यूपी का यह चुनाव विपक्षियों से ज्यादा जनता का संघर्ष है

एचएल दुसाध

0 65

10 फ़रवरी से शुरू हुआ पांच राज्यों का चुनाव 7 मार्च को समाप्त हो रहा है। कहने को तो यह 5 राज्यों का चुनाव रहा, किन्तु पूरे देश की निगाहें देश के राजनीति की दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश पर रहीं, जहाँ का विधानसभा चुनाव देश के चुनाव की शक्ल अख्तियार कर लिया था। कारण, यहाँ के चुनाव पर कल के भारत का भविष्य टिका का था। बहुजन नजरिये से यदि इस चुनावमें भाजपा जीत जाती है तो संघ परिवार अपनी स्थापना के सौवें साल : 2025 में देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने तथा आंबेडकर के संविधान की जगह मनु लॉ के तहत देश को परिचालित करने की स्थिति में ऐसा जायेगी। ऐसे में यहाँ बहुजनों के लिये सबसे बड़ा मुद्दा भाजपा को हटाना था। इसके लिए लोग उम्मीद कर रहे थे कि गैर- भाजपाई विशेषकर, बहुजनवादी पार्टियां खांटी भाजपा विरोधी के रूप में उभरने में एक दूसरे से होड़ लगायेंगी। खांटी भाजपा-विरोधी के रूप में उभरने का मतलब यह था कि गैर-भाजपा दल वैसी कर्मसूचियों के साथ चुनाव के मैदान में उतरेंगे जिनसे भाजपा द्वारा बहुसंख्य समाज और देश की हुई क्षति से उबरा जा सके। इस लिहाज से यह चुनाव बहुत ही निराशाजनक रहा। खांटी भाजपा विरोधों के रूप में उभरने के लिए सबसे जरुरी था वर्ग संघर्ष के नजरिये से भाजपा की भूमिका का आंकलन करते हुए उसके प्रतिकार के एजेंडे के साथ चुनाव में उतरना। क्योंकि भाजपा की भूमिका वर्ग संघर्ष का इकतरफा खेल खेलते हुए अपने वर्ग शत्रुओं : शुद्रातिशूद्रों और इनसे धर्मान्तरित अल्पसंख्यकों को फिनिश करने की रही है।

आरक्षण के खिलाफ राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के जरिये गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति का आन्दोलन छेड़कर भाजपा सत्ता में पहुंची और राज्य का निर्मम इस्तेमालसुविधाभोगी वर्ग (सवर्णों) को और शक्ति संपन्न करने तथा अपने अपने वर्ग शत्रुओं (बहुजनों) को फिनिश करने में की। इस मकसद के लिए ही उसने देश की बड़ी-बड़ी सरकारी कम्पनियां, परिसंपत्तियां इत्यादि निजी क्षेत्र में देने; श्रम कानूनों को निजी क्षेत्र वालों के अनुकूल करने, अनुच्छेद 370 का उन्मूलन, कृषि कानूनों और शिक्षा नीति में बदलाव लाने इत्यादि में राज्य का बेरहमी से इस्तेमाल किया।

