Friday, February 23, 2024
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बरगी बांध के विस्थापित गाँव अब दोबारा नहीं चाहते विस्थापन, अब कर रहे हैं चुटका परियोजना का विरोध

मध्यप्रदेश के जबलपुर संभाग का मण्डला जिला एक आदिवासी क्षेत्र है। आदिवासी बहुल इलाका होने के कारण मण्डला पांचवीं अनुसूची में आता है। जिले की पर्यावरणीय स्थिति काफी अच्छी है। मगर, यहाँ के नागरिकों को जीविका के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष की वजह यह है कि आदिवासी समुदाय की ज्यादातर जमीन बरगी […]

मध्यप्रदेश के जबलपुर संभाग का मण्डला जिला एक आदिवासी क्षेत्र है। आदिवासी बहुल इलाका होने के कारण मण्डला पांचवीं अनुसूची में आता है। जिले की पर्यावरणीय स्थिति काफी अच्छी है। मगर, यहाँ के नागरिकों को जीविका के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष की वजह यह है कि आदिवासी समुदाय की ज्यादातर जमीन बरगी बांध में अधिग्रहित की जा चुकी हैं। मगर, इस जमीन अधिग्रहण में आदिवासी समुदाय को इतना मुआवजा नहीं मिला कि वह दोबारा जमीन खरीद सकें। ऐसें में आदिवासी लोगों की रोजी-रोटी, बची-खुची जमीन पर ही निर्भर हैं। जब से चुटका परियोजना का प्रस्ताव पारित हुआ है, तब से उनकी नींद उड़ी हुई है। उन्हें डर है कि इस परियोजना के कारण कहीं यह सब भी न छिन जाए।

मण्डला में करीब 40 साल पहले बरगी बांध परियोजना लायी गयी। इस परियोजना को नर्मदा नदी पर जल आपूर्ति के लिए स्थापित किया गया। इस परियोजना में कई गाँव को रोजगार की उम्मीद थी, लेकिन मिला विस्थापन। बरगी बांध जब अस्तित्व में आया, तब कई गाँव विस्थापित हो चुके थे। इन विस्थापित गाँवों में चुटका (आबादी तकरीबन 1000) भी शामिल था। बरगी बांध में विस्थापन का दर्द झेलने के बाद चुटका बुरी तरह बिखर चुका था। तब विस्थापन के बाद कई वर्षों से चुटका गाँव अपनी आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक स्थिति संवारने में लगा था। लेकिन, वर्ष 2009-10 में केंद्र और राज्य सरकार ने चुटका गाँव मे ‘चुटका परमाणु परियोजना’ स्थापित करने की मंजूरी दे दी। ऐसे में विकास से महरूम चुटकावासियों के ऊपर विस्थापन का संकट दोबारा आ गया। मगर, अब चुटका ग्रामवासी दोबारा विस्थापित नहीं होना चाहते। इसीलिए चुटका परियोजना का चुटका ग्रामवासी पुरजोर विरोध कर रहे हैं। इस विरोध का आगाज चुटका परियोजना को मंजूरी मिलने के बाद से ही शुरू हो गया। अब तक इस विरोध के स्वर सूबे से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक मीडिया की सुर्खी बन चुके हैं।

चुटका परियोजना के बारे में जानने की कोशिश करते हैं, तब इसकी जानकारी हमें सरकारी वेबसाइट और दस्तावेजों से मिलती है। सरकारी वेबसाइट और दस्तावेज बताते हैं कि चुटका परियोजना भारत की एक प्रस्तावित नाभिकीय विद्युत ऊर्जा परियोजना है। इस परियोजना की आधारशिला (एनपीसीआईएल) द्वारा रखी गयी। चुटका परमाणु परियोजना की क्षमता (2 × 700) मेगावाट है।

