एक अभिनेता और एक कवि जो गहरे दोस्त भी थे और जन मन के चितेरे भी

विद्या भूषण रावत

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राज कपूर की जयंती और शैलेंद्र की पुण्यतिथि पर उन दोनों की दोस्ती को याद करते हुये …. 

हिन्दुस्तानी सिनेमा में सामूहिकता को साकार करने वाले लीजेंड राज कपूर का आज 98वीं जयंती है। राज कपूर बम्बई सिनेमा की प्रसिद्ध तिकड़ी ( राज कपूर, दिलीप कुमार, देवानंद) के सबसे बड़े स्तम्भ थे। अक्सर लोग इन तीनों कलाकारों की तुलना करते हैं और फिर एक नतीजा निकाल लेते हैं लेकिन तीनों ही बेहतरीन कलाकार थे और एक दूसरे के अभिन्न मित्र। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में स्वयं लिखा है कि उन्हें सिनेमा में लाने वाले राज कपूर थे। दोनों के परिवार पेशावर से थे और पारिवारिक मित्र थे। दिलीप कुमार फिल्मों में कभी भी काम करने को उत्सुक नहीं थे लेकिन राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर थिएटर की दुनिया में एक बहुत बड़ा नाम थे और बाद में उन्होंने बड़े बैनर्स की फिल्मों में काम करना शुरू किया। राज कपूर को इसका थोड़ा लाभ हुआ होगा लेकिन यह बात भी दिलीप कुमार बताते हैं कि जब वह बम्बई आये तो उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए राज कपूर ने ही प्रेरित किया। खैर, राज कपूर ने फिल्म निर्देशक केदार शर्मा के सहायक के रूप में काम किया और उनकी पहली फिल्म नील कमल थी। ( बाद में  नीलकमल नामक फिल्म मनोज  कुमार ने भी बनाई थी, जो परदे पर खूब चली) लेकिन 24 वर्ष की उम्र में ही राज कपूर ने यह निर्णय ले लिया कि  वे क्रिएटिविटी की दुनिया में कुछ नया करेंगे और अपनी पहली फिल्म आग का निर्माण किया।

तीन लीजेंड दोस्त राजकपूर,दिलीप कुमार और देवानंद

1948 में बनी इस फिल्म का पहला सीन ही इतना खतरनाक था कि कोई भी नया ‘हीरो’ आज तक वैसा नहीं कर पाया।  पहले ही सीन में फिल्म के नायक का आग में झुलसा चेहरा दिखाने की हिम्मत एक 24 वर्षीय नौजवान ने की, जो अपने को नायक के तौर पर स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा था। आग  बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली, लेकिन राज कपूर ने सिनेमा में एक नायक और निर्माता के तौर पर दस्तक दे दी। यह अंदाजा हो गया था कि लीक से हटकर सोचकर फिल्म बनाने वाला एक युवा आ चुका है। इस फ़िल्म में राज कपूर के लिए मुकेश का गाया ज़िंदा हूँ इस तरह कि गमे-जिन्दगी नहीं, जलता हुआ दिया हूँ मगर रौशिनी नहीं, बहुत लोकप्रिय हुआ और आज भी सुना जाता है।

फिल्म आग से राज कपूर और मुकेश का चोली-दामन का साथ हो गया। राज कपूर ने मुकेश को अपनी ‘आवाज’ बताया। 1949 में राज कपूर ने फिल्म बरसात का निर्माण किया। इस फिल्म के लिए गीत शैलेन्द्र ने लिखे और संगीतकार शंकर जयकिशन भी राज कपूर की फिल्म के स्थायी साथी बने। राज कपूर के साथ परदे पर नर्गिस उनकी प्रेमिका बनीं। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त धमाका किया और इसका म्यूजिक अमर हो गया। फिल्म का टाइटल सॉन्ग बरसात में हम से मिले तुम सजन तुम से  मिले हम शैलेन्द्र का लिखा हुआ था और अत्यंत लोकप्रिय हुआ। बरसात ने दरअसल आर के बैनर्स की बुनियाद को मजबूती से स्थापित कर दिया और यहीं से आर के का लोगो, जिसमे राजकपूर की बाहों में नर्गिस दिखाई देती हैं, सिनेमा की एक अमर कृति बन गया। बरसात ने मात्र राजकपूर को ही स्थापित नहीं किया, अपितु भारतीय सिनेमा में एक पूरी डेडिकेटेड टीम को भी जन्म दिया जहाँ सिनेमा केवल एक हीरो तक सीमित नहीं है अपितु इसमें पटकथा, संगीत, गीत, फोटोग्राफी आदि सभी का योगदान है।  राज कपूर शायद अकेले वे कलाकार और निर्माता-निर्देशक थे जिन्होंने अपनी सफलताओं के लिए अपनी पूरी टीम को श्रेय दिया जिसमें उनकी हीरोइन नर्गिस के अलावा शैलेन्द्र, मुकेश, शंकर जयकिशन, लता मंगेशकर और ख्वाजा अहमद अब्बास भी शामिल थे।

