था के कुठाराघात ने बनारस में खिलौना बनानेवालों को तबाही के कगार पर ला खड़ा किया है

मो. अरशद का काम और वर्कशॉप उनके घर पर ही है। अंदर जाने पर ग्राउन्ड फ्लोर पर छोटे-छोटे दो कमरों में हाथ से चलने वाली मशीनें लगी हुई हैं। वहां उनके बेटे आदिल अकेले ही नक्काशीदार दरवाजे के हैन्डल पर फिनिशिंग का काम रहे थे। आदिल 25-26 वर्ष के हैं और बी.कॉम. करने के बाद अपने पुश्तैनी काम में लग गए हैं।

बनारस अपनी अनेक चीजों के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। यहाँ की गलियाँ, गालियाँ, मिठाई, घाट, पंडे, पान, विश्वविद्यालय और भौकाल सबकुछ दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। इसी तरह बनारसी साड़ियां और अनेक हस्तकलाएँ बनारस की बहुत बड़ी पहचान बनाती हैं।

हर गली और मुहल्ला दस्तकारी में अपनी किसी न किसी खासियत के साथ ज़िंदा है। यह और बात है कि वक्त की मार और अर्थव्यवस्था के कुठाराघात ने बहुत सी चीजों को धूल-धूसरित कर दिया है।

इन्हीं में से एक है लकड़ी के खिलौने बनानेवालों की ज़िंदगी, जिनमें से बहुतों की कहानियाँ अत्यंत दर्दनाक है। मंदी, कोरोना और उधारी पर दिये गए माल का पैसा वापस न आने से बहुत से परिवार तंगहली के अंधेरे में जीने को विवश हैं तो कुछ ने बदहाली और गरीबी को अपनी किस्मत मान लिया है।

हालाँकि काष्ठशिल्प के क्षेत्र में कई ऐसे महत्वपूर्ण कलाकार भी हैं जिनका देश-विदेश में बड़ा नाम है और उन्हें अनेक पुरस्कारों से भी नवाजा गया है तो कुछ लोग लकड़ी की कारीगरी में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं और उनका अपना एक व्यावसायिक नेटवर्क भी है लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है।

ज़्यादातर लोग अपने धंधे में पिछड़ गए हैं और निर्विकल्प होने के कारण भले ही अभी तक काम कर रहे हों लेकिन इसके भविष्य को लेकर वे कई तरह की आशंकाओं से भर गए हैं।

लकड़ी के खिलौनों के लिए प्रसिद्ध कश्मीरीगंज मुहल्ले में मैं कई ऐसे कारीगरों से मिली जो बताते हैं कि वे इस काम में मजबूरन हैं क्योंकि और कुछ नहीं आता। इसे छोडकर मजदूरी करना भी फायदेमंद नहीं है क्योंकि काम और मजदूरी दोनों का कोई ठिकाना नहीं है।

लल्लापुरा में खेलते हुए बच्चे दौड़कर आकर फोटो खिंचवाने की फरमाइश करते हुए

लल्लापुरा के मोहम्मद अरशद लकड़ी की कारीगरी में नामी आदमी हैं

बनारस का मुस्लिम बहुल मोहल्ला लल्लापुर आमतौर पर बनारसी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है लेकिन वहाँ रहनेवाले मोहम्मद अरशद की प्रसिद्धि लकड़ी के खिलौनों के लिए है। मैं जब उनसे मिलने लल्लापुरा पहुँची तो तीसरे पहर की धूप में वहाँ एक उदासी पसरी पसरी हुई थी।चारों तरफ दो-तीन तल्ला मकान थे, जिनमें से कई की दीवारों का प्लास्टर उखड़ा हुआ था और उनसे पुराने समय की लखौरी ईंटें झांक रही थीं। इन्हीं मकानों के बीच में लगभग एक बिस्सा जमीन खाली पड़ी हुई थी, जिस पर 10-12 बच्चे खेल रहे थे और दो-तीन लड़के पतंगें उड़ा रहे थे। जैसे ही मैं वहाँ पहुंची तब सभी ने धमा-चौकड़ी रोक दी और मुझे देखने लगे।  उन्हें देखकर मैंने भी हाथ हिलाया और मुस्कुराई। कैमरा देखकर कुछ बच्चे पास आए और फोटो खिंचवाने की फरमाइश करने लगे। मैंने खुश होते हुए उनकी फोटो ली। कुछ और बच्चे भी वहाँ थे। लेकिन उन्होंने इच्छा होते हुए भी संकोच दिखाया। उनमें से एक बच्ची ज़ारा ने मुझसे पूछा कि आप अंग्रेज हैं क्या? शायद हाथ में कैमरा देखकर पूछा। एक ने तो आकर सीधा यह प्रश्न किया कि आप बच्चा चोर तो नहीं हैं? बनारस और आस-पास के जिलों में आजकल यह अफवाह जोरों से फैली हुई है।