चुटका परियोजना को लेकर गाँव के लोग क्या सोचते हैं और इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? यह जानने के लिए जब हम जबलपुर से मण्डला होते हुए चुटका गाँव पहुंचे, तब वहाँ के ग्रामवासियों ने तरह-तरह के विचार और नजरिये हमारे सम्मुख रखे। पहले हमारी मुलाकात गहबर सिंह बरकड़े सहित कुछ अन्य लोगों से हुई तब उन लोगों ने बताया कि, ’हम बरगी बांध के कारण पहले से विस्थापित हैं। इस बांध के चलते हमारी कमर टूट गई थी। हमारी कुछ जमीन बरगी बांध में डूब गई थी। बाकी अब चुटका परियोजना में जा रही है। बरगी और चुटका परियोजना में मुआवज़ा मिलना एक महत्वपूर्ण बिन्दु है। लेकिन, हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण हमारी आज़ादी है और यह संवैधानिक तौर पर हमें मिला है। यहाँ हम जंगल की लकड़ी, फल-फूल जैसे अन्य संसाधनों पर आश्रित है, जिनका कोई मुआवज़ा नहीं मिला। चुटका परियोजना से जंगल के बहुमूल्य संसाधन नष्ट हो जाएंगे। ऐसे में निश्चित तौर पर हमारे गरिमापूर्ण जीवन जीने की स्वतंत्रता प्रभावित होगी।’

आदिवासी गुड्डालाल बरकड़े बताते हैं कि, ‘हम भूमिहीन हैं। हमारे घर का पट्टा तक नहीं है। जैसे-तैसे मजदूरी और जंगल के संसाधनों पर हमारा जीवन निर्भर हैं। अगर, चुटका परमाणु परियोजना स्थापित हुई तो हम पलायन के लिए विवश हो जाएंगे।’

अपने खेतों से घास-फूस साफ कर रहे देव नेताम अपनी बात कुछ यूं रखते हैं, ‘हम कई सालों से वनभूमि पर काबिज हैं। लेकिन प्रशासन हमें पट्टे का हकदार नहीं समझता। जब बरगी बांध बना था तब हमारे बच्चों को जमीन और नौकरी का आश्वासन दिया गया था। मगर, हुआ ये कि बरगी बांध में हम अपनी जमीन से भी हाथ धो बैठे। अब चुटका में भी यही हालत है।’

लकड़ियाँ समेटते अमर सिंह कुंजाम अपना दर्द यूँ बयां करते हैं, ‘वर्ष 2009 से हमारे आस-पास के क्षेत्र में शिक्षा जैसे अन्य विकास कार्यों पर रोक लगी है। जिससे सीधे बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। चुटका परियोजना में विस्थापन को लेकर हमें एक-एक कमरे बनाकर दिये गये। ये कमरे इतने छोटे हैं कि बच्चे उसमें सो जाएं तो हमें बाहर सोना पड़ेगा। और हम पति-पत्नी कमरे में सो जाएं, तो बच्चों को बाहर सुलाना पड़ेगा। ऐसे कोई रिश्तेदार आ जाए तो क्या ही करेंगें? वहीं, हमारे मवेशियों को तो कोई निवास ही नहीं बनाया गया।’

गौरतलब है कि, कुंजाम जैसे लोगों के साथ चुटका परियोजना में क्या आर्थिक न्याय हुआ? शायद आवश्यकता से कम।

इसी गाँव के सुमरत बरकड़े का सवाल है कि चुटका परियोजना से सरकार हमें क्या लाभ दिया या देगी? आगे वह कहते हैं कि, ‘हम चुटका परियोजना तब तक नहीं स्वीकार सकते, जब तक कि हमारी ग्रामसभा की 26 सूत्रीय मांगें नहीं मानी जातीं। हमने प्रशासन से लेकर नेताओं तक को चुटका परियोजना पर पुनर्विचार संबंधी ज्ञापन दिए, मगर इस मामले में सभी ने अपने कान बंद रखे हैं।’

घर के आँगन में बैठे बुद्धु लाल और अन्य ग्रामीण

गाँव के नाड़ासिंह मराबी इसे अपने शब्दों में ऐसे पेश करते हैं, ‘चुटका परियोजना में हमारे कुल देवी-देवताओं के पूजास्थल विलुप्त हो जाएँगे। उनके संरक्षण की व्यवस्था पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। हमारे कुल देवी-देवताओं को कैसे संरक्षित किया जाए? यह हमारे कानों में गूँजता रहता है।’

एक घर के आँगन में बैठे बुद्धधूलाल सहित कुछ अन्य लोग कहते हैं कि, ‘चुटका परियोजना में यदि हमारी 26 सूत्रीय मांगें नहीं मानी गईं, तो हम परियोजना का काम नहीं होने देगें।’