बरसात के बाद राजकपूर के कृतित्व में शैलेन्द्र अभिन्न रूप से जुड़ गए। शैलेन्द्र एक महान गीतकार थे, जो मुख्यतः एक कवि थे और रेलवे में काम करते थे। ऐसा कहा जाता है कि राज कपूर ने शैलेन्द्र को एक कवि सम्मलेन में कविता पढ़ते सुना था जहाँ वह  जलता है पंजाब  नामक कविता पढ़ रहे थे। राज कपूर उनसे बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अपनी पहली  फिल्म आग में गीत लिखने के लिए कहा था जिसे शैलेन्द्र ने शालीनता से नकार दिया। फिर भी राजकपूर ने शैलेन्द्र से यह कहा कि जब भी उन्हें उनकी जरूरत महसूस हो वे उनके पास अवश्य आ सकते हैं। जब शैलेन्द्र की पत्नी गर्भवती थीं तो उन्हें पैसो की जरूरत महसूस हुई। उन्होंने दो गीत लिखे हुए थे और उसे लेकर वह राज कपूर के स्टूडियो पहुँच गए। यह उस समय की बात है जब राज कपूर फिल्म बरसात  बना रहे थे। एक दिन शैलेन्द्र को पैसों की जरूरत महसूस हुई। बरसात के दो गीत अभी लिखे जाने बाकी थे। टाइटल सॉन्ग और एक अन्य। शैलेन्द्र ने वे लिखने का वायदा किया। राज कपूर ने उन्हें पांच सौ रुपये दिए जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी रकम थी। इसलिए वायदे पर इतना पैसा लगा जिगरे की बात थी लेकिन राज कपूर तो राज कपूर ठहरे। और शैलेंद्र भी कहाँ जौ भर कम थे। दुनिया जानती है कि इसके बाद शैलेंद्र राज कपूर की प्रसिद्ध टीम का हिस्सा बन गए।

आवारा के बाद राज कपूर ने अगली हिट फिल्म दी थी श्री 420। फिल्म संगीत, कथानक, एक्टिंग, सिनेमा के हर कोण से एक क्लासिक कही जा सकती है। आज भी यह फिल्म भारत में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक ढाँचे पर एक बेहद तीखा प्रहार है। इसका गीत रमैय्या वस्ता वैय्या, मैंने दिल तुझको दिया... फिल्मांकन का वह नमूना है जिसके बारे में कोई दूसरा निर्देशक दूर-दूर तक सोच भी नहीं सकता। राज कपूर को संगीत की भी समझ थी और वह लगभग हर वाद्य बजा लेते थे। डफली बजा कर नाचने के मामले पूरे सिनेमा जगत में कोई उनके नज़दीक भी नहीं आ सकता।