मो. आदिल आर्डर पर मिले दरवाजे के हैंडल तैयार करते हुए

मो. अरशद का काम और वर्कशॉप उनके घर पर ही है। अंदर जाने पर ग्राउन्ड फ्लोर पर छोटे-छोटे दो कमरों में हाथ से चलने वाली मशीनें लगी हुई हैं। वहां उनके बेटे आदिल अकेले ही नक्काशीदार दरवाजे के हैन्डल पर फिनिशिंग का काम रहे थे। आदिल 25-26 वर्ष के हैं और बी.कॉम. करने के बाद अपने पुश्तैनी काम में लग गए हैं।

छोटे से आंगननुमा जगह पर कदंब की ढेर सारी लकड़ियाँ रखी हुई थीं और उसके आगेवाले कमरे में नक्काशी की गईं सैकड़ों चीजें रखी हुई थीं। यहां पर रौशनी बहुत कम थी और खुली आलमारी में रखे हुए नक्काशीदार सामानों पर धूल की मोटी परत दिखाई दे रही थी। जगह-जगह लटकते हुए जाले संकेत कर रहे थे कि उन सामानों को काफी समय से छुआ ही नहीं गया है।

कोरोना के कारण पर्यटकों की आवाजाही बंद होने की वजह से इन सामानों की मांग पूरी तरह खत्म हो गई है। आदिल बताते हैं कि इसीलिए तब से अब तक ये सामान जस के तस रखे हुए हैं।

दस पीढ़ियों की परंपरा

मो.अरशद की उम्र तकरीबन 60-62 साल है। उन्होंने बताया कि वे अपने परिवार की दसवीं पीढ़ी के सदस्य हैं जो इस काम को कर रहे हैं। काम वही है लेकिन काम के आधार में बदलाव आ चुका है। वे कहते हैं कि मेरे लकड़दादा और परदादा यानी मेरे पिताजी के पुरखे तीन भाई थे जो 1857 में आज के पाकिस्तान इलाके से, जो उन दिनों हिंदुस्तान का ही हिस्सा हुआ करता था, यहाँ आए। तीनों भाई दिल्ली, बनारस और लखनऊ में अपनी रोजी-रोजगार के लिए बस गए।

मोहम्मद अरशद कहते हैं कि मेरे परदादा ने हाथी दांत पर नक्काशी का काम शुरू किया। यह आश्चर्यजनक है कि दसवीं और ग्यारहवीं पीढ़ी अब भी अपने पुश्तैनी काम को बहुत लगन और रुचि से कर रही है।

मो. अरशद, पुराने दिनों को याद करते हुए

आदिल,जो इस परिवार की ग्यारहवीं पीढ़ी हैं, से मैंने पूछा कि ‘आप पढे-लिखे हैं। क्या आपने काम बदलने या नौकरी करने की नहीं सोची? तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि ‘घर का काम बरसों से चला आ रहा है। उस को छोड़ना मुझे सही नहीं लगता। और बचपन से इस काम को करते आ रहे हैं, इसलिए इसे करना और सीखना आसान है।’

