होण्डुरास से लौटे हुये एक ज़माना बीत गया – एक

विद्या भूषण रावत

0 191

पहला हिस्सा 

22 जुलाई को रात 10 बजे के.जी.गौतम ने अपनी मारुति वैन में मुझे एयरपोर्ट छोड़ा। गौतम साहब एक विशेष भारतीय प्रजाति हैं। उन्हें इस बात से बड़ी परेशानी थी कि दलितों का एक बहुत बड़ा वर्ग जिसने बौद्ध धर्म अपनाया अपने नाम के पीछे गौतम लगा रहा था। शर्मा जी के सामने धर्म संकट कि कैसे उन जैसे शुद्ध ब्राह्मण को लोग कभी-कभार जाटव (चमार) समझ बैठते हैं। यह कलयुग है, शर्मा जी कहते हैं और फिर अन्य भूदेवताओं की तरह वह भी कहते है ‘मैं जातिवाद के बिल्कुल खिलाफ हूँ।’

अपने कागज़ात दिखाने के बाद मैं जैसे ही अपनी सीट पर बैठा एक अच्छा-सा नौजवान बगल में बैठा मिला। आदतन मैं किसी से बात की शुरुआत नहीं करता। मैंने सोचा कि वह किसी कम्पनी में काम करता होगा।  आजकल अमेरिका जाने वाले अधिकांश भारतीय साफ्टवेयर से सम्बन्धित हैं। ‘तुसी टोरटों जाण्या सी‘ अचानक उसने पूछा।  मैं कुछ देर चुप रहा।  अचानक झटके से पूछे गए सवाल से मैं झुँझला गया लेकिन चुप ही रहा। उसने फिर पूछा कि ‘क्या काम करते हो टोरटों विच।’ वह लगातार इस किस्म की उल-जलूल सवाल किये जा रहा था। अब मुझे गुस्सा भी बहुत आ रहा था परन्तु अपने पंजाबी बंधु तो ऐसी ही प्रजाति है।  ‘मैं मयामी जा रहा हैूँ’  अंततः मैंने कहा। तुरंत ही उसने सवाल दागा – ‘क्या शादीशुदा हो? क्या काम है आपका? …… खैर, उससे बातचीत करके पता चला कि वह कनाडा में ट्रक चलाता है और अभी शादी करने के बाद वापस जा रहा था, फ्रेंकफर्ट में जैसे ही हम लैड करने वाले थे उसने अपने पंजाबी अंदाज में कहा –  ‘ये पायलट बहुत अच्छा है, इसने जहाज को धीरे-धीरे गिराया।’

फ्रैंकफर्ट में भारतीयों की भरमार थी। सभी ने अपने समूहों के साथ करीब चार घंटे के इंतजार के बाद मयामी के लिये प्रस्थान किया।  दिल्ली से चले करीब बारह घंटे हो चुके थे। मयामी का रास्ता साढ़े नौ घंटे का है। इतनी देर तक बैठे-बैठे मेरी पीठ में दर्द हो रहा था। हम लोग यात्राओं को, विशेषकर हवाई यात्राओं को बहुत आरामदायक समझते हैं लेकिन यह बहुत बड़ी भूल है। इतनी दूर तक की ये यात्राएं बहुत थकाने वाली होती हैं। दोपहर में हम ठीक एक बजकर चालीस मिनट पर मयामी हवाई अड्डे पहुंचे। हालांकि मुझे दूसरा जहाज पकड़ना था और दुनिया के किसी दूसरे हवाई अड्डे पर मुझे दोबारा सेइमिग्रेशन चेक करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन अमेरिका की तो बात ही कुछ और है। वे तो दुनिया के दादा हैं और लोगों को अपमानित करने में उन्हें आनन्द की अनुभूति होती है। यदि आपकी अगली उड़ान का समय दो घंटे से कम है तो किसी भी अमेरिकी हवाई अड्डे से आपकी यात्रा छूट सकती है।