दादु लाल कुड़ापे

चुटका (विरोध) संघर्ष समिति के अध्यक्ष दादु लाल कुड़ापे बताते हैं कि, ‘हम चुटका परियोजना पर मांगों और पुनर्विचार को लेकर सालों से कई ज्ञापन व आपत्तियां प्रशासन और राजनेताओं को देते आए हैं। लेकिन, यह आपत्तियां और ज्ञापन कागज बनकर रह गये हैं,  इनका कोई जवाब नहीं आया।’

चुटका परियोजना से प्रभावित आदिवासियों ने प्रशासन और नेताओं को सौंपीं कई आपत्तियां व ज्ञापन पत्र भी दिखाए। जिला कलेक्टर (मंडला) को लिखे ऐसे ही एक पत्र में लोगों ने चुटका परियोजना से संबंधित अपनी मांगों का उल्लेख किया है। इस पत्र में लिखा है कि ‘चुटका परियोजना मंडला ग्राम पंचायत पाठा, ग्राम चुटका की ग्रामसभा में पारित प्रस्ताव में 26 बिंदुओं की मांग पूरा ना होने के कारण आपत्ति।’

पत्र में आगे लिखा गया है कि, हम सभी ग्रामवासी ग्राम चुटका, टाटी घाट, कुन्डा विकास खंड नारायणगंज, जिला मंडला मध्य प्रदेश के स्थायी निवासी हैं। उपरोक्त विषयान्तर्गत आपसे निवेदन है कि चुटका परमाणु परियोजना के अन्तर्गत ग्रामसभा में प्रस्तावित 26 बिंदुओं की मांग है। इन मांगों में जमीन अधिग्रहण का मुआवज़ा 60 लाख रुपये एकड़, चुटका परियोजना में हितग्राहियों के बैंक खातों में मनमर्जी जबरदस्ती राशि डालना, कृषकों को भूमि और पेड़-पौधों का कम मुआवज़ा देना, विस्थापितों लोगों की गौशालाओं का मुआवज़ा न देना रोका जाय। चुटका विस्थापितों को वनभूमि खोला जाए और वन ग्राम बसाये जाएं।’

भोपाल के मुख्यमंत्री और आयुक्त को लिखा गया शिकायत पत्र।

चुटका परियोजना को लेकर एक अन्य आपत्ति स्थानीय लोगों ने क्षेत्रीय प्रदूषक नियंत्रक बोर्ड को भी सौंपी है। इस आपत्ति में उल्लेखित है कि इस परियोजना से चुटका, टाटी घाट और कुंडा सहित आसपास के 54 गांव प्रभावित होगें। ऐसे में क्षेत्र के ग्रामीण आदिवासियों के नैसर्गिक अधिकारों सहित पर्यावरण और जैवविविधता पर हानिकारक प्रभाव पड़ेगा।

आपत्ति में बताया गया कि, परियोजना में पुनर्वास नीति 2002, संविधान की पांचवीं अनुसूची का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके आगे आपत्ति में उल्लेख है कि परियोजना में 7 करोड़, 25 लाख, 76 हजार घनमीटर पानी प्रतिवर्ष नर्मदा की जलधारा से लिया जाएगा, जो नदी में वापस नहीं होगा। इससे नर्मदा किनारे के सैकड़ों गांव जल की कमी से प्रभावित होंगे। अत: परियोजना रद्द की जाये। चुटका परमाणु संयंत्र को ठंडा करके जो पानी नर्मदा में जाएगा, उससे जलीय जीव और मानव बीमारियों का खतरा रहेगा।

चुटका प्रभावित यहीं नहीं रुके प्रभावितों ने राज्यपाल के नाम भी अनुविभागीय अधिकारी सिवनी को ज्ञापन सौंपा है। इस ज्ञापन के जरिये चुटका परियोजना को निरस्त करने की मांग की गयी है। पत्र में कहा गया कि जल, जंगल और जमीन आदिवासियों की आजीविका के मुख्य साधन हैं। इनके खत्म होने से स्थानीय आदिवासी समुदाय पलायन और भुखमरी का शिकार होंगे।

मुख्यमंत्री को भी लिखा गया है शिकायत पत्र 

चुटका परियोजना का वर्षों से विरोध करती आ रही चुटका परमाणु विरोधी संघर्ष समिति ने चुटका परियोजना के लिए ग्रामसभा की अवहेलना कर जबरन बेदखली का शिकायत पत्र मुख्यमंत्री को भी लिखा। इस पत्र में लिखा गया कि मण्डला और सिवनी के विभिन्न गाँव ने चुटका परियोजना के विरोध में प्रस्ताव पारित किया है। उपरोक्त ग्रामसभाओं ने परियोजना को लोकहित के विरुद्ध निरूपित करते हुए भूमि अधिग्रहण का विरोध किया है। इस पत्र में (चुटका परियोजना के संबंध में) ग्रामवासियों द्वारा हजारों आपत्तियाँ दर्ज कराने का भी जिक्र है।

