मान्यवर कांशीराम की बसपा के पुनरुद्धार के तीन उपाय !

एचएल दुसाध

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आज बसपा के संस्थापक अध्यक्ष मान्यवर कांशीराम की 88वीं जयंती है, किन्तु उनके अनुयायी आज बहुत ही उदास मन से इसका जश्न मनाएंगे। कारण हर कोई जानता है कि साहब कांशीराम ने भारत में समतामूलक समाज निर्माण के लिए 1984 में जिस पार्टी का गठन किया था, आज उसके वजूद पर संकट खड़ा हो गया है और यह इससे उबर जाएगी, इसकी फिलहाल सम्भावना भी नहीं दिख रही है। हजारों साल के दासों, शुद्रातिशूद्रों में शासक बनने की महत्वाकांक्षा पैदा करने का चमत्कार घटित करने वाले साहब ने बहुजन समाज के जिन लाखों सक्षम लोगों को ‘पे बैक टू द सोसाइटी’ के मन्त्र से दीक्षित कर समाज परिवर्तन के मोर्चे पर लगाया, आज वे बसपा की कल्पनातीत हार से खून के आंसू रो रहे हैं: उन्हें चारो ओर अँधेरा ही अँधेरा नजर आ रहा है। बहरहाल, निराश-हताश बहुजन अगर इस अँधेरे से निकलना चाहते हैं, तो उन्हें कांशीराम साहब के उस दर्शन का नए सिरे से अध्ययन कर लेना चाहिए, जिसमें सिर्फ उनकी ही नहीं, सम्पूर्ण मानवता की मुक्ति के बीज छिपे हैं; साथ ही उन उपायों पर चिंतन-मनन करना होगा, जिसकी जोर बसपा का पुनरुद्धार जैसा असंभव-सा कार्य अंजाम दिया जा सकता है।

सर्वश्रेष्ठ नारे की तलाश में निकलने पर जो नारे परिवर्तनकारी लोगों को खासतौर से आकर्षित करते हैं, वे हैं- बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, दुनिया के मजदूरों एक हो, स्वधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, अंग्रेजों भारत छोड़ो, तुम मुझे खून दो-मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा, राजसत्ता का जन्म बन्दूक की नली से होता है, सभी समस्यायों का समाधान राजसत्ता की चाबी है, मैं हिन्दू के रूप में पैदा हुआ, पर हिन्दू के रूप में मरूंगा नहीं। किन्तु तमाम खूबियों के बावजूद इनमें से किसी को भी सर्वोत्तम नारे के रूप में चिन्हित करने में मुझे झिझक है, यद्यपि इनके साथ गौतम बुद्ध, मार्क्स, गांधी, तिलक, सुभाष, माओ, बाबासाहेब जैसे महामानवों तक का नाम जुड़ा है।

बहरहाल, आज निराशा की इस घड़ी में सबसे पहले हमें यह याद करना होगा कि कांशीराम साहब सिर्फ बसपा के संस्थापक ही नहीं थे, बल्कि वे गौतम बुद्ध से लगाये आधुनिक विश्व के मार्क्स, माओ, लेनिन, फुले, बाबा साहेब आंबेडकर, पेरियार इत्यादि उन महामानवों की श्रृंखला की कड़ी थे, जिन्होंने मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या- आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से निजात दिलाकर उसे सुखी बनाने में अपना सर्वस्व झोंक दिया। मानव जाति को सुखी बनाने के लिए दुनिया के विभिन्न महामानवों ने न सिर्फ अपने- अपने तरीके से संघर्ष चलाया, बल्कि अपने परिवर्तनकामी दर्शन से जनगण को उद्वेलित करने के लिए समय-समय पर तरह-तरह के नारे भी गढ़े, इन नारों के साथ उनकी पहचान जुड़ गयी। इन नारों के उल्लेख मात्र से उनके सम्पूर्ण संघर्ष और दर्शन की झलक हमारे जेहन में कौंध जाती है। बहरहाल महान परिवर्तनकामी नायकों के नारे की प्रभावकारिता पर कोई तुलनात्मक अध्ययन हुआ है या नहीं, बताना मुश्किल है। किन्तु अगर नहीं हुआ तो जरुर होना चाहिए। खासकर आज उद्भ्रांत बहुजनों को इस दिशा में जरुर आगे बढ़ना चाहिए, कारण, यह प्रमाणित हो चुका है कि नारों ने सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई के चक्के में ग्रीस का काम किया।

