जातिगत जनगणना पर क्या सोचते हैं बुद्धिजीवी-1

गाँव के लोग टीम

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देश में इस समय जातिगत जनगणना का मुद्दा गरमाया हुआ है। विभिन्न जगहों पर लोग और सामाजिक संस्थाएँ इस पर लगातार जनजागरुकता अभियान चला रहे हैं। जगह-जगह जन जुटान और विचार गोष्ठियों के माध्यम से लोग इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं और जनता से अपील कर रहे हैं कि वह इस मुद्दे पर एकजुट हो और केंद्र में सत्तासीन मोदी सरकार पर जन दबाव बनाए। बिहार में राकेश यादव, डॉ हीरालाल मौर्य, उत्तर प्रदेश में डॉ ओमशंकर, प्रेमप्रकाश सिंह यादव, अनूप श्रमिक, रमाकांत यादव, मनीष शर्मा, छेदी लाल निराला, विमला यादव और दिल्ली में प्रोफेसर रतन लाल और लक्ष्मण यादव आदि ने इस मुहिम को बहुत तेजी से आगे बढ़ाया है। बनारस में ब्लॉक स्तर पर अनेक कार्यक्रम किए गए। और उनकी शृंखला जारी है।

इसके संदर्भ में बनारस के जाने-माने अधिवक्ता प्रेमप्रकाश सिंह यादव ने कहा कि ‘जातिगत जनगणना न कराना सरकारों की मनुवादी मानसिकता को प्रदर्शित करता है ,जब जनगणना वर्ष आता है तब सरकार कोई अन्य मुद्दा खड़ा कर जातिगत जनगणना के सवाल को पीछे धकेल देती है।’

नब्बे साल से टलता आ रहा मुद्दा

1931 के बाद से आज तक पिछड़ों की जातिगत जनगणना नहीं हुई। 1941 में  द्वितीय विश्वयुद्ध दौर था,1951 में देश की आजादी के बाद पिछड़ों की जातिगत जनगणना होनी थी, सरकार ने आजादी व गणतंत्र में पिछड़ों को भुलवा दिया, 1961 में जनगणना होनी थी तो 1962 का युद्ध आ गया, 1971 में बांग्लादेश प्रकरण आ गया, 1981 में इमरजेंसी के बाद का दौर था, 1991 से पहले मंडल कमीशन के बाद कमंडल ला दिया, 2001 में गोधरा कांड हुआ, 2011 में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के नाम पर भुलवाया गया। संसद में बहस के बाद जातिगत जनगणना के लिए सरकार तैयार भी हुई जातिगत जनगणना भी कराया लेकिन उसको सार्वजनिक नहीं किया। उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 2021 से पहले किसान कानून, सीएए एनआरसी, मजदूर कानून सहित तमाम जन विरोधी कानून लाए गए और  सरकारी संपत्तियों व संस्थानों का निजीकरण के बहाने  देश को गुमराह कर जातिगत जनगणना से ध्यान भटकाने का प्रयास हो रहा है। इसके बावजूद जब मांग की गई तो सरकार ने संसद में स्पष्ट तौर पर कहा कि वह पिछड़ों की अलग से जातिगत जनगणना नहीं कराएगी। इससे सरकार की मनुवादी व ब्राह्मणवादी सोच पर परिलक्षित होती है, साथ ही साथ विपक्षी पार्टियां, जिन्हें संसद से लेकर सड़क तक आंदोलन  करना चाहिए वे मीडिया, संसद व विधानसभाओं में बयान तक ही सीमित हैं। ऐसे में विपक्षी पार्टियों को यह लगता है कि वे मनुवादी, सामंतवादी, पूंजीवादी ताकतों को नाराज कर सत्ता में नहीं आ सकते, इसलिए वह भी सत्ता की लालच में इस मुद्दे पर संघर्ष व आंदोलन में नहीं आ रहे हैं।

