सोवियत संघ के विघटन के बाद की दुनिया, मेरा देश और मेरा समाज  (डायरी 26 दिसंबर, 2021) 

नवल किशोर कुमार

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कल दोपहर की बात है। पटना से एक परिचित का फोन आया। आए दिन ऐसा होता है कि पटना से कोई न कोई परिचित अपने इलाके में घटनेवाली घटना की जानकारी दे देते हैं। कल भी यही हुआ। परिचित ने बताया कि हमारे इलाके में एक नौजवान को जिंदा जलाकर मार दिया गया है। मैंने विस्तार से पूछा तो जानकारी मिली कि पटना के सिपारा इलाके में यह घटना घटित हुई है। मृतक एक मोबाइल दुकान में काम करता था। उसने अपना वेतन मांगा तो दुकानदार से झगड़ा हो गया और दुकानदार ने उसके उपर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। इस आशय का आरोप मृतक के परिजनों ने लगाया है।
अभी उपरोक्त सूचना के बारे में कुछ सोच ही रहा था कि एक और फोन आया। इस बार कैमूर के इलाके से। फोन करनेवाले ने यह जानकारी दी कि दो साल के एक मासूम की गला दबाकर हत्या कर दी है। मामला अपहरण का था। लेकिन इसे फिल्मी अंदाज में अंजाम दिया गया। आरोपी अविनाश ने पड़ोसी के ही बच्चे का अपहरण कर लिया। बच्चा रोने लगा तो उसे चुप कराने के लिए उसने उसके मुंह को दबा दिया और इस क्रम में बच्चे की मौत हो गई। बच्चे की हत्या करने के बाद आरोपी उसकी लाश को ठिकाने लगाकर घर वापस चला आया और उसने सामान्य तरीके से अन्य लोगों के साथ मिलकर बच्चे को खोजने का पाखंड भी किया। साथ ही अपने पड़ोसी को आठ लाख रुपए की फिरौती से संबंधित पत्र भी भिजवाया। आखिरकार लोगों को शक हुआ और जब पुलिस ने मामले की जांच की तब जाकर सारा सच सामने आया।

1990 का दशक कितना महत्वपूर्ण दशक था। भारत की बात करूं तो इस दशक ने भारत की तस्वीर ही बदल दी। एक तो मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई। इसी दशक की शुरुआत में डॉ. आंबेडकर को भारत रत्न का सम्मान दिया गया। और इसी दशक में ग्लोबलाइजेशन का विस्तार हुआ। भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना।

 

इन दो घटनाओं के उद्धरण के पीछे मेरा आशय यह टिप्पणी करना नहीं है कि बिहार में सुशासन है अथवा कुशासन। जंगलराज और मंगलराज अथवा रामराज आदि शब्दावलियां सियासतदानों को अच्छे लगते हैं। मैं तो यह देख रहा हूं कि समाज में चीजें कैसे एकदम तेजी से बदल रही हैं। लोगों के अंदर भौतिकता के प्रति लगाव बढ़ा है और इस लगाव ने उन्हें इंसान भी नहीं रहने दिया है।
मैं तो सोवियत संघ को याद करता हूं। वह शायद 25 दिसंबर, 1991 का ही दिन था जब मास्को के क्रेमलिन से सोवियत संघ का लाल झंडा उतारा गया था और उसके बदले तीन रंगों का झंडा फहराया गया। सोवियत संघ के अंतिम प्रमुख रहे मिखाइल गोर्बाचोव का ऐतिहासिक इस्तीफा वाकई में अनेक संदेश देता है। मैं यह सोच रहा हूं कि 1990 का दशक कितना महत्वपूर्ण दशक था। भारत की बात करूं तो इस दशक ने भारत की तस्वीर ही बदल दी। एक तो मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई। इसी दशक की शुरुआत में डॉ. आंबेडकर को भारतरत्न का सम्मान दिया गया। और इसी दशक में ग्लोबलाइजेशन का विस्तार हुआ। भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना। पूंजीवाद के आधुनिक स्वरूप नवउदारवाद ने इसी दशक में (जो कि बीसवीं सदी का आखिरी दशक था) लगभग पूरे विश्व अपने प्रभाव में शामिल कर लिया।
सोवियत संघ के राष्ट्रपति (15 मार्च 1990 – 25 दिसंबर 1991) मिखाइल गोर्बाचेव
सोवियत संघ के विघटन के बारे में सोच रहा हूं। तब मैंने यह खबर अपने पापा को पढ़कर सुनाया था। मुझे याद नहीं कि पापा की प्रतिक्रिया कैसी थी। हालांकि तब मेरे ही गांव में डा. रामचंद्र यादव रहते थे। वे आईपीएफ के बड़े नेता थे। वे चुनाव भी लड़ चुके थे। यही आईपीएफ यानी इंडियन पीपुल्स फ्रंट बाद में भाकपा माले के रूप में सामने आया। डा. रामचंद्र यादव रिश्ते में बड़का बाबू लगते थे और जहां तक मुझे याद है वह एकमात्र थे जो मूंछ नहीं रखते थे। हर दिन दाढ़ी बनाते थे। होमियोपैथिक डाक्टर भी थे। इसके पहले वह पटना के पुरंदरपुर में रहते थे।
खैर, जब मैं सोवियत संघ के विघटन की खबर पापा को पढ़कर सुना रहा था तब वहां डा. रामचंद्र यादव भी बैठे थे। उन्होंने झट से अखबार मुझसे ले लिया। उनकी प्रतिक्रिया से लग रहा था कि वे दुखी थे। उनके दुख की वजह उस वक्त समझने की स्थिति में मैं नहीं था। तब मेरी उम्र ही कितनी थी। करीब सात या आठ साल।

