Sunday, May 26, 2024
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अन्य पात्र के माध्यम से घटनाओं को व्यक्त करना हमेशा ही दोयम दर्जे का होगा

दूसरा हिस्सा आपकी पहली किताब कब आई? मेरी पहली पुस्तक प्रवंचना 1978 में तैयार हो गई थी जिसके प्रकाशन हेतु मैं और मेरे भाई साहब प्रयासरत थे। मैंने बहुजन साहित्य प्रकाशन सआदतगंज लखनऊ से पत्र व्यवहार द्वारा तथा व्यक्तिगत रूप से भी संपर्क किया। किन्तु उन्होंने कुछ धनराशि छपाई के लिए मांगी जिसके लिए मैं […]

दूसरा हिस्सा

आपकी पहली किताब कब आई?

मेरी पहली पुस्तक प्रवंचना 1978 में तैयार हो गई थी जिसके प्रकाशन हेतु मैं और मेरे भाई साहब प्रयासरत थे। मैंने बहुजन साहित्य प्रकाशन सआदतगंज लखनऊ से पत्र व्यवहार द्वारा तथा व्यक्तिगत रूप से भी संपर्क किया। किन्तु उन्होंने कुछ धनराशि छपाई के लिए मांगी जिसके लिए मैं समर्थ नहीं था तथा यह सौदा भी मुझे पसंद नहीं था।अन्तत: यह पुस्तक 2011 में ही प्रकाशित हो पाई जबकि इसके पहले 1994 में तश्नगी का रास्ता नाम से ग़ज़ल संग्रह छपा। इसके बाद एक ग़ज़ल संग्रह सुबह की उम्मीद  नाम से वाणी प्रकाशन  नई दिल्ली से 2004 में प्रकाशित हुआ था।

आपकी किताब प्रवंचना जिसमें जाति-दंश है, लेकिन वह मुक्त-छंद की कविता है। उसमें आप सहूलत ले सकते हैं जबकि ग़ज़ल एक तय फार्म और मीटर की  विधा है। इसमें छूट कम ली जा सकती है। आपने इस विधा में दलित-दंश को कितना जगह दिया ?

देखिए प्रवंचना  में मुक्त छंद भले ही है लेकिन वह भी छंद मुक्त कविता या गद्य कविता नहीं है। वहां भी बाकायदा बहरों का बहाव है। हां इसमें वैचारिक अभिव्यक्ति का स्पेस अधिक आज़ादी देता है यह सच है । किंतु आपकी केंद्रीय सोच तो हर विधा में ही अभिव्यक्ति का दबाव बनाएगी। इसलिए मेरी हर तरह की रचना में उस केंद्रीय विषय वस्तु; जिसमें सामाजिक वंचना एवं सामाजिक न्याय की पैरोकारी शामिल है ,को आवाज़ और अभिव्यक्ति स्वत: ही मिलती है। जहां तक ग़ज़लों में दलित-दंश या सामाजिक न्याय संबंधी अभिव्यक्ति का प्रश्न है, मेरी ग़ज़लों में भी उसे पर्याप्त स्पेस एवं वाणी मिली है। रदीफ़, काफ़िया एवं मीटर की पाबंदी और फॉर्मेट के तयशुदा मानक में भी विचारों पर तो पाबंदी नहीं लग सकती। मेरे कई शेर हैं जिनको आप इस नज़रिए से आंक सकते हैं ।मैं कुछ उदाहरण देकर इस बात की पुष्टि कर सकता हूं और इस पर आप स्वयं ही विचार करके निर्णय कर सकते हैं कि मैंने ग़ज़लों में दलित दंश को अभिव्यक्ति देने में किस हद तक कामयाबी पारी है तथा किस दर्जे तक न्याय किया है। उदाहरणार्थ आप कुछ ग़ज़लों के शे’र देखें—