आजादी के बाद से लगातार जनसंख्या वृद्धि को रोकने के प्रयास एक तरफ और जनसंख्या के आधार पर कथित अवसरों का बंटवारा दूसरी तरफ। जाति तोड़ने के आंदोलन चलाने वाले जातिगत जनगणना के पैरोकार हो गये हैं! समझ नहीं आ रहा कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? आज जाति से बड़ी सच्चाई आर्थिक स्थिति है। सदियों से अवसरों की ताक में सम्मानजनक नागरिक जीवन के अभिलाषी आरक्षित और अनारक्षित दोनों वर्गों में हैं। जनसंख्या के आधार पर अवसरों-संसाधनों को बांटने की मांग विभाजनकारी ही साबित होगी।

प्रेम प्रकाश आगे कहते हैं –‘ऐसे में हम सभी अधिवक्ताओं, सामाजिक व राजनीतिक संगठन के साथियों की यह जिम्मेदारी है कि सरकार के साथ-साथ विपक्ष पर भी दबाव बनाकर जातिगत जनगणना को लागू करवाया जाए। इसके लिए बगैर आंदोलन व जन दबाव के जातिगत जनगणना होना संभव नहीं है।’

हमने सोचा कि यह जाना जाय कि इस ज्वलंत मुद्दे पर हमारे देश का बुद्धिजीवी क्या सोच रहे हैं ? इसे जानने के लिए हमने उनको चार प्रश्न भेजे — जाति जनगणना को लेकर आपका क्या दृष्टिकोण है? क्या जाति जनगणना से सामाजिक दरार पैदा हो सकती है? जाति जनगणना क्यों आवश्यक है? और उससे देश के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?

और इसका बड़ा ही दिलचस्प नतीजा आया है। हमने किसी जाति विशेष के लोगों को नहीं, बल्कि समाज के हर हिस्से और जाति के लोगों को सवाल भेजे। पिछले कुछ वर्षों से उत्तर प्रदेश में यह नैरेटिव फैलाया गया है कि बाकी सभी पिछड़ी जातियों का हक-हिस्सा यादवों ने खा लिया है। इस हिसाब से तो यादवों को इस मुद्दे पर चुप्पी साध लेनी चाहिए थी लेकिन वे ही इस मुद्दे पर सबसे मुखर हैं। जहां और जातियों के लोग बगलें झांक रहे हैं वहीं यादवों ने इसकी जोरदार वकालत की है और यहाँ तक कहा है कि जातिगत जनगणना हो और यदि यादवों ने किसी का हक-हिस्सा खाया है तो वे खुशी से वापस कर देंगे अथवा उनसे जबरन छीन भी लिया जाय। यह लोगों और सरकार के सामने एक नैतिक चुनौती है। साथ ही अपील भी  कि वे इस मुहिम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।

लोगों की धारणाएं और प्रतिक्रिया

लेकिन अमूमन जाति जनगणना का मुद्दा सुनते ही ब्राह्मण जातियों के लोग भय और गुस्से से ऐसे कांप रहे हैं गोया उन्होंने पाँव के पास अजगर देख लिया हो। मसलन गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ संजीव दुबे ने तो इस मुद्दे को लगभग गैरजरूरी मानते हुये पूरी हिकारत से व्हाट्सएप्प किया कि ‘जाति तोड़ो-समाज जोड़ो के लिए संघर्ष कर रहे लोग अब जाति जनगणना की वकालत कर रहे हैं। यह तो हुई समाजवाद की यात्रा।’ इस छोटे से मैसेज के बाद डॉ दुबे ने एक दूसरा मैसेज भी भेजा – ‘आजादी के बाद से लगातार जनसंख्या वृद्धि को रोकने के प्रयास एक तरफ और जनसंख्या के आधार पर कथित अवसरों का बंटवारा दूसरी तरफ। जाति तोड़ने के आंदोलन चलाने वाले जातिगत जनगणना के पैरोकार हो गये हैं! समझ नहीं आ रहा कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? आज जाति से बड़ी सच्चाई आर्थिक स्थिति है। सदियों से अवसरों की ताक में सम्मानजनक नागरिक जीवन के अभिलाषी आरक्षित और अनारक्षित दोनों वर्गों में हैं। जनसंख्या के आधार पर अवसरों-संसाधनों को बांटने की मांग विभाजनकारी ही साबित होगी।’