वन्यावस्था को अतिक्रम कर सभ्यावस्था में पहुंचकर भी मानव समाज अपनी वजूद रक्षा के लिए परस्पर संघर्षरत रहा है। इसके कारणों की सही तफ्तीश करते हुए महानतम समाज विज्ञानी कार्ल मार्क्स ने कहा है, ‘अब तक के विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है। एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है अर्थात दूसरे शब्दों में जिसका शक्ति के स्रोतों पर कब्ज़ा है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर हैं अर्थात शक्ति के स्रोतों से दूर व बहिष्कृत हैं। पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है।’ मार्क्स के अनुसार ‘समाज के शोषक और शोषित : ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता। नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वर्गों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है। प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है।’ विश्व इतिहास में वर्ग-संघर्ष का सर्वाधिक बलिष्ठ चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था में क्रियाशील रहा है, जो मूलतः शक्ति के स्रोतों (आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक, धार्मिक) अर्थात मार्क्स की भाषा में उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है। इसमें शक्ति के समस्त स्रोत सिर्फ सवर्णों के लिए आरक्षित रहे और जब 7 अगस्त, 1990 को प्रकाशित मंडल रिपोर्ट के जरिये पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ, आधुनिक भारत में वर्ग संघर्ष रातों रात तुंग पर पहुँच गया। इसी आरक्षण के खिलाफ राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के जरिये गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति का आन्दोलन छेड़कर भाजपा सत्ता में पहुंची और राज्य का निर्मम इस्तेमालसुविधाभोगी वर्ग (सवर्णों) को और शक्ति संपन्न करने तथा अपने अपने वर्ग शत्रुओं (बहुजनों) को फिनिश करने में की। इस मकसद के लिए ही उसने देश की बड़ी-बड़ी सरकारी कम्पनियां, परिसंपत्तियां इत्यादि निजी क्षेत्र में देने; श्रम कानूनों को निजी क्षेत्र वालों के अनुकूल करने, अनुच्छेद 370 का उन्मूलन, कृषि कानूनों और शिक्षा नीति में बदलाव लाने इत्यादि में राज्य का बेरहमी से इस्तेमाल किया। इस कारण ही आज जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के स्रोतों पर उसके संख्यानुपात से प्रायः 65-75 प्रतिशत अतिरिक्त कब्ज़ा हो गया है और भाजपा गैर-सवर्णों के लिए दु:स्वप्न बन चुकी  है। इससे निजात पाने के लिए जरुरी था कि देश के चुनाव की शक्ल अख्तियार कर चुके यूपी विधानसभा चुनाव- 2022 में उतरी गैर-भाजपाई पार्टियाँ भाजपा के इकतरफा वर्ग संघर्ष पर विराम लगाने के लिए उसके वर्ग शत्रुओं अर्थात बहुजनों के हित में जरुरी मुद्दे उठातीं।

2019 में मोदी ने संसद का शीतकालीन सत्र ख़त्म होने के दो दिन पूर्व 7 जनवरी, 2019 को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के बिल को मंजूरी दिलाने के बाद जिस तरह आनन-फानन में 8 जनवरी को लोकसभा एवं 9 जनवरी को राज्यसभा में पास कराया, वह भारत के इतिहास में लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ी बलात्कार के घटना के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।

सवर्ण हित में भाजपा द्वारा छेड़े गए वर्ग संघर्ष के काट के लिए विपक्षी पार्टियाँ एक एजेंडा यह दे सकती थीं कि सत्ता में आने पर हम सभी सामाजिक समूहों के संख्यानुपात में अवसरों और संसाधनों के बंटवारे का उपक्रम चलाएंगे ताकि सुविधाभोगी वर्ग के हिस्से का अतिरिक्त 65 से 75 प्रतिशत अवसर वंचित वर्गों अर्थात दलित, आदिवासी, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों के मध्य बंटने का मार्ग प्रशस्त हो सके। भाजपा ने अपने चहेते वर्ग के हित में राज्य का सबसे निर्मम इस्तेमाल विनिवेश के क्षेत्र में किया है। इसे देखते हुए हुए उसके मंसूबों पर पानी फेरने के लिए जरुरी था कि गैर-भाजपा पार्टियाँ यह घोषणा करने में एक दूसरे से होड़ लगाती कि हम सत्ता में आयेंगे तो विनिवेश नीति के तहत बेंची गयी कंपनियों और परिसंपत्तियों के सौदों की समीक्षा कराएँगे और प्रयोजन पड़ने पर पुनः उनका राष्ट्रीयकरण करेंगे। किन्तु कोई भी पार्टी इस चुनाव में भाजपा के विनिवेश नीति पर ढंग से मुंह नहीं खोली। कम से कम बहुजनवादी दलों को तो इस पर मुंह खोलना ही चाहिए था। यही नहीं विनिवेश नीति के जरिये देश की सरकारी कंपनिया हिन्दू और जैन व्यापारियों के हाथ में देने का इकतरफा खेल अंजाम दिया गया है। विपक्ष यदि इस स्थिति से चिंतित होता वह घोषणा करता कि विनिवेश में हिन्दू उद्यमियों के बजाय सिख, इसाई, मुसलमान, पारसी इत्यादि अ-हिन्दू उद्यमियों को तरजीह देंगे जिनका राष्ट्र-हित में ट्रैक रिकॉर्ड बहुत बेहतर है।

