कक्षा के भीतर के व्यवहारों और पूर्वाग्रहों पर सवाल उठाती किताब

अशोक कुमार

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बच्चे मशीन नहीं होते मात्र एक किताब नहीं बल्कि एक शोधार्थी, एक स्कूल अध्यापक, एक मेंटर टीचर और एक सहायक प्रोफेसर की जीवन यात्रा के दौरान के उन अनुभवों का दस्तावेज है, जिनसे होकर आलोक एक बेहतरीन विचारक होकर उभरे हैं।

इस किताब से गुजरते हुए जिस तरह से मेरी कई धारणाएं टूटी हैं, मैं यह समझ सकता हूँ कि लेखक ने अपनी यात्रा के दौरान किस पीड़ा से गुजरते हुए स्थापित सामाजिक मान्यताओं को तोड़ते हुए अपने लिए यह मुश्किल रास्ता बनाया होगा।

अलोक इस किताब में स्कूली शिक्षा, शिक्षा के प्रति व्यवस्था के दायित्व, प्रशासनिक उदासीनता, राजनैतिक इच्छाशक्ति, शिक्षकों की जिम्मेदारियों, हमारे पूर्वाग्रह, जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय और लैंगिक भेदभाव पर केवल सवाल नहीं उठाते बल्कि अपने अनुभवों के आधार पर समस्यायों के समाधान भी सुझाते हैं।

इस किताब में सामाजिक विज्ञान की कक्षाओं में नवाचारों को कैसे अपनाया जाए इसके कई उदाहरण तो हैं ही साथ में इस बात को पुख्ता प्रमाणों के साथ स्थापित भी किया गया है कि  सामाजिक विज्ञान की कक्षा में वैज्ञानिक चेतना के साथ जाने पर किस तरह से सामाजिक बदलावों की अपेक्षाए की जा सकती हैं ताकि निकट भविष्य में हम एक बेहतर समाज के सपने को पूरा होते हुए देख सकें।

इस पूरी किताब में लेखक ने कक्षा-कक्ष के भीतर होने वाले व्यवहारों में तमाम तरह होने वाले भेदभावों, पूर्वाग्रहों, मान्यताओं, भाषाई समस्याओं पर गंभीर सवाल उठाये हैं, और साथ ही साथ समाधान भी सुझाए हैं जिससे की कक्षा-कक्ष के भीतर एक सौहार्दपूर्ण, धर्मनिरपेक्ष, भेदभाव रहित और रचनात्मक माहौल बनाया जा सकता है।

इस किताब में कक्षाओं के अनुभव हैं, बेहतरीन शैक्षिक यात्राओं के संस्मरण हैं, सामाजिक विज्ञान की कक्षाओं में करवाई जा सकने वाली एक्टिविटीज के उदाहरण हैं, गणित की पुस्तकों की विषयवस्तु पर तथा हिंदी विषय की पुस्तकों में जेंडर आधारित असमानताओं पर शोधपत्र हैं, नई शिक्षानीति की आलोचनात्मक पड़ताल है, दोस्तों-छात्रों तथा परिवार के लोगों के साथ हुए अनुभवों के विवरण हैं, और एक बेहतरीन स्कूल की इच्छाओं से लबरेज़ एक संवेदनशील अध्यापक के सपनों की एक लम्बी फेहरिस्त भी है।

ये बत्तीस आलेख स्कूली शिक्षा व्यवस्था की दीवार में बत्तीस रोशनदान हैं जिनसे आती है एक किरण और हमारे चेहरों पर किसी रौशनी की तरह बिखर जाती है। ये आलेख छात्रों के पक्ष में खड़े, शिक्षकों के पक्ष में खड़े, रूढ़िवादिता और भेदभाव के विरुद्ध मानवता के पक्ष में खड़े वे बयान हैं, जिन्हें हमारे सामने रखने से पहले लेखक ने दर्शन, मनोविज्ञान, सामाजिक अपेक्षाओं, प्रयोगों, और अनुभवों की कसौटियों पर कसा है। हो सकता है हमारी मान्यताओं को ठेस पहुंचे जब आलोक लिखते हैं कि बच्चों को कोरा कागज या कच्ची मिट्टी मानना पुरानी और दकियानूसी सोच है। बच्चे तो रंग-बिरंगे कैनवास की तरह आते हैं हमारे पास और हमारा काम तो केवल उन बिखरे हुए रंगों को खूबसूरत पेंटिग में ढलने में मदद करना है।

