नीतीश कुमार ने फिर की आठ पिछड़ों की ‘हत्या’ (डायरी 16 जनवरी, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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आह‍‍! फिर आठ लोग मारे गए। जो मारे गए, वे पिछड़े समाज के थे। महत्वपूर्ण बात यह कि ऐसी घटनाओं में मरनेवाले सवर्ण नहीं होते। मेरे पास जो अपने संसाधनों से जुटाए गए आंकड़े हैं, उसके हिसाब से बिहार में तथाकथित शराबबंदी के बाद अब तक 4,829 लोगों की मौत हुई है। इनमें आठ की संख्या को मैंने आज जोड़ा है। इतने लोगों में कोई एक सवर्ण भी था, ऐसी जानकारी मेरे पास नहीं है। ऐसा क्यों है कि जहरीली शराब से मरनेवाले केवल दलित और पिछड़े वर्ग के ही लोग होते हैं? इस सवाल पर विचार करने से पहले 14 जनवरी, 2022 को बिहार के नालंदा जिले के बिहारशरीफ शहर के छोटी पहाड़ी और मंसूरनगर इलाके में हुई घटना की बात करते हैं। इस घटना में आठ लोगों के मारे जाने की बात सरकारी तंत्र ने स्वीकार किया है। हालांकि डीएम शशांक शुभंकर ने एक बार जहरीली शराब को वजह मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि लोगों की मौत की वजह हार्ट अटैक व ठंड है।

दरअसल, बिहार में शराबबंदी पूरी तरह विफल है और मुझे लगता है कि नीतीश कुमार को अब यह सच कबूल कर लेनी चाहिए। उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए कि शराबबंदी कठोर कानून से मुमकिन नहीं है। कानूनों के कठोर होने को लेकर अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को फटकार भी लगायी। अब सवाल यह है कि इन कानूनों का जमीन पर असर क्या हुआ है, जिसका प्रमाण नालंदा जो कि नीतीश कुमार का अपना गृह जिला है, में हुई आठ लोगों की हत्या है।

मैं ‘हत्या’ शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि यह वाकई में एक हत्या ही है और कायदे से इस अपराध के लिए नीतीश कुमार और उनके पूरे तंत्र को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। दरअसल, कोई भी कठोर कानून तभी सफल हो सकता है जब उसे लागू करानेवाला तंत्र ईमानदार हो। बहुत अधिक दिन नहीं हुए जब बिहार विधानसभा के परिसर में शराब की बोतलें मिलीं। जब यह खबर आई थी तब विधानसभा का शीतकालीन सत्र चल रहा था। नीतीश कुमार ने आपा खोते हुए इसे साजिश कहा था और यह भी कि किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। मेरे संज्ञान में यह खबर अभी तक नहीं आयी है कि विधानसभा परिसर में शराब की बोतलें कैसे पहुंचीं और इसके लिए जो जांच समिति का गठन किया गया था, उसकी रपट क्या है। संभव है कि रपट अभी तैयार नहीं हुई हो, लेकिन किसी न किसी की गिरफ्तारी तो हाेनी ही चाहिए थी।

बिहार में शराबबंदी पूरी तरह विफल है और मुझे लगता है कि नीतीश कुमार को अब यह सच कबूल कर लेनी चाहिए। उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए कि शराबबंदी कठोर कानून से मुमकिन नहीं है। कानूनों के कठोर होने को लेकर अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को फटकार भी लगायी। अब सवाल यह है कि इन कानूनों का जमीन पर असर क्या हुआ है, जिसका प्रमाण नालंदा जो कि नीतीश कुमार का अपना गृह जिला है, में हुई आठ लोगों की हत्या है।

खैर, कल देर रात पटना के एक पत्रकार रूपेश कुमार सिंह का फेसबुक लाइव देख रहा था। वे बिहारशरीफ के छोटी पहाड़ी मुहल्ले में थे। वहीं जहां 14 जनवरी, 2022 को आठ पिछड़ों की ‘हत्या’ कर दी गई। वे दिखा रहे थे कि कैसे उस इलाके के एक घर के बगल में जहां कचरा पड़ा था, वहां अंग्रेजी शराब और झारखंड सरकार के देसी शराब के रैपर थे। वे सवाल पूछ रहे थे कि अगर डीएम और एसपी यह कह रहे हैं कि लोगों की मौत जहरीली शराब के कारण नहीं हुई तो छापेमारी क्यों की जा रही है और ये सब (शराब की बोतलें आदि) हैं, क्यों हैं और कैसे हैं?

