खौलते दूध से नहाने के बीच सवाल कि पुष्पक विमान बना लिए तो शौचालय क्यों नहीं बना सके

अपर्णा

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मुंबई से आए वक्ता और आंदोलनकारी शूद्र शिवशंकर सिंह यादव ने जब मुझसे सोनभद्र में होने वाले कार्यक्रम में चलने के लिए कहा तो मुझे कोई खास उत्कंठा न हुई। फिर तय यह हुआ कि मैं वहाँ बुक स्टॉल लगाऊँगी। हालांकि इधर बीच रिपोर्टिंग के लिए मुझे लगातार भाग-दौड़ करनी पड़ रही है। कभी नौगढ़, कभी भदोही कभी, आजमगढ़ और इस प्रक्रिया में बुरी तरह थक जाती हूँ लेकिन नई-नई जगहें देखने का ऐसा नशा है कि हाथ-पाँव की परवाह किए बगैर निकल पड़ती हूँ।

सोनभद्र बस से जाना था। हमारी सीट एकदम पिछले पहिये के ऊपर थी।

गड्ढा आए तो नीचे और पत्थर आए तो ऊपर और फिर धीरे से कह पड़ना अरे बाप रे! शूद्र जी बहत्तर में चल रहे हैं लेकिन उनका जुनून बाइस साल के युवकों जैसा है। जब तक मैं उन्हें नहीं जानती थी तब तक लगता था इनको नाम कमाने का शौक चर्राया है लेकिन जैसे-जैसे उनसे परिचय गहराता गया वैसे-वैसे यह जान पाई कि वे अलग ही तरह के इंसान हैं। देश में उनको कहीं भी बुलाया जाय वे चले जाएँगे और मजाल क्या कि आयोजक को अपना टिकट भी कराने का मौका दें। अपने पेंशन से अपना खर्च चलाते हैं। हमेशा स्लीपर में आते-जाते हैं और स्वाभिमान से इसे कहते भी हैं। उन्हें अलग से कमरे की व्यवस्था न भी की जाय तो किसी बैठक में ही सो लेंगे और खाने के मामले में तो शायद ही उनका कोई नखरा हो। जो भी मिला चाव से खाया, पानी पिया चल दिये। लेकिन वे अपनी बात कहना और उस पर अड़ना जानते हैं। उनमें यह जुनून देखकर मैं कई बार कहती हूँ कि अब अपनी उम्र और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखिए तो वे हंस पड़ेंगे और कहेंगे – उम्र है तो बीतेगी ही और शरीर तो खत्म ही होगा लेकिन जो काम कर रहा हूँ उसे क्यों रोकूँ।

बड़े-बड़े वक्ता आयोजकों के पैसे से उड़ते हैं और होटलों में ठहरते हैं लेकिन शूद्र जी ऐसा कोई शौक नहीं पालते। आज भी जब बस बीच-बीच में उछाल मारती तो हम असहज हो रहे थे लेकिन शूद्र जी आराम से नींद ले रहे थे। ढाई बजे हम चोपन बस अड्डे पर उतरे। अब हमको पीडब्लूडी रेस्ट हाउस में अपना समान रखना था। इसकी व्यवस्था इंजीनियर मनीष यादव ने की थी। हमारे पास कैमरे का एक ही एसडी कार्ड था। और जाने से एक दिन पहले ही लॉक टूटने से एक खराब हो गया। मनीष ने फोन किया तो रामजी ने उनसे पूछा कि राबर्ट्सगंज में एसडी कार्ड मिल सकता है। हम यह उम्मीद बिलकुल भी नहीं कर रहे थे और मनीष उस समय बनारस में थे लेकिन जब हम राबर्ट्सगंज पहुंचे तो एक आदमी एसडी कार्ड लेकर इंतज़ार करता मिला।

हमें लेने के लिए एडवोकेट श्याम बिहारी यादव के रिश्तेदार ज्ञान प्रकाश और उनके एक साथी आए थे। चोपन से आठ किलोमीटर पश्चिम मंजरी धाम है जहां श्याम बिहारी ने कार्यक्रम रखा था। शूद्र जी वहीं प्रमुख वक्ता थे। ज्ञान प्रकाश ने जब माता मंजरी कहा तो रामजी बोले- अरे भाई यहाँ तो मंजरी का मायका था तो वह आपकी माता कैसे हुईं? वह तो आपकी फुआ हुईं और लोरिक आपलोगों के फूफा हुये। पहले तो किसी ने समझा नहीं लेकिन जैसे ही समझ आया कार ठहाके से भर गई।