सर्वश्रेष्ठ नारे की तलाश में निकलने पर जो नारे परिवर्तनकारी लोगों को खासतौर से आकर्षित करते हैं, वे हैं- बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, दुनिया के मजदूरों एक हो, स्वधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, अंग्रेजों भारत छोड़ो, तुम मुझे खून दो-मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा, राजसत्ता का जन्म बन्दूक की नली से होता है, सभी समस्यायों का समाधान राजसत्ता की चाबी है, मैं हिन्दू के रूप में पैदा हुआ, पर हिन्दू के रूप में मरूंगा नहीं। किन्तु तमाम खूबियों के बावजूद इनमें से किसी को भी सर्वोत्तम नारे के रूप में चिन्हित करने में मुझे झिझक है, यद्यपि इनके साथ गौतम बुद्ध, मार्क्स, गांधी, तिलक, सुभाष, माओ, बाबासाहेब जैसे महामानवों तक का नाम जुड़ा है। मेरे विचार से अगर किसी नारे में इतिहास के सर्वश्रेष्ठ नारे के रूप में चिन्हित होने की कूवत है तो वह है, जिसकी जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी, जिसके जनक आज ही के दिन, 1934 में पंजाब के रोपड़ के खवासपुर गाँव में जन्मे, वह मान्यवर कांशीराम रहे, जिनका आज हम जयंती मना रहे हैं।

राजतंत्रीय व्यवस्था के खिलाफ लगभग 500 सालों तक सुदीर्घ संघर्ष चलाकर अंग्रेज जनगण ने मानव जाति को जो लोकतान्त्रिक प्रणाली उपहार दिया, उसके सुदृढ़ीकरण के लिए लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों ने जिस रास्ते अवलम्बन किया वह शक्ति के स्रोतों में जिसकी जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी लागू करने का ही रास्ता था।

जिसकी जितनी संख्या भारी नारे का प्रभाव सार्वदेशिक है। यह नारा प्राचीन समाजों में जितना उपयोगी हो सकता था, आज के लोकतान्त्रिक युग में भी उतना ही प्रभावी है। अगर यह शाश्वत सचाई है कि सारी दुनिया में ही जिनके हाथों में हाथों में सत्ता की बागडोर रही, उन्होंने शक्ति के स्रोतों (आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक) का विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारा कराकर ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या- आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी- को जन्म दिया तो इससे उबारने में जिसकी जितनी संख्या भारी से बेहतर कोई सूत्र हो ही नहीं सकता। राजतंत्रीय व्यवस्था के खिलाफ लगभग 500 सालों तक सुदीर्घ संघर्ष चलाकर अंग्रेज जनगण ने मानव जाति को जो लोकतान्त्रिक प्रणाली उपहार दिया, उसके सुदृढ़ीकरण के लिए लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों ने जिस रास्ते अवलम्बन किया वह शक्ति के स्रोतों में जिसकी जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी लागू करने का ही रास्ता था। इसी रास्ते ही अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, न्यूजीलैंड, मलेशिया, दक्षिण-अफ्रीका इत्यादि ने विभिन्न वंचित नस्लीय समुदायों और महिलाओं को शक्ति के भिन्न-भिन्न स्रोतों में भागीदारी देकर अपने लोकतंत्र को अनुकरणीय बनाया। जिन देशों ने ऐसे सिद्धांत का अनुसरण नहीं किया वहां का लोकतंत्र संकटग्रस्त है तथा समतामूलक समाज एक सपना बनकर रह गया है, जिनमें टॉप पर है भारतवर्ष!

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भारत समाज सदियों से ही वर्ण-व्यवस्था के प्रावधानों द्वारा परिचालित होता रहा है। धर्म के आवरण में लिपटी वर्ण-व्यवस्था विभिन्न तबकों (वर्णों) के स्त्री-पुरुषों के मध्य शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही। इस व्यवस्था के विदेशागत आर्य प्रवर्तकों ने स्वधर्म पालन की आड़ में ऐसी व्यवस्था किया जिससे शक्ति के सारे स्रोत पीढ़ी दर पीढ़ी तीन उच्चतर वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों-के लिए आरक्षित होकर रह गए। इसमें शुद्रातिशूद्रों को शक्ति के सभी स्रोतों अर्थात शासन-प्रशासन और धन-धरती-शिक्षा के साथ पौरोहित्य इत्यादि से पूरी तरह तो बहिष्कृत किया ही गया, खुद शक्तिशाली वर्णों की महिलाओं तक इसमें स्वतंत्र रूप से भागीदारी नहीं दी गई। इससे प्राचीनकाल से ही इस देश में विषमता का कोई और-छोर नहीं रहा। इस देश में जैसी विषमता सहस्रों वर्ष पूर्व राजतंत्रीय व्यवस्था में रही, प्रायः वैसी ही 21वीं सदी की गणतांत्रिक व्यवस्था में भी दिख रही है। यहां आज भी सदियों के परम्परागत रूप से विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न वर्ग का शक्ति के समस्त स्रोतों पर प्रायः एकाधिकार है।