बरसात के बाद राज कपूर-मुकेश और शैलेन्द्र के बिना आर के बैनर्स की किसी फिल्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। शैलेन्द्र ने जो भी खूबसूरत गीत लिखे उनमें ‘दिल’ मुकेश ने डाला और राज कपूर ने परदे पर उसे लोगों से जोड़ा। बरसात  के बाद राज कपूर की आवारा ने तो दुनिया में आर के का परचम लहरा दिया। राजकपूर भारत के पहले स्टार थे जिन्होंने भारत से बाहर विदेशों में, विशेषकर रूस, चीन, जर्मनी, हंगरी आदि देशों में अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की। शैलेन्द्र के गीत को मुकेश की आवाज ने घर-घर पहुंचा दिया। आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ…. आज भी विदेशों में वैसे ही लोकप्रिय है और इसके बहुत से वर्जन आपको दिखाई देंगे। इस फिल्म में शैलेन्द्र के गीतों ने जबर्दस्त सफलता प्राप्त की। राजकपूर के निर्देशन की तो बहुत तारीफ हुई ही। फिल्म का पूरा कथानक हमारे समाज में व्याप्त सामंती चरित्र का पर्दाफाश करता है जो यह मानता है कि अपराधी का बेटा ही अपराधी होता है। बड़े लोगों के तो अपराध माफ़ हैं। राज कपूर और नर्गिस के रोमांस को इस फिल्म ने एक नया मुकाम दिया। दोनों पर फिल्माया हुआ गीत — दम भर जो उधर मुंह फेरे, ओ चन्दा, मैं उनसे प्यार कर लूंगा …. सिनेमेटोग्राफी की दृष्टि से बेहतरीन प्रस्तुति है। इसी फिल्म में नर्गिस पर फिल्माया घर आया मेरा परदेशी … गीत को  राजकपूर ने ड्रीम सीक्वेंस में ऐसे फिल्मांकित किया है जो उन्हें सिनेमा के सबसे पहले और बड़े शोमैन का दर्जा देता है।

कथानक, गीत-संगीत और सिनेमेटोग्राफी राज कपूर के फिल्मों का प्रमुख घटक थे। राज कपूर ने कभी यह तो नहीं कहा कि वह ‘आर्ट’ सिनेमा बनाते हैं लेकिन व्यावसायिक सिनेमा में हमारे सामाजिक सवालों को उन्होंने बेहद संजीदगी और स्पष्टता के साथ डाला। सिनेमा में इतने प्रयोग करने वाला कोई स्टार नहीं था। उनके समकालीन दिलीप कुमार इतने बड़े रिस्क लेने को कभी तैयार नहीं थे और उनका अधिकांश सिनेमा बनी-बनाई थीम पर होता था, लेकिन राज कपूर इस मायने में अपने सारे समकालीन कलाकारों से बहुत आगे थे। यदि सिनेमा, संगीत और लोगों के सवाल पर कोई उनके नजदीक आता था वह थे गुरुदत्त, जो वाकई एक बेहद संवेदनशील अभिनेता और निर्देशक थे। बहुत कम उम्र में ही उनका देहांत हो गया। हालाँकि जाते-जाते वे हिन्दुस्तानी सिनेमा को प्यासा, साहेब बीवी और गुलाम,  कागज के फूल आदि कभी न भूलने वाली फिल्में दे गए। 1953 में राज कपूर ने फिल्म बूट पालिश बनाई जो बहुत नहीं चली। वह इसमें किसी बड़ी भूमिका में नहीं थे लेकिन इस फिल्म का गीत नन्हे मुन्हे बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…  बहुत चला और इसे न केवल फिल्मफेयर के लिए नामांकन मिला अपितु काँस फिल्म फेस्टिवल के ग्रैंड ज्यूरी प्राइज के लिए भी नोमिनेट किया गया था। 1956 में राज कपूर की जागते रहो को कार्लो वैरी अन्तरराष्ट्रीय फेस्टिवल में क्रिस्टल ग्लोब अवार्ड मिला। ये दोनों ही फिल्में अपने आप में क्लासिक थीं लेकिन शायद बॉक्स ऑफिस के हिसाब से उतना बेहतरीन संगीत नहीं दे पाईं। राज कपूर जानते थे कि सिनेमा की सफलता में उसके गीत-संगीत की बहुत बड़ी भूमिका होती है और वे यह सुनिश्चित करते हैं कि यह बेहतरीन हो इसीलिये राज कपूर को अपने कविराज पर बहुत गर्व था।

1961 से इस फिल्म को बनाने के लिए शैलेन्द्र ने अपनी पूरी पूँजी लगा दी। फिल्म के बनने में बहुत देर हुई और अंत में 1966 तक यह फिल्म बनी। फिल्म के गीत-संगीत को बहुत सराहा गया। फिल्म फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए भी नामित हुई लेकिन बॉक्स ऑफिस पर पिट गई। इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला लेकिन व्यवसायिक असफलता ने शैलेन्द्र को बेहद दुखी कर दिया। फिल्म में शैलेन्द्र ने अपनी विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया।