अनेक जगहों से आये बिरहिये अपने कार्यक्रम का इंतज़ार करते हुए

सोन नदी के किनारे का यह इलाका खनन माफियाओं की खुली लूट से विदीर्ण हो रहा है। नदी के पाट में भीमकाय जेसीबी बालू खोद रहे हैं और कतार से खड़े ट्रकों में लाद रहे हैं। यहाँ लाल बालू यानि मोरङ मिलता है। यह सफ़ेद बालू की तुलना में महंगा होता है। शायद इसी बालू के कारण सोन का पानी सुनहरा दिखता है। सोन की यह विशेषता ही उसके लिए अभिशाप बन गई है। पर्यावरण के नुकसान का कोई अंत नहीं है। सत्ता के दुलरुआ खनन माफिया सोनभद्र के चप्पे-चप्पे को चबा जाना चाहते हैं।

एक पहाड़ी पर मंजरी धाम है। पाँच-छः बिस्वे की बाउंड्री में बीच में मंजरी का मंदिर और उससे सटा एक बरामदा और सामने छोटा सा मैदान। बाउंड्री में एकमात्र नीम का पेड़ और इकलौता हैंडपंप जो शायद कई वर्षों से पानी नहीं देता और शोभा की वस्तु बना हुआ है। पूरा माहौल लोगों से गुलजार था।

खौलते दूध से नहाने की तैयारी में भगत (जिसे कड़ाह कहा जाता है) (फोटो – ज्ञानप्रकाश)

बरामदे के बाहर एक कुर्सी पर नेताजी मुलायम सिंह यादव की तस्वीर रखी गई है जिस पर आनेवाले लोग पुष्पांजलि और श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे। हमारे पहुँचने तक गोवर्द्धन पूजा और कड़ाह खत्म हो चुका था और राजनीति से जुड़े लोगों का भाषण चल रहा था। बातें घिसी-पिटी थीं। ज़्यादातर लोग मुलायम सिंह यादव के प्रति आदर व्यक्त करते हुये उनके बारे में वे ही बातें दुहरा रहे थे जो बरसों से दुहराई जा रही हैं। कुछ लोग तो उन्हें कृष्ण के बाद सबसे महान व्यक्ति साबित कर रहे थे। कुछ लोग दहाड़ रहे थे तो कुछ वैचारिक रूप से पछाड़ खा रहे थे। लेकिन सबसे ज्यादा मज़ा तब आ रहा था जब कोई बिरहिया श्रद्धांजलि का बिरहा गाता था। वह अपनी आवाज में ऐसा दर्द पैदा करता था कि हँसी के मारे पेट फूल जाता था।

लेकिन वास्तव में यह कार्यक्रम हम जैसे लोगों के लिए नहीं था। हम सोचते हैं कि श्रद्धांजलि ज़रा तमीज़ से दी जाय और किसी व्यक्ति के ऐतिहासिक योगदान को सही परिप्रेक्ष्य में और गंभीरता से याद किया जाय। लेकिन यह जगह संबंध-प्रदर्शन की थी। मसलन कोई पुलिस अधिकारी आए तो सभी युवक कुर्सियाँ और पानी का जग लेकर उनकी तरफ दौड़ पड़े और डिमांड न होने पर भी सप्लाई की प्रतीक्षा करते रहे जबकि दो-तीन लोग पानी के लिए गुहार करते रहे।

कड़ाह देते भगत का चमत्कार देखने बैठे उत्सुक दर्शक (फोटो – ज्ञानप्रकाश)

इन सबके बीच लोग भोजन कर रहे थे और जमकर खीर पी रहे थे। आज यहाँ चार सौ लीटर दूध की खपत हुई थी जिसमें दोपहर में कड़ाह देते भगत जी तीन घड़ों में उबलते दूध से नहाये। बाकी का खीर बना।