चुटका परमाणु विरोधी संघर्ष समिति द्वारा राज्यपाल के नाम 2017 में लिखे एक पत्र में भी बताया गया था कि संविधान के भाग 10 के अनुसार, अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन स्थानीय जनजातीय समाज की सहमति द्वारा संचालित किया जाना चाहिए। ऐसे में, जनजातीय समाज की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, चुटका परमाणु परियोजना तथा उससे विस्थापित परिवारों के लिए ग्राम गोंझी, मण्डला में निर्माण किए गए पुनर्वास को रद्द किया जाए।

चुटका परियोजना के संबंध में बरगी बांध विस्थापन संघ के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार सिन्हा से गाँव के लोग डॉट कॉम ने बातचीत की। राजकुमार बताते हैं कि, ‘चुटका परियोजना जहां प्रस्तावित हुई है वहाँ के कई गाँव पहले ही बरगी बाँध में विस्थापन का शिकार हो चुके हैं। ऐसे में, इस परियोजना का चुटका परमाणु विरोधी संघर्ष समिति कई साल से विरोध करती आ रही है।’

‘भारत सरकार को भी अलग-अलग समय पर चुटका परियोजना से संबंधित ग्रामसभाओं की आपत्तियां और प्रस्ताव भेजे गए, लेकिन सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया।’

वह आगे कहते हैं, ‘देश की परमाणु परियोजनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि, जहां-जहां ये परियोजनाएं स्थापित की जाती हैं, वहाँ का सार्वजनिक जनजीवन और लोगों का स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित होता है।’

विस्थापितों के अधिकारों को लेकर कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता शारदा यादव कहते हैं कि, ‘अगर चुटका परमाणु संयंत्र स्थापित किया जाता है, तो अनुमानतः चुटका से सटे करीब 50 गांवों को रेडिऐशन का खतरा झेलना पड़ेगा। जहां चुटका स्थापित होना है, उसके 4 किमी दूर से ही नर्मदा नदी का पानी लिफ्ट करके जलजीवन मिशन के तहत क्षेत्रवासियों को दिया जाएगा। ऐसे में पानी दूषित होने का संकट है।’

कागजों को देखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता शारदा‌ यादव (दाहिने)।

वह आगे बताते हैं, ‘चुटका विस्थापन के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि, विस्थापित लोगों को दो कमरे का आवास मिल गया है। लेकिन, चुटका पूरा आदिवासी क्षेत्र है। आदिवासी समुदाय के निवास का एक अलग तरीका है। आदिवासी दो कमरों में अपने परिजन, पशु-पक्षी, खेती के औजार, फसलें यह कैसे रखेगा?’

शारदा आगे दावा करते हैं कि, ‘चुटका परियोजना का विरोध आसपास की 101 ग्रामसभाओं ने किया। 101 ग्रामसभाओं ने यह लिखकर भी दिया है कि हम चुटका परियोजना नहीं चाहते। इस परियोजना का विरोध रुकेगा नहीं बल्कि, दिन-ब-दिन बढ़ता ही जाएगा।’

चुटका परियोजना और बरगी बांध में विस्थापितों के पुनर्वास पर पुनर्विचार करने के संबंध में मंडला के पूर्व विधायक अशोक मर्सकोले ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को एक पत्र लिखा। इस पत्र का जवाब भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा दिया गया।

दरअसल, परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा 18 जुलाई, 2023 को एक पत्र जारी किया गया। इस पत्र में बताये गये विवरण का कुछ अंश इस प्रकार है, …(देश में) नाभकीय ऊर्जा कार्यक्रम 1960 के दशक में शुरू हुआ। वर्तमान में नाभिकीय ऊर्जा 6780 वाट हो गयी है। …वर्तमान में हम 23 रिएक्टरों के विश्व में सातवें सबसे बड़े फ्लीट का संचालन करते हैं। 2031-32 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता 22480 मेगावाट बढ़ाने के लिए एक बढ़ा कार्यक्रम वर्तमान में चल रहा है। 23 रिएक्टरों के बड़े फ्लीट को संभालने के बावजूद, भारत का सुरक्षा रिकॉर्ड त्रुटिहीन है। लेकिन, परमाणु ऊर्जा के 53 वर्षों में… जनता के लिए एक भी दुर्घटना या विकिरण जारी नहीं हुआ है।

