औरतों का औरतपन (डायरी 18 जून, 2022)

नवल किशोर कुमार

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 खाना बनाना अब मेरी दिनचर्या में लगभग शामिल हो चुका है। इसने मेरे जीवन में अनेक बदलाव किये हैं। एक तो यह कि मेरे अंदर के इस भ्रांति का खात्मा हो गया है कि बर्तन मांजना और खाना बनाना दोयम दर्जे का काम है। और यह भी कि यह केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है। पुरुष का काम केवल पैसे कमाना है। खाना बनाने में अधिक समय भी नहीं लगता है। अधिक से अधिक एक घंटा और बाजदफा तो आधे घंटे में ही अपने लिए दाल-भात-तरकारी जैसा कुछ बना लेता हूं। इससे एक और समझ मेरे अंदर विकसित हुई है कि भारतीय घरों का अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र क्या है।
पहले जब बच्चा था तब कभी यह बात जेहन में ही नहीं आती थी कि रोटी के लिए गेहूं कहां से आएगा, भात के लिए चावल और तेल-नमक-मसाले कहां से आएंगे। अपना काम तो बस खाना था। जब बड़ा हो गया तब भी यही स्थिति बनी रही। मेरा काम तो बस पढ़ना और कमाना था। सारी जिम्मेदारियां घर के अन्य परिजनों ने ले रखी थीं। बाद में तो मेरी पत्नी ने इन जिम्मेदारियों को आजतक बखूबी संभाला है।
अब दिल्ली में रहकर मैं इन जिम्मेदारियों को महसूस करता हूं। राशन कितना खर्च होता होगा, अन्य वस्तुओं के लिए कितना खर्च होता होगा, फिर सभी कुछ खरीदने के लिए मशक्कत करनी पड़ती ही होगी। मैं यहां यह सब खुद करता हूं। इसके भी फायदे हैं। मसलन, जब मैं सब्जियां खरीदने बगल की गली में जाता हूं तो पाता हूं कि अब भी 98 फीसदी महिलाएं खरीदारी कर रही होती हैं। कुछ महिलाओं को देखकर तो ऐसा लगता है जैसे कि वह सीधे अपने दफ्तर से आ रही हों और घर पहुंचने से पहले अपनी इस जिम्मेवारी को पूरा कर लेना चाहती हैं। कामकाजी महिलाओं के उपर यह दोहरी जिम्मेदारी होती है।

कल एक दुकान पर खड़ा था। दो-तीन महिलाएं भी थीं। वह मोल-भाव कर रही थीं। इस कारण मुझे देरी हो रही थी। फिर जब महिलाओं को सामान देने के बाद दुकानदार मुझसे मुखातिब हुआ तो उसने हंसते हुए कहा– सब महिलाएं ऐसी ही होती हैं, झूठ-मूठ का ड्रामा करती हैं। मैंने कहा कि यह तो बिल्कुल गलत बात है। आप समझदार व्यक्ति हैं। महिलाओं के बारे में आपको ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। फिर उसे संभवत: मेरी बात समझ में आ गई, तो झेंपते हुए कहा– सॉरी।

 

