हिंसा और यातना लोकतंत्र और स्थायी विकास के लिए खतरा है

श्रुति नागवंशी

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यातना मुक्त समाज के लिए बहुलतावाद क्यों जरूरी है? विषय पर संवाद का आयोजन

वाराणसी में बघवानाला स्थित मिर्ज़ा ग़ालिब ग्लोबल सेंटर फॉर डाईवर्सिटी एंड प्लूरलिज्म में आजादी के 75 वर्षगांठ व संविधान दिवस को पखवाड़ा के रूप में मनाने के लिए मानवाधिकार जननिगरानी समितिसावित्री बाई फुले महिला पंचायत लोक विद्यालय, यातना मुक्त समाज के लिए बहुलतावाद क्यों जरूरी है? विषय पर संवाद का आयोजन किया गया।

इस मौके पर मानवाधिकार जननिगरानी समिति के संस्थापक सदस्य डॉ. लेनिन रघुवंशी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए इस संवाद के विषय वस्तु को साझा करते हुए कहा कि, जब आप एक-दूसरे पर विचार थोपना चाहते हैं, तो आप केवल हिंसा का सहारा लेते हैं, लेकिन जब राज्य करती है तो यातना के द्वारा करती है। यातना व हिंसा लोकतंत्र व स्थायी विकास के लिए खतरा है।

हमें एक ऐसा समाज बनाना चाहिए जहाँ एक-दूसरे के विचारों को आदर और सम्मान दे सकें। अहिंसात्मक बहस द्वारा उसे हल करने की कोशिश करें। इसलिए जरुरी है कि बहुलतावाद लोगों के व्यवहार में मूल के तरह स्थापित हो। इस स्थिति में नवदलित आन्दोलन की प्रासंगिकता अधिक बढ़ जाती है। टूटे हुए सभी लोगों के साथ प्रगतिशील लोगों की एकता दण्डहीनता की संस्कृति व वंचितिकरण के ख़िलाफ़ लड़ने का सबसे अच्छा तरीका है। उन्होंने इस मौके पर काशी के बहुलतावाद और इतिहास पर भी प्रकाश डाला।

बंदी अधिकार आन्दोलन के संयोजक संतोष कुमार उपाध्याय को सम्मानित करते हुए

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देश के वरिष्ठ पत्रकार व लेखक अभिषेक श्रीवास्तव ने कहा कि इंसानी सभ्यता के इतिहास में समाज ने जितने भी सामूहिक उद्यम किए हैं, हमारी विविधता उन्हीं से पैदा हुई है। यह विविधता प्रकृति के नियमों के अनुकूल है, जो सभी को बराबर अधिकार से और अपनी जरूरत के हिसाब से जीने का अधिकार देती है। इस विविधता को नुकसान पहुंचाना प्रकृति के खिलाफ जाने जैसा है। हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम विविधता को न केवल बचाएं बल्कि बढ़ाएं भी साथ ही इस तरह से प्राकृतिक बहुलता को बरकरार रखने में अपना योगदान दें। जीयें और सभी को जीने दें।

इस मौके पर बंदी अधिकार आन्दोलन के संयोजक संतोष कुमार उपाध्याय को देश भर में बंदियों के अधिकार के लिए काम के लिए प्रतिबद्धता और समर्पण के लिए जनमित्र सम्मान से सम्मानित किया गया।

संवाद को आगे बढ़ाते हुए युवा चिन्तक उवैस सुल्तान खान ने कहा कि, हमारी परम्परा स्वीकार्यता की रही है| यहाँ हम सब एक-दूसरे में समां गये थे, इसलिए उनको अलग करना मुश्किल था। पिछले कुछ दशक पहले विभाजनकारी नीतियों ने हमारे बुजुर्गों द्वारा संजोये गये सपनों के भारत को बहुलतावाद और विविधतता को खत्म करने की कोशिश की। अपने जैसे सब बनाना चाहते है, पर कोई अपना नहीं बनाना चाहता। उन्होंने लैंगिक बराबरी पर भी जोर दिया।

कार्यक्रम में उपस्थित लोग

राजेश प्रताप सिंह (पूर्व सहायक निदेशक, गृह मंत्रालय, भारत सरकार) ने काशी को बहुलता की संस्कृति को साझा किया। उन्होंने कहा कि बहुलता के लिए शास्त्रर्ध जरुरी है।

इस मौके पर सावित्री बाई फुले महिला पंचायत की संयोजिका श्रुति नागवंशी ने धन्यवाद् देते हुए कहाकि विभाजनकारी और फासीवादी हमेशा से समाज के कटुता फ़ैलाने का कार्य कर रहा है। इसलिए मिर्ज़ा ग़ालिब ग्लोबल सेंटर फॉर डाईवर्सिटी एंड प्लूरलिज्म लोगों में एकजुटता और जमीनी स्तर पर संविधान लागू करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

इस मौके पर राकेश रंजन त्रिपाठी, आशीष पाण्डेय, बुनकर दस्तर अधिकार मंच के इदरीश अंसारी, मनीष शर्मा, शिरीन शबाना खान, रिंकू पाण्डेय, छाया कुमारी, राजेंद्र, अभिमन्यु, ओंकार सहित 80 से अधिक लोगों ने भागीदारी किया| संचालन डॉ. लेनिन रघुवंशी ने किया।

श्रुति नागवंशी सावित्री बाई फुले महिला पंचायत की संयोजिका है। 

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