दस पीढ़ियों से चले आ रहे नक्काशी के काम का एक बड़ा इतिहास है। मोहम्मद अरशद बताते हैं कि ‘ज्ञानवापी मस्जिद की सीढ़ी के ठीक नीचे हमारी नक्काशीदार शोपीस की बरसों पुरानी दुकान थी, जो अब बंद हो चुकी है। वहाँ पर हाथी दांत का पासा(लूडो), स्ट्राइकर और कुर्ते का बटन बनाये जाते थे। पहले सजावटी सामान का चलन आम लोगों के बीच नहीं था। एक खास वर्ग ही इन चीजों के शौकीन हुआ करता था। इसलिए यह कम बनता था।

 

बहुत वर्ष पहले बने हुए हाथी दांत के शो पीस

 

‘पहले मशीनें नहीं थीं तो ये सब काम हाथ से ही होता था। धीरे-धीरे हाथी दांत की मूर्तियाँ, अशोक की लाट और माला बनने लगे। कारीगीरी का सभी काम मेरे दादा-परदादा खुद किया करते थे। अस्सी के दशक में हाथी दांत पर बंदिश लगने के बाद बाजार में इसकी उपलब्धता खत्म होने लगी। ऐसे समय में चंदन की लकड़ी पर इसी काम की शुरुआत हुई। चंदन की लकड़ी पर ज्यादा प्रयोग हुए।

‘बेस के बदलने से इसमें बनने वाले आइटमों में भी बढ़ोतरी हुई। धीरे-धीरे चंदन की लकड़ी भी आसानी से मिलनी मुश्किल हो गई तब इसके विकल्प में कदंब के पेड़ की लकड़ी चलन में आई और आज सभी काम इसी लकड़ी पर होता है।’

मो. अरशद के वर्कशॉप के आँगन में ढेर सारी कदम पेड़ की लकड़ियाँ रखी हुई थीं, जिन्हें आवश्यकतानुसार काटा और तराशा जाता है। लकड़ियों के ढेरों कुंदे वहाँ पड़े हुये थे लेकिन काम में मंदी के कारण बहुत दिनों से उनका इस्तेमाल ही नहीं हुआ था।

कदंब की लकड़ी के बने शो पीस, फ़िलहाल मंदी के कारण धूल खा रहे हैं

कोरोना के चलते सारे समीकरण उलट गए

दो साल की कोरोना महामारी ने लघु उद्योगों को तहस-नहस कर दिया है। इसी तरह आज पर्यटन से जुड़े हर व्यवसाय की स्थिति बहुत खराब हो चुकी है। कोरोना से पहले इनके काम की स्थिति बहुत बेहतर थी। मो.अरशद बताते हैं कि ‘पॉलिश होते-होते ही सारा सामान निकल जाता था। काम से समय निकाल पाना मुश्किल होता था क्योंकि काम बहुत होता था।’

लेकिन अब स्थिति बिलकुल बदल चुकी है। वे बताते हैं कि ‘आज से ढाई-तीन साल पहले 15-20 कुशल कारीगर काम करते थे। इन लकड़ी से बने सजावटी सामानों की इतनी मांग होती थी कि बाहर भी ऑर्डर देकर सामान बनवाना पड़ता था। पहले कोलकाता, मुंबई, दिल्ली से बहुत ऑर्डर आते थे। हमारा काम पर्यटकों के ऊपर निर्भर है। कोरोना से पहले तक  पर्याप्त संख्या में पर्यटक बनारस आते थ। तब किसी भी तरह की कोई दिक्कत नहीं आई, लेकिन कोरोनाकाल में जब सब बंद हो गया तो इसका असर हमारे काम पर भी पड़ा।’

कोरोना ने जहां ठगों के लिए आपदा में अवसर पैदा किया वहीं मेहनत-मशक्कत से काम करने वालों के लिए नई-नई मुसीबतें पैदा की। इनमें सबसे बड़ी मुसीबत थी कार्यशील पूंजी का फंस जाना। जिसके पास जो बकाया पड़ा था वह ज़्यादातर वहीं रह गया।