रूपेश इलेक्ट्रानिक मीडिया के अच्छे पत्रकार हैं। उन्हें सवाल पूछते देख अच्छा लगता है। लेकिन उनकी भी सीमा है। मैं तो इसे समाजशास्त्र से जोड़कर देख रहा हूं। आखिर जहरीली शराब से दलित और पिछड़े ही क्यों मरते हैं? कोई सवर्ण क्यों नहीं मरता?

दरअसल, इसका एक अर्थशास्त्र है। अंग्रेजी शराब जो कि सुरक्षित होती हैं, की कीमतें अधिक होती हैं और गरीब दलित-पिछड़े खरीदने में सक्षम नहीं होते। पीने की बुरी लत तो उन्हें रहती ही है। ऐसे में वे देसी और स्पिरिट से बनी शराब आदि का सेवन करते हैं। हालांकि मैं कोई प्रोफेशनल नहीं हूं जो यह दावा कर सकूं कि स्पिरिट की मात्रा अधिक हो जाने अथवा देसी शराब में किसी खास तरह के केमिकल रिएक्शन के कारण वह जहर हो जाता है। यह काम तो जांच एजेंसियों का है।

परंतु मूल में अंग्रेजी शराब की कीमतें हैं। मेरे सूत्र बताते हैं कि बिहार में अंग्रेजी शराब दुगनी-तिगुनी कीमत में होम डिलीवरी की जाती है। हालांकि देसी शराब की कीमत में भी लगभग इतनी ही उछाल है। परंतु अंग्रेजी की तुलना में यह सस्ता है और लोग सस्ते की वजह से जहरीली शराब पीकर मर जाते हैं।

बिहार में बेरोजगारी दर पूरे देश में सबसे अधिक है और एक तरह से असंगठित क्षेत्र को सबसे अधिक मजदूरों की आपूर्ति करनेवाला नंबर वन राज्य है, तब सरकार को सबसे पहले इसी दिशा में काम करना चाहिए। जबरदस्ती से कोई समाज सुधार नहीं होने वाला है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि सवर्ण यानी देवतागण सोमरस का पान करें और शूद्र जहर का। प्रा

अब समाधान क्या है? इस सवाल पर विचार करते हैं। मुझे लगता है कि सभ्य समाज का निर्माण तभी मुमकिन है जब रोजी-रोजगार के साधन हों। ऐसे हाल में जबकि बिहार में बेरोजगारी दर पूरे देश में सबसे अधिक है और एक तरह से असंगठित क्षेत्र को सबसे अधिक मजदूरों की आपूर्ति करनेवाला नंबर वन राज्य है, तब सरकार को सबसे पहले इसी दिशा में काम करना चाहिए। जबरदस्ती से कोई समाज सुधार नहीं होने वाला है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि सवर्ण यानी देवतागण सोमरस का पान करें और शूद्र जहर का। प्राख्यात इतिहासकार डी एन झा तक ने इस बारे में लिखा है कि कैसे वैदिक देवी-देवता छककर सुरक्षित और सुस्वादू शराब का सेवन करते थे।

खैर, अपनी सनक के लिए कुख्यात नीतीश कुमार का कलेजा अभी ठंडा नहीं हुआ है। यह तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं। फिर भी आम आदमी हूं और जब लोग सरकारी तंत्र की सनक के कारण बेमौत मारे जाते हैं तो दुख होता है। कोई जनप्रतिनिधि होता तो नीतीश कुमार से जरूर अनुरोध करता कि वे शराबबंदी कानून को खत्म करें। शराब वर्ल्ड वाइड प्रोडक्ट है। और अब तो भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य भी है। शराब की संस्कृति पहले से अधिक विस्तृत हुई है। इसे रोकने के लिए हल्के-फुल्के प्रयास काफी नहीं हैं। तो छोड़िए अपनी सनक और लोगों की हत्या करने से बाज आइए।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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