चुटका परियोजना पर विचार करने एकजुट हुए चुटका ग्रामवासी।

पत्र में आगे वर्णित है कि, संयंत्र सालाना लगभग 558.88 क्यूबिक मीटर पानी खपत करेगा। यह नर्मदा नदी में बहने वाले कुल जल का 1 प्रतिशत से भी कम है। इसके आगे पत्र में यह भी उल्लिखित किया गया कि, चुटका परियोजना के लिए विभिन्न विभागों, मंत्रालयों से मंजूरी ली जा चुकी है और ली जा रही है। अतः इस समय परियोजना पर पुनर्विचार का प्रश्न नहीं उठता।

वहीं, जब हमने चुटका परियोजना का विषय में पूर्व विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले के सामने रखा। तब वह कहते हैं कि, ‘मण्डला जिले की कई परियोजनाओं में से एक चुटका परियोजना है। यह परियोजना जब से प्रस्तावित हुई है। तब से लोग इसका विरोध कर रहे है।’

पूर्व विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले के पत्र का जवाब

‘यहां की पर्यावरणीय स्थिति और जनजीवन के लिहाज से यह परियोजना ठीक नहीं समझ आ रही है। हमने अपने स्तर पर परियोजना के विषय में, प्रशासन और नेताओं से पत्रव्यवहार किया है लेकिन, अभी चुटका परियोजना का कोई रास्ता नहीं निकला है।’

चुटका परियोजना और परियोजना के अंतर्गत जमीन अधिग्रहण को चुनौती देने के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में एक जनहित याचिका भी लगाई गयी थी।

यह याचिका चुटकावासियों के आह्वान पर एडवोकेट राघवेंद्र कुमार और स्वप्निल गांगुली ने लगायी। लेकिन, उच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया। मार्च, 2017 के आर्डर में हाईकोर्ट ने बताया कि, परियोजना में काफी निवेश किया जा चुका है। परियोजना का कार्य भी आगे बढ़ चुका है। परियोजना प्रस्तावित होने के 6 साल अब इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

बीते दिनों चुटका परमाणु विद्युत संयंत्र के विषय में लोकसभा में प्रश्न 153 के जरिए सांसद राजेंद्र अग्रवाल और अपराजिता सारंगी द्वारा सवाल किये गये। यह कुछ इस प्रकार रहे। क्या प्रधानमंत्री यह बताने की कृपा करेंगे कि चुटका परमाणु विद्युत संयंत्र में हुई प्रगति का ब्योरा क्या है? चुटका परियोजना का अनुमानित लागत का ब्यौरा क्या है और इसके लिए प्रस्तावित व आबंटित क्षेत्र क्या हैं?

लोकसभा में सांसद राजेंद्र अग्रवाल और अपराजिता सारंगी द्वारा उठाए गए सवाल।

क्या कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के बाघ अभयारण्य के आस-पास परियोजना निर्मित करना सुरक्षित है। क्या सरकार ने इसकी सुरक्षा संबंधी सावधानियों के लिए कोई प्रारंभिक अध्ययन कराया है। यदि हां, तो तत्संबंधी ब्योरा क्या है? चुटका परियोजना को राज्य के किसी अन्य निर्जन स्थान या पहाड़ी क्षेत्र में स्थानांतरित करने का विचार है। यदि है, तब उसका ब्योरा क्या है?