दूध से नहाना एक ऐसा रहस्य है जो आजतक खुला नहीं। शायद यहाँ नरेंद्र दाभोलकर जैसा कोई आदमी नहीं पैदा होगा। हालांकि कुछ लोग दावे से कहते हैं कि भगत लोग कोई केमिकल लोचा करते हैं। कुछ लोग इसे हठयोग का परिणाम मानते हैं। भगत लोग बहुत से चमत्कार करते हैं जिनमें आग पर चलना, खौलते तेल से पूड़ी निकालना और खौलती हुई खीर से नहाना आदि है। इन्हीं चमत्कारों के आगे लोगों का दिमाग लुल्ल हो जाता है। सारा विज्ञान एक तरफ दूध की ताई एक तरफ। आज के आयोजक श्याम बिहारी यादव ने आज कड़ाह देनेवाले भगत की तारीफ करते हुये बताया कि ‘सपा एमएलसी लाल बिहारी यादव आए थे। उन्होंने खीर से भगत के नहाने पर शंका ज़ाहिर की और कहा कि मेरे आने से पहले भगत ने जो खीर-स्नान किया वह ठंडी रही होगी। अब अगर वे सच्चे भगत हैं तो गर्म खीर से नहाएँ। भगत ने चुनौती स्वीकार की और आग पर लोटने लगे। थोड़ी देर में उन्होंने खौलती हुई खीर अपने ऊपर डाल ली।’ श्याम बिहारी जी कहते हैं कि ‘लाल बिहारी जी भी चमत्कार खा गए। अलबत्ता वे विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं।’वि

 कड़ाह देते भगत जी तीन घड़ों में उबलते दूध से नहाते हुए..(देखिये, वीडियो- ज्ञानप्रकाश))

 

कहानीकार रामजी यादव कहते हैं कि ‘सारे भगत ढोंगी होते हैं और भोले-भाले लोगों के मन में अंधविश्वास भरकर उसके बदले में पैसा कमाते हैं। मैंने बचपन से देखा है कि वे अपने को दुर्गा का भक्त कहते हैं लेकिन स्त्री-विरोधी कर्म करते हैं। कड़ाह देते वक्त औरतों को गालियाँ देते हैं और कभी-कभी उनके ऊपर लाठी भी चला देते हैं।’

वह एक घटना बताते हैं ‘बचपन में मैंने देखा कि एक स्त्री ने कड़ाह देते हुये भगत के सामने प्रार्थना की कि हे माई मुझे बच्चा दो। घर के लोग मुझे बहुत सताते हैं। इसके बाद उस भगत ने उस औरत को कई लाठी मारी। वह बेहोश हो गई लेकिन किसी ने विरोध नहीं किया। कुछ महीने बाद उस औरत की लाश वरुणा में तैरती मिली।’

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वह कहते हैं कि ‘अब तो कड़ाह में एक तरफ भगत उछलता-कूदता है तो दूसरी ओर ब्राह्मण हवन करता है। यादव चाहे खुद कभी घी न खा पाये लेकिन हवन के नाम पर पसेरियों घी जला देता है। असल में यही सब इस समाज की बेड़ियाँ हैं जिनसे जकड़ा यह समाज लगातार पीछे जा रहा है। आज कुछ यादव प्रॉपर्टी, खनन, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल आदि के धंधे में काफी पैसा बना लिए हैं लेकिन समाज में वे ऐसी ही धार्मिक गुलामी बढ़ाने के लिए भारी चंदा देते हैं। उनके प्रतिगामी और मंदबुद्धि होने का यथार्थ तो इतना वीभत्स है कि जिस रामचरित मानस में उन्हें गालियाँ दी गई हैं उसी का पाठ कराते हैं। वे गरीब और मेहनतकश यादवों का अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने हेतु लगातार ऐसे कार्यक्रम कराते हैं जिनसे अंधविश्वास और गुलामी को बढ़ावा मिले। चाहे वह धार्मिक गुलामी हो चाहे राजनीतिक हो।’

सपा के एमएलसी लाल बहादुर यादव को स्मृति चिन्ह प्रदान करते हुए श्याम बिहारी यादव (फोटो – ज्ञानप्रकाश)

कई बार मैं सोचती हूँ कि आखिर इस तरह के जन जुटानों का क्या उद्देश्य है? जो जनता है उसे क्या मिल रहा है? क्या कहीं उसके सांस्कृतिक जगत को उद्वेलित करने और उसके मन-मिजाज को रचनात्मक बनाने की कोई कोशिश हो रही है? या फिर ये लोग सिर्फ खीर पीने और मनोरंजन करने आए हैं? खासतौर से इन दिनों जब लोगों को बदलती आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों के कारण एक अंधेरा भविष्य दिख रहा है। जब संविधान खतरे में है। युवाओं की नौकरियाँ ही नहीं सामान्य आदमी का रोजगार भी खत्म किया जा रहा है।