बसपा नेतृत्व ने इस व्यापकतम नारे को सिर्फ सत्ता में भागीदारी तक सीमित रखा गया। यदि इस नारे को समस्त आर्थिक गतिविधियों, राज-सत्ता की सभी संस्थाओं इत्यादि तक प्रसारित किया गया होता, बसपा अतीत का विषय बनने की ओर अग्रसर नहीं होती। दुःख के साथ कहना पड़ता है 2007 में शिखर पर पहुँचने के बाद जिस तरह बसपा नेतृत्व ने बहुजन से सर्वजन की ओर विचलन करने के साथ ही शक्ति के स्रोतों में साहेब कांशीराम के भागीदारी दर्शन की निरंतर अनदेखी किया, उसका कुफल लोकसभा चुनाव-2009 से ही सामने आना शुरू हो गया।

इस समस्या से राष्ट्र को निजात न तो मार्क्सवादी और न ही गाँधीवादी व राष्ट्रवादी आर्थिक दर्शन दिला सकता है। भारत से अगर विषमता का विलोप कोई आर्थिक दर्शन कर सकता है तो वह है कांशीराम का आर्थिक दर्शन जिसकी जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी! चूंकि परिवर्तनशील श्रेणी समाज ही नहीं, भारत जैसे जड़ जाति-समाज में भी कांशीराम का राम का भागीदारी दर्शन सुखद बदलाव लाने में समान रूप से सक्षम है इसलिए जिसकी जितनी संख्या भारी… ही मानव जाति के सर्वोत्तम नारे के रूप में मान्य हो सकती है। किन्तु भारी अफ़सोस की बात है कि मानव जाति का यह सर्वश्रेष्ठ नारा खुद कांशीराम द्वारा स्थापित पार्टी में ही पूरी तरह उपेक्षित रहा है।

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कांशीराम उत्तरकाल में बसपा नेतृत्व यह भूल गया कि हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से वंचित दलित, आदिवासी, पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित लोगों का बसपा से तेजी से जुडाव इसलिए हुआ कि उनमे यह विश्वास जन्मा था कि एक दिन यह पार्टी केंद्र की सत्ता पर काबिज होकर शक्ति के स्रोतों में कांशीराम का भागीदारी दर्शन लागू कर, उन्हें उनका हको-हुकुक दिला देगी। किन्तु बसपा नेतृत्व ने इस व्यापकतम नारे को सिर्फ सत्ता में भागीदारी तक सीमित रखा गया। यदि इस नारे को समस्त आर्थिक गतिविधियों, राज-सत्ता की सभी संस्थाओं इत्यादि तक प्रसारित किया गया होता, बसपा अतीत का विषय बनने की ओर अग्रसर नहीं होती। दुःख के साथ कहना पड़ता है 2007 में शिखर पर पहुँचने के बाद जिस तरह बसपा नेतृत्व ने बहुजन से सर्वजन की ओर विचलन करने के साथ ही शक्ति के स्रोतों में साहेब कांशीराम के भागीदारी दर्शन की निरंतर अनदेखी किया, उसका कुफल लोकसभा चुनाव-2009 से ही सामने आना शुरू हो गया।

आज पार्टी 1 सीट और 12. 79 प्रतिशत वोट तक गिरकर संकेत दे दी है कि कांशीराम की जिस पार्टी को भारत पर शासन करना था, वह प्रायः अतीत का विषय बनने की स्थिति में पहुँच चुकी है। अब बहुजन बुद्धिजीवियों में इस बात की चारों ओर इस बात की चर्चा की चर्चा हो रही है कि कांशीराम की बसपा को अतीत का विषय बनने से कैसे बचाया जाय? यह सवाल मुझसे भी कई चैनलों पर पूछा गया है।