पूछ कर जात घराने मेरे

सब लगे ऐब गिनाने मेरे

ज़ात फिर इल्म से बड़ी निकली

काम आए न बहाने मेरे

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और आगे यह कि—

घर में रहने का कुछ हक उन्हें भी तो हो

पुश्त-दर-पुश्त कर जो पायदानों प थे

 विप्लवी  ज़ुल्म ऊंचे घरों ने किए

और इल्ज़ाम निचले घरानों प थे

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और यह शेर भी देखेंगे —

खाना-पीना साथ शहर  में

भीतर-भीतर घात शहर में

भाड़े का एक घर लेना था

पड़ी छुपानी ज़ात शहर में

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यह शे’र भी ध्यातव्य है–

नीचा का कर छोड़ न दे

 ऊंचे घर की यारी फिर

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या फिर यह शे’र—-

शहज़ोर घरानों से मिले ज़ुल्मो- सितम फिर

 अफसोस मैं रहमत की नज़र ढूंढ़ रहा हूं

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ये भी शे’र–

सूत-पुत्र होने ने मारा

कुल से हुनर महान नहीं था

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देवताओं के हाथ खंज़र हैं

सर उठाने की बात कौन करे

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इस घर छुरियां, उस घर फांसी

जैसा    क़ाबा,    वैसा     काशी

सांस सांस अटकाती जी को

फांस बनी  है ज़ात  बला  सी

बहुजन हो तो बहुजन बोलो

धोबी, खटिक, चमार और पासी

[bs-quote quote=”भावनात्मक काव्यशास्त्र से मानसिक जुगाली करने का दौर अब नहीं रहा । आम आदमी की दुःख-तकलीफ़ में साझेदारी और उससे निजात दिलाने के लिए संघर्ष में भागीदारी अब साहित्य की नैतिक ज़िम्मेदारी बन गई है। कम से कम उन लोगों के लिए तो अवश्य ही यह नैतिक ज़िम्मेदारी बनी है जो मनुष्यता की पैरोकारी के लिए कृतसंकल्प हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

यह बड़ी लम्बी फेहरिस्त है—

घर में थोड़ी ज़ात-पात है

बाहर तो हम साथ-साथ हैं

 दिखलाने को समरसता है

खाने  वाले  और  दांत  हैं

 दाई, महरी, मज़्दूरन हम

उनके घर तो बेगमात हैं

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यहां ख़ूबी-ख़राबी की कसौटी कुछ अलग ही है

 यहां तो आदमी के पहले उसकी ज़ात जाए है

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परजीवी जोकों के माफ़िक़ खून चूस है अब तक ज़िन्दा

स्वांगी दुनिया का सुख भोगें मासूमों पर ज़ात का फंदा

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ज़ातो-मज़्हब में हम उलझे 

कौन   करे  उद्धार  हमारे

हर कोई अब वेद पढ़े है

 कौन करे बेगार हमारे

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गाली इज़्ज़तदार बन गई

तू  सरकारी  वाभन  है  क्या?

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बाप दादों को हमारे सामने दें गालियां

जब्रिया बजवाई जाती हैं हमी से तालियां

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ईश्वर अगवा, भक्त भिखारी

और   फिरौती   ख़ासी  भारी

मज़्हब-धर्म ग़रीबों ख़ातिर

छुआछूत  की   है  बीमारी

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चरण की धूलि लो पूजा करो सौ बार दलितों की

मगर बनने न पाए ;देखना, सरकार दलितों की

 अगर गिरवा नहीं सकते, बनी सरकार दलितों की

तो उनके साथ हो जाओ करो जयकार दलितों की

 सफ़ाई और ज़मादारी तलक तो बात जंचती थी

 हुकूमत में मगर, कैसे सहें भरमार दलितों की

जहां पर बैठने की भी इजाज़त थी नहीं इनको

 वहीं मठ बन गए मठ पर बनी मीनार दलितों की

 बता दो झुग्गियों को सर उठाने की है क्या क़ीमत

 न जाने बस्तियां कितनी हुईं मिस्मार दलितों की

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और यह भी कि —

मेहनतकश हैं भूखे नंगे

हुक्म चलाते हैं भिखमंगे

पानी-घाट, नदी में ईश्वर

मैला पानी हर-हर गंगे

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आईनों कि क्या ख़ता है

पत्थरों को सब पता है

क्या करें उम्मीद तू तो

पत्थरों का देवता है

बिहार के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम सत्यपाल मलिक एवं गोवा की तत्कालीन राज्यपाल महामहिम मृदुला सिन्हा के साथ पटना में “नई धारा रचना सम्मान” प्राप्त करते हुए

