स्त्री विमर्श का परचम लहराने वाली ज्यादातर स्त्रियाँ घरों में प्रताड़ना और उपेक्षा से जूझ रही हैं

प्रख्यात कथाकार सुधा अरोड़ा से युवा आलोचक पल्लव की बातचीत

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बातचीत का चौथा और अंतिम हिस्सा 

स्त्री मुक्ति की लड़ाई में आप भी लगातार हैं, विश्वास है कि किसी मंजिल तक पहुंचेंगी?

बदलाव तो आ रहा है , इसमें कोई संदेह नहीं। पर यह बदलाव किसी भी स्त्री की वैयक्तिक क्षमता पर ही अधिक निर्भर करता है। विपरीत परिस्थितियों से लगातार जूझना अपने आप स्त्री में लड़ने की और स्वयं को ज़िन्दा रखने की ताकत देता है। हमारी पीढ़ी की औरतों के संघर्ष  से बेटियों ने ही नहीं सीखा, बेटों में भी एक सहयोगी, समझदारी की सकारात्मक सोच पनपी है। हमारी पीढ़ी की औरतों में भी सहनशीलता के लिहाज़ से सैचुरेशन पॉयन्ट देर से आया पर उसने जीवन जीने के सही विकल्प की सीख अगली पीढ़ी तक स्थानांतरित की, यह हमारी एक बड़ी उपलब्धि है ।

कहानी आलोचना के वर्तमान परिदृश्य से कितनी संतुष्ट  हैं?

आलोचना आज कहानी या कहानीकार की सफलता का मापदंड नहीं रह गई है। पाठक और समय ही वास्तविक निर्णायक है। आज से पचास साल बाद क्या बचा रहेगा, क्या समय की गर्त में खो जाएगा, कोई नहीं बता सकता। यह आने वाला समय तय करेगा कि कौन सी रचनाएं समय के साथ चल पाने में समर्थ हैं।

स्त्रीवादी होना वामपंथ से अलगाता है? नहीं, तो श्रीलता स्वामीनाथन गर्व से यह कैसे कहती हैं, मैं मार्क्सवादी हूं , स्त्रीवादी नहीं।

श्रीलता स्वामीनाथन की तरह बहुत-सी फेमिनिस्टों के इस तरह के बयान सुने गए है कि वे मानवतावादी हैं, नारीवादी नहीं या मार्क्सवादी हैं, स्त्रीवादी नहीं । दरअसल ये सब जुमले हैं। गहराई में जाएं तो अगर आप मानवतावादी है, आप लिंग विभाजन से समाज में व्यक्ति की स्थिति को नहीं आंकना चाहते, तो भी एक मानव (पुरुष) और दूसरे मानव (स्त्री) के बीच असमानता और शोषण न हो, इसी पर आप बात करेंगे । मार्क्सवादी हैं तो मार्क्स के दृष्टिकोण से स्त्री के दोयम दर्जे के प्रति सरोकार की बात करेंगे। दूसरी तरफ रैडिकल – अत्याधुनिक फेमिनिज़्म है जो हर समस्या को औरत के नज़रिए से ही देखता है। उन्हें यह लगता है कि सारी समस्या की जड़ विवाह जैसी सामंती संस्था है और यह दुनिया बग़ैर विवाह की संस्था या बग़ैर पुरुषों के भी चल सकती है। सोशलिस्ट फेमिनिस्ट मानते हैं कि जब हम स्त्री शोषण की बात करते हैं तो वर्ण और वर्ग विभेद को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते क्योंकि शोषण  के सभी प्रकार एक दूसरे से गुंथे हुए हैं। एक पर विमर्श करें तो दूसरा अपने आप सामने आ जाएगा इसलिए इस शोषण का निराकरण साथ साथ ही होना है। ले दे कर बात तो आप समाज में व्याप्त शोषण और असमानता की ही कर रहे हैं । 1960 से 1980 तक सभी फेमिनिस्ट एक ही कॉमन प्लैटफ़ॉर्म से अपनी बात कहते थे लेकिन 1980 के बाद जैसे जैसे इन सामान्य मुद्दों को विस्तार मिला, उनके विश्लेषण के अलग कोण तलाशी जाने लगे और सोशलिस्ट, मार्क्सिस्ट, रैडिकल आदि प्रकारों ने अलग रास्ते ढूंढे। मुख्य बात यह है कि आपकी प्राथमिकता के मुद्दे क्या हैं ?