आवारा के बाद राज कपूर ने अगली हिट फिल्म दी थी श्री 420। फिल्म संगीत, कथानक, एक्टिंग, सिनेमा के हर कोण से एक क्लासिक कही जा सकती है। आज भी यह फिल्म भारत में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक ढाँचे पर एक बेहद तीखा प्रहार है। इसका गीत रमैय्या वस्ता वैय्या, मैंने दिल तुझको दिया…  फिल्मांकन का वह नमूना है जिसके बारे में कोई दूसरा निर्देशक दूर-दूर तक सोच भी नहीं सकता। राज कपूर को संगीत की भी समझ थी और वह लगभग हर वाद्य बजा लेते थे। डफली बजा कर नाचने के मामले पूरे सिनेमा जगत में कोई उनके नज़दीक भी नहीं आ सकता।  उनके मँझले बेटे ऋषिकपूर इस मामले में सफल माने जाते हैं  जिनकी डफली पर कई गाने हिट हुए हैं। इस फिल्म में मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के.... और  दिल का हाल सुने दिल वाला, छोटी सी बात न मिर्च मसाला, कहके रहेगा कहने वाला…. आज के समाज के भ्रष्ट रूप पर एक करारा प्रहार है। राजकपूर के पुश्किन शैलेन्द्र गंभीर बात को हलके ढंग से कहने में माहिर थे। उनके गाने इतनी आसानी से दिल की गहराइयों को छू लेते हैं कि आज तक साधारण शब्दों में बड़ी बात कहने में शैलेन्द्र का कोई मुकाबला नहीं।

इसी फिल्म का आइकॉनिक सॉन्ग बना प्यार हुआ इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यों डरता है दिल, कहता है दिल रस्ता मुश्किल मालूम नहीं है कहा मंजिल…., लता मंगेशकर और मन्ना डे द्वारा गया है।  इस गाने को देखें तो आपको पता चलेगा कि किसी भी गीत में रोमांस और सेंसुअसनेस  को लाने के लिए उसे भोंडा बनाने की जरूरत नहीं है। जिस प्रकार से पूरे गाने को फिल्माया गया वह हर एक प्रेमी के लिए एक स्वप्न है और यह दिखाता है कि रोमांस के लिए नग्नता की जरूरत कतई नहीं है। राज कपूर और नर्गिस दत्त ने आग से लेकर जागते रहो  तक 16 फिल्मों में साथ काम किया और रुपहले परदे पर वे सबसे रोमांटिक युगल के तौर पर जाने जाते हैं।

फिल्म तीसरी कसम की तैयारी के दौरान

हालाँकि राजकपूर और नर्गिस परदे पर एक दूसरे के लिए बने हुए थे और उनके रिश्तों के चर्चे भी होने लगे थे। एक बार उन्होंने नर्गिस से कहा कि ‘कृष्णा, मेरी पत्नी, मेरे बच्चो की माँ है और और मै चाहते हूँ कि तुम मेरी फिल्मों की माँ बनो।’

एक अभिनेता के तौर पर राजकपूर ने अपने बैनर के बाहर की फिल्मों में भी काम किया और वे खूब चलीं भी। राज कपूर और दिलीप कुमार की अंदाज बहुत हिट फिल्म थी जो महबूब खान ने बनाई थी। इसमें राज कपूर का रोल थोड़ा नकारात्मक था। मुकेश के गाये, नौशाद के संगीतबद्ध किये सभी गीत दिलीप कुमार पर फिल्माए गए थे लेकिन ऐसा कहा जाता है कि राजकपूर का नकारात्मक रोल लोगों को ज्यादा पसंद आया।  हालांकि इसके बाद से दोनों किसी फिल्म में साथ नहीं आये। राज कपूर और नर्गिस दत्त की एक बेहद रोमांटिक फिल्म थी चोरी चोरी  जो 1956 में बनी थी और इसके गीत शैलेन्द्र ने लिखे और संगीत शंकर जय किशन का था। राजकपूर के लिए सभी गानों को मन्ना डे ने आवाज दी और संगीत और गानों की दृष्टि से यह फिल्म सुपर-डुपर हिट थी।  इसके गीत आज भी उतने ही जवान हैं जितने पहले थे। रोमांस के ऐसे गीतों का आज भी मुकाबला नहीं।  आजा सनम, मधुर चांदनी में हम-तुम मिलें तो वीराने में भी आ जायेगी बहार…. हो या जहाँ मैं जाती हूँ, वहीं चले आते हो…., अथवा ये रात भींगी भींगी, ये मस्त फिजाएँ, उठा धीरे धीरे वो चाँद प्यारा प्यारा…. सभी अद्भुत गीत हैं। लता मंगेशकर के गाये और नर्गिस पर फिल्माए पंछी बनूं उड़ती फिरूँ मस्त गगन में… आज मैं आज़ाद हूँ, दुनिया के चमन में… आज भी उतने ही कर्णप्रिय और सकारात्मक हैं जैसे पहले थे।