वहीं एक शोधार्थी रेशमा त्रिपाठी ने इस मुद्दे को लेकर अपनी बात इस प्रकार रखी ‘जाति जनगणना को समाप्त करना चाहिए अथवा किसी विशेष नियमावली के तहत समाप्ति की घोषणा का प्रावधान करना चाहिए जैसे कि स्त्रियों का विवाह बाद सरनेम बदल जाना वैसे ही जातिगत समीकरण में बदलाव हेतु कोई कानूनी प्रावधान किया जाना चाहिए ।’ हां कारण हैं कि कुछ जाति के ठेकेदार विशेष रूप से इसका अपने निजी हित के लिए प्रयोग करते हैं क्योंकि वास्तविक आंकड़े के आधार पर ही सरकार में बिल पास कर संशोधन किया जा सकता है और साथ ही जरूरतमदों को  सहायता के लिए  आवश्यक हैं।’ सुश्री त्रिपाठी मानती हैं कि जाति जनगणना से देश का बुरा हो सकता है । उन्होंने लिखा ‘वर्तमान काबुल घटना एक ज्वलंत उदाहरण हैं  कुछ ऐसे ही परिणाम देखने को मिल सकते हैं।’

इसी तरह दिल्ली स्थित दंत चिकित्सक डॉ विवेक मिश्र, जो कि हिन्दी के जाने-माने कहानीकार हैं और दलित-पिछड़े पात्रों को लेकर कई कहानियाँ लिख चुके हैं, ने इस प्रश्न पर पर अपने खयालात का कुछ यूं इज़हार किया – ‘बिलकुल रामजी भाई। मैं लगातार इस बारे में सोच रहा हूं। आपके भेजे सवाल मेरे भी हैं। पर अभी इसके क्या व्यापक प्रभाव होंगे और यह फासिस्ट सरकार इसमें भी क्या चालाकी करके इसे ही समाज को बांटने का हथियार बना लेगी, या नहीं। यह समझ नहीं पा रहा हूं। इन्होंने हर वर्ग और जाति ने भी अपनी सेंध लगाई है। बिलकुल । लगतार सोच रहा हूं। बस इसका एहतियात कैसे रखा जाए कि इसे जातियों के बीच फूट डालकर, आम जन की इनके खिलाफ लगातार बढ़ती एकजुटता को खतरा पैदा न हो। ये इसे जातियों को आपस में लड़ाने का हथियार न बना दें। इस समय पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन के कारण वर्तमान सरकार के खिलाफ आम जन में बहुत आक्रोश है। हर वर्ग जाति के लोग समर्थन में जुट रहे हैं। इसका राज्य और केंद्र दोनों के चुनाव पर असर पड़ेगा।’

विज्ञापन की दुनिया की नामी हस्ती और सुप्रसिद्ध कवि मदन केशरी ने स्पष्ट रूप से कह दिया – ‘जाति जनगणना के विषय में मुझे विशेष जानकारी नहीं है। आधी-अधूरी समझ से अपने विचार रखना उचित नहीं होगा। मगर इस विषय पर और अधिक पढूंगा।’

जाति जनगणना के मुद्दे पर भ्रम अधिक है

उपरोक्त बातों से पता चलता है कि इस मुद्दे पर या तो लोगों ने कभी विचार नहीं किया अथवा इसे लेकर मन ही मन भयभीत हैं कि कुछ ऐसा गोपन है जो जाति जनगणना के बाद नंगी सच्चाई बनकर सामने आएगा जिसका सामना करना उनके बस की बात नहीं है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से ब्राह्मण जातियों के कई लेखकों और एंकरों ने जाति जनगणना के खिलाफ लिखना और बोलना तेज कर दिया है। वे इस बात को लेकर प्रतिबद्ध हैं कि जाति जनगणना सही नहीं है और इससे समाज टूटेगा। इस संदर्भ में एक साहित्यिक व्यक्ति रामप्रसाद राजभर के विचार कुछ यूं हैं-‘जातिगत जनगणना से जातिवाद और अधिक मजबूत होगा। आरक्षण के लिए मांग बढ़ेगी। आज दलित जातियों में भी जातिवाद बहुत गहरे तक अपनी जड़ें जमा चुका है। इससे उसे और मजबूती मिलेगी। जहाँ तक मेरा अनुमान है कि दरार और अधिक चौड़ी तथा गहरी होगी। जाति जनगणना आवश्यक तो नहीं है। शायद रिकॉर्ड के लिए यह आवश्यक हो या फिर क्षेत्रीय राजनीति के लिए। भविष्य में जातीय जनगणना से यह तय होगा कि हमारी संख्या इतनी है। हमारे अधिकार भी इतने होने चाहिए। आज क्षेत्रीय पार्टी इसी आधार पर शक्तिशाली हैं। समझौता और शोषण बढ़ेगा।’ इस प्रकार यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि केवल ब्राह्मण ही नहीं बल्कि सांघी विचारों और विजन के करीब किसी गैर ब्राह्मण की भी आवाज उतनी प्रतिगामी है।