अपने को फेमिनिस्ट होने के लेबल से बचाना चाहें तो कुछ भी कहा जा सकता है।

समाज के विस्तृत फलक पर लिखनेवालों की कमी नहीं है। हिन्दी साहित्य उनसे अंटा पड़ा है। अफसोस इस बात का है कि स्त्रियों का भी पूरा फोकस इस पुरुष व्यवस्था का हिस्सा बनने में है। साहित्य कितना स्त्री सशक्तीकरण में योगदान दे पाएगा, मालूम नहीं। आखिर बदलाव ज़मीनी तौर पर स्त्रियों के लिए काम करनेवाली कार्यकर्ताओं से ही आएगा। साहित्य के जरिए हम कितना कर पाएंगे, कभी कभी यह सोच ही निराशा के गर्त में /धकेल देती है। स्त्रियों की पहली लड़ाई इन स्त्री देह में पुरुष सोच को पुष्पित पल्लवित करने वाली स्त्रियों से ही है, पुरुषों का नम्बर दूसरा है

आपने लिखा है –‘स्त्री यातना के सीमित फलक की कहानियां लिखने का कोई मलाल नहीं।’ अर्थात सीमित तो है यह फलक। साहित्य की क्या भूमिका रहेगी इसमें ?

दरअसल यह सीमित फलक निरंतर उपेक्षा के कारण अब बहुत ज्यादा व्यापक हो गया है। हमारे यहां हर भाषा, हर विज्ञान, इतिहास, मनोविज्ञान पुरुषों के ही दृष्टिकोण से लिखा गया, उनके सिद्धांत गढ़े गए। मनोविज्ञान में जिसे सामान्य मनोविज्ञान कहा जाता रहा – दशकों तक, वहां स्त्री के दृष्टिकोण को तो एक सिरे से नकारा गया।

स्त्रीमुक्ति, नारी अभिव्यक्ति  की खूब बातें की जाती हैं, विशेषांक निकाले जाते हैं, होता कुछ नहीं। स्त्री विमर्श का सबसे ज्यादा परचम लहराने वालों के अपने घरों में स्त्र्यिां हर तरह की प्रताड़ना, उपेक्षा से जूझ रही हैं। समाज के विस्तृत फलक पर लिखनेवालों की कमी नहीं है। हिन्दी साहित्य उनसे अंटा पड़ा है। अफसोस इस बात का है कि स्त्र्यिों का भी पूरा फोकस इस पुरुष व्यवस्था का हिस्सा बनने में है। साहित्य कितना स्त्री सशक्तीकरण में योगदान दे पाएगा, मालूम नहीं। आखिर बदलाव ज़मीनी तौर पर स्त्र्यिों के लिए काम करनेवाली कार्यकर्ताओं से ही आएगा। साहित्य के जरिए हम कितना कर पाएंगे, कभी कभी यह सोच ही निराशा के गर्त में /धकेल देती है। स्त्र्यिों की पहली लड़ाई इन स्त्री देह में पुरुष सोच को पुष्पित  पल्लवित करने वाली स्त्र्यिों से ही है, पुरुषों का नम्बर दूसरा है

स्त्रीवाद, स्त्रीविमर्श  स्त्रीसशक्तीकरण और स्त्रीमुक्ति आंदोलन क्या समानार्थक है? नहीं तो अन्तर बताइए और आप अपने को किसके सर्वाधिक करीब पाती हैं ?

ये सारे शब्द समानार्थी नहीं हैं। स्त्रीविमर्श  सैद्धान्तिक वैचारिक पक्ष है, जहां स्त्रीवादी या फेमिनिस्ट अपने अपने नज़रिए से स्त्रीमुक्ति और स्त्रीसशक्तीकरण की बात करते हैं। बौद्धिक विमर्श  में मेरा न ज्यादा दखल है, न विशवास। विचारों के घटाटोप में स्त्र्यिों को उलझाकर हमें क्या मिलेगा। उनकी ज़िन्दगी की समस्याओं से सीधे दो–चार हों, अपने आस पास भी थोड़ी सी जागरूकता हर पढ़ी लिखी औरत फैला सके या ऐसा लेखन कर सके जो कहीं सीधे बदलाव लाने में सहायक हो तभी समाज की रूढ़ हो चुकी /धारणाओं और विसंगतियों में दरार आ सकती है। वर्ना यह तोे हर औरत की वैयक्तिक जंग है जिससे उसे खुद जूझना है, अपनी जगह बनानी है। मैं इस जंग में बूंद भर भी योगदान दे सकूं तो मैं अपना होना सार्थक समझूंगी।