मयामी में सारी प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद मैंने अमेरिकन एयर लाइन्स के विमान में प्रवेश किया। हमारी फ्लाइट एक  घंटा लेट थी। शाम के साढे पांच बजे थे। आगे का सफर डेढ़ घंटे का है। अंततः यात्रा शुरू हुई।  करीब आधे घंटे बाद एयर केबिन स्टाफ ने खाना परोसा। पूछते हैं आप कौन सा स्नेक पसंद करेंगे? उनके उच्चारण से मैं अचकचा गया। सांप के मांस का नाम सुनकर मेरे शरीर में सिहरन सी दौड़ गई लेकिन सच कहूँ तो गलतफ़हमी मेरी थी। उन दिनों स्नेक्स बहुत प्रचलित नहीं थे। यही तो दुनिया की विविधता है। इस सांस्कृतिक विविधता का हमेशा सम्मान करना चाहिए। हम ठीक 7 बजे  होण्डुरास के हवाई अड्डे सेन पेड्रो सूला पर थे। ऊपर से देखने पर होण्डुरास की घाटियां साफ नजर आती हैं। सेन पेड्रो यहां का दूसरा बड़ा शहर है जिसकी जनसंख्या करीब 6 लाख है। पूरे होण्डुरास की जनसंख्या लगभग 60 लाख है। तेग्यूसिगल्पा यहां की राजधानी है और भाषा स्पानी। हवाई अड्डा अत्यंत छोटा है और चारों ओर घाटियों से घिरा भी, जिससे जहाजों का उतरना मुश्किल होता है। मौसम बहुत खराब था। उस दिन भयंकर कोहरा था। स्थानीय समय के हिसाब से सात बज रहे थे और अंधेरा हो रहा था। दक्षिण एशिया की भांति लातिनी अमेरिका में भी शाम 6-7 बजे तक हो जाती है। सुबह 5 बजे के बाद हवाई अड्डे के बाहर हमारे स्थानीय संरक्षक मौजूद थे। मैं कार में बैठकर अपने होटल निकल पड़ा।

ऊबड़-खाबड़, टूटे-फूटे रास्तों से गुजरते हम लोग अंततः 11.30 बजे अपने गन्तव्य पर पहुँचे जहाँ हजारों किसान-मजदूरों बच्चों ने हमारा स्वागत किया। यह आनन्द का क्षण था। लाखों किलोमीटर और सात समुन्दर पार दुनिया के दूसरे कोने में संघर्ष कर रहे लोगों के संघर्ष में शामिल होने का मौका मिला था। हमें जुलूस में सभास्थल तक लाया गया और दोनों ओर कतारबद्ध बच्चे हाथ हिलाकर और ताली बजाकर हमारा स्वागत कर रहे थे। थकान के बावजूद हम लोग पूरे इलाके के सर्वेक्षण पर गये।

होटल बहुत छोटा है। अपने किसी भी छोटे शहर में इस प्रकार के होटल मिल जायेंगे। होटल स्टाफ स्पानी के अलावा और कोई भाषा नहीं समझता। जो अंग्रेजी को दुनिया की एकमात्र भाषा समझते हैं उन्हे लैटिन अमेरिका में आकर शर्म आ सकती है। अंग्रेजी भाषी यहां पर कोई बिरला ही मिलेगा। असल में दुनिया में तीन देशों ने सर्वाधिक राज किया। एशिया में अंग्रेजों ने, अफ्रीका में फ्रांसीसियों ने और अमेरिका में स्पानियों ने। जिन इलाकों में ये लोग रहे वहां इनकी साम्राज्यवादी भाषाएँ भी रहीं। यही कारण है कि पूरे लातिनी अमेरिका में सिर्फ स्पानी बोली जाती है।

होण्डुरास मध्य अमेरिका का एक छोटा देश है जो सल्वाडोर, बेलिस, ग्वाटेमाला और निकरागुआ से घिरा हुआ है और इसके दोनों ओर प्रशान्त महासागर और कैरेबियन सागर है। यहां की मुद्रा लेम्पिरा है।  एक लेम्पिरा चार भारतीय रुपए के बराबर था।

यहां का मुख्य खाद्यान्न केला ओर गन्ना है। सुबह नाश्ते में मुख्यतः केले को फ्राई करके बनाई गई विशेष डिश, राजमा को पीसकर बनाया गया पेस्ट, योगर्ट, अंडा, ब्रेड और कॉफी। हाँ, कॉफी यहाँ की खासियत है। होण्डुरास का पूरा जीवन कृषि पर आधारित है और देश में प्राकृतिक खूबसूरती और कैरेबियन समुद्री किनारा वाकई देखने लायक है।

यहां पर टेलीफोन सेवायें बहुत महँगी हैं। कल यहाँ से भारत 1 मिनट बात करने का लगभग 12 डालर यानी 550 रुपये का भुगतान किया।