2007 में यूपी विधानसभा चुनाव में 30. 43 प्रतिशत वोट पाने वाली बसपा 2009 के लोकसभा चुनाव में 27. 20 प्रतिशत वोट पाई, जिसमें  2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में और गिरावट आई। 2007 में 30.43 प्रतिशत वोट पाने वाली बसपा का वोट 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में गिरकर 25.91 तक पहुँच गया, किन्तु मायावती की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा, जिसका भयावह परिणाम दो साल बाद लोकसभा चुनाव में सामने आया। 2014 में बसपा का वोट प्रतिशत फिसल कर 19.17 पर आ गया और 2009 के 20 सीटों के मुकाबले 2014 में सीटों की संख्या शून्य पर पहुँच गयी। 2003 में शारीरिक अस्वस्था के कारण चिरकाल के लिए राजनीतिक रूप से निष्क्रिय होने वाले साहेब कांशीराम बसपा को ऐसी पुख्ता जमीन सुलभ करा गए थे, जिस पर केन्द्रीय सत्ता का महल विकसित हो सकता था। ऐसी पार्टी के सीटों की संख्या 2014 में शून्य पर पहुँचने के बावजूद  मायावती को पार्टी की दशा सुधारने में युद्धस्तर पर जुट जाना चाहिए था, लेकिन वह इस पराभव से पूरी तरह निर्लिप्त रहीं और बसपा की इस स्थिति से चिंतित बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा लगातार सावधान किये जाने के बावजूद वह  लगातार बेरहमी से इसकी अनदेखी करता रहीं, जिसका चरम दुष्परिणाम 11 मार्च, 2017 को सामने आया। किन्तु यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में पार्टी के वजूद पर संकट आने के बावजूद कांशीराम की उत्तराधिकारी मायावती ने अपनी कार्यशैली में रत्तीभर भी बदलाव नहीं लाया। सर्वजन से बहुजन की ओर पुनः लौटने के साथ भविष्य में शक्ति के समस्त स्रोतों में कांशीराम का भागीदारी दर्शन लागू करने का आश्वासन अपने मतदाता वर्ग को देने में कोई रूचि नहीं लिया।

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यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में 25. 91 प्रतिशत वोट और 80 सीटें पाने वाली बसपा 2017 के यूपी विधानसभा में 21 प्रतिशत वोट 19 सीटों तक सिमट कर रह गयी। इस चुनाव ने स्पष्ट संकेत कर दिया पार्टी के वजूद पर संकट खड़ा हो गया है। लेकिन इससे भी मायावती ने कोई सबक नहीं लिया। हाँ, 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन का फैसला कर कुछ बदलाव का संकेत दिया, जिसके फलस्वरूप पार्टी शून्य से 10 सीटों तक पहुँच गयी। इससे लगा कि बसपा का वजूद बचाने के लिए अब मायावती सम्यक कदम उठाएंगी। किन्तु जल्द ही बेवजह सपा से गठबंधन तोड़कर वह पूर्व स्थिति में पहुँच गईं, जिसका खामियाजा बसपा को 2022 में उठाना पड़ा। आज पार्टी 1 सीट और 12. 79 प्रतिशत वोट तक गिरकर संकेत दे दी है कि कांशीराम की जिस पार्टी को भारत पर शासन करना था, वह प्रायः अतीत का विषय बनने की स्थिति में पहुँच चुकी है। अब बहुजन बुद्धिजीवियों में इस बात की चारों ओर इस बात की चर्चा की चर्चा हो रही है कि कांशीराम की बसपा को अतीत का विषय बनने से कैसे बचाया जाय? यह सवाल मुझसे भी कई चैनलों पर पूछा गया है।

सापेक्षिक वंचना के जो हालात भारत में है, उसका सद्व्यहार करने का मन बनाने पर एक वंचित बहुजनों का एक साधारण राजनीतिक दल भी लोकतांत्रिक क्रांति घटित कर सकता है : जबकि बसपा के लिए कांशीराम वह सारे बुनियादी सामान मुहैया करा गए हैं, जिसकी जोर से सामान्य स्थिति में भी केन्द्रीय सत्ता पर कब्ज़ा जमाया जा सकता था, यदि मायावती खुद को कांशीराम के योग्य उत्तराधिकारी के रूप में खुद को साबित कर पाई होतीं।