इस प्रश्न (153) का उत्तर देने की तारीख़ 13 दिसम्बर, 2023 मुकर्रर की गयी। तब राज्यमंत्री, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन तथा प्रधानमंत्री कार्यालय (डॉ. जितेंद्र सिंह) की तरफ से उत्तर आये। जिसमें मध्य प्रदेश के मंडला जिले में 2×700 मेगावाट की चुटका परियोजना में अब तक कार्य के बारे बताया गया।

इसमें बताया गया कि, चुटका परियोजना के लिए भूमि राजस्व अभिलेखों में एनपीसीआईएल के नाम पर स्थानांतरित कर दी गई है। एनपीसीआईएल ने राज्य सरकार द्वारा निर्धारित भूमि और पुनर्स्थापन व पुनर्वास (आर&आर) पैकेज के लिए राशि जमा कर दी है। निजी भूमि के भूस्वामियों को मुआवजे का भुगतान पूरा हो गया है। विस्थापित किए जाने वाले परियोजना से प्रभावित व्यक्तियों के लिए पुनर्स्थापन व पुनर्वास (आर&आर) बस्ती का निर्माण कार्य पूरा हो गया है। परियोजना के लिए पानी के आबंटन हेतु राज्य सरकार के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से परियोजना के लिए पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त की गई है।

भारत सरकार ने 10 शीघ्रगामी (फ्लीट) मोड रिएक्टरों के भाग के रूप में, चुटका परियोजना के लिए प्रशासनिक अनुमोदन और वित्तीय मंजूरी प्रदान की है।चुटका सहित शीघ्रगामी (फ्लीट) मोड रिएक्टरों के लिए लंबे विनिर्माण चक्र उपकरण की खरीद शुरू की गई है।

परियोजना प्रभावित व्यक्तियों (पीएपी) को आर&आर बस्ती में स्थानांतरित न किए जाने की वजह से भूमि का वास्तविक कब्जा अभी तक नहीं हुआ है। परियोजना की अनुमानित लागत 21,000 करोड़ रुपये हैं और इसके लिए अर्जित कुलक्षेत्र 708.19 हेक्टेयर।

चुटका परियोजना कान्हा बाघ अभयारण्य सीमा से काफी दूर (50 किमी से अधिक आकाशीय दूरी) पर अवस्थित है। इसलिए अभयारण्य पर इसका कोई प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया के भाग के रूप में परियोजना का विस्तृत पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन का अध्ययन किया गया था। अंत में उल्लेख किया गया कि, चुटका नाभिकीय विद्युत परियोजना के पुनर्स्थापन का कोई प्रस्ताव नहीं है।

क्या है सरकार की योजना 

ज्ञात हो कि भारत सरकार का लक्ष्य वर्ष 2031 तक 22480 मेगावाट क्षमता परमाणु ऊर्जा निर्मित करना है। ऐसे में सरकार ने देश में 10 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर लगाने के लिए शासकीय और वित्तीय मंजूरी जून, 2017 में दे दी थी। इन रिएक्टर में प्रत्येक कि क्षमता 700 मेगावाट है। स्वदेशी तकनीकी पर आधारित ये रिएक्टर भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड (एनपीसीआईएल) लगाए जाएंगे। इन्हीं रिएक्टर में चुटका परमाणु परियोजना (मध्यप्रदेश) भी शामिल। इसके अलावा कर्नाटक में कैगा, राजस्थान में माही बांसवाड़ा और हरियाणा में गोरखपुर रिएक्टर भी प्रस्तावित हैं।

NPCIL द्वारा चुटका क्षेत्र में चलाये जा रहे सामाजिक उत्तरदायित्व कार्यक्रम लेखा-जोखा।

बता दें कि, एनपीसीआईएल भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व वाला सार्वजनिक उपक्रम है। जो परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत काम करता है। वहीं, एनपीसीआईएल तारापुर, मद्रास, नरौरा और काकरापार परमाणु विद्युत परियोजना जैसी अन्य परियोजनाएं भी संचालित करती है। इस सभी परियोजनाओं की क्षमता 7480 (एमडब्ल्यूई) मेगावाट इलेक्ट्रिक है। एनपीसीआईएल परमाणु ऊर्जा तक सीमित नहीं। एनपीसीआईएल कई कार्यक्रम भी चलाती है। अभी मध्य प्रदेश चुटका परियोजना क्षेत्र में एनपीसीआईएल द्वारा सामाजिक उत्तरदायित्व कार्यक्रम के तहत जैविक खाद्य निर्माण प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किया गया है। इस कार्यक्रम के तहत 40 किसानों को जैविक खाद्य निर्माण एवं नई तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जायेगा।