जब हम इस किताब में पृष्ठ-दर-पृष्ठ गुजरते हैं तो लेखक से कभी-कभी सहमत होते हैं, कभी-कभी असहमत होते हैं किन्तु लेखक के द्वारा उठाये गए मुद्दों को ख़ारिज नहीं कर पाते। और यही इस किताब की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

इन आलेखों में जहाँ एक तरफ लेखक थर्ड जेंडर को किताबों में जगह न मिलने पर सवाल खड़ा करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ इस बात से सहमत भी होते हैं कि बीते कुछ वर्षों में कक्षा-कक्ष थोड़ा और अधिक समावेशी भी हुआ है। जहाँ एक तरफ वह समाजिक विज्ञान की कक्षाओं में नीरसता पर सवाल खड़े करते है वहीं दूसरी तरफ वह उन क्रिया-कलापों का विस्तृत वर्णन भी देते हैं जिनसे कि सामजिक विज्ञान की कक्षा को  रचनात्मक बनाया जा सकता है। ये क्रिया-कलाप मात्र लेखक की कल्पनायें नहीं हैं बल्कि लेखक के द्वारा एक शिक्षक होते हुए कक्षाओं में आजमाई  गयी वे टेकनीक हैं जिनके सकारात्मक परिणाम कक्षाओं में मिले भी हैं।

लेखक बड़े सहस के साथ डाटर्स-डे पर बेटियों के नाम ख़त विषयक आलेख में जेंडर विषय पर चल रहे विमर्शों, द्वंद्वों, भेदभावों, परम्पराओं के दबावों और हमारी सोशल ट्रेनिंग के घेरे को तोड़ते हुए अपनी बेटियों को सीख देते हुए सवाल पूछने, अपनी आज़ादी को महसूस करने और उसके साथ जीने के लिए प्रेरित करते हुए इस बात को स्वीकार करते हैं कि बेटियां यह बातें समझने के लिए अभी बहुत छोटी हैं किन्तु इससे पहले कि यह सब समाज से उन्हें पता चलें वह उन्हें समझा देना चाहते हैं।

बच्चे मशीन नहीं हैं पुस्तक का शीर्षक आलेख दरअसल स्कूलों, अध्यापकों और यहाँ तक कि अविभावकों द्वारा किसी छात्र से शत-प्रतिशत उपस्थिति की अपेक्षा को अमानवीय अपेक्षा बताते हुए लिखा गया है। जहाँ लेखक यह सवाल पूछना चाहते हैं कि क्यों एक छात्र साल में एक दिन बीमार नहीं पड़ सकता? क्यों वह किसी पारिवारिक समारोह में शामिल होने के लिए एक दिन का अवकाश नहीं ले सकता? या ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि एक दिन उसका मन न हो और वह यह कहे कि उसे आज स्कूल नहीं जाना? बच्चा भी हमारे समाज का हिस्सा है कोई मशीन नहीं है।

भाषा की जकडबंदी में लेखक बड़ा गंभीर सवाल उठा रहे हैं। उनकी बेटी द्वारा छोटे समोसे को समोसी कहने भर से उपजे द्वंद्व को लेखक ने पूरे आलेख में विस्तार से समेटने की कोशिश की है। दरअसल भाषा की सरंचना ही इस प्रकार से हुई है कि न चाहते हुए भी हमारे पास ऐसे शब्द उपलब्ध नहीं हैं जो जेंडर न्यूट्रल हों। चूड़ी पहनने वाले मुहावरे अपने आप में सारी  कहानी कह देते हैं।

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शिक्षक दिवस पर एक शिक्षक का पत्र यह एक ऐसा ऐसा आलेख है जिसमें आलोक बिना किसी किन्तु-परंतु के यह स्वीकार कर रहे हैं कि कक्षा-कक्ष में केवल विद्यार्थी ही नहीं सीखते बल्कि यह प्रक्रिया दोतरफा मुसलसल चलती है। जितना विद्यार्थी सीखते हैं उतना ही शिक्षक भी प्रत्येक कक्षा के बाद स्वयं को समृद्ध पाता है।

