महिलाओं के संबंध में खुसरो, पेरियार और डॉ. आंबेडकर के विचार (डायरी 8 मार्च, 2022)

नवल किशोर कुमार

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कल उत्तर प्रदेश में आखिरी चरण के मतदान समाप्त हो गए। शाम होते ही एक्जिट पोल के नतीजे भी सामने आए। नतीजे दो दिन पहले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बयान को पुष्ट कर रहे हैं। अमित शाह ने कहा था कि उनकी पार्टी यूपी, मणिपुर, गोवा और उत्तराखंड में सरकार बनाएगी। पंजाब के संदर्भ में उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी पहले से बेहतर प्रदर्शन करेगी। एक्जिट पोल के नतीजे भी लगभग यही बात कह रहे हैं। हालांकि मेरे अपने विचार अलग हैं। मेरा आकलन है कि यूपी और उत्तराखंड में भाजपा को हार मिलेगी। मेरे इस अकलन के पीछे चुनाव के दौरान मिले रूझान हैं जो भाजपा के खिलाफ थे।

अमीर खुसरो, पेरियार और आंबेडकर। इन तीनों ने महिलाओं की स्वतंत्रता को अहम माना। पेरियार ने तो यहां तक कहा कि पति-पत्नी की संज्ञा ही गलत है। स्त्री और पुरुष के बीच मित्रता होनी चाहिए। इसकी वजह यह रही कि वे मित्रता को समता की बुनियाद मानते थे।

खैर, आज का दिन तो महिलाओं के नाम है। यह एक मौका है जब हम महिलाओं के बारे में सोचें। मैं आज जिन तीन लोगों के बारे में सोच रहा हूं, वे बहुत खास रहे। ये हैं– अमीर खुसरो, पेरियार और आंबेडकर। इन तीनों ने महिलाओं की स्वतंत्रता को अहम माना। पेरियार ने तो यहां तक कहा कि पति-पत्नी की संज्ञा ही गलत है। स्त्री और पुरुष के बीच मित्रता होनी चाहिए। इसकी वजह यह रही कि वे मित्रता को समता की बुनियाद मानते थे। जैसे ही हम मित्र के बजाय कुछ और होते हैं, हमारी सोच बदल जाती है। डॉ. आंबेडकर भी पेरियार के जैसे ही थे। महिलाओं को पितृसत्ता से आजादी मिले, इसके लिए उन्होंने हिंदू कोड बिल प्रस्तुत किया। वे हर हाल में महिलाओं को आजादी दिलाना चाहते थे। यहां तक कि जब उनके मसौदे को संसद की स्वीकृति नहीं मिली तो उन्होंने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। इन दोनों के अलावा अमीर खुसरो भी बहुत खास रहे।

अमीर खुसरो का असली नाम अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद। जन्म 1235 में और मृत्यु 1325 में हुआ। आज इनकी बात कुछ खास कारणों से अपनी डायरी में दर्ज कर रहा हूं। पहले यह कि अमीर खुसरो भारत के मशहूर कवि रहे। मैं तो उन्हें शब्दों का कारीगर मानता हूं। ऐसी कारीगरी कि आदमी बस पढ़ता ही रह जाय। अमीर खुसरो को बचपन से ही कविता करने का शौक़ था।

खुसरो के गुरु ने उनकी साहित्यिक प्रतिभा की प्रशंसा की और काव्य संगीत प्रतिभा तथा मधुर संगतीमयी वाणी की अत्यंत तारीफ की और ख्वाजा से खुसरो का इम्तहान लेने को कहा। ख्वाजा साहब ने तब अमीर खुसरो से कहा कि 'मू' (बाल), 'बैज' (अंडा), 'तीर' और 'खरपुजा' (खरबूजा) - इन चार बेजोड़, बेमेल और बेतरतीब चीज़ों को एक अशआर में इस्तेमाल करो।

यह शौक इस कदर परवान चढ़ा कि असली नाम पीछे ही छूट गया। वजह भी थी। वजह यह कि खुसरो ने धार्मिक संकीर्णता और राजनीतिक छल कपट की उथल-पुथल से भरे माहौल में रहकर हिन्दू-मुस्लिम एवं राष्ट्रीय एकता, प्रेम, सौहार्द्र और मानववाद के लिए पूरी ईमानदारी और निष्ठा से रचनाएं रचीं।

यदि मुसलमान न होते और उसपर से भी राजपूत (हिंदू) महिला की संतान न होते तो उन्हें आज भी वही सम्मान मिलता जो तुलसीदास को मिला है या फिर मिर्जा गालिब को। उनकी रचनाओं का प्रभाव मुझे कबीर और रैदास के दोहों में भी दिखता है।

अबुल हसन निश्चित तौर पर अमीर रहे होंगे। अमीर मतलब रईस। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि वे शब्दों के अमीर थे। प्रसिद्ध इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ ‘तारीखे-फिरोज शाही’ में स्पष्ट रुप से लिखा है कि बादशाह जलालुद्दीन फ़ीरोज़ खिलजी ने अमीर खुसरो की एक चुलबुली फ़ारसी कविता से प्रसन्न होकर उन्हें ‘अमीर’ का ख़िताब दिया था।