इसके बावजूद अनेक लोगों ने इस विषय पर स्पष्टता से अपने विचार रखे और इसकी आवश्यकता पर बल दिया कि जाति जनगणना होनी चाहिए ताकि देश की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सके। जो विचार हमारे पास आए वे यहाँ यथावत रखे जा रहे हैं –

इससे आंख चुराने का मतलब डकैती को छिपाना है

सुभाष चन्द्र कुशवाहा , कथाकार-इतिहासकार , लखनऊ

ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता द्वारा संग्रहित गजेटियर आज भी भारत को समझने के मूल दस्तावेज हैं और शोधार्थियों के काम आते हैं। उन गजेटियरों के संग्रह में जनगणना का महत्वपूर्ण योगदान है जिनमें जातिगणना शामिल है। यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान से लैश औपनिवेशिक सत्ता द्वारा भारतीय भू-भाग पर कुछ जरूरी काम किए गए। भले ही उनका तत्कालीन उद्देश्य, अपनी सत्ता को मजबूत करना रहा। सत्ता को जनपक्षधर बनाने में जनगणनाएं सहायक रही हैं, यह दुनिया का प्रमाणित तथ्य है।  जातिगत आंकड़ों के अभाव में 1955 में काका कालेलकर रिपोर्ट को अस्पष्ट और अव्यवहारिक बताकर खारिज कर दिया गया।

जनता पार्टी सरकार ने 1979 में मंडल आयोग का गठन किया। जातिगत आंकड़ों के अभाव में मंडल आयोग ने 1931 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग किया और 1980 में रिपोर्ट दी।

जाति गणना के पीछे ठोस तर्क यह हैं कि सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि आरक्षण के बारे में कोई भी फैसला आंकड़ों के बिना संभव नहीं। राज्यों को ओबीसी विकास के लिए दिया जाने वाला पैसा, ओबीसी आंकड़ों के अभाव में उस राज्य की कुल जनसंख्या के आधार पर दिया जाता है। संभव है कुछ पिछड़ी जातियां अगड़ी जातियों में शामिल होने योग्य हो चुकी हों या कुछ नई जातिययों की स्थिति और खराब हो चुकी हो या कुछ सामान्य जातियां, पिछड़ी में शामिल हो चुकी हों। जातियों की गिनती न होने से हम यह पता नहीं कर पाते कि देश में विभिन्न जातियों के कितने लोग हैं और उनकी शैक्षणिक-आर्थिक स्थित कैसी है। उनके बीच संसाधनों का बंटवारा किस तरह का है और उनके लिए किस तरह की नीतियों की आवश्यकता है।

जो लोग जाति जनगणना के विरोध में झंडा बुलंद किए हैं, तर्क यह दे रहे कि इससे जातिवाद बढ़ेगा, यह मजाक के सिवा कुछ नहीं है। गोया समाज में पहले से जातिवाद हो ही न? या वे जातिवाद के विरोधी हैं? जिस समाज में जातिदंश के यथार्थ के कारण ही फुले और अम्बेडकर ने सामाजिक आंदोलन शुरू किया, जहां जाति के आधार पर हैसियत, सम्पत्ति, ज्ञान और शक्ति का निर्धारण हुआ, वहां आप जाति गणना से परहेज करें, यह समझ से परे लगता है।

जाति गणना का प्रश्न समाजिक सन्दर्भों के अध्ययन और सामाजिक उन्नयन के लिए नीतियों के निर्धारण, दोनों के लिए बहुत जरूरी है।