भाजपा ने वर्ग संघर्ष का एकतरफा खेल खेलते हुए बहुजनों को गुलामों की स्थिति में पहुचाने के लिए जो कई लोकतंत्र व देश-विरोधी काम अंजाम दिया है, उनमें निजीकरण, विनिवेशीकरण और लैटरल इंट्री के साथ 7-9 जनवरी, 2019 के मध्य  आनन-फानन में लागू हुआ सवर्ण आरक्षण भी है, जिस पर राष्ट्रपति ने 12 जनवरी, 2019 को अपने समर्थन की मोहर लगा दिया। 2019 में मोदी ने संसद का शीतकालीन सत्र ख़त्म होने के दो दिन पूर्व 7 जनवरी, 2019 को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के बिल को मंजूरी दिलाने के बाद जिस तरह आनन-फानन में 8 जनवरी को लोकसभा एवं 9 जनवरी को राज्यसभा में पास कराया, वह भारत के इतिहास में लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ी बलात्कार के घटना के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। यह लोकतंत्र में तानाशाही सत्ता का सबसे विकृत दृष्टांत था। इस बात को ध्यान में रखते हुए जरुरी था कि भाजपा विरोधी पार्टियाँ लोकतंत्र के सबसे बड़े कलंक के रूप में चिन्हित सवर्ण आरक्षण का खात्मा करने या एमके स्टालिन की तरह इसे अपने राज्य में न लागू करने का विकल्प देने के लिए सामने आतीं। लेकिन किसी पार्टी ने इस पर पर मुंह नहीं खोला।

विश्व आर्थिक असमानता रिपोर्ट 2022 की भांति ही पिछले साल ग्लोबल जेंडर गैप की जो रिपोर्ट आई उसमे देखा गया कि लैंगिक समानता के मोर्चे पर भारत बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार इत्यादी अपने दुर्बल प्रतिवेशी देशों से भी पिछड़ गया है। यह भाजपा की सवर्णपरस्त आर्थिक नीतियों के कारण ही हुआ है।

शासक वर्ग ने मंडलोत्तर काल में आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने के मकसद से निजीकरण का जो सैलाब पैदा किया, उससे सरकारी कंपनियों और परिसंपत्तियों का निजी हाथों में जाने का जो फ्लड गेट खुला, उससे क्वालिटी एजुकेशन निजी क्षेत्र में चली गई और सरकारी स्कूल बन गए मिड-डे-मिल सेंटर। सरकार के निजीकरण पॉलिसी का लाभ उठाकर सवर्ण नेता, व्यापारी, बड़े-बड़े अपराधी अपना शिक्षण संस्थान विकसित कर लिए, जहाँ आरक्षित वर्गों के छात्रों और शिक्षकों के लिए कोई अवसर ही नहीं रहा। भाजपा ने एक ओर जहाँ निजीक्षेत्र में शिक्षा को बढ़ावा दिया, वहीँ दूसरी ओर सरकारी शैक्षणिक संस्थानों के प्रति पूरी तरह उदासीनता बरत कर ऐसे हालात पैदा कर दिया कि वंचित बहुजनों के लिए उच्च शिक्षा व क्वालिटी एजुकेशन सपना बनते जा रहा है। ऊपर से उसने नयी शिक्षा नीति के जरिये बहुजनों की राह और कठिन कर दी है। ऐसे में भारत के विविध समूहों के मध्य शिक्षा का संतुलन कायम करने के लिए जरुरी था कि भाजपा विरोधी पार्टियाँ अपनी शिक्षा नीति के जरिये यह घोषणा करती कि सत्ता में आने पर हम ऐसी व्यवस्था करेंगे जिससे सभी सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों को छोटे-बड़े सभी शिक्षण संस्थानों के एडमिशन, टीचिंग स्टाफ की नियुक्ति इत्यादि में उनके संख्यानुपात में अवसर सुनिश्चित हो।

अगोरा प्रकाशन की किताबें अब किन्डल पर भी उपलब्ध :

