मुसलमानों पर हमले का एक और टूल

सलमान अरशद

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पैगम्बरे इस्लाम पर अमर्यादित टिप्पणी हुई और उसके बाद मुसलमानों पर हमलों का एक सिलसिला चल पड़ा। इस देश में मुसलमानों पर हमले के मामले में कानून, संविधान और कोर्ट ने कोई रुकावट पैदा करना फ़िलहाल बंद कर दिया है। मुसलमानों पर हमलों का जो नया दौर शुरू हुआ है, उसके बुनियाद में जो मुद्दा है, उस पर हिन्दुओं को तो छोड़िये, खुद मुसलमानों की भी समझ बहुत कम है। इस लेख में इसे ही समझने की कोशिश करते हैं। पैगम्बरे इस्लाम ने क्या 6 साल की लड़की से शादी की थी? इस पर चर्चा से पहले ये जानना ज़रूरी है कि आज के दौर में इस तरह के बहस की जरूरत क्या है?

भारतीय राजनीति मुसलमानों के प्रति फैलाई गयी नफ़रत पर पूरी तरह निर्भर हो गयी है, इस नफ़रत के डोज़ को ज़रा भी कम किया गया तो लोगों को शिक्षा, सेहत, रोज़गार और महंगाई के मामलात नज़र आने लगेंगे, अगर ऐसा हुआ तो शासक वर्ग के लिए बेलगाम लूट आसान न रह जाएगी और बहुत मुमकिन है कि सत्ता का स्वरूप भी बदल जाये।

पैगम्बरे इस्लाम की शादी को लेकर जो हमला अक्सर होता रहता है वो शब्द प्रमाण के कारण संभव हुआ है। दरअसल, बुख़ारी ने अपनी हदीस में कहा है कि पैगम्बरे इस्लाम ने हज़रते आयशा से जब शादी की तो उनकी उम्र 6 साल थी और जब विदाई करवाई तो उम्र 9 साल थी।

पिछले कुछ सालों में भारतीय मानस के एक खास पहलु का परीक्षण हुआ है। इसके अनुसार भारतीय जनता के एक बड़े हिस्से को दूसरों की पीड़ा में सुख मिलता है, ये सुख मिलता रहे तो वो अपनी बर्बादी को न सिर्फ़ स्वीकार करने के तैयार हो जाते हैं बल्कि बर्बादी का जश्न भी मनाते हैं। भारतीय मानस में परपीड़ा की जड़ें सदियों गहरी हैं, जाति व्यवस्था में हर जातीय समूह को कम या ज़्यादा परपीड़ा का मौका मिलता है, भारतीय मानस के परपीड़ा के इस सदियों पुराने अभ्यास ने उन्हें स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुता के मूल्य को ग्रहण करने से रोक दिया है। नफ़रत पर आधारित सियासी कामयाबियों ने साबित किया है कि देश में परपीड़कों की इतनी संख्या तो हो ही गयी है कि वो मिलकर राजनीतिक सत्ता का निर्माण कर सकते हैं, और इनकी संख्या लगातार बढ़ भी रही है। यही कारण है कि मुसलमानों के प्रति नफ़रत और इस नफ़रत को बनाये रखने के लिए अंतहीन मुद्दों की लिस्ट तैयार रहती है।