माया सभ्यता के अवशेष

24 जुलाई 2000 आज सुबह मुझे बताया गया कि ग्वाटेमाला बार्डर चलना है जहाँ पर (माया) जनजाति के लोगों के अवशेष विद्यमान हैं। माया सभ्यता ईसा से भी तीन हजार वर्ष पुरानी है। हम लोग अपने होटल से टोयोटा खुली जीप में गये। होण्डुरास में अधिकांश लोग खुली जीप में पीछे खड़े होकर या बैठकर घूमना पसन्द करते हैं। करीबन 170 किलोमीटर  का सफर हमने साढ़े तीन घंटे में तय किया। यहां पर यह बताना भी आवश्यक है कि यह रास्ता हाइवे है और काफी सुरक्षित है। हरे-भरे जंगलों से होकर जब हम कोपन घाटी पहुंचे तो वहाँ धूप का अद्भुत नजारा था। तापमान 30-35 डिग्री सेन्टीग्रेटथा। वातावरण में उष्णता थी। हम लोग कोपन घाटी में माया सभ्यता के खण्डहर देखते हैं। इन्हें देखकर यह लगता है कि यह सभ्यता भारत से यहाँ आयी। इन लोगों में आत्म बलिदान करने की प्रथा भी थी और यहाँ के कई खण्डहरों में मैने स्वास्तिक के निशान भी देखे। माया भाषा और धर्म ग्रन्थ यहां पर 45 सीढियों में लिखे पड़े है और होण्डुरास सरकार ने इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया है, क्योंकि पूरी सभ्यता वनों पर निर्भर थी।  अतः आज भी यहां पर हिरन आदि पशु-पक्षी देखे जा सकते हैं। स्मारक के गेट पर ही हमारा स्वागत यहाँ के राष्ट्रीय पक्षी ’मकाऊ‘ ने किया। मकाऊ एक खूबसूरत रंगीन पक्षी है जो कबूतर से थोड़ा बड़ा होता है।

सायं 7 बजे हम लोग वापस होटल आ गये। कान्फ्रेंस में हिस्सा लेने अनेक देशों के प्रतिनिधि आये है। लातिनी अमेरिका से ग्वाटेमाला, कोस्टारिका, ब्राजील, पेराग्वे, कोलम्बिया, मैक्सिको और बोलिविया के प्रतिनिधि मण्डल में बहुत से जाने पहचाने चेहरे हैं। रात के नौ बजे हमारी कान्फ्रेंस विधिवत रूप से शुरू हो गई। यहाँ के सेन्ट्रल बैंक के कान्फ्रेस हाल में होेंडयूरास के किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने स्थानीय धुनों पर मधुर संगीत प्रस्तुत किया। लैटिन अमेरिका में कृषि सुधार आंदोलन बहुत आगे बढ चुका है एक संस्कृति, एक भाषा और वैश्वीकरण के दुष्परिणामों को ये लोग देख चुके हैं और कमर कसके इसके विरुद्ध लड़ने को तैयार हैं।

राष्ट्रीय पक्षी मकाऊ

एक खास बात यह है कि लैटिन अमेरिका के लोग कद काठी और रंग रूप में दक्षिण एशियाई नजर आते हैं। ग्वाटेमाला बोलिविया, मैक्सिको में खूबसूरत लड़किया भारतीय ही नजर आती हैं। हालांकि सांस्कृतिक पराभव यहाँ पर भी नजर आता है। लड़कियों के बदन पर कपड़े कम होते हैं और सड़क पर मनचले लड़के उन्हें छेड़ते हुए नजर आ सकते हैं।

25 जुलाई, 2000 को हमारी कान्फ्रेंस को यहाँ के राष्ट्रपति कार्लोस सम्बोधित ने किया। उनके साथ पूरी मंत्री परिषद आ रही थी। ठीक 10 बजे राष्ट्रपति महोदय को पहुँचना था। हममें से कुछ लोगों को उनके स्वागत के लिए प्रथम मंजिल पर जाने को कहा गया। यहाँ के सुरक्षाकर्मी व्यवस्था में लगे थे। लेकिन माहौल अपने जैसा नहीं कि सुरक्षा तंत्र आपको अपमानित करे। हमारे एक मित्र अपने सूट में थे। प्रोटोकाल अधिकारी ने बताया कि राष्ट्रपति साधारण कपड़ों में आ रहे हैं अतः अपना कोट उतार दीजिए।