भाजपा राज में सवर्ण हित में वर्ग संघर्ष का एकतरफा खेल खेलते हुए हुए जो आर्थिक नीतियाँ नीतियां अख्तियार की गईं, उसका भयावह परिणाम कुछेक माह पूर प्रकाशित विश्व असमानता रिपोर्ट-2022 में सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के शीर्ष 10 फीसदी अमीर लोगों की आय 57 फीसदी है, जबकि शीर्ष 1 प्रतिशत अमीर देश की कुल कमाई में 22 फीसदी हिस्सा रखते हैं। इसके विपरीत नीचे के 50 फीसदी लोगों की कुल आय का योगदान घटकर महज 13 फ़ीसदी पर रह गया है। रिपोर्ट के मुताबिक शीर्ष 10 फीसदी व्यस्क औसतन 11,66,520 रूपये कमाते हैं। यह आंकड़ा नीचे की 50 फीसदी वार्षिक आय से 20 गुणा अधिक है। इस रिपोर्ट को देखते हुए गैर-भाजपा दलों को मतदाताओं के बीच सन्देश चाहिए था कि हम सत्ता में आने पर समस्त आर्थिक गतिविधियों में अवसरों का बंटवारा विविध सामाजिक समूहों के संख्यानुपात में करेंगे ताकि इस भयावह असमानता से, जिसका सर्वाधिक शिकार दलित, आदिवासी, पिछड़े और धार्मिक अल्पसंख्यक हैं, राष्ट्र को निजात मिले सके। विश्व आर्थिक असमानता रिपोर्ट 2022 की भांति ही पिछले साल ग्लोबल जेंडर गैप की जो रिपोर्ट आई उसमे देखा गया कि लैंगिक समानता के मोर्चे पर भारत बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार इत्यादी अपने दुर्बल प्रतिवेशी देशों से भी पिछड़ गया है। यह भाजपा की सवर्णपरस्त आर्थिक नीतियों के कारण ही हुआ है। ऐसे में लैंगिक समानता के लक्ष्य को पाने के लिए गैर-भाजपा दलों का अत्याज्य कर्तव्य बनता था यह घोषणा करने का कि इस शर्मनाक स्थिति से भारतीय महिलाओं को उबारने के लिए हम शक्ति के स्रोतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करेंगे। लेकिन गैर-भाजपा दलों ने भाजपा की भांति ही विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 और ग्लोबल जेंडर गैप पर चुप्पी साधे रखी।

झारखण्ड में भाजपा सरकार को शिकस्त देकर सत्ता में आये हेमंत सोरेन ने जुलाई, 2020 में भवन निर्माण विभाग में 25 करोड़ तक के ठेकों में एसटी, एससी, ओबीसी को आरक्षण देने का साहसिक फैसला किया था, जिसे लेकर सवर्ण ठेकेदारों ने काफी बवाल काटा था। वहां शराब की दुकानों में एसटी-एससी के लिए आरक्षण लागू हो चुका है, साथ में निजी क्षेत्र की नौकरियों में स्थानीय लोगों को 75 प्रतिशत आरक्षण का एलान हो चुका है।

भाजपा की सवर्णपरस्त नीतियों से जिस तरह दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यकों की स्थिति दयनीय बनी है, उससे उबारने के लिए यूपी के गैर-भाजपाई दलों को दूसरे प्रान्तों के भाजपा-विरोधी मुख्यमंत्रियों द्वारा लिए गए फैसलों से भी प्रेरणा लेना चाहिए था। पिछले वर्ष तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति में दलित, पिछड़े और महिलाओं को आरक्षण देकर क्रांति ही कर डाला। उनके उस फैसले से 36,000 मंदिरों में वंचितों को रोजगार का अवसर मिला ही, ब्राह्मणशाही के टूटने का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। उन्होंने मठों-मंदिरों की जमीन का कॉलेज, हॉस्पिटल इत्यादि के निर्माण में उपयोग करने का फैसला किया है। उन्होंने विधानसभा में बिल पास कराकर छात्रों को नीट परीक्षा से निजात दिलाने का काम किया है। अब वहां छात्रों को राज्य के मेडिकल कॉलेजों में 12 वीं में प्राप्त अंकों के आधार पर दाखिला मिलेगा। 2019  में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अनुसूचित जाति का आरक्षण 12 से 13 और ओबीसी का 14 से 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया, जिससे वहां आरक्षण 50 प्रतिशत का दायरा पार कर 72 प्रतिशत हो गया। उन्होंने एसटी-एससी के चतुर्थ से लेकर प्रथम श्रेणी के कर्मचारियों के प्रमोशन में आरक्षण देने की भी घोषणा किया था। बघेल सरकार के नक़्शेकदम का अनुसरण करते हुए 2019 में आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी सरकार ने मंदिरों के बोर्ड ऑफ़ ट्रष्टी में पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 50 फीसद और महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा किया था। यही नहीं रेड्डी ने स्थानीय लोगों को प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों में 75 प्रतिशत आरक्षण देने की साहसिक घोषणा के साथ निगमों, बोर्डों, सोसाइटियों और बाजार के कार्यस्थलों में पिछड़ा वर्ग, एससी, एसटी को 50 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया था। इसके साथ ही उन्होंने सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने की क्रांतिकारी घोषणा किया था। झारखण्ड में भाजपा सरकार को शिकस्त देकर सत्ता में आये हेमंत सोरेन ने जुलाई, 2020 में भवन निर्माण विभाग में 25 करोड़ तक के ठेकों में एसटी, एससी, ओबीसी को आरक्षण देने का साहसिक फैसला किया था, जिसे लेकर सवर्ण ठेकेदारों ने काफी बवाल काटा था। वहां शराब की दुकानों में एसटी-एससी के लिए आरक्षण लागू हो चुका है, साथ में निजी क्षेत्र की नौकरियों में स्थानीय लोगों को 75 प्रतिशत आरक्षण का एलान हो चुका है। झारखण्ड की कोलियरी में भी वंचितों के लिए एक करोड़ तक ठेकों में आरक्षण दिया जा चुका है। उन्होंने अपने राज्य में कई विभागों के आउटसोर्सिंग जॉब में भी आरक्षण लागू कर दिया है।