अब बात पैगम्बरे इस्लाम के 6 साल की बच्ची से शादी की, लेकिन यहाँ ये भी देखन होगा कि शादी की जो उम्र आज तय की गयी है ये अभी आज़ादी से पहले नहीं थी और कानून के बावजूद आज भी देश में बड़े पैमाने पर बाल विवाह होते हैं। राजस्थान और देश के कई हिस्सों में आज भी 5 से 10 साल के उम्र के बच्चों की शादियाँ होती हैं और 15 से 20 के बीच इन लड़कियों की विदाई होती है। अभी पिछली सदी के शुरुआत तक लगभग पूरी दुनिया में बाल विवाह का चलन था और ये पूरी तरह आज भी ख़त्म नहीं हुआ है। हिन्दू धर्म के अंतर्गत जब लड़की की शादी के लिए उम्र को 9 साल से 12 साल किया गया तो तिलक सहित कई हिन्दू नेताओं ने इसका विरोध किया था। इसलिए आज से लगभग 15 सौ साल पहले अगर ऐसी शादी हुई थी तो इस पर हैरानी की कोई ज़रूरत नहीं है। अगर आप को इस बात से हैरानी है कि एक अधेड़ उम्र का इन्सान एक कम उम्र की लड़की से शादी क्यों करता है, तो ये भी लगभग पूरी दुनिया में अभी पिछली सदी तक प्रचलित रहा है। इसलिए यहाँ भी हैरान होने जैसी बात नहीं है। लेकिन बात पैगामरे इस्लाम की है, तो मुसलमान विरोधी परपीड़क मन और मुसलमान विरोधी सियासत को इससे ख़ुराक मिलती है, इसलिए इस बहस का अर्थ है। चूंकि धर्म का मामला है तो मुसलमान भी इस पर प्रतिक्रिया करेगा और चूंकि वो आहत भी हो रहा है तो परपीड़क समुदाय के लिए ये आनंद का विषय बन जाता है। आइये इस मुद्दे की पड़ताल करते हैं।

सत्य के परीक्षण की तीन विधियाँ हैं, इन्हीं के आधार पर दुनिया भर में सत्यता की जाँच की जाती है। ये विधियाँ हैं, प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। कुछ और भी विधियाँ हैं लेकिन उनका इतना महत्व नहीं है, इसलिए हम यहाँ इन तीन के ही आधार पर बात करेंगे।

पहले प्रत्यक्ष की। आपने जो कुछ देखा, सुना, अनुभव किया वो प्रत्यक्ष है, इसके लिए किसी और साधन की ज़रूरत नहीं पड़ती। आज ऐसा कोई नहीं है जिसने पैगम्बरे इस्लाम को एक छः साल की लड़की से शादी करते हुए देखा हो। लेकिन आप चाहें तो छः साल की दर्जनों लड़कियों की शादी आज भी आखातीज के अवसर पर इसी देश में देख सकते हैं, और जो लोग पैगम्बरे इस्लाम पर इस तरह की शादी के बहाने हमले कर रहे हैं, वो इन शादियों पर एक शब्द नहीं बोलते।

दूसरी विधि पर अंत में बात करेंगे, पहले तीसरी विधि देख लेते हैं। तीसरी विधि है शब्द प्रमाण, यानि कहीं कोई लिखित प्रमाण हो या किसी विश्वसनीय व्यक्ति ने घटना विशेष का ब्यौरा दिया हो, लेकिन शब्द प्रमाण एक तो कमज़ोर प्रमाण माना जाता है दूसरे इसकी पड़ताल अन्य दो प्रमाणों से ही की जाती है। पैगम्बरे इस्लाम की शादी को लेकर जो हमला अक्सर होता रहता है वो शब्द प्रमाण के कारण संभव हुआ है। दरअसल, बुख़ारी ने अपनी हदीस में कहा है कि पैगम्बरे इस्लाम ने हज़रते आयशा से जब शादी की तो उनकी उम्र 6 साल थी और जब विदाई करवाई तो उम्र 9 साल थी।