एक आलेख है कक्षा के समांतर पाठ जहां निजी अनुभवों के ऐसे उदाहरण देकर आलोक यह सिद्ध करते हैं कि किस तरह बिना सोचे-समझे जजमेंटल हो जाना न केवल छात्रों को बल्कि अध्यापकों को भी इतना असहज कर सकता है कि सत्य से अवगत होने के बाद अध्यापक कई दिनों तक गिल्ट के भाव को लेकर मानसिक रूप से विचलित रहता है। छात्रों के पहनावे, साफ-सफाई, उनके पास चीजों की अनुपलब्धता पर जजमेंटल होने से पहले उनकी पारिवारिक स्थितियों को जानना कितना आवश्यक होता है।

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नई शिक्षानीति जो कि एक बेहद ही परिष्कृत भाषा के साथ हमारे सामने रखी गयी है, उसमें पंक्तियों के बीच जो छोड़ दिया गया है वे कितना महत्वपूर्ण है, इसकी तरफ हमारा ध्यान खींचने की लेखक ने पुरजोर कोशिश की है। उनके अनुसार इस नीति में किस तरह उत्तर भारत को ही भारत मान लेने की एक कोशिश की गई है। त्रिभाषा फार्मूले में दक्षिण या पूर्वोत्तर की भाषाओं को सम्मलित करने का जो एक बेहतरीन अवसर था उसे कैसे गंवा दिया गया है। या फिर मध्यकालीन इतिहास और स्वतंत्रता के संघर्ष के इतिहास को क्यों जगह देने की बात नहीं कहीं गयी है। वो कहते हैं कि इस शिक्षा नीति में बहुत-सी अच्छी बातें कहीं गयी हैं इसके बावजूद भी जो नहीं कहा गया वह कितना जरूरी था यह समझा जाना भी बेहद जरूरी है। इस दस्तावेज में एक शब्द आता हैं परोपकारी निजी संस्थान इसकी कोई परिभाषा दी जानी चाहिए थी जोकि नहीं दी गयी।

इस किताब में सबसे बेहतरीन दो शोधपत्र हैं एक मिशन बुनियाद में प्रयुक्त गणित सामग्री का विश्लेषण और दूसरा स्कूली भाषा में जेंडर समावेशन का अध्ययन (हिंदी पाठ्य-पुस्तकों और उनके शिक्षण के संदर्भ में)। इन दोनों शोधपत्रों में उठाये गए सवाल एक शिक्षक के नाते मुझे ठहरकर सोचने को विवश करते हैं। किस तरह हमारी भाषा, हमारा कार्यव्यवहार समाज में व्याप्त जातिगत, धर्मिक, क्षेत्रीय, और लैंगिक भेदभाव को स्कूली शिक्षण में परिवर्तित हो जाता है और हमें भान तक नहीं होता। तथ्यों, प्रमाणों और संदर्भों की सहायता से लेखक नें भेदभाव के समाजीकरण को जिस तरह से इन शोधपत्रों में सत्यापित किया है हमारे ज़ेहन में सौ सवाल छोड़ जाता।

इस पूरी किताब में लेखक ने कक्षा-कक्ष के भीतर होने वाले व्यवहारों में तमाम तरह होने वाले भेदभावों, पूर्वाग्रहों, मान्यताओं, भाषाई समस्याओं पर गंभीर सवाल उठाये हैं, और साथ ही साथ समाधान भी सुझाए हैं जिससे की कक्षा-कक्ष के भीतर एक सौहार्दपूर्ण, धर्मनिरपेक्ष, भेदभाव रहित और रचनात्मक माहौल बनाया जा सकता है।

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एक शिक्षक होने के नाते मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि प्रत्येक शिक्षक के द्वारा यह पुस्तक पढ़ी जानी चाहिए।

अशोक कुमार दिल्ली के सरकारी स्कूल में गणित के अध्यापक हैं।

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