जातिदंश और जातिमुक्ति के लिए जरूरी है कि सभी जातियों को समानता का अधिकार मिले, संविधान की मूल आत्मा यही है। जातिगणना के बिना जाति असमानता का पता नहीं लगाया जा सकता। ऐसे में जाति समानता का प्रश्न अधूरा रह जायेगा।

देखा जाए तो जातिगणना के विरोधी, जाति असमानता के पक्षधर हैं। समदर्शी समाज के लिए अगर हम जातियों को खत्म कर पाए तो जातिगणना का प्रश्न स्वतः खत्म हो जायेगा। तब तक जातिगणना से, वंचितों का पता लगाया जा सकता है और उन्हें समाज के मुख्यधारा में लाकर, एक समतामूलक समाज बनाया जा सकता है। अगर लोकतंत्र को मजबूत करना है तो जाति गणना जरूरी है। जातिगणना भविष्य का लिटमस पेपर होगा जो बताएगा कि किसका हक मार गया है और किसने मारा है। इससे आंख चुराने का मतलब डकैती को छिपाना है। यह अन्यायपरक व्यवस्था की बुनियाद है।

सवाल तर्क का नहीं, जनहित का है

कर्मेन्दु शिशिर , सुप्रसिद्ध आलोचक , पटना

मैंने इस विषय पर उनको पढ़ा जो जाति जनगणना के पक्ष में बात करते हैं। उनको भी पढ़ा जो इसके विपक्ष में लिखते हैं। मौटे तौर पर सवर्ण इसके विपक्ष में हैं और गैरसवर्ण पक्ष में। इसलिए सवाल तर्क का नहीं जनहित का है। असल बात यह है कि आप इसका किस रूप में इस्तेमाल करते हैं। अब आरक्षण में यह व्यवस्था थी कि पचास प्रतिशत जेनरल रखा जाय। मसलन सवर्ण, पिछड़ा, दलित या मुस्लिम जो प्रतिभा से आये उनके लिए पचास प्रतिशत। अब यहाँ यह चतुराई बरती जाने लगी कि पचास प्रतिशत जेनरल में सवर्णों को भर दिया जाने लगा और बाकी पचास प्रतिशत आरक्षण में तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी। कहने का मतलब यह है कि यह नीयत और ईमानदारी से अमल में लाने पर निर्भर है। अल्पसंख्यक, कमजोर और गरीब जातियों की हालत अभी भी बहुत खराब है। कुछ ऐसी जातियाँ हैं जिनमें कोई न एम ए पास है और न किसी नौकरी में है। जाति जनगणना  का उपयोग सत्ता के लिए जातिगत गठबंधन के लिए इस्तेमाल हो, मैं तो कहूँगा यह भी एक हद तक उनके हित में होगा।वह आज न कल अपनी भागीदारी तो माँगेगा। लब्बोलुआब यह है कि हर हालत में नीयत और ईमानदारी से इसके इस्तेमाल पर यह निर्भर करता है कि यह ठीक है या ऐसे ही है।

यह भय कि इससे जातिवाद बढ़ेगा तो जातिवाद घटा ही कब है? मेरे मित्र प्रकाश चंद्रयान कहते हैं कि शिशिर जी, जातिवाद अमीबा और ऑक्टोपस है। यह शक्ल बदल लेगा। जायेगा नहीं। भूकंप आने पर भी अमीबा बचा रहेगा। कँवल भारती जी कहते हैं कि इसके खत्म करने का एक ही तरीका है कि खूब खूब अंतर्जातीय विवाह हों। मगर ऐसे विवाह में भी जाति पिता से जुड़ जाती है जबकि बच्चा पैदा माँ करती है। मगर उसकी जाति नहीं जुड़ती। जाति का सवाल अगर आक्रमणता और नफ़रत से सुलझाने की कोशिश हुई तो यह पूँजीवाद को बहुत सूट करेगा। समाज आपस में लड़ता है तो पूँजीपति आराम से लूटता है। इसलिए एक बेहतर समाज के लिए सैद्धांतिक आधार पर बिना कटुता के विचार और संस्कारों में बदलाव लाने के हर संभव उपाय हों तो यह बहुत ही अच्छा है! वरना नौकरियों में कटौती और आपस में निम्नस्तरीय मुँहचौथौवल तो चल ही रहा है। इतना अहंकार, आक्रामकता और अशिष्टता का प्रदर्शन हो रहा है कि ऐसे लोग यह मान बैठे हैं कि बदलाव ताकत से होगा। बहस-विमर्श में रत्ती भर असहमति अभद्रता पर और कुतर्को पर उतार लाती है। अगर इस तरीके से भी बदलाव आ जाय तो ठीक ही है। लाया जाना चाहिए। रही बात देश के भविष्य पर असर की तो जाति जनगणना से ऐसा असर पड़ जायेगा जो पहले से नहीं पड़ा हो !