यह भी पढ़ें :

क्या शुद्रातिशूद्र समाज ने शिवाजी के राज्याभिषेक की कीमत चुकाई?

ऐसे में देखा जाय तो  भाजपा ने वर्ग संघर्ष का एकतरफा खेल खलते हुए दलित, आदिवासी, पिछड़ों और मुसलमानों का जो सर्वनाश किया, उसकी भरपाई के लिए यूपी के गैर-भाजपाई दल न तो कोई ठोस एजेंडा लेकर उतरे और न ही भूपेश बघेल, जगनमोहन रेड्डी, हेमंत सोरेन, एमके स्टालिन इत्यादि के क्रांतिकारी फैसलों से ही कोई प्रेरणा लिए। जबकि ऐसा करना न सिर्फ भाजपा के वर्ग शत्रुओं को बचाने के लिए जरुरी, बल्कि खुद का वजूद बचाने के लिए भी। स्मरण रहे पिछले विधानसभा चुनाव में विजेता भाजपा और उसके प्रतिद्वंदी दलों बसपा, सपा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मत प्रतिशत में जमीन असमान का अंतर रहा। 2017 में भाजपा, बसपा, सपा और कांग्रेस को क्रमशः 39.67, 22.23, 21.82 और 6.25 प्रतिशत मत मिले। इनमे भाजपा 384 सीटों पर चुनाव लड़कर 312 पर विजय प्राप्त की जबकि बसपा, सपा और कांग्रेस क्रमशः 403, 311, 114 पर चुनाव लड़कर क्रमशः 19, 47 और 7 सीटें जितने में कामयाब रहे। ऐसी ताकतवर भाजपा से पार पाने के लिए बसपा, सपा और कांग्रेस को अपने मत प्रतिशत में बहुत ही ज्यादे इजाफा करने की जरूरत थी। इसके लिए इन पार्टियों को भाजपा से कई गुना बेहतर एजेंडा और तैयारियों के साथ चुनाव में उतरना था। लेकिन जिन मुद्दों के साथ ये पार्टियाँ भाजपा जैसी विश्व की सबसे शक्तिशाली पार्टी के खिलाफ उतरी हैं, ऐसा लगता है इन पार्टियों ने महज चुनाव में उतरने की औपचारिकता पूरा किया है। इन्होंने भाजपा के सवर्णपरस्त नीतियों के शिकार लोगों के समक्ष ऐसा कोई सपना नहीं दिया है, जिसके जोर से वे भाजपा से पार पा सकें। ऐसे में भाजपा अगर यूपी में सत्ता से आउट होती है तो उसका सारा श्रेय जनता को जायेगा। अगर खांटी भाजपा विरोधी के रूप में किसी पार्टी ने कुछ हद तक अपना चरित्र जाहिर किया है तो वह सपा है, जिसने सत्ता में आने पर भाजपाई अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा ख़त्म की गयी पुरानी पेंशन योजना को लागू करने का वचन दिया है। इस पार्टी ने सत्ता में आने पर जाति जनगणना कराकर विभिन्न समाजों के संख्यानुपात में अवसरों के बंटवारे का भी वादा किया है। किन्तु इसी आधार पर इसे खांटी भाजपा विरोधी पार्टी के ख़िताब से नहीं नवाजा जा सकता। जो लोग खांटी भाजपा विरोधी पार्टी देखना चाहते हैं, उन्हें अभी और इंतजार करना पड़ेगा। क्योंकि यूपी चुनाव में तमाम गैर-भाजपाई दल खांटी भाजपा विरोधी दल के रूप में उतीर्ण होने में विफल रहे हैं।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.