फ़िलहाल मो.अरशद और मो. आदिल ही काम कर रहे हैं

मो. अरशद बताते हैं कि ‘कोरोना से पहले जहां-जहां रुपया फंसा हुआ था, आज भी फंसा हुआ है। भेजे गए सामानों के लाखों रुपये आजतक नहीं मिल पाये। फोन करने पर लोग आश्वासन देते हैं, दिलासा बँधवाते हैं लेकिन किसी ने आज तक नहीं दिया। जबकि अब तो सभी का काम पटरी पर आने लगा है। अब मुझे भी कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती। इनमें से कुछ कश्मीरी थे, जो यहाँ दुकानें लगाते थे। कोरोना के समय वे अपनी दुकानें छोड़कर वापस चले गए। उन्हें कहाँ पकड़ेंगे या संपर्क करेंगे?’

गहरी उदासी में डूबे अरशद कहते हैं कि ‘दिक्कतें तो बहुत हैं। काम बंद हो जाने से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।’ उनके वर्कशॉप के सन्नाटे और स्टोर की हालत को देखकर मुझे भी लगा कि वास्तव में स्थिति बहुत खराब है।

लकड़ी काटने वाली हस्तचालित मशीन

थोथी साबित हुई हैं सरकारी योजनाएँ

अरशद बताते हैं कि ‘सरकार की तरफ से योजनाएं बहुत आती हैं लेकिन ये सब योजनाएँ हम तक नहीं पहुँच पातीं’ हस्तशिल्प कार्ड बने होने के बाद भी आजतक किसी प्रदर्शनी में नहीं जा पाए क्योंकि कोई भी सूचना इन तक नहीं पहुँचती और जब ये खुद पता करने जाते हैं तो प्रदर्शनी के बारे में कोई भी सही जानकारी नहीं दी जाती। यह शिकायत कश्मीरीगंज के भी कई कारीगरों की थी। वे कहते थे कि कुछ गिने-चुने लोग ही सारे लाभ ले रहे हैं।

अरशद ने अफसोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि ‘2014 से पहले सरकार द्वारा किसी भी तरह की कोई दुर्भावना न समाज में थी न ही राजनीतिज्ञों में थी। माहौल में एक तरह का सौहार्द्र का भाव था, लेकिन 2014 के बाद केंद्र और राज्य सरकार खुलकर भेदभाव कर रही हैं। कलाकरों को सहयोग देने की बात हो या प्रोत्साहन देने की या फिर सम्मानित करने का मामला हो, वहाँ खुलकर भेदभाव किया जाता है।’

उन्होंने बताया कि ‘अब तो यह काम वे खुद और उनका बेटा आदिल ही कर रहे हैं। अब ऐसी स्थिति न रही कि और कारीगर रख सकें।’ आदिल भी इस काम को लेकर कई आशंकाओं से घिरे हुये हैं। वे कहते हैं कि माल की गुणवत्ता और दूसरी खूबियों में हम खुलकर कंपटीशन कर सकते हैं लेकिन अब निर्णय कुछ और भी आधार पर लिए जा रहे हैं और भेदभाव बढ़ रहा है।

कई स्तरों पर हो रहा है बदलाव 

लोग कहते हैं कि बनारस के हस्तशिल्प के इतिहास में ऐसा समय कभी नहीं आया था। शायर अलकबीर कहते हैं कि ‘अब धर्म देखकर चीजें तय हो रही हैं। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। आप चाहे कितने भी योग्य और अच्छे हैं लेकिन आपका धर्म राजनीति को पसंद नहीं तो आप पीछे धकेल दिये जाएँगे।’

जबकि किसान नेता रामजनम के अनुसार मेहनतकशों के बीच सत्ता ने अनेक तरह की जटिलताएँ और गलतफहमियाँ पैदा कर दी हैं। ऐसा लगता है कि सारी चीजें एकतरफा तय की जा रही हैं। लेकिन थोड़ा बारीकी से देखने पर पता लगेगा कि हर जगह ऐसा वर्ग काबिज़ हो गया है जो किसी भी स्तर पर उत्पादक नहीं है लेकिन उसके पास बहुत पैसा है जिसके बल पर वह वास्तविक लोगों को दूर हटाकर और भी पैसा बनाने में लगा है।’