राज कपूर की आर के फिल्म्स से बाहर की फिल्मों में प्रमुख थीं  फिर सुबह होगी, अनाड़ी, कन्हैया, शारदा, परवरिश, मैं नशे में हूँ, आशिक,  श्रीमान सत्यवादी, छलिया, नज़राना, दूल्हा दुल्हन।  इनमें भी बहुत सी फिल्मो में शैलेन्द्र ने उनके गीत लिखे और मुकेश ने अपनी आवाज से उन्हें अमर किया. ‘किसी की मुस्कुराहटो पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभाशाली गीतों में कहा जा सकता है. इसके अलावा, मै आशिक हूँ बहारो का, या तुम जो हमारे मीत न होते, गीत ये मेरे गीत ना होती बेहद ही संवेदनशील गीत है. फिल्म मै नशे में हूँ में शैलेन्द्र ने बेहद खूबसूरत गीत लिखा “ मुझको यारो माफ़ करना मै नशे में हूँ.

फिर सुबह होगी, एक भविष्य दृष्टा फिल्म थी जिसमें राज कपूर ने बिलकुल अलग रोल किया और इस फिल्म के गीत साहिर ने लिखे और उसका संगीत खैय्याम का था लेकिन यहाँ भी मुकेश की दिलकश आवाज ने वो सुबह कभी तो आयेगी को अमर कर दिया। आज भी ये गीत हमारे सामाजिक आन्दोलनों का प्रमुख गीत है। इसी फिल्म में साहिर का एक और बेहतरीन गीत है चीनो-अरब हमारा, सारा जहाँ हमारा, रहने को घर नहीं है, हिंदोस्ता हमारा…, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना शायद पहले था। कवियों और लेखको के ये शब्द तभी सामने आते हैं जब सत्ता आपकी भावनाओं की कद्र करती है।  वह जमाना ‘नेहरुवियन एज’ मानी जाती है और इसलिए शैलेन्द्र हों या साहिर। सभी ने अपनी अभिव्यक्ति को अत्यंत सशक्त तरीके से प्रस्तुत किया।