दक्षिणपंथ को स्त्री विरोधी  कहा जाता है पर नारीशक्ति की बात वे भी करते हैं  ।

1950 के बाद सभी राजनीतिक खेमों में – चाहे वह दक्षिणपंथी हो या वामपंथी – स्त्री मुक्ति और सशक्तीकरण की बात कही गयी है। 1980 के आसपास नारीवाद के भी कई प्रकार हो गए। सोशल फेमिनिज़्म है, मार्क्सिस्ट फेमिनिज़्म है, रैडिकल फेमिनिज़्म है, राइटिस्ट विंग का फेमिनिज़्म भी है। पर मुद्दे तक पहुंचने के कोण सबके अलग अलग हैं। दक्षिणपंथी भी नारीशक्ति की बात करते हैं पर उनका दृष्टिकोण परंपरा अनुमोदित है। त्याग उनका मूलमंत्र् है। स्त्री की मुक्ति, उनकी आज़ादी और उनके अधिकारों पर वे ज्यादा बात नहीं करते। वे कहते हैं कि स्त्र्यिों को अपनी अभिव्यक्ति का प्रदर्शन करना है, लेकिन कैसे? अच्छे बेटे पैदा करके जो देश के लिए लड़ें। वे आज भी आदर्श माताएं, आदर्श पत्नियां,आदर्श स्त्री की बात करेंगे जो देश के, राष्ट्र के संरक्षण के लिए अच्छी संतानें पैदा करें, ससुराल में ताल मेल बिठाकर रहें। उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा के भाषण में स्त्री मुद्दों पर ध्यान दें। उसमें पुरुष सर्वशक्तिमान है, लेकिन उसे चूंकि स्त्री ने जन्म दिया है इसलिए स्त्री महान है, त्यागमूर्ति है, सबला है। सशक्तीकरण में नारियों का योगदान सिर्फ देश के लिए अच्छी संतानों को अच्छा संस्कार देने तक सीमित है।

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स्त्री की मुक्ति उसकी देह से शुद्ध होगी  आप इससे कितना सहमत–असहमत है ?

सभी नारीवादियों ने शुरुआत से ही यह ज़रूर कहा कि स्त्र्यिों का अपने शरीर पर आविष्कार होना चाहिए और वह अपने शरीर पर किसी तरह का अत्याचार बर्दाश्त नहीं करेगी। नारीवादियों ने लैंगिक आधार पर श्रम की असमानता या दैहिक शोषण का विश्लेषण किया। पर देह पर आविष्कार और देह की आजादी को मान कर देह को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना दो अलग बल्कि विपरीत स्थितियां हैं। देह की आजादी के नाम पर देह की उच्छृंखलता को बढ़ावा देने वाली ये औरतें भी अपने को नारीवादी कहती हैं और बाकायदा पुरुष संरक्षण में रहकर सत्ता में बने रहने के लिए प्रयासरत रहती हैं। राजनीति और समाज के हर क्षेत्र में  जिस तरह के नकली मुखैाटे वाले लोग व्यवस्था को भ्रष्ट करने में योगदान दे रहे हैं, ये महिलाएं भी वहीं कर रही हैं। हर क्षेत्र में आज नकल और असल के बीच की पहचान जटिलतर होती जा रही है।

एक महिला संगठन है जिसने गाली बंद करो अभियान पर काफी काम किया पर उन्होंने देखा कि महिलाएं भी जब गाली गलौज पर उतरती हैं तो आपस में ही मां–बहनों की गालियां देकर बात करती हैं। इसे तभी बदला जा सकता है जब पुरुषों के साथ साथ स्त्रियां अपना नज़रिया बदलें। गांव की बात छोड़े, कुछ महिला हिन्दी प्राध्यापक भी तीन अक्षरों की गाली के बिना बात ही नहीं करतीं।

स्त्रीत्व और भाषा के प्रश्न को पूछने से पहले कहूंगा हमारी सारी गालियां स्त्रियों से संबंधित क्यों हैं ? इससे कैसे निबटें – बदलें ?

फेमिनिस्टों ने इन सभी मुद्दों पर सवाल उठाए हैं – भाषा विज्ञान पर , साहित्य और इतिहास, चिकित्सा शास्त्र – फ्रायडियन मनोविज्ञान की भाषा और स्थापनाओं पर। हमारे यहां भाषाएं भी तो पुरष प्रधानता को ही प्रश्रय देती हैं। पुरुष को शास्त्रों से  लेकर आम जनमानस में श्रेष्ठ, उत्तम, अर्थ उपार्जन के कारण मनमानी करनेवाला और स्त्री को उसके अधीन, उसकी हर तरह की ज्यादतियों को स्वीकार करने वाला माना गया है। स्त्री को दांव पर लगाया जा सकता है यानी  एक वस्तु का दोयम दर्ज़ा तय है इसलिए हर भारतीय भाषा में स्त्री अंगों पर गालियां धड़ल्ले से प्रचलित हैं। गांव कस्बों में कई बार भाषा ऐसी लगती है जैसे स्त्र्यिोंं से अपनी पुश्तैनी दुश्मनी निकाल रही है। उत्तर प्रदेश में पुरुषों के बीच काम करने वाला एक महिला संगठन है जिसने गाली बंद करो अभियान  पर काफी काम किया पर उन्होंने देखा कि महिलाएं भी जब गाली गलौज पर उतरती हैं तो आपस में ही मां–बहनों की गालियां देकर बात करती हैं। इसे तभी बदला जा सकता है जब पुरुषों  के साथ साथ स्त्र्यिां अपना नज़रिया बदलें। गांव की बात छोड़े, कुछ महिला हिन्दी प्राध्यापक भी तीन अक्षरों की गाली के बिना बात ही नहीं करतीं। ये गालियां हमारी पुरुष प्रधान व्यवस्था का हिस्सा बन गयी हैं और तभी प्रचलन से बाहर हो सकती हैं, जब समाज की मानसिकता बदले और औरतें स्वयं इसमें सहयोग दें।