ठीक 10 बजे राष्ट्रपति महोदय बैंक के मुख्य द्वार पर पहुँचे। उनके साथ में उनके बंदूकधारी अंगरक्षक और मंत्रियों की बारात। स्वागत के बाद सामने लिफ्ट में सभी लोग पहुँचे। चूँकि लोग अधिक हैं इसलिए लिफ्ट नहीं उठती। राष्ट्रपति महोदय अपने एक सुरक्षा कर्मचारी को उतरने को कहते हैं।  लेकिन उसके उतरने के बाद स्थिति वैसी ही रही। उन्होंने एक- दो और लोगों को नीचे उतरने को कहा लेकिन कुछ नहीं हुआ। अंत में उन्होंने मज़ाकिया लहजे में कहा कि अच्छा, मैं ही उतर जाता हूँ आप चले जाइए। सभी लोग उनको मनाने लगे। अपने सारे सुरक्षा गार्डों को नीचे उतारकर राष्ट्रपति लिफ्ट से ऊपर आए। क्या यह हमारे देश में सम्भव है? लोकतंत्र के सबसे बड़ी दावेदारी वाला भारत आम पुलिस और सैनिक प्रशासन की गिरफ्त में है।

अपने भाषण के समाप्त होने के बाद राष्ट्रपति कार्लोस हम लोगों से मिले। मैंने उन्हे उनके अच्छे भाषण के लिए धन्यवाद दिया और भारत आने का अनौपचारिक निमंत्रण दिया। वह इस विषय में बहुत उत्सुक दिखे। उन्होंने उम्मीद जताई कि  कभी न कभी वह भारत जरूर आएंगे।

इतने सारे देशों के प्रतिनिधि, एक छोटे से देश में इकट्ठा हुए इससे बड़ी क्या बात हो सकती है। वहां के अखबारों और टेलीविजन पर कार्यक्रम की बड़ी-बड़ी रिपोर्टें प्रकाशित हुईं जो इस बात का सबूत था कि लोगों को अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी से उम्मीद थी।

हम लोगों की चर्चाएं रात 10 बजे तक चलती रहीं। अगले दिन सुबह दक्षिण में कैरेबियन सागर के पास एक गांव जाना था जहाँ पर 5000 परिवारों ने 1300 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा कर लिया है। यह जमीन सेना के अधीन थी और अमेरिका की सेना कोस्टारिका निकरागुआ, एल सल्वाडोर और क्यूबा के विद्रोंहियों को यहाँ पर प्रशिक्षण देती थी। होण्डुरास में ड्रग माफिया भी यहाँ से अपना काम करता था।

26 जुलाई, 2000 को सुबह 3.30 बजे उठे हैं। 4.30 बजे हमें बस से अपनी यात्रा करनी थी। सुबह-सुबह अच्छा मौसम था। हमें लग रहा था कि 4 घंटे में पहुँच जाएँगे। बस ड्राइवर यहां भी हमारे यहाँ जैसे ही हैं। सिगरेट पीते और बाते करते हुए तीव्र गति से बस चल रही थी। दोनों ओर केले और गन्ने के बडे-बड़े बगीचे। करीब नौ बजे, एक छोटे से शहर में हम लोगों ने  नाश्ता किया। यहाँ मुश्किल यह थी कि मांस के बारे में हमें पता नहीं होता था कि किसका मांस है। यहाँ सुअर और गाय का मांस सर्वाधिक मिलता है। हमने नाश्ता किया और फिर चल दिये। रास्ते में तरबूज, मक्का के बेचने वालों की लम्बी कतारें थीं। भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों की भाँति यहाँ पर भी हर एक स्टाप पर खोमचे वाले, पानी की थैलियां और फल सब्जी बेचने वाले बहुत लोग मिल जायेंगे। थोड़ी बाल मजदूरी भी दिखाई पड़ सकती है। ऊबड़-खाबड़, टूटे-फूटे रास्तों से गुजरते हम लोग अंततः 11.30 बजे अपने गन्तव्य पर पहुँचे जहाँ हजारों किसान-मजदूरों बच्चों ने हमारा स्वागत किया। यह आनन्द का क्षण था। लाखों किलोमीटर और सात समुन्दर पार दुनिया के दूसरे कोने में संघर्ष कर रहे लोगों के संघर्ष में शामिल होने का मौका मिला था। हमें जुलूस में सभास्थल तक लाया गया और दोनों ओर कतारबद्ध बच्चे हाथ हिलाकर और ताली बजाकर हमारा स्वागत कर रहे थे। थकान के बावजूद हम लोग पूरे इलाके के सर्वेक्षण पर गये। खासकर उस स्थान पर बहुत से लोगों की आंखें नम हो गईं, जहाँ अमेरिकी सैनिक अपने विरोधी समझे जाने वाले कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों को मार कर दफना देते थे। लोगों ने हमें पूरे इतिहास और अपने संघर्ष की जानकारी दी।

