पांच सेर गेहुंआ पे काहे लुभाइ गयो

जुल्मीराम यादव

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पांच सेर गेहुंआ पे काहे लुभाइ गयो
        सात पीढ़ी होइहैं गुलाम हो सजनवां।
हमरी फसलिया चरावइ गोरू गइया से
                  हमके भिखरिया बनावइ बेइमनवां।
रोजी रोजिगार छीनइ जिनगी अधार छीनइ
                 अखियां के छीनइ उजियार बेइमनवां।
जूड़ भयो चूल्हवा अंतड़िया भभकि रही
                 छिनलेस करहिया के तेल बेइमनवां।
पांच सेर गेहुँआ मे आग लागै जरि जाइ
                लूटि लिहे जाइ बैरी हमरा सपनवांं।
पांच सेर गेहुंआ मछरिया के चरवा हौ
              कटिया लगाए अहै बैरी मछुवरवा।
मीठी मीठी बोलिया बहेलिया के लासा पिया
             उड़ि उड़ि फंसि फंसि जाए रे सुगनवां।
हमरेन जगरवां से मुंहवां के लाली तोरे
             हमहिन के करइ बदहाल दुसमनवां।
भीखिया न चाही हमइ चाही अधिकरवा हो,
             चाही आपन धरती अउ चाही रे गगनवां।

जुल्मीराम यादव कवि और लेखक हैं।

 

1 Comment
  1. Gulabchand Yadav says

    बहुत बढ़िया अवधी गीत। बिलकुल यथार्थ वर्णन। बधाई।

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