यह बात सही है कि आज बसपा जिस स्टेज में पहुँच चुकी है और मायावती की जो कार्यशैली है, उससे इसे अतीत का विषय बनने से बचाना बहुत ही कठिन है। बावजूद इसके मेरा मानना है कि शासक दलों, विशेषकर हिंदुत्ववादी भाजपा की आर्थिक नीतियों से भारत में सापेक्षिक वंचना के अभूतपूर्व जो हालात पैदा हो चुके हैं, उससे लोकतान्त्रिक क्रांति के जो हालात भारत में पैदा हुए हैं, वैसी स्थिति न तो फ्रांसीसी क्रांति के पूर्व में रही और न ही 1917 में जारशाही के खिलाफ लेनिन के नेतृत्व में लड़ी गयी लड़ाई के पूर्व रूस में रही। सापेक्षिक वंचना के जो हालात भारत में है, उसका सद्व्यहार करने का मन बनाने पर एक वंचित बहुजनों का एक साधारण राजनीतिक दल भी लोकतांत्रिक क्रांति घटित कर सकता है : जबकि बसपा के लिए कांशीराम वह सारे बुनियादी सामान मुहैया करा गए हैं, जिसकी जोर से सामान्य स्थिति में भी केन्द्रीय सत्ता पर कब्ज़ा जमाया जा सकता था, यदि मायावती खुद को कांशीराम के योग्य उत्तराधिकारी के रूप में खुद को साबित कर पाई होतीं।

बहरहाल क्रांति का अध्ययन करने वाले तमाम समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जब समाज में सापेक्षिक वंचना का भाव पनपने लगता है, तब आन्दोलन की चिंगारी फूट पड़ती है। समाज विज्ञानियों के मुताबिक़, ‘दूसरे लोगों और समूहों के संदर्भ में जब कोई समूह या व्यक्ति किसी वस्तु से वंचित हो जाता है तो वह सापेक्षिक वंचना है दूसरे शब्दों में जब दूसरे वंचित नहीं हैं तब हम क्यों रहें!’ सापेक्षिक वंचना का यही अहसास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अमेरिकी कालों में पनपा, जिसके फलस्वरूप वहां 1960 के दशक में दंगों का सैलाब पैदा हुआ, जो परवर्तीकाल में वहां डाइवर्सिटी लागू होने का सबब बना। दक्षिण अफ्रीका में सापेक्षिक वंचना का अहसास ही वहां के मूलनिवासियों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया, जिसमे भस्म हो गयी वहां गोरों की तानाशाही सत्ता। दक्षिण अफ्रीका में भारत के सवर्णों सादृश्य जिन 9-10 प्रतिशत गोरों का शक्ति के समस्त स्रोतों में 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा था, वे आज प्रत्येक क्षेत्र में ही अपने संख्यानुपात में सिमटते जाने के कारण वहां से पलायन करने लगे है।

इसके लिए मायावती को सवर्णों से पूरी तरह दूरी बनाते हुए उन्हें टिकट देने से परहेज करने की रणनीति बनानी होगी। और तीसरे नम्बर उन्हें निम्न क्षेत्रों में कांशीराम का क्रांतिकारी आर्थिक दर्शन ‘जिसकी जितनी-संख्या भरी, उसकी उतनी भागीदारी’ लागू करने का विश्वास बहुजनों को दिलाना होगा।

लेकिन आज भारत में हजारों साल के जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त वर्ग के  प्रत्येक क्षेत्र में असीमित प्रभुत्व से यहाँ के वंचितों को अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के वंचितों से भी कहीं ज्यादा सापेक्षिक वंचना के अहसास से भर दिया है। इसके कारणों की तह में जाने पर दिखाई पड़ेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें  80-90  प्रतिशत फ्लैट्स इन्ही के हैं। मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दुकानें इन्हीं की हैं। चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाडियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल्स प्राय इन्ही के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है। संसद विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्ही का है। मंत्रिमंडलों मंत्रीमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं। शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सुविधाभोगी वर्ग जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में नहीं है, लिहाजा भारत के बहुजनों जैसा सापेक्षिक वंचना का अहसास भी कहीं नहीं है।