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक हर घंटे भारत में कम से कम 20 महिलाएं पुरुषों के अत्याचार का शिकार होती हैं (जो मामले थानों में दर्ज कराए जाते हैं) और हर दूसरा अत्याचारी उनका अपना परिजन होता है। अत्याचार में मारपीट से लेकर बलात्कार तक शामिल हैं।

खैर, अमीर खुसरो दहलवी का जन्म उत्तर-प्रदेश के एटा जिले के पटियाली नामक ग्राम में गंगा किनारे हुआ था। यह गांव उन दिनों मोमिनपुर या मोमिनाबाद के नाम से जाना जाता था। उनकी मां दौलत नाज़ हिन्दू (राजपूत) थीं। ये दिल्ली के एक रईस अमीर एमादुल्मुल्क की पुत्री थीं। ये बादशाह बलबन के युद्ध मंत्री थे। ये राजनीतिक दवाब के कारण नए-नए मुसलमान बने थे। इस्लाम धर्म ग्रहण करने के बावजूद इनके घर में सारे रीति-रिवाज हिन्दुओं के थे।

अमीर खुसरो प्रतिभा के धनी थे। जब वे सोलह-सत्रह साल के थे तब उनके गुरु असदुद्दीन मुहम्मद उन्हें अपने साथ नायब कोतवाल के पास ले गए। वहां एक विद्वान ख्वाजा इज्जुद्दीन थे। खुसरो के गुरु ने उनकी साहित्यिक प्रतिभा की प्रशंसा की और काव्य संगीत प्रतिभा तथा मधुर संगतीमयी वाणी की अत्यंत तारीफ की और ख्वाजा से खुसरो का इम्तहान लेने को कहा। ख्वाजा साहब ने तब अमीर खुसरो से कहा कि ‘मू’ (बाल), ‘बैज’ (अंडा), ‘तीर’ और ‘खरपुजा’ (खरबूजा) – इन चार बेजोड़, बेमेल और बेतरतीब चीज़ों को एक अशआर में इस्तेमाल करो।

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खुसरो ने फौरन इन शब्दों को सार्थकता के साथ जोड़कर फारसी में एक सद्य:: रचित कविता सुनाई – हर मूये कि दर दो जुल्फ़ आँ सनम अस्त, सद बैज-ए-अम्बरी बर आँ मूये जम अस्त, चूँ तीर मदाँ रास्त दिलशरा जीरा, चूँ खरपुजा ददांश मियाने शिकम् अस्त। यानी उस प्रियतम के बालों में जो तार हैं उनमें से हर एक तार में अम्बर मछली जैसी सुगन्ध वाले सौ-सौ मोतियां पिरोए हुए हैं। उस सुन्दरी के हृदय को तीर जैसा सीधा-सादा मत समझो व जानो क्योंकि उसके भीतर खरबूजे जैसे चुभनेवाले दाँत भी मौजूद हैं।

खैर, अब वह बात जिसके कारण मैं अमीर खुसरो के बारे में अपनी डायरी में लिख रहा हूं। वजह उनकी एक कविता है। यह एक कजरी है। पहले यह कजरी –

अम्मा मेरे बाबा को भेजो री – कि सावन आया

बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री – कि सावन आया

अम्मा मेरे भाई को भेजो री – कि सावन आया

बेटी तेरा भाई तो बाला री – कि सावन आया

अम्मा मेरे मामू को भेजो री – कि सावन आया

बेटी तेरा मामू तो बांका री – कि सावन आया

खुसरो अपनी इस रचना में क्या कहना चाहते हैं, आसानी से समझा जा सकता है। मेरे सामने एनसीआरबी यानी राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो द्वारा जारी अद्यतन रिपोर्ट है। रिपोर्ट के मुताबिक हर घंटे भारत में कम से कम 20 महिलाएं पुरुषों के अत्याचार का शिकार होती हैं (जो मामले थानों में दर्ज कराए जाते हैं) और हर दूसरा अत्याचारी उनका अपना परिजन होता है। अत्याचार में मारपीट से लेकर बलात्कार तक शामिल हैं।

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एक घटना कल की है। मेरे गृह प्रदेश बिहार के गोपालगंज जिले में एक दलित परिवार के पुरुषों ने अपने ही घर की बेटी की हत्या कर दी। हत्या के चार आरोपियों में मृतका के पिता, चाचा और भाई हैं। यह मामला ऑनर किलिंग का है। यदि बिहार में अखबारों के संपादक व प्रबंधक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गुलाम नहीं होते तो यह पहले पन्ने की खबर होती।

खैर, अमीर खुसरो महिलाओं को संपत्ति में हिस्सा देने के पक्षधर रहे। अपनी एक रचना में उन्होंने कहा है –

काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस

भैया को दियो बाबुल महले दो-महले

हमको दियो परदेस

अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस

खुसरो ने यह रचना संभवत: 1260 में रची और आज 2022 है। आज भी भारत में महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हिस्सेदार नहीं माना जाता और कमाल की बात यह कि आज हम सभी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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