**जुल्मतों में ख़ामुशी से देखे हैं

यूं  तो अल्लाह -राम  दोनों  हैं

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मेहनतकशों, मज़दूरों, दलितों से क्या पूछे हो

पत्थर की हवेली के आदाब कड़े क्यों हैं

नफरत के हवाले हैं अस्पृश्य, नीच,अन्त्यज

मज़्हब जिसे कहते हैं वे चिकने घड़े क्यों हैं ?

भगवान, भाग्य में जो उलझे हैं तो क्या पूछो

इस अंधी गली में वे सदियों से पढ़े क्यों हैं

सब ‘विप्लवी’ से पूछें शोषण की रवायत को

हम जड़ से मिटाने के मक़सद पर अड़े क्यों हैं

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सारा अमरित तो बस देवता पी गए

हम थे इंसान क़ीमत चुकाते रहे

अपने हिस्से का अमरित लगे मांगने

दैत्य कहकर जिन्हें बरगलाते रहे

दान में मांगकर यूं कवच-कुंडलें

हम हक़ीक़त से क्यों मुंह चुराते रहे

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जहां शीशे तराशे जा रहे हैं

वहीं पत्थर तलाशे जा रहे हैं

कुआं खोदा गया था जिन की ख़ातिर

वही प्यासे के प्यासे जा रहे हैं

खंडकाव्य प्रवंचना

इन उदाहरणों से यह बात साफ़ हो जाती है कि दलित-वंचित अवाम की आवाज़ ग़ज़लों के रूप में बड़ी शिद्दत से अभिव्यक्त हुई है।

आपने दो अलग विधाओं को चुना है ,एक ध्रुव पर कविता और ग़ज़ल जैसी आत्माभिव्यक्ति की प्रांजल और कोमल विधाएं हैं तो दूसरे ध्रुव पर ठेठ गद्य जो कई बार बहुत कठोरता का एहसास कराता है। बीच में कहानी, उपन्यास और नाटक आदि कुछ भी नहीं, ऐसा क्यों है ?

देखिए मुख्य बात यह है कि जो हम कहना चाहते हैं या जो कहना हमें ज़रूरी लगता है, वह बात वहां तक,उसी प्रभावोत्त्पादकता के साथ पहुंचे जहां और जिस रूप में हम लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं। इस लिहाज़ से ही अभिव्यक्ति का माध्यम,भाषा-शैली और फॉर्मेट रूप और आकार लेता है। जब मैं ग़ज़लों की ओर आकर्षित हुआ तो इसके पीछे केवल यही बात नहीं थी या विधा के चुनाव जैसी बात नहीं थी। मुझे ऐसा शुरू से ही लगने लगा था कि यह विधा ज्यादा कारगर है । यदि ऐसा नहीं होता तो अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कहने के लिए संसद की बहस एवं अभिभाषणों से लेकर अन्य ओजस्वी वक्ताओं के भाषणों में अक्सर क्यों कोई शे’र ‘कोट’ करके अपनी बात पर बल देने के लिए असरदार बनाया जाता है। यही नहीं ग़ज़ल और दोहे की विधा में भी समान रूप से वह शक्ति है कि किसी बात को व्यक्ति के दिलो-दिमाग़ में गहराई तक उतार सके। इसलिए मुझे ग़ज़ल की यह विधा ख़ासतौर पर पसंद आई तथा मैं इसके ज़रिए अपनी बात कहने की कोशिश करता रहा।

फ़्रांस की फोटोग्राफर और पत्रकार मिस दुबईस को बौद्ध धर्म और विपश्यना पर पूछे गये सवालों का जवाब देते (श्रावस्ती में )