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तहत परीक्षा परिणाम जाति आधारित होता था

सुजीत कुमार सिंह , प्राध्यापक , हमीरपुर

भारत जाति आधारित देश है। भारतीय समाज जाति के अनुसार ही अपने कर्मों में बँधा हुआ है। कठोर वर्ण व्यवस्था ने हाशिए के समाज को बहुत पीछे धकेल दिया है। औपनिवेशिक जनगणना से जहाँ सवर्ण समुदाय के लोग अपनी कमियों को लेकर जाग्रत हुए, वहीं पिछड़ों ने भी शिक्षा आदि पर ध्यान दिया। यह मालूम होना चाहिए कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय 1900 ई. के आसपास जब हाईस्कूल या इण्टरमीडिएट का परिणाम घोषित करता था तो यह परिणाम जाति आधारित होता था। परिणाम में ब्राह्मण शीर्ष पर होते थे। फिर भी वे शिक्षा को लेकर सचेत रहते थे। उन्हें लगता था कि हमें अपना स्कूल खोलना चाहिए। इसी तरह से 1909 के परिणाम में राजपूत जातियों का क्रम कुछ नीचे था। मुझे लगता है कि परीक्षा परिणाम देखकर ही सवर्ण लोग जागरूक हुए कि हमें अपना अपना स्कूल खोलना चाहिए।

यह जाति आधारित परीक्षा फल  का ही परिणाम था कि क्षत्रिय कालेज, राजपूत कालेज, मारवाड़ी स्कूल, अग्रवाल स्कूल जैसे शिक्षा संस्थान उपनिवेश में देखने को मिलते हैं। औपनिवेशिक युग में ही कुर्मियों व अहीरों ने भी अपने-अपने विद्यालय स्थापित किए। आर्य समाज ने दलितों के लिए स्कूल बनवाए। मुझे नहीं लगता कि जाति आधारित जनगणना से समाज में दरार पैदा होगा। बल्कि समाज तरक्क़ी ही करेगा, ऐसा मैं औपनिवेशिक जनगणना के आधार पर कह रहा हूँ। जाति आधारित जनगणना का सवर्णों ने सदैव ही विरोध किया है। यह सब नवजागरणकालीन पत्रिकाओं में आसानी से देख सकते हैं। 1931 से पहले 1921 की जनगणना में ही जातियों की एक सूची प्रकाशित की गयी थी जिससे हिन्दू संपादक बौखला गये थे। अछूतों की जनसंख्या पर वे विश्वास ही नहीं करते थे कि देश में इतनी भारी संख्या में अछूत हो सकते हैं। तो देश की तरक्की के लिए जाति आधारित जनगणना बहुत आवश्यक है।

 क्रमशः

4 Comments
  1. जाति जनगणना पर आदरणीय विद्वानों के जरूरी विचार। गाँव लोड पत्रिका के इस पहल को बहुत शुभकामनाएं

    1. मुसाफ़िर बैठा says

      बढ़िया। सुजीत कुमार सिंह के पक्ष में तो रोचक सूचनाएँ भी हैं। उनके पास अछूती सी जानकारियों तक पहुंचने के स्रोत हैं, रुचि है। उनके लिखे को मैं हमेशा संजीदा और इंफॉर्मेटिव पाता हूँ। विलक्षण प्रतिभा हैं वे।

  2. जाति जनगणना पर आदरणीय विद्वानों के जरूरी विचार। गाँव के लोग पत्रिका के इस पहल को बहुत शुभकामनाएं।

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