लेकिन आयोजक श्याम बिहारी यादव कहते हैं ‘यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन है जो लोगों को एकजुट करता है। उनमें प्रेम और भाईचारे की भावना भरता है। लोग यहाँ साल में एक दिन आते हैं खाते-पीते हैं। बिरहा सुनते हैं। आप देखिएगा यह बिरहा रात भर चलेगा। ठंड शुरू हो गई है। ओस भी गिरने लगी है लेकिन लोग रात भर बैठे रहेंगे।’

बिरहा सुनते लोग

शूद्र शिवशंकर सिंह ने भी पहले बताया था कि ‘लोग रात भर बिरहा सुनते हैं। नाचते हैं और बिरहियों पर खूब पैसा लुटाते हैं। बिरहिए भी मौके का फायदा उठाना जानते हैं। वे लोगों की भावनाएं ही नहीं जेब भी खाली कर लेना चाहते हैं।’

श्याम बिहारी यादव इस आयोजन के केंद्रीय व्यक्ति हैं और जिस तरीके से कई विधायक और मंत्री यहाँ आए हैं उससे उनकी अच्छी सर्किल का पता चलता है। वे बहुत मिलनसार और हँसोड़ व्यक्ति हैं। एक-एक आदमी के योगदान को याद रखते हैं। मसलन जिन यादव-बंधुओं ने आज के आयोजन में खीर के लिए दूध पहुंचाया उनको मंच पर बुलाकर सम्मानित किया। सबका परिचय दिया।

श्याम बिहारी जी सोनभद्र में समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष रहे हैं। वे फिलहाल उत्तर प्रदेश ग्राम प्रधान संघ के अध्यक्ष हैं। वे जिला पंचायत सदस्य और बीडीसी भी रह चुके हैं। अध्यक्ष जी के सम्बोधन से बुलाये जाने वाले श्याम बिहारी जी जमीनी स्तर के नेता हैं। उन्हें हजारों लोग निजी रूप से जानते और मानते हैं। एक अधिवक्ता के रूप में वे गरीबों का मुकदमा निःशुल्क लड़ते हैं और जरूरत पड़ने पर उनको आर्थिक मदद भी करते हैं। अस्सी के दशक में वे मान्यवर कांशीराम के बामसेफ से जुड़ गए और समाज के लिए कुछ करने में लगातार लगे रहे।

श्याम बिहारी यादव, गोवर्धन पूजा के मुख्य आयोजकों में से एक

ज्ञान प्रकाश बताते हैं कि ‘अध्यक्ष जी ने तीस-पैंतीस साल पहले कार्तिक पूर्णिमा के दिन गोवर्द्धन पूजा और बिरहे का आयोजन शुरू कराया। पहले यह मारकुंडी पहाड़ पर स्थित वीर लोरिक पत्थर के पास होती थी जहां दस-बारह हज़ार लोगों का जुटना साधारण बात थी लेकिन उनकी लोकप्रियता से चिढ़नेवाले कुछ लोगों ने साजिश करना शुरू कर दिया। इसके बाद अध्यक्ष जी ने माता मँजरी की इस बखरी को चुना और इसका जीर्णोद्धार कराया।’

मारकुंडी पहाड़ पर स्थित वीर लोरिक की पत्थर की बनी मूर्ति

 

श्याम बिहारी जी ने बताया कि ‘यह जगह इतनी उपेक्षित पड़ी हुई थी कि लोग इसे जोतने-बोने लगे थे। जब मुझे पता लगा तो यहाँ खुदाई करवाने पर एक टीला मिला। फिर शासन और लोगों के सहयोग से इस पूरी जगह का पुनरुद्धार हुआ।’

लोरिक और मँजरी बारहवीं शताब्दी से ताल्लुक रखते हैं। इनकी गाथा लोरिकायन में लिपिबद्ध है जिसे लोकगायक रात-रात भर गाते रहे हैं लेकिन अब उस कला का अवसान हो गया है। लोकगाथा में मँजरी एक उज्ज्वल चरित्र की स्त्री हैं। अपरूप सुंदरी होने के साथ उनमें किसान जीवन की कर्मठता थी। अपने पति लोरिक के दूसरे विवाह के बाद उन्होंने खेती करके और गोबर पाथकर अपने बेटे का पालन-पोषण किया लेकिन कहीं झुकी नहीं। यहाँ तक कि उन्होंने अपना दुख लोरिक से भी नहीं कहा।