ऐसे ही कुछ और अहसास भी होते हैं जब मैं राशन की दुकान पर जाता हूं। अक्सर महिलाएं राशन खरीदते वक्त जिस हिसाब से मोल-भाव करती हैं, वह बेहद खास होता है। जबकि मैं मोल-भाव नहीं करता। यह शायद इसलिए कि मेरे अंदर पुरुष होने का अहंकार है या फिर यह कि मैं इसकी जरूरत नहीं समझता।
लेकिन महिलाएं समझती हैं। वह यह बात अच्छे से जानती हैं कि चावल की वाजिब कीमत कितनी होनी चाहिए। सब्जी का वाजिब मूल्य क्या है। कई बार कुछ दुकानदार अपनी दुकान पर ‘फिक्स्ड रेट’ का साइन बोर्ड लगाकर रखते हैं। मैंने ऐसी दुकानों पर भी महिलाओं को मोल-भाव करते देखा है।
खैर, कल एक दुकान पर खड़ा था। दो-तीन महिलाएं भी थीं। वह मोल-भाव कर रही थीं। इस कारण मुझे देरी हो रही थी। फिर जब महिलाओं को सामान देने के बाद दुकानदार मुझसे मुखातिब हुआ तो उसने हंसते हुए कहा– सब महिलाएं ऐसी ही होती हैं, झूठ-मूठ का ड्रामा करती हैं। मैंने कहा कि यह तो बिल्कुल गलत बात है। आप समझदार व्यक्ति हैं। महिलाओं के बारे में आपको ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। फिर उसे संभवत: मेरी बात समझ में आ गई, तो झेंपते हुए कहा– सॉरी।
मैं यह सोच रहा हूं कि उस दुकानदार ने उपरोक्त टिप्पणी क्यों की? इसके पीछे का समाजशास्त्र क्या है? आखिर महिलाएं इतना मोल-भाव करती ही क्यों हैं? कुछ तो है इसके पीछे?
मुझे लगता है कि इसकी एक वजह यह कि सामान्य तौर पर वे महिलाएं जो घरों में रहती हैं और एक साथ अनेक जिम्मेदारियों का निर्वहन करती हैं, वे मोल-भाव का उपयोग बाहरी दुनिया से संवाद करने के लिए करती हैं। हर संवाद के अपने कारण होते हैं और वे बे-मकसद नहीं होते। मैं तो अपने गांव के बाजार की बात करता हूं। वहां सप्ताह में दो दिन बाजार लगता है। पटना में रहने पर कभी-कभार बाजार जाने का मौका मिलता है तो अपनी पत्नी का सहयोगी बन जाता हूं। हाथ में झोला लेकर निकल पड़ता हूं उसके साथ। अब चूंकि मेरा गांव अब भी गांव है तो संस्कृति भी वही है। हालांकि मैंने यह महसूस किया है कि जब मैं अपनी पत्नी के साथ निकलता हूं तो वह एक गर्व के साथ चलती है और रास्ते में कुछ भौजाइयां मुझे टोकती भी हैं। उनके टोकने से मेरी पत्नी के चेहरे पर एक अलग तरह की मुस्कुराहट होती है। फिर बाजार में अधिकांश दुकानदार पुराने ही हैं। हालांकि हर बार मैं कुछ नये चेहरों को अवश्य देखता हूं, लेकिन मेरी पत्नी को वे सब जानते हैं। ऐसे ही एक दुकानदार हैं जो सब्जियां बेचते हैं। उनके इस काम में उनका सहयोग उनकी पत्नी करती हैं। हमारे बीच शायद देवर-भौजाई का रिश्ता है। या हो सकता है कि मैं उनका भतीजा लगता होऊं।
तो अपने गांव के बाजार में मैं यह महसूस करता हूं कि वहां लाेग संवाद करते हैं। खबरें साझा करते हैं। महिलाएं दुख-सुख भी बांटती हैं।
निस्संदेह महिलाओं के संवाद में बहुत कुछ खास होता है। उनके औरतपन को समझने के लिए बस अपने अंदर के मर्द होने के अहंकार को खत्म करना आवश्यक है।

मुझे लगता है कि इसकी एक वजह यह कि सामान्य तौर पर वे महिलाएं जो घरों में रहती हैं और एक साथ अनेक जिम्मेदारियों का निर्वहन करती हैं, वे मोल-भाव का उपयोग बाहरी दुनिया से संवाद करने के लिए करती हैं। हर संवाद के अपने कारण होते हैं और वे बे-मकसद नहीं होते।

 

बहरहाल, कल से दिल्ली में रुक-रुककर बारिश हो रही है। कल दफ्तर से निकला तो खुद को थोड़ा सा भीगने दिया। वैसे भी कल एक और दुखद खबर मिली थी। मेरे गांव के नंदू चाचा का कल निधन हो गया। वे हमारे गोतिया में थे। उनसे नाता भैंस की चरवाही के दिनों से था। वे कमाल के उद्यमी किसान और मवेशीपालक थे। एक समय मेरे घर की भैंसें और उनके घर की भैंसों के बीच इस बात की प्रतिस्पर्धा रहती थी कि कौन अधिक दूध देती हैं। अब भी वे दूध का छोटा सा ही सही, लेकिन कारोबार करते थे।
बारिश की बूंदों ने मेरे दुख को बहाने की कोशिशें की। फिर प्रेमिका ने शब्द दिया– पन्ने। मेट्रो में मेरी उंगलियां मोबाइल पर टाइप कर रही थीं–
अहा!
बरसात और सफेद पन्ने
दोनों मौजूद हैं मेरे पास
और है एक भीगा हुआ खाब
जिसे चूम लिया है तुमने।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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