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जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हजारों साल के विशेषाधिकारयुक्त तबकों के शक्ति के तमाम स्रोतों पर ही 80-90 प्रतिशत कब्जे ने बहुजनों में सापेक्षिक वंचना के अहसास को धीरे-धीरे जिस तरह विस्फोटक बिन्दु के करीब पहुंचा दिया है, उससे बैलेट बॉक्स में क्रांति घटित होने लायक पर्याप्त सामान जमा हो गया है। भारत में सापेक्षिक वंचना का भाव क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक और शर्त पूरी करता दिख रहा है और वह है ‘हम-भावना’ का तीव्र विकास। कॉमन वंचना ने बहुजनों को शक्तिसंपन्न वर्गों के विरुद्ध बहुत पहले से ही ‘हम-भावना’ से लैस करना शुरू कर दिया था, जिसमें आज और उछाल आ गया है। क्रान्तिकारी बदलाव में दुनिया के प्रत्येक देश में ही लेखकों ने प्रभावी भूमिका अदा किया है। मंडल के दिनों में वंचित जातियों में बहुत ही गिने-चुने लेखक थे: प्रायः 99 प्रतिशत लेखक ही विशेषाधिकारयुक्त वर्ग से थे, जिन्होंने मंडलवादी आरक्षण के खिलाफ सुविधाभोगी वर्ग को आक्रोशित करने में कोई कोर-कसर नहीं रखी। तब उसकी काट करने में वंचित वर्गों के लेखक पूरी तरह असहाय रहे। लेकिन आज की तारीख में वंचित वर्ग लेखकों से काफी समृद्ध हो चुका है, जिसमे सोशल मीडिया का बड़ा योगदान है। सोशल मीडिया की सौजन्य से इस वर्ग में लाखों छोटे-बड़े लेखक-पत्रकार पैदा हो चुके हैं, जो देश में व्याप्त भीषणतम आर्थिक और सामाजिक विषमता का सदव्यवहार कर वोट के जरिये क्रांति घटित करने लायक हालात बनाने में निरंतर प्रयत्नशील हैं। ऐसे में देखा जाय तो वर्तमान भारत में जो हालात हैं, उसका सद्व्यवहार कर बसपा के लिए भाजपा की जगह लेना कोई बड़ी बात ही नहीं होगी। लेकिन इस हालात का सद्व्यवहार करने के लिए बसपा नेत्री मायावती को खुद में बहुत भारी बदलाव लाते हुए तीन जरुरी काम करने होंगे।

सबसे पहले उन्हें कांशीराम के मिशन को पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले पुराने बसपा नेताओं को ससम्मान पार्टी में वापसी करानी होगी। दूसरे नंबर जिस तरह भाजपा ने अपनी हिन्दुत्ववादी छवि को धारदार बनाने के लिए मुसलमानों से दूरी बनाते हुए उन्हें टिकट देने से पूरी तरह परहेज करने की नीति अख्तियार की है, वही नीति बसपा को बहुजनवादी पार्टी की छवि प्रदान करने के लिए अख्तियार करने होगी। इसके लिए मायावती को सवर्णों से पूरी तरह दूरी बनाते हुए उन्हें टिकट देने से परहेज करने की रणनीति बनानी होगी। और तीसरे नम्बर उन्हें निम्न क्षेत्रों में कांशीराम का क्रांतिकारी आर्थिक दर्शन ‘जिसकी जितनी-संख्या भरी, उसकी उतनी भागीदारी’ लागू करने का विश्वास बहुजनों को दिलाना होगा।

  1. सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर, सभी प्रकार की नौकरियों व धार्मिक प्रतिष्ठानों अर्थात पौरोहित्य;
  2. सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जानेवाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप;
  3. सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जानेवाली सभी वस्तुओं की खरीदारी;
  4. सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों, पार्किंग, परिवहन;
  5. सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जानेवाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकि-व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं के संचालन, प्रवेश व अध्यापन;
  6. सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों, उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जानेवाली धनराशि;
  7. देश-विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ को दी जानेवाली धनराशि;
  8. प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं फिल्म-टीवी के सभी प्रभागों;
  9. रेल-राष्ट्रीय मार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की खाली पड़ी जमीन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अस्पृश्य-आदिवासियों में वितरित हो एवं 10- ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधासभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा; राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि में।

यदि मायावती उपरोक्त से मात्र तीन उपायों का अवलंबन करती है तो ढेरों कमियों सवालों के बावजूद वह न सिर्फ खुद के बूते भारत का पीएम बन सकती हैं, बल्कि कांशीराम सहित फुले, शाहूजी, पेरियार, बाबासाहेब आंबेडकर सहित उन असंख्य महापुरुषों के सपनो का भारत निर्माण भी कर सकती हैं, जिन्हें साहेब कांशीराम इतिहास की कब्र से बाहर निकाल कर योग्य सम्मान दिलाने का ऐतिहासिक काम किया।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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