इस देश में वामपंथ को भी बेकसूर नहीं माना जा सकता है। वजह यह कि इस देश ने वामपंथ पर भी बहुत विश्वास किया। असंख्य लोगों ने इसके लिए कुर्बानियां दी हैं। और इसके बदले वामपंथ ने इस देश को कुछ ऐसा दिया हो, जिसका कि मैं उल्लेख करूं, मेरे पास नहीं है। यदि है तो वह राष्ट्रवाद का उभार है और यह राष्ट्रवाद भी राष्ट्र के प्रति समर्पण नहीं, अवसरवादिता है। समाजवादियों की अय्याशी और वामपंथियों की खिलंदड़ी ने आरएसएस जैसे संगठन को मजबूत होने दिया।

 

आज सोच रहा हूं कि विश्व स्तर पर समाज में जो बदलाव हो रहे हैं, उसके लिए किसे कटघरे में खड़ा करूं। एक तो मेरा मन कहता है कि समाजवाद को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। नवउदारवाद के उदय के लिए एक यही जिम्मेदार है। भारत की ही बात करें तो एक समय समाजवाद ने भारतीय राजनीति को खूब प्रभावित किया और ऐसा लगने लगा था कि समाजवाद अब देश में आकर रहेगा। लेकिन यह इतना आसान कहां था। गोरख पांडे की कविता – समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई – एक मारक कविता थी। इस कविता ने समाजवाद की खामियों को उजागर कर दिया था। हालांकि इसकी शैली व्यंग्यात्मक थी और कहीं न कहीं एक वामपंथी के अंदर की कुंठा भी।
लेकिन इस देश में वामपंथ को भी बेकसूर नहीं माना जा सकता है। वजह यह कि इस देश ने वामपंथ पर भी बहुत विश्वास किया। असंख्य लोगों ने इसके लिए कुर्बानियां दी हैं। और इसके बदले वामपंथ ने इस देश को कुछ ऐसा दिया हो, जिसका कि मैं उल्लेख करूं, मेरे पास नहीं है। यदि है तो वह राष्ट्रवाद का उभार है और यह राष्ट्रवाद भी राष्ट्र के प्रति समर्पण नहीं, अवसरवादिता है। समाजवादियों की अय्याशी और वामपंथियों की खिलंदड़ी ने आरएसएस जैसे संगठन को मजबूत होने दिया। जयप्रकाश नारायण इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं।
अब जबकि देश के हालात तेजी से बदल रहे हैं तो कोई विकल्प सामने नजर नहीं आता। अब कल की ही बात है कि कानपुर में एक इत्र व्यवासायी के घर से पौने दो सौ करोड़ रुपए नकद मिले हैं। मैं यह सोच रहा हूं कि नोटबंदी की सफलता को लेकर एक से बढ़कर एक दावा करनेवाले इस देश के प्रधानमंत्री को बदल रहा भारतीय समाज दिखता भी है या नहीं दिखता है।
मेरे हिसाब से तो नहीं ही दिखता है। दिखता तो वह गंभीर होता। वह खेलमचवा तो नहीं ही होता।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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