रामजनम यह भी कहते हैं कि वर्तमान सरकार अपने धार्मिक विद्वेष के कारण धर्म के आधार पर भेदभाव करती दिखाई तो पड़ रही है लेकिन वास्तविकता यह है कि उसके चारों ओर पैसेवाले जुट गए हैं। वे ही लोग उसकी ताकत हैं और बाकी लोग लगातार बहिष्कृत किए जा रहे हैं।’ उनका स्पष्ट इशारा सरकारी योजनाओं की लूट में लगे अमीरों के सिंडीकेट की ओर था।

आखिर क्या होगा भविष्य

बनारसी साड़ियों और अनेक हस्तकलाओं का गढ़ रहा बनारस दुनिया भर के पर्यटकों के भी आकर्षण का केंद्र रहा है और इसी कारण यह शहर बहुत बड़ा बाज़ार भी है। यहाँ के स्थानीय उत्पाद लाखों लोगों को रोजी-रोटी देते रहे हैं। पीतल, तांबे, मिट्टी, पत्थर और लकड़ी के खिलौने एक समय बहुतायत से बनाए जाते थे। लेकिन इधर कुछ वर्षों से बाजार में बदलाव आने के साथ ही साथ पिछले दो-ढाई वर्षों से कोविड-19 के चलते इन चीजों के हस्तशिल्पी या कारीगर लगातार मंदी की मार झेल रहे हैं।

शहर के अनेक मुहल्लों में मैंने लोगों से मुलाक़ात की और यह जानना चाहा कि आजीविका के स्तर पर वे किस तरह की चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। मुझे यह जानकर दुख हुआ कि इनमें से हजारों लोगों को इतनी कम मजदूरी मिलती है कि मध्यवर्ग का आदमी उतने में एक पिज्जा भी नहीं खरीद सकता।

मंदी के कारण धूल और जाले के बीच रखा हुआ सामान

जबकि इसी कम मजदूरी में ये लोग अपने परिवार चला रहे हैं। उन्हें कितना पौष्टिक भोजन मिलता है इसको नापने का अभी कोई तरीका नहीं बना है। ये बीमारी में कहाँ इलाज कराते होंगे यह भी एक कठिन सवाल है। लेकिन इससे भी कठिन सवाल यह है कि जो लोग ऐसे कामों में आधी से ज्यादा ज़िंदगी बिता चुके हैं उनका भविष्य क्या होगा?

इसका जवाब बेशक आसान नहीं है। अनेक लोगों ने बताया कि वे अपने इस पुश्तैनी काम से तौबा कर दूसरे काम की तरफ रुख कर चुके हैं। मजदूरी करना, दुकानों पर काम करना, रिक्शा-ठेला चलाना अथवा ऐसा ही कुछ ताकि भूख से न मर जाएँ। हालाँकि कुछ ने इस मंदी और अभाव में भी हिम्मत नहीं छोड़ी है। इसके बावजूद तंगहाली ने उनको चारों तरफ से कमजोर कर दिया है।

मैंने कई ऐसे लोगों से भी बात की तो उनकी बातचीत से लगा कि हिम्मत से ज्यादा अपने पुश्तैनी काम को नहीं छोड़ने का एक बड़ा कारण किसी अन्य काम में उनकी हुनरमंदी का न होना है। यही बात मो. अरशद ने भी कही कि ‘जिस काम से हमने अपने जीवन की शुरुआत की। जिस काम को हमने अपने पिताजी और दादा की शागिर्दी में सीखा। आज काम न चलने पर उसे छोड़कर कौन सा काम करें? हमें कोई दूसरा काम आता नहीं है।’

वैसे, उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले दिनों में इस काम की मांग पहले जैसी हो जाएगी।

अपर्णा
अपर्णा
अपर्णा गाँव के लोग की संस्थापक और कार्यकारी संपादक हैं।

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