क्यूबा अमेरिकी साम्राज्यवाद और भौंडे वैश्वीकरण की शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक है। क्यूबा आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। क्यूबा ने दिखाया है कि एक देश की संस्कृति और आत्म सम्मान की रक्षा करना कितना आवश्यक है। क्यूबा की उपस्थिति ऐसे सम्मेलनों में अत्यन्त आवश्यक है। भूमि सुधार कार्यक्रमों को लागू करने में क्यूबा प्रथम राष्ट्र था। लोगों ने मेरी बात का तालियाँ बजाकर स्वागत किया।

पूरे इलाके में लगभग पाँच हजार परिवार रह रहे हैं। एक छोटा-सा स्कूल है और घास-बाँस के झुग्गीनुमा खूबसूरत मकान देखकर मजा आ गया। वे लोग अत्यन्त मुश्किलों में रह रहे थे। किसी भी दिन यहाँ की सेना उन्हें खदेड़ सकती थी लेकिन उनका कहना था कि जमीन हमारी माँ है और हम न तो माँ को बेच सकते हैं न ही छोड़ सकते हैं।

सभी साथियों ने उनके इस कदम की सराहना की और वैश्वीकरण की प्रक्रिया का विरोध करने को कहा। यह विश्व को गुलाम बना लेने की अमेरिकी साजिश है। हमें भोजन के लिए आमंत्रित किया गया। मक्की की रोटी, राजमा-चावल के साथ खाने से भारत की यादें ताजा हो गईं। हमने खाने के बाद हुये कार्यक्रम में लोगों का धन्यवाद किया और फिर प्रशान्त और कैरेबियन सागर की शांत लहरों का मज़ा लेने चल पड़े। कई साथियों ने समुद्र तट पर स्नान किया और सायं 6 बजे हम लोग वापस सेन पेड्रोसूला के लिए चल पड़े। चूर-चूर कर देने वाली थकान के बावजूद हमने हिम्मत नहीं हारी और कई सवालों पर बहस की। रात दस बजे हम लोगों ने भोजन किया और आगे चले। अंधेरे और ऊबड़-खाबड़ रास्ते के कारण अंततः हम रात्रि 3.00 बजे अपने होटल पहुँचे। मेरी कमर में बहुत दर्द हो रहा था।

साढ़े चार घंटे सोने के बाद अगले दिन सुबह मैं ठीक नौ बजे कान्फ्रेंस हाॅल मै था। मुझे एक कार्यसमूह की रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी। ठीक 10 बजे मुझे माइक पर आमंत्रित किया गया। मैंने 15 मिनट में अपनी विस्तृत रिपोर्ट पढ़कर सुना दिया।  साथियों ने तालियां बजाकर मेरा अभिवादन किया।

शाम को मुझे दूसरी बैठक की रिपोर्ट तैयार करनी थी ताकि सुबह सामान्य बैठक में उसे प्रस्तुत कर सकूं। मैं अपनी नार्वेजियन मित्र के साथ यह रिपोर्ट लिख रहा था जो भविष्य के कार्यक्रम तैयार करने के लिए बनाये गये कार्य समूह में चर्चा का विषय था। शाम को हम जल्दी ही सोे जाते। इतने दिनों में पहली बार 10 बजे सोया हूँ।

28 जुलाई 2000 को सम्मेलन का आखिरी दिन था। इसमें बहुत से प्रश्न आने थे। भारतीय अनुभवों के विषय में मुझे कम से कम दो बार बोलना था। यह उन लाखों मजदूर किसानों के बारे में था जो विभिन्न क्षेत्रों में कर रहे थे। भारत के लोगों की ओर से मैंने आयोजकों और अन्य प्रतिनिधियों को शुभकामनाऐं देता हूँ।