शैलेन्द्र और राज कपूर का अगला कमाल  था जिस देश में गंगा बहती है।  यह फिल्म 1960 में आई।  राजकपूर ने यह फिल्म चम्बल में डकैती की समस्या को लेकर बनाई थी जिस पर दरअसल भूदान आन्दोलन का भी हल्का असर दिखाई देता है। अगर कथानक की दृष्टि से देखें तो राज कपूर डकैती को एक सामाजिक दृष्टिकोण से देख रहे थे और यह कि ऐसी समस्याओं का उत्तर मात्र बन्दूक या दवाब से नहीं है। प्यार प्यार प्यार … यह है फिल्म के नायक की विचारधारा।  इसके गीत इतने सशक्त हैं कि वे आज भी हमें एक नयी ऊर्जा देते हैं और हमें प्रेम सिखाते हैं। इस फिल्म में राज कपूर एक डफली वाले नायक दीखते हैं। इतने भोले कि उनके भोलेपन पर भी केवल प्यार आता है। फिल्म की शुरुआत मेरा नाम राजू घराना अनाम, बहती है गंगा, जहा मेरा धाम…. बहुत कर्णप्रिय है लेकिन इस फिल्म का सबसे चर्चित और सशक्त गीत बना —  होंठों पे सच्चाई रहती है, जहाँ दिल में सफाई रहती है, हम उस देश के वासी है, जिस देश में गंगा बहती है…. यह गीत इस फिल्म का थीम गीत भी है और मुकेश ने इसे जिस मिठास से गाया वह आज भी दिल के अन्दर सीधे प्रवेश करती है। इस फिल्म में एक क्लासिक कव्वाली है जिसमें मुकेश, लता, शमशाद बेगम, मन्ना डे और एक दो और लोग गाते है — हम आग से खेलते हैं, हम आग से खेलना जानते हैं…. यदि पूरा गीत ढंग से सुनेंगे तो शैलेन्द्र के शब्द विन्यास को सलाम करना पड़ेगा। कमाल की भाषा, शब्दावली थी उनके पास।  इसी फिल्म में पद्मिनी पे फिल्माया गया ओ बसंती, पवन पागल, ना जा रे ना जा अपनी लोकेशन के कारण भी खूबसूरत दिखता है। लेकिन शैलेन्द्र का इस फिल्म में  अंतिम गीत सबसे अधिक छू लेने वाला है। इसे मुकेश की आवाज ने और भी अधिक दिलकश बना दिया—

आ अब लौट चलें,

नैन बिछाए, बाहें पसारे,

तुझको पुकारे देश तेरा…

आँख हमारी मंजिल पर है,

दिल में ख़ुशी की मस्त लहर है,

लाख लुभाए महल पराये,

अपना घर तो अपना घर है…. 

शैलेन्द्र की ये पंक्तियाँ उनके जीवन का मूल हैं। आज के दौर में भी ये पंक्तियाँ बहुत बड़ी बात कह रही हैं।

जिस देश में गंगा बहती है के बाद राज कपूर ने रंगीन फिल्मों के दौर में प्रवेश किया और उनकी अगली फिल्म थी संगम जिसमें उनके साथ राजेंद्र कुमार और वैजयन्ती माला ने काम किया। इस फिल्म के गीत भी बेहद सराहे गए। दोस्त दोस्त न रहा, प्यार प्यार न रहा…. हो या हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गायेगा.…या  मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमना, बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं लोगों ने बहुत पसंद किये हालांकि इस फिल्म में राजेंद्र कुमार पर फिल्माया और मोहम्मद रफ़ी का गाया ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर, के तुम नाराज मत होना…  बिनाका गीत माला की सालाना लिस्टिंग में टॉप पर था। इसी फिल्म में राजकपूर पर मुकेश का गाया गीत बेहद खूबसूरत है — ओह महबूबा, तेरे दिल के पास ही है मेरी मंजिले मक़सूद। 

राज कपूर के लिए शैलेन्द्र ने मेरा नाम जोकर के लिए भी गीत लिखे और उनका लिखा जीना यहाँ मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ… बहुत लोकप्रिय हुआ।  मेरा नाम जोकर राज कपूर की ‘आत्मकथा’ थी लेकिन इतने बड़े पैमाने पर बनाई गयी इस फिल्म की असफलता ने राज कपूर को बुरी तरह तोड़ दिया। बाद में इस फिल्म को सभी ने पसंद किया और इसके सभी गीत सुपर हिट थे। जाने कहाँ गए वो दिन….,  ए भाई ज़रा देख के चलो…., कहता है जोकर सारा ज़माना, आधी हकीकत आधा फसाना …. आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर कहते हैं कि ‘आज के दौर में मेरा नाम जोकर को बहुत अधिक देखा गया है और यदि राज कपूर जिन्दा होते तो उन्हें यह बेहद अच्छा लगता।’

राज कपूर ने धरम-करम, बीवी ओ बीवी, कल आज और कल आदि फिल्मों का निर्माण भी किया और धीरे-धीरे अपने को अभिनय की दुनिया से अलग कर लिया। मेरा नाम जोकर के बाद उन्हें पता चल गया कि फिल्म अभिनेता के तौर पर अब उन्हें विदा ले लेना चाहिए और फिर उन्होंने अपने मँझले बेटे ऋषि कपूर को लेकर बॉबी बनाई जिसने बॉक्स ऑफिस पर सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। बाद की फिल्मों में सत्यम शिवम् सुन्दरम, प्रेम रोग और राम तेरी गंगा मैली शामिल हैं। 1979 में मुकेश के निधन के बाद से ही उनकी फिल्मों में अन्य गायक कलाकार आने लगे थे। जब मुकेश का निधन हुआ तो राज कपूर अवाक थे।  उन्होंने कहा, ‘आज मेरी आवाज चली गयी है। मुकेश के बिना तो मैं मात्र हाड़-मांस का एक पुतला हूँ।’