चूंकि ग़ज़लों में  बात बहुधा इशारों-इशारों में की जाती है, अतः कई बार आम जन को इसके निहितार्थ को खोलकर बताने की तथा इसकी व्याख्या करने की ज़रूरत पड़ती है। ख़ासतौर पर जब हम दलित- वंचित लोगों के लिए बात करते हैं तो वहां आपको अनेकों स्तर पर जाकर उनकी शब्दावली में और उनके मुहावरे में बात करनी पड़ेगी। यहीं से मुझे आलेखों के ज़रिए अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने की आवश्यकता महसूस हुई। क्योंकि जो मिशन लेकर हम चल रहे हैं, वहां पर केवल कविता की अलंकारिकता और कल्पना- लोक के सौंदर्यशास्त्र से काम नहीं चलने वाला है। भावनात्मक काव्यशास्त्र से मानसिक जुगाली करने का दौर अब नहीं रहा। आम आदमी की दुःख-तकलीफ़ में साझेदारी और उससे निजात दिलाने के लिए संघर्ष में भागीदारी अब साहित्य की नैतिक ज़िम्मेदारी बन गई है। कम से कम उन लोगों के लिए तो अवश्य ही यह नैतिक ज़िम्मेदारी बनी है जो मनुष्यता की पैरोकारी के लिए कृतसंकल्प हैं। इसलिए कविताओं, ग़ज़लों और आलेखों में लगातार शोषण और वंचना के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर शोषित जन को जागरूक करना हमारे मिशन का ही एक भाग है।

मैंने गद्य साहित्य में दलित दर्शन की वैचारिकी लिखकर उसी दिशा में एक क़दम रखने की कोशिश की है। आपने मेरे आलेखों में गद्य लेखन के ज़रिए खरी-खरी बातों से कठोरता का एहसास कराने की तरफ़ ही शायद इशारा किया है। ऐसी बात नहीं है। गद्य में हास्य-व्यंग या कोई हल्की-फुल्की बात कही जाए तो वहां कोई कठोरता नहीं रहती। मुख्य बात है कथ्य की। क्योंकि गद्य के माध्यम से मैंने पारंपरिक पोंगा पंथी ब्राह्मणवादी विचारधारा को नंगा करने की कोशिश की है इसलिए आप इसमें कठोरता देख सकती हैं। हम पारंपरिक रूप से हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अन्धविश्वासों एव झूठे देवी देवताओं आदि को अस्वीकार किए जाने की बात सुनने के आदी रहे हैं।

हमारे संस्कारों में वेद वादी, पुराण वादी मिथकीय धर्म भीरुता कूट-कूट कर भरी गई है जो उन मान्यताओं के विरुद्ध विज्ञान वादी और तर्कपूर्ण बात को भी आसानी से मान्यता नहीं देती है। इसलिए मेरे गद्य साहित्य में वही कठोर सच उस तरह की विचार धारा वाले लोगों में असहजता पैदा करता है। हां कविता, ग़ज़ल, कहानी, नाटक, उपन्यास,आलेख आदि सभी विधाएं अलग या विपरीत किनारों पर नहीं खड़ी हैं। ये सभी विचार-विनिमय के दृष्टिकोण से एक दूसरे की पूरक हैं।

मुशयारे में ग़ज़ल पढ़ते हुए

ऐसा नहीं कि मैंने अन्य विधाओं में लेखन कार्य नहीं किया है। मैंने मुक्त छंद की कविताएं दोहे, कुंडलिया एवं गीत इन सब पर भी कुछ न कुछ काम किया है–हां मात्रा कम हो सकती है। इसी प्रकार मैंने व्यंग्य भी लिखे हैं। आलेखों के अलावा यात्रा कथाएं भी लिखे हैं। एक नाटक लिखा था एक और शास्त्रार्थ–इस नाटक का मंचन भी स्कूली बच्चों ने किया था। इसमें भगवान बुद्ध से संबंधित  कथा को नाट्य शैली में लिखा गया है। हां उपन्यास और कहानी पर अभी योजनाबद्ध रूप से काम नहीं कर पाया।

जैसे दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को एक राजनीतिक मुहावरा दिया वैसे ही क्या दलित प्रश्नों को इस विधा में जगह दी जा सकती है?