विश्व में परमाणु विद्युत उत्पादन की बात करें तब आकड़ों के अनुसार, आज, परमाणु ऊर्जा वैश्विक ऊर्जा मांग का लगभग 10% पूरा करती है , जिसमें 32 देशों में वर्तमान में 439 परमाणु संयंत्र चालू हैं और लगभग 55 नए रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। 2020 में, 13 देशों ने अपनी कुल बिजली का कम से कम एक-चौथाई हिस्सा परमाणु ऊर्जा से उत्पादित किया, जिसमें अब तक अमेरिका,  चीन और फ्रांस का बाजार पर दबदबा रहा है।

1950 के दशक से, 250,000 टन अत्यधिक रेडियोधर्मी परमाणु कचरे का भंडार दुनियाभर में जमा और वितरित किया गया है, जिसमें से9 0,000 मीट्रिक टन अकेले अमेरिका में संग्रहीत है। परमाणु कचरे के खतरों को जानते हुए, कई लोग दुर्घटनाओं के डर से  परमाणु ऊर्जा का विरोध करते हैं, बावजूद इसके  किऐसा होने की अत्यधिक संभावना नहीं है। दरअसल, विरोधियों को पता है कि जब परमाणु विफल होता है, तो यह शानदार ढंग से विफल हो सकता है। उन्हें इसकी याद 2011 में आई, जब फुकुशिमा आपदा में सीधे तौर पर किसी की मौत नहीं होने के बावजूद, 150,000 से अधिक लोगों का विस्थापन हुआ, हजारों  लोगों की निकासी/संबंधित मौतें हुईं और सफाई पर अरबों डॉलर खर्च हुए। परमाणु विद्युत उत्पादन में वर्ष 2021 तक विश्व परमाणु बेड़े ने 2,653 शुद्ध टेरावाट-घंटे (TWhयाअरबकिलोवाट-घंटे) बिजली उत्पन्न की। 2021 में परमाणु उत्पादन में 3.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई लेकिन यह 2019 के स्तर से थोड़ा नीचे रहा। जबकि, वर्ष 2021 में वैश्विक वाणिज्यिक सकल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी गिरकर 9.8 प्रतिशत हो गई। पहली बार10 प्रतिशत से नीचे और चार दशकों में सबसे कम मूल्य है।

भारत में परमाणु विद्युत उत्पादन की स्थिति देखी जाए, तब 2019 में परमाणु उत्पादन में गिरावट आ रही है और 2021 तक कुल बिजली उत्पादन का 3.2 प्रतिशत प्रतिनिधित्व किया गया। भारत में आठ रिएक्टर निर्माणाधीन के रूप में सूचीबद्ध हैं। 2021 तक देश में, पवन और सौर दोनों ने राष्ट्रीय बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा उत्पादन में 150 प्रतिशत से अधिक का योगदान दिया।

गौरतलब है कि, देश में स्थापित की जा रही चुटका जैसी विभिन परियोजनाएं विकास के नजरिए से ठीक ठहराई जा सकती हैं। लेकिन, यह विचार किया जाना चाहिए कि, इन परियोजनाओं के निर्माण से आमलोगों और सार्वजनिक जनजीवन पर बुरा असर ना पड़े। विकास के हवाले लाई जा रही परियोजनाओं में विस्थापित लोगों को पुनर्वास नीति 2002 और 2013 के तहत, बिजली, सड़क, पानी, स्वास्थ्य जैसी विभिन्न नागरिक सुविधाएं, आवास सुविधा, विस्थापित परिवार के एक सदस्य को नौकरी, बेटियों को जमीन पट्टा सहित अन्य मूलभूत सुविधाएं दी जाएं। पुनर्वास नीति यह भी कहती है कि, लोगों का परियोजना द्वारा विस्थापन नहीं किया जाना चाहिए।

विस्थापितों की प्रगति को ध्यान में रखकर सरकार और प्रशासन द्वारा वे सारी सुविधाएं दी जानी चाहिए, जिनसे विस्थापित मजबूत और संरक्षित हो। ताकि आगे उन्हें यह अहसास न हो कि, वे विस्थापित हुए हैं। यदि चुटका विस्थापितों को यह समस्त सुविधाएं को नहीं दी गयीं, तब इन विस्थापित लोगों के स्वतंत्रता, समानता, न्याय, व्यक्ति की गरिमा जैसे विभिन्न संवैधानिक मूल्यों पर संकट बरकरार रहेगा। जिससे विस्थापित अपने संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण की गुहार लगाते रहेगें।

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सतीश भारतीय
सतीश भारतीय स्वतंत्र पत्रकार हैं। मध्य प्रदेश में रहते हैं।

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