राज कपूर के कविराज शैलेन्द्र को भी एक बार फिल्म बनाने की सूझी। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम  उन्हें इतनी पसंद आयी कि उन्होंने राज कपूर को लेकर तीसरी कसम  बनाने का निर्णय ले लिया। वहीदा रहमान इस फिल्म की हिरोइन थीं और उन्होंने अपना किरदार बेहद ख़ूबसूरती से निभाया लेकिन फिल्म दरअसल नायक हिरामन के  इर्द-गिर्द घुमती है जो एक गाड़ीवान है और बहुत भोला-भाला है। राज कपूर ने  ग्रामीण पृष्ठभूमि के एक भोले-भाले व्यक्ति की भूमिका अच्छी तरह से निभाई। फिल्म का संगीत शंकर जयकिशन का था और इसमें गीत शैलेन्द्र के अलावा, हसरत जयपुरी और मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे। इस फिल्म के सभी गीत क्लासिक हैं और बहुत खूबसूरत हैं। मुकेश ने उन्हें जीवन्तता प्रदान कर दी।  दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनायी….,  सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है…., सजनवा बैरी हो गए हमार…. मुकेश द्वारा एवं  पान खाए सैंय्या हमार… आशा भोंसले द्वारा और चलत मुसाफिर मोह लिए रे…. मन्ना डे द्वारा गाया गया  सभी प्रचलित गीत बने।

1961 से इस फिल्म को बनाने के लिए शैलेन्द्र ने अपनी पूरी पूँजी लगा दी। फिल्म के बनने में बहुत देर हुई और अंत में 1966 तक यह फिल्म बनी। फिल्म के गीत-संगीत को बहुत सराहा गया। फिल्म फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए भी नामित हुई लेकिन बॉक्स ऑफिस पर पिट गई।  इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला लेकिन व्यवसायिक असफलता ने शैलेन्द्र को बेहद दुखी कर दिया। फिल्म में शैलेन्द्र ने अपनी विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया। फिल्म के अंत को लेकर कई सवाल थे और बहुत से लोगों ने फिल्म को अनिश्चित अंत के स्थान पर हिरामन और हीराबाई के मिलन से करवा कर हैप्पी एंडिंग करने की बात कही थी लेकिन शैलेन्द्र को ऐसा मंज़ूर नहीं था क्योंकि वे इसे लीक से हटकर बनाना चाहते थे। उन्होंने जो किया वह आज की भी हकीकत है, जैसे कई बार जिसे हम चाहते हैं और लगता है चाहत बहुत नजदीक है लेकिन वह कभी मिल नहीं पाती। दोनों की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। इसलिए इस फिल्म के निर्माता ने इसे वैसे ही छोड़ दिया। लोगों को सोचने पर मजबूर किया लेकिन जहाँ लोगों सोचना नहीं चाहते तो वहाँ ऐसी अनिश्चितता व्यवासायिक सिनेमा के लिए नुकसानदायक होती है और इस मामले में भी यही हुआ।

14 दिसंबर 1966 को जब राज कपूर अपना 42वाँ जन्मदिन मना रहे थे तो उन्हें बेहद मनहूस खबर मिली। उनके कविराज शैलेन्द्र ने 43 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। राजकपूर ने शैलेन्द्र को याद करते हुए फिल्मफेयर  पत्रिका में एक श्रद्धांजलि लिखी :

‘मेरी आत्मा का एक हिस्सा चला गया है। यह ठीक नहीं है। मैं अपने बगीचे के सबसे खूबसूरत गुलाबों में से एक के चले जाने पर टूट जाता हूँ, रोता हूँ। वह मेरे होने का एक बड़ा हिस्सा था। कितना ईमानदार और स्वार्थरहित इन्सान था वह। अब वह चला गया है और मेरे पास सिवाय उसको याद करने और रोने के और कुछ नहीं बचा है।’

