और अब भाड़े की फौज (डायरी 15 जून, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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 शासक और व्यापारी में अंतर होता है। कहने का मतलब यह कि शासक का काम व्यापार करना नहीं है और कोई भी देश कोई कंपनी नहीं होती है। भारत तो ऐसे भी अलग तरह का देश है। जहां अनेक विभिन्नताएं हैं। इन विभिन्नताओं में धर्म, जाति, भूगोल, भाषा आदि अनेक विभिन्नताएं शामिल हैं। लेकिन इसके बावजूद यह एक देश है, क्योंकि यह कंपनी नहीं है।
लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं। देश को कंपनी की तरह चलाया जा रहा है। हालांकि इसकी शुरुआत का श्रेय भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही जाता है। एक समय उन्होंने ही राज्य को एक कंपनी की तरह चलाना चाहा था। लेकिन सफल नहीं हो सके। लिहाजा अब वे बिहार को कंपनी मोड में नहीं चला रहे हैं।
दरअसल, कल केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने महत्वपूर्ण ऐलान किया है। उनके मुताबिक, अब इस देश में कांट्रैक्ट पर सैनिक बहाल होंगे। कांट्रैक्ट की अवधि चार साल की होगी। जो रंगरूट बहाल होंगे, उन्हें भारत सरकार ‘अग्निवीर’ कहेगी, लेकिन उन्हें संगठित क्षेत्र के मजूदर की भी हैसियत नहीं देगी। मतलब यह कि सरकार ऐसे रंगरूटों को 30 हजार से लेकर 40 हजार रुपए प्रतिमाह तक वेतन देगी। वे किसी पीएफ और पेंशन के हकदार नहीं होंगे। राजनाथ सिंह ने एक बात और कही है कि 25 फीसदी रंगरूटों की सेवा स्थायी करने के लिए प्रावधान किये जाएंगे। (बाकी 75 फीसदी चाहे जाकर पकौड़ा तलें।)
वहीं, राजनाथ सिंह ने यह भी कहा है कि रंगरूटों को 48 लाख रुपए का बीमा कवर दिया जाएगा। यह राशि उनके आश्रितों को तब दी जाएगी, जब वे शहीद होंगे। इसके अलावा दो और अहम बातें राजनाथ सिंह ने कही हैं। एक तो यह कि भर्ती के लिए मानकों में कोई ढील नहीं दी जाएगी और दूसरी बात यह कि जाट, सिक्ख, राजपूत रेजीमेंट आदि जो कि विशिष्ट सेवा के लिए जानी जाती हैं, अपने हिसाब से जवानों की भर्ती करती रहेंगीं।

मेरी चिंताएं दूसरी हैं। एक तो यह कि जो तथाकथित अग्निवीर होंगे, जिनके दिमाग में यह बात रहेगी कि वे केवल चार साल के लिए ही सैनिक हैं, तो क्या वे उतने ही प्रतिबद्ध होंगे, जितने कि नियमित सैनिक? यदि नहीं हुए तो क्या इसका असर देश की सुरक्षा पर नहीं पड़ेगा? दूसरी चिंता यह है कि आज ऊंची जातियों के लोग, जिनके पास धन-संपदा है, वे अपने बच्चों को सेना की नौकरी में नहीं भेजना चाहते हैं। यदि भेजते भी हैं तो वे उच्च पदों को ध्यान में रखकर। रंगरूट यानी मुख्य मोर्चे पर लड़नेवाले सैनिकों में अधिकांश दलित-पिछड़े ही होते हैं।