यह सवाल भारत के लिए भी महत्वपूर्ण था और उन सभी के लिए भी जो वैश्वीकरण को अवश्यम्भावी समझते है। आज सम्पूर्ण लैटिन अमेरिका नेे क्यूबा को नई ऊँचाइयाँ दी जिसे पश्चिम के राष्ट्र सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। 1960 के बाद से ही अमेरिकी तंत्र ने क्यूबा को धमकाने और खत्म करने की अनगिनत कोशिश की लेकिन इन सबके बावजूद आज क्यूबा का स्वास्थ्य विभाग दुनिया में सबसे बेहतरीन है। वहाँ कोई गरीब नहीं है और न ही सड़कों पर कोई भिखारी नजर आता है।

मेरे लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर था और मैंने अपने लातिनी अमेरिकन मित्रों की भावनाओं को समझा। कास्त्रों का एक  घंटे का भाषण मैंने पढ़ा। उनके तर्कों का मैं बहुत सम्मान करता हूँ। सोचता हूँ कि क्या हमें भी कोई कास्त्रो या माओत्से तुंग मिलेगा। मैंने कहा, ‘क्यूबा अमेरिकी साम्राज्यवाद और भौंडे वैश्वीकरण की शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक है। क्यूबा आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। क्यूबा ने दिखाया है कि एक देश की संस्कृति और आत्म सम्मान की रक्षा करना कितना आवश्यक है। क्यूबा की उपस्थिति ऐसे सम्मेलनों में अत्यन्त आवश्यक है। भूमि सुधार कार्यक्रमों को लागू करने में क्यूबा प्रथम राष्ट्र था। लोगों ने मेरी बात का तालियाँ बजाकर स्वागत किया। मैंने लैटिन अमेरिका में महिला किसानों के आंदोलन का भी समर्थन किया। एशिया के लोग इनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।

हमने देश की महिला शाक्ति को संस्कृति के धागे से बांध दिया है। इन छोटे-छोटे देशों को देखता हूँ तो लगता है कि चाहे कुछ भी हो यहाँ की हवा में कुछ भी पहनने, खाने, और करने की आजादी है। क्या हमारे यहाँ महिलाओं को यह आजादी  मिलेगी या घर-परिवार और संस्कृति की रक्षा करते-करते उसकी जिंदगी गुजर जायेगी?

शाम को कार्यक्रम समाप्त होने के बाद विशेष सांस्कृतिक संध्या का आयोजन था। हम लोग शहर में यहाँ के सबसे बड़े म्यूजियम में गए जहाँ होण्डुरास की सांस्कृतिक विविधता की जानकारी दी गई है और देश के इतिहास से सम्बन्धित महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और अन्य सामग्री रखी गई है। पत्थर की कलाकृतियां पुराने राजाओं के वस्त्र, सैनिक शासकों की वर्दियां रानियों की पोशाकें, सैनिक साज-सामान, किसानों के हल, ट्रैक्टर, कैमरा, सिलाई मशीनें और पुराने समय में किसानों के झोंपड़ीनुमा घर सभी यहाँ प्रदर्शित हैं। ये सब देखने के बाद हम लोगों को म्यूजियम के म्यूजिक हाल में आमंत्रित किया गया। जहाँ आकेस्ट्रा पर विभिन्न धुनें चल रही थीं। पूरे कैरेबियन और लातिनी अमेरिका में लोग खूब बेहतरीन नृत्य करते हैं। महिला-पुरुष सभी साथ-साथ नृत्य कर रहे थे। उनके कदमों और ताल का समन्वय बेहतरीन था। अधिकांश लोग गिटार या वायलिन बजाना जानते था। यह पूरा कार्यक्रम विविधता में एकता का प्रतीक था। हम सभी लोग इसमें नाचे। हालांकि मेरे अन्य ऐशियाई मित्र अन्य लोगों की तरह इसे उनकी संस्कृतिक विरासत का हिस्सा समझने की बजाय इसे सांस्कृतिक प्रदूषण समझते हैं। दरअसल यह हमारा सबसे बड़ा ढोंग है। हमारे निकारागुआ, होण्डुरास और फिलीपींस के मित्रों ने अपने-अपने देशों के गीत सुनाये। अंत में सभी प्रतिनिधियों साथ खाना खाया जहाँ नेपथ्य में आकेस्ट्रा की मधुर धुनेंचल रही थी।

रात दस बजे हमने अपने साथियों से विदा ली और होटल आ गये।

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.