आखिर आम आदमी की ईमानदारी को प्रस्तुत करता उनका यह कथन — कुछ लोग जो ज्यादा जानते हैं, इंसान को कम पहचानते हैं, ये पूरब है पूरब वाले हर जान की कीमत जानते हैं.. मिल जुल के रहो और प्यार करो, एक चीज यही जो रहती है, हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है…

राज कपूर यह कहते हैं कि यदि शैलेन्द्र न होते तो उनकी आमजन का प्रतिनिधित्व करनेवाली इमेज नहीं बनती। ये शैलेन्द्र की कविताएं हैं जिन्होंने राज कपूर को दुनिया में अभूतपूर्व तरीके से लोकप्रिय बनाया।

यह सब कहने के लिए जिगर, जज्बा और ईमानदारी होनी चाहिए। राज कपूर में वह जूनून  था। वह ईमानदारी थी जिसने उन्हें शैलेन्द्र जैसे महाकवि को सिनेमा में इतने बेहतरीन गाने बनाने को प्रेरित किया या उनसे प्रेरणा ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में इतने बड़े क्रिएटिव लोग एक साथ और पूरी तरह से एक दूसरे को समर्पित लोग नहीं मिलेंगे। अपने सभी संगी-साथियों को अपनी और अपनी फिल्मों की सफलता का श्रेय केवल राजकपूर ही कर सकते थे। राज कपूर ने दिखाया के एक अच्छे सिनेमा के लिए अच्छे लोगों का साथ होना कितना जरूरी है। फिल्मों में नायकों के इर्द-गिर्द बातों को बढ़ाने का प्रचलन शुरू हो चुका है जहाँ नायक ही सब कुछ है। आज के दौर में क्या हम अपने लेखकों, संगीतकारों और अन्य कलाकारों को कितना क्रेडिट देते हैं? हकीकत यही कि राज कपूर आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े हीरो हैं और मैं उन्हें हीरो बिलकुल उस सन्दर्भ में कह रहा हूँ जहाँ एक कलाकार अपनी सफलताओं में अपने हरेक साथी के योगदान को खुले दिल से स्वीकारता है। राज कपूर, शैलेन्द्र-मुकेश एक अविभाज्य कॉम्बिनेशन था जिसने भारतीय सिनेमा को एक मानववादी मूल्यों की एक नयी संस्कृति दी। समाजवादी चिंतन दिया और हमें केवल भाग्य और भगवान के भरोसे नहीं छोड़ा। राज कपूर और उनके कविराज शैलेन्द्र को हमारा सलाम।

तू ज़िंदा है तो जिन्दगी की जीत पे यकीं कर,

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर..

ये गम के और चार दिन,

सितम के और चार दिन,

ये दिन भी जायेंगे गुजर,

गुजर गए हज़ार दिन…

शैलेन्द्र का लिखा ऐसा जनगीत जो हर किसी में उत्साह और उर्जा भर देता है :

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

1 Comment
  1. J N Shah says

    साथी,पूरा लेख पढ़ा।काफी मेहनत और होम वर्क कर लिखा गया है।कला, संस्कृति और फिल्मों के क्षेत्र में जो अश्लीलता, भोंडापन और फूहड़ता समाज में लंबे अरसे से फैलाई गई है उसके बरक्स हम लोग इन महान कलाकारों गीतकारों संगीतकारों निर्देशकों के कालजई कृतियों को सामने लाकर एक विकल्प दे सकते हैं।पहले हम लोग स्वयं इन महान फिल्मों को समूह में देखें।हाल ही में हम लोगों ने शैलेन्द्र की कालजई फिल्म तीसरी कसम देखी।एक ऐसे समाज में जहां चाहत ख्वाहिश बमुश्किल हकीकत बन पाते हैं वैसे समाज में इस फिल्म को अनिश्चित मुकाम पर छोड़ कर शैलेन्द्र ने बिल्कुल सही सवाल इस फिल्म के द्वारा उठाया।
    दिल का हाल सुने दिलवाला की अगली लाइन”सीधी सी बात न मिर्च मसाला” है।
    लेख के लिए आपको लाल सलाम।

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