ग्लोबलाइजेशन से स्त्री मुक्ति की लड़ाई आसान हुई है या कठिन? क्यों कि उन्हें तो हर मनुष्य का लाभ लेना है चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।

ग्लोबलाइजेशन ने स्त्री मुक्ति की लड़ाई में भी उतनी ही मुश्किलें  खड़ी की हैं, जितनी दूसरे शोषित तबकों  की लड़ाई में। स्त्रीमुक्ति का मुद्दा भी दलित, विस्थापित, आदिवासी, अल्पसंख्यक के शोषित तबकों के साथ ही जुड़ा है  ।

स्त्रीवाद को किसी दर्शन / राजनीतिक सिद्धान्त का सहारा लेना क्यों जरूरी है ?

फेमिनिज़्म या स्त्रीवाद विचार या सिद्धांत विहीन वाद नहीं है। इसे राजनीतिक सिद्धान्तों या राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से व्यावहारिक रूप से जोड़ना ज़रूरी है ताकि समाज के सभी  शोषित तबको की मुक्ति और उत्थान के लिए कार्यरूप में परिणत होने की निश्चित संभावना बने।

कुछ न कर पाने का अफसोस?

मेरी पूरी ज़िन्दगी ही अफसोसों का एक लंबा सिलसिला है। बचपन से लेकर अब तक।

क्रमवार बात करूं तो लंबी फेहरिस्त है –

सात भाई बहनों में सबसे बड़ी क्यों हूं। छोटी होती तो अच्छा था। हालांकि मुझे जितना लाड़ दुलार मिला, मुझसे छोटे भाई बहनों को नहीं मिला। बचपन में इतनी बीमार क्यों रही। पर बीमार न होती तो कभी लेखिका न बनती। मुझे मनोविज्ञान या दर्शन शास्त्र  में एमए करना था। मां के कहने पर हिन्दी साहित्य में किया। एमए में भी टॉप किया तो आईएएस में बैठना चाहती थी, पर घर का माहौल ऐसा था कि एमए करवाने में ही मां को दादा–दादी की खिलाफत करनी पड़ी। और हां, तीन चौथाई थीसिस लिखने के बाद भी अपने पति से इश्क के फितूर में अपनी पीएचडी अधूरी छोड़ने और शादी के बाद कॉलेज की लेक्चरशिप छोड़ने का बेहद अफसोस है।

सुधा अरोरा और जीतेन्द्र भाटिया

अपने पति के अंधे प्रेम में अपनी ज़िदगी के बेहतरीन पैंतीस साल बरबाद करने का अफसोस है। पर इतने साल बरबाद न करती तो एक आम मध्यवर्गीय औरत की ज़िन्दगी के अनुभवों से दो–चार कैसे होती। ऐसे अनुभवों से साबका न पड़ता तो लेखन में यह धार न आती ।

असंतुष्ट रहना मेरी आदत का हिस्सा है। वैसे मैंने एक भरी–पूरी अच्छी ज़िन्दगी जी और अब साठ के बाद तो बोनस पीरियड चल रहा है। इसका बेहद अच्छा और सार्थक इस्तेमाल करना चाहती हूं।

आजकल आप किस लेखन कार्य में व्यस्त हैं ? इन दिनों नया क्या लिख रही हैं ?

अब मैं वह लिखने की कोशिश  कर रही हूं जो एक लंबे अरसे से लिखना चाहती थी और लिख नहीं पा रही थी। उम्र के इस पड़ाव पर अब मैं अपनी सेंसरशिप से मुक्त हूं। इससे पहले ही मुक्त हो जाना चाहिए था पर बेटर लेट दैन नेव्हर!

 

पल्लव जाने-माने युवा आलोचक और बनास जन  पत्रिका के संपादक हैं। फिलहाल वे हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। 

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