अब यहां से बात शुरू की जा सकती है कि यह पूरा माजरा क्या है। दरअसल, भारत सरकार बिजनेस कर रही है। वह यह देख रही है कि बेरोजगारी चरम पर है और मानव बल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। उधर भारतीय सैनिकों की तरफ से लगातार वेतन व पेंशन संबंधी मामले उठाए जाते रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार ने एक विशुद्ध उद्योगपति के माफिक अपने मजदूरों को सबक सिखाने का फैसला लिया है। जाहिर तौर पर जो चार साल के लिए कांट्रैक्ट पर बहाल किये जाएंगे, उनकी हैसियत नियमित सैनिकों के जैसी तो नहीं हाी होगी।
जैसा कि मैंने पहले कहा कि यह फार्मूला बिहार सरकार पहले ही अपना चुकी है। बिहार में नीतीश कुमार ने सेवानिव‍ृत्त सैनिकों को कांट्रैक्ट पर रखना शुरू किया। इसके अनेक फायदे बिहार सरकार को हुए। पहला तो यह कि पेंशन व पीएफ आदि के झंझट से मुक्ति मिली। दूसरा फायदा यह कि पुलिस कर्मियों के प्रशिक्षण पर होनेवाले खर्च से सरकार बच गई, क्योंकि सेवानिवृत्त सैनिक सैन्य कला में पहले से प्रशिक्षित होते हैं। जब मैं पटना में पत्रकारिता कर रहा था तब अनेक ऐसे कांट्रैक्ट वाले पुलिसकर्मियों से बात होती थी, जो यह कहते थे कि सरकार द्वारा नियोजित नियमित पुलिसकर्मियों की तुलना में सरकार हमें अधिक खतरे वाले कामों में तैनात करती है और वेतन तो खैर, अलग बात है, सम्मान भी नहीं मिलता है।
जाहिर तौर पर नरेंद्र मोदी सरकार का कांट्रैक्ट पर सैनिकों की बहाली का फार्मूला उनका अपना फार्मूला नहीं है। यह फार्मूला नीतीश कुमार का है, जिसे नरेंद्र मोदी अब लागू कर रहे हैं। लेकिन मेरी चिंताएं दूसरी हैं। एक तो यह कि जो तथाकथित अग्निवीर होंगे, जिनके दिमाग में यह बात रहेगी कि वे केवल चार साल के लिए ही सैनिक हैं, तो क्या वे उतने ही प्रतिबद्ध होंगे, जितने कि नियमित सैनिक? यदि नहीं हुए तो क्या इसका असर देश की सुरक्षा पर नहीं पड़ेगा? दूसरी चिंता यह है कि आज ऊंची जातियों के लोग, जिनके पास धन-संपदा है, वे अपने बच्चों को सेना की नौकरी में नहीं भेजना चाहते हैं। यदि भेजते भी हैं तो वे उच्च पदों को ध्यान में रखकर। रंगरूट यानी मुख्य मोर्चे पर लड़नेवाले सैनिकों में अधिकांश पिछड़े-दलित ही होते हैं। ऐसे में मेरी चिंता यह है कि क्या यह कांट्रैक्ट सैनिक का फार्मूला दलित-पिछड़े नौजवानों को ठगने के लिए नहीं है? मेरी तीसरी चिंता यह है कि चार साल तक सैनिक रहने के बाद जो युवा समाज में वापस लौटेंगे, उनकी मानसिकता में तब आमूलचूल परिवर्तन हो चुका होगा। मैं यह नहीं कर रहा कि वे हिंसक हो जाएंगे, लेकिन उन्हें हिंसा अन्यायपूर्ण तो नहीं ही लगेगी। तो क्या भारत सरकार ऐसा ही समाज चाहती है, जिसके अधिकांश युवाओं में अहिंसा के लिए कोई जगह नहीं हो।

जब देश को एक कंपनी हुकूमत ने मान ही लिया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो यह भी कह चुके हैं कि व्यापार उनके खून में है तो कोई क्या कह सकता है? मैं तो इस देश के बारे में सोच रहा हूं और लोकतंत्र के बारे में।

बहरहाल, ये सब मेरी चिंताएं हैं। जब देश को एक कंपनी हुकूमत ने मान ही लिया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो यह भी कह चुके हैं कि व्यापार उनके खून में है तो कोई क्या कह सकता है? मैं तो इस देश के और लोकतंत्र के बारे में बारे में सोच रहा हूं । कल मेरी एकमात्र फुआ तेतरी दीदी का निधन हो गया। वह बीमार थीं। तो कल पूरा दिन उदासी में बीता। शाम होते-होते उदासी दूर हुई। प्रेमिका से बातचीत हुई तो हमारी बातचीत के केंद्र में लोकतंत्र रहा। एक कविता सूझी।
मैं तुमसे प्यार करता हूं
और मानता हूं कि
प्यार आदमी को 
लोकतांत्रिक बना देता है
हां, लोकतंत्र को स्वीकार करना
प्यार करने की पहली 
और आखिरी शर्त है
और यह बात मैं 
इसलिए नहीं कह रहा कि 
मैं तुमसे प्यार करता हूं
बल्कि इसलिए कि
जब तुम हंसती हो
समता की हंसी
तब तुम्हारे संग
फूल, पहाड़, समंदर 
सब हंसते हैं।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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