देखिए ग़ज़ल को महबूब से गुफ़्तगू तक सीमित करने का दौर ख़त्म हो चुका है। ग़ज़ल अब अपनी विलक्षण कहन के ज़रिए दुनिया के सारे प्रश्नों को सामने रखने की कुव्वत रखती है । इसलिए इसके माध्यम से दलित प्रश्नों को भी पुरजोर ढंग से उठाया जा सकता है और उठाया भी जा रहा है ।

मैंने पहले भी अपने ही कुछ शे’र का उदाहरण दिया है । मेरी नज़र में दलित-शोषित जनता की आवाज़ को आप इन ग़ज़लों में स्पष्टत: सुन सकते हैं । मैं अपनी ग़ज़लों से ही  कुछ और उदाहरण देता हूं—

इस घर छुरियां उस घर फांसी

जैसा क़ाबा ,वैसी काशी

भूख का रंग अमावस जैसा

भरे    पेट   को   पूरनमासी

माल-मलाई   छकते   पन्द्रह

चाटें    जूठी   छाछ  पचासी

बहुजन  हो  तो बहुजन बोलो

अहिर चमार खटिक और पासी

वक़्त ‘विप्लवी’  है  बहुरूपिया

किसको कहें साधु-संन्यासी

[bs-quote quote=”मैंने गद्य साहित्य में दलित दर्शन की वैचारिकी लिखकर उसी दिशा में एक क़दम रखने की कोशिश की है। आपने मेरे आलेखों में गद्य लेखन के ज़रिए खरी-खरी बातों से कठोरता का एहसास कराने की तरफ़ ही शायद इशारा किया है। ऐसी बात नहीं है। गद्य में हास्य-व्यंग या कोई हल्की-फुल्की बात कही जाए तो वहां कोई कठोरता नहीं रहती। मुख्य बात है कथ्य की। क्योंकि गद्य के माध्यम से मैंने पारंपरिक पोंगा पंथी ब्राह्मणवादी विचारधारा को नंगा करने की कोशिश की है इसलिए आप इसमें कठोरता देख सकती हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

कहते हैं कि दलित- समाज अनुभव और आत्मकथाओं के मामले में बहुत समृद्ध है लेकिन दलित-साहित्य में आत्मकथाओं के अलावा कहानी विधा कोई ख़ास मुकाम नहीं बना पायी। घिसी-पिटी और दुहराव वाली कहानियां ही अधिक हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?

यह सच है कि दलित समाज के पास स्वयं की भोगी हुई यातनाओं, दु:खों और दमनकारी शोषण के वृत्तांत का अनमोल खज़ाना है। इसमें मनुष्य के रूप में पशुवत व्यवहार के लोमहर्षक अनुभव एवं घटनाएं हैं जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक हिला देती हैं। क्योंकि यहां बनावट नहीं है अतः नैसर्गिक रूप में ये घटनाएं एक प्रभावशाली साहित्य का सृजन करती हैं। कहानी विधा या उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी दलित साहित्य को अभी और भी आगे जाना है। मेरा मानना है कि किसी अन्य पात्र के माध्यम से घटनाओं को व्यक्त करना हमेशा ही दोयम दर्जे का होगा ,जब तक लेखक ख़ुद को उस अनुभव से नहीं गुज़ारता है।लेखक ख़ुद को वहां रखकर ही कुछ सार्थक रचना कर पाता है। वह भुक्त-भोगी व्यक्ति खुद ही किरदार में हो तो सच्चाई निर्मल जल की तरह पारदर्शी दिखाई देती है। इसलिए दलित आत्मकथाएं बहुत से तथाकथित श्रेष्ठ उपन्यासों से अधिक प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण हैं। आप देखिए कि प्रेमचंद ने उपन्यास एवं कथा साहित्य में कितना बड़ा काम किया है। किंतु उनके यहां गढ़े गए पात्रों के आचार-व्यवहार में कहीं-कहीं आरोपित कृत्रिमता खटक जाती है जिसे बड़ी आसानी से नोटिस किया जा सकता है।

क्रमश:

अपर्णा गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं

 

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