जिन्हें मुसलमानों पर हमले करना है, वो कुरआन, हदीस और इस्लामी तारीख से आधे-अधूरे सच उठाते हैं और हमले करते हैं। ये कोई नई बात नहीं है। बुखारी की इस हदीस ने वाकई समस्या खड़ी की है और आप देखेंगे कि सैकड़ों मुस्लिम स्कॉलर हैं जो अपने-अपने तरीके से इस पर सफ़ाई दे रहे हैं। पहले यहाँ संदर्भ के अनुसार शब्द प्रमाण की समीक्षा कर लेते हैं, फिर और बात करेंगे। सबसे पहले तो बुखारी पैगम्बरे इस्लाम के समकालीन नहीं थे, उन्होंने उनकी मृत्यु के लगभग दो सदी बाद इन हदीसों को इकट्ठा किया था, इसलिए उनकी कोई भी हदीस समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती लोगों के सूचनाओं के आधार पर हदीसें जमा की हैं, हालांकि इस प्रक्रिया में उन्होंने अपने तौर पर ज़रूरी यहतियात बरता है। दूसरे हज़रते आयशा की शादी वाली हदीस कमज़ोर हदीस भी है। ये एक तकनीकी मामला है, पाठक चाहेंगे तो इस मुद्दे पर तकनीकी शब्दावलियों का अर्थ बताते हुए एक विस्तृत लेख लिखा जा सकता है।

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अतीत की मनमानी और खतरनाक व्याख्या

अब इस प्रमाण की ही समीक्षा दूसरे प्रमाण से करते हैं जिसे अनुमान प्रमाण कहा जाता है। अनुमान प्रमाण प्रत्यक्ष प्रमाण से उपजे तथ्यों का उपयोग करती है, इसलिए इसे प्रत्यक्ष के बाद सबसे ज़्यादा महत्व हासिल है। जैसे आपने देखा है कि कहीं भी धुआँ तभी निकलता है जब आग लगी हो, अब अगर कहीं धुआँ दिख रहा है तो आप मान लेते हैं कि वहां आग लगी है, क्योंकि अतीत में अपने ऐसा देखा है। अब बात पैगम्बरे इस्लाम की करते हैं, उन्होंने कई शादियाँ की, लेकिन उनको संतान सिर्फ़ पहली शादी से हुई थी जो उन्होंने तब की थी जब वो खुद तो 25 साल के थे लेकिन हज़रते खदीजा 40 साल की थीं। उन्होंने जो शादियाँ की उनके पीछे कबीलों के बीच बेहतर रिश्ते या एक महिला को सहारा देने का मकसद शामिल था। ये सभी महिलाएं या तो विधवा थीं या तलाकशुदा थीं, ज़्यादातर उम्रदराज़ भी थीं। उन्होंने अपने जीवन में कुल 11 शादियाँ की और हज़रते आयशा को छोड़कर सभी ऐसी ही थीं। ऐसा करके उन्होंने अपने अनुयाइयों को सन्देश दिया कि उन्हें महिलाओं के साथ कैसे पेश आना चाहिए। ये वो दौर था जब महिलाएं प्रायः पुरुषों के अधीन होती थीं, हालांकि उस दौर में भी महिलाओं के व्यवसाय करने के उदहारण मिलते हैं।

अब एक बार फिर से मूल सवाल पर आते हैं कि शादी के वक़्त हजरते आयशा की उम्र कितनी थी। यहाँ शब्द प्रमाण का परीक्षण अन्य तथ्यों के आधार पर करना पड़ेगा।

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पैगम्बरे इस्लाम ने जब अपने नबी और रसूल होने के एलान किया तब उनकी उम्र 40 साल थी। इस समय हज़रते आयशा पैदा हो चुकी थीं। नबूवत के एलान के बाद पैगम्बरे इस्लाम मक्का में 13 साल रहे। इस वक़्त तक हज़रते आयशा की उम्र किसी भी सूरत 6 साल तो नहीं ही थी। उनकी उम्र हर हाल में 13 से तो ज़्यादा ही होनी चाहिए। इसलिए जो स्कॉलर अलग-अलग तथ्यों के आधार पर शादी के वक्त उनकी उम्र 15 साल या इससे अधिक बताते हैं, वो ग़लत तो नहीं हैं। हज़रते आयशा की बड़ी बहन हज़रते अस्मा की मौत 73 हिजरी में 100 साल की उम्र में हुई जो हज़रते आयशा से उम्र में 10 साल बड़ी थीं। यानि एक हिजरी में वो 28 साल की थी, इस हिसाब से भी रुखसती के वक़्त हज़रते आयशा की उम्र 18 साल के आसपास ठहरती है। इस बहस को लम्बा नहीं खींचना है इसलिए संक्षेप में कह दूं कि जंगे उहद के हवाले से खुद बुखारी की हदीस ही उनके हज़रते आयशा की उम्र वाली हदीस का साथ नहीं देती और इसी तरह की बुखारी की और भी कई हदीसें हैं जो कहती हैं कि हज़रते आयशा की उम्र वाली हदीस ग़लत है।