यादवों के बीच उनका बहुत आदर है। इस जगह पर, जिसे माता मँजरी की बखरी कहा जाता है, चारदीवारी के बीचोबीच जो मंदिर बनाया गया है उसकी एकमात्र अधिष्ठात्री माता मँजरी ही हैं। किसी भी देवी-देवता को उनके पासंग में भी जगह नहीं मिली है। शाम की लालिमा में यहाँ से अगोरी का किला साफ-साफ दिख रहा है। इस परिसर के निर्माण से जुड़े सभी लोगों के नाम शिलापट्ट पर लिखे गए हैं।

श्यामबिहारी यादव, रामजी यादव और शुद्र शिवशंकर सिंह यादव

इस स्थानीय आयोजन में, जहां पूर्वान्ह में हवन और पूजा हुई है, शूद्र शिवशंकर सिंह यादव का बुलाया जाना एक अचरज पैदा कर रहा है क्योंकि वे तो हवन, पूजा के विरोध में बोलते हैं। वे कृष्ण को भगवान नहीं नायक मानते हैं। जबकि यादवों में कृष्ण भक्ति का आलम यह है कि मथुरा के उद्धार के नाम पर भाजपा उनका सर्वस्व ले ले लेकिन उन्हें कोई गम नहीं। कार्यक्रम में आनेवाले अतिथियों के नामोल्लेख का जो फ़्लेक्स बैनर है उसमें शूद्र जी का नाम प्रमुखता से लिखा गया है।

श्याम बिहारी यादव कहते हैं कि ‘आने वाला समय तो वही है जो सर कह रहे हैं। इनकी बातें समाज में अधिक से अधिक जानी चाहिए। लेकिन अगर केवल इनके नाम पर बुलाऊँगा तो एक आदमी नहीं आएगा। इसलिए मुझे लगता है कि इनको इस कार्यक्रम में आना चाहिए लेकिन कार्यक्रम भी होता रहे इसलिए लोगों का आना भी बहुत जरूरी है। आपको यह विडम्बना लग सकती है लेकिन यही सच है।’

और जब शूद्र जी बोलने के लिए मंच पर आए तो उन्होंने तुरंत ही अपनी रौ पकड़ी। वे वही बोले जिनके लिए वे जाने जाते हैं। उन्होंने गोवर्धन पूजा की आलोचना की। वेदों की धज्जियाँ उड़ाई और सवाल खड़े किए। लोगों से तार्किक होने की अपील की।

मजे कि बात तो यह है कि बिरहा सुनते समय कतिपय हुड़दंग के मूड में दिखनेवाले लोग बड़े मनोयोग से शूद्र जी को सुन रहे थे। यहाँ तक कि एक युवा ने उठाकर उन्हें प्रणाम किया और जेब से सौ रुपए निकाल कर उनकी ओर बढ़ाया।

लीजिये सुनिए शूद्र शिवशंकर सिंह यादव का वह यादगार वक्तव्य मनुवादी गतिविधियों के बीच ब्राह्मणवाद से आज़ादी की बात —

अपर्णा गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं। 

2 Comments
  1. Gopal Singh Gautam says

    शूद्र शिवशंकर यादव गुरु जी की बहुत ही अच्छी स्पीच सुनकर के आनंद आया एक ऐसे कार्यक्रम में जहां इस तरह की बात सोच भी नहीं सकते वहां उन्होंने सबके सामने बोला स्पीच दी सर का बहुत-बहुत साधुवाद जय भीम नमो बुद्धाय

  2. Mukesh singh says

    भाईसाहब शुद्र शिवशंकर यादव जी को जय भीम नमो बुद्धाय।
    आपके जोश जज्बे को 72 वर्ष की आयु में सलाम है। आने बहुत तरीके से गांव के लोगो को तर्क करने के लिए प्रेरित किया। समझाया। बहुत अच्छे उदाहरण देकर समझाया। भाषण के अंत मे एक आवाज बार बार आ रही थी हर हर महादेव। इसका क्या तात्पर्य है? क्या वो आदमी आपका विरोध कर रहा था? या आपको ही महादेव बता रहा था ? क्योंकि आपका नाम भी शिवशंकर है।अगर आप हिन्दुओ के देवताओ उनके मंन्दिरों को नही मानते तो आपको जल्दी ही सबसे पहले अपना नाम परिवर्तन करना चाहिए। कोई भी नाम रखना उसमे किसी देवी देवता की झलक नही आई चाहिये। ये मेरा सुझाव है । नाम बदलने के बाद आपकी बातों का प्रभाव और ज्यादा होगा।

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