शादी के वक़्त हज़रते आयशा की उम्र 16 और रुखसती के वक़्त 19 थी, इस तथ्य के पक्ष में अब ढेरों शहादतें हैं, मैं उनकी तफसील में नहीं जा रहा हूँ, लेकिन आप चाहें तो ये तमाम शोध आसानी से हासिल हो जायेंगी। देखना ये है कि ये ग़लती हुई कैसे। स्कालर्स की राय है कि हदीसों को छपने के क्रम में किसी से ये ग़लती हुई है कि उसने 16 को 6 और 19 को 9 लिख दिया। शिया समुदाय की ओर ये आरोप भी लगता है कि नबी के खानदान को बदनाम करने के लिए कुछ लोगों ने ग़लत हदीसें बयान की हैं या सही हदीसों में मिलावट की है। बहरहाल, ये शोध का विषय है, लेकिन इसी एक वजह से मुसलमान और इस्लाम पर हमला करने वाली ताकतों को एक ज़रिया मिल गया। बहरहाल, कोई भी मज़हब हो आज बहुत-सी बुनियादों पर उनकी आलोचना हो सकती है, हो भी रही है, लेकिन मुसलमानों पर या इस्लाम पर भारत और दुनिया के दूसरे इलाकों से जो हमले हो रहे हैं, उनकी बुनियाद में नफ़रत की राजनीति है।

हिन्दू धर्म पर भी इसी तरह के हमले होते हैं जब कहा जाता है कि ब्रह्मा ने अपनी बेटी सरस्वती से जबरन शादी की थी। दरअसल, जिन्हें धर्मों के नाम पर धार्मिक समूहों से नफ़रत करनी है और इस नफ़रत को लगातार बढ़ाना है, वो इस तरह की आलोचना या हमला करते हैं। लेकिन जिन्हें हमला नहीं करना है वो देश काल और परिस्थितियों को समझ कर अपनी राय रखते हैं। उदाहारण के लिए हिन्दू पौराणिक ग्रन्थ जो ब्रह्मा के अपनी ही पुत्री के प्रति आसक्ति का उल्लेख करते हैं या वो कहानियाँ जो भाई-बहन के बीच सेक्स सम्बन्धों का उल्लेख करती हैं, वो दरअसल मनुष्य के रिश्तों-नातों के विकासक्रम को दर्शाती हैं। राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक वोल्गा से गंगा में भाई-बहन और माँ व बेटे के बीच सम्बन्धों का उल्लेख किया और ये बताने की कोशिश की है कि कैसे मनुष्य ने समय के साथ अपने आपसी सम्बन्धों में बदलाव किया है। निकट सम्बन्धों में संसर्ग के इतिहास को किसी समुदाय पर हमले के रूप में न देख के इसे विकासक्रम का एक सोपान ही समझा जाना चाहिए। आप हज़ार साल पुराने किसी कृत्य का परीक्षण आज के एथिक्स या कानून से नहीं कर सकते, लेकिन जो ऐसा करते हैं, उनकी नियत में खोट है और ये बात आप सभी जानते हैं।

अंत में मैं आपको राय देना चाहूँगा कि अगर आप इंसानी रिश्तों, समाज व्यवस्था और तमाम तरह के निज़ाम को सिलसिलेवार समझना चाहते हैं तो किताब परिवार, निजी सम्पत्ति एवं राज्य की उत्पत्ति पढ़िए, ऑनलाइन पीडीऍफ़ हिन्दी और अंग्रेज़ी में मिल जाएगी।

डॉ. सलमान अरशद स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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