बाथे-बथानी-नगरी, एके कहानी सगरी, कोर्ट से भइली निसहाय जी..(18 जुलाई, 2021 की डायरी )

नवल किशोर कुमार

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कानून का होना बड़ी बात है। फिर चाहे वह कोई भी देश क्यों न हो। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं कि मनुष्य यदि सामाजिक प्राणी है तो उसका एक कारण कानून भी है। जरा सोचिए कि यदि कानून न हो या फिर कानून का खौफ न हो तो क्या हो।

एक उदाहरण एकदम ताजा है। जगदीश मास्टर बिहार में नक्सल आंदोलन के प्रणेता रहे। जाति के कोइरी थे लेकिन थे बड़े क्रांतिकारी। 1970 के दशक में इस स्कूल मास्टर ने उन सामंतों का चैन छीन लिया था, जो आए दिन शाहाबाद के इलाकों में गरीबों पर जुल्म ढाते थे। उनके दामाद हैं श्रीभगवान सिंह कुशवाहा। उनके एक करीबी रिश्तेदार के उपर हाल ही में नट जाति के लोगों के साथ मारपीट का आरोप है। जगदीशपुर के पुलिस थाने में जो मामला दर्ज कराया गया है, उसके मुताबिक श्रीभगवान सिंह कुशवाहा का करीबी, जो कि मुखिया बताया जाता है, को नट जाति के दो लोगों का कुर्सी पर बैठे रहना रास नहीं आया। और उसने उनके साथ मारपीट की। इस मामले में माले के विधायक मनोज मंजिल के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया है। मनोज मंजिल ने भी इस संबंध में एक मामला दर्ज कराया है। वहीं श्रीभगवान सिंह कुशवाहा ने दूरभाष पर हुई बातचीत में आरोपों को खारिज किया है। हालांकि उन्होंने यह जरूर स्वीकार किया है कि मारपीट की घटना हुई है। उनके हिसाब से घटना गर्म खून की वजह से हुई। इसमें जातिगत भेदभाव का मामला नहीं है।

मैं उपरोक्त घटना के उपर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। यह काम अदालतें करें तो बेहतर। मैं तो यह सोच रहा हूं कि यदि कानून नहीं होता तो क्या होता। श्रीभगवान सिंह कुशवाहा और उनके करीबी को अलग रखते हैं तब कोई और होता जो गरीब और कमजोर वर्गों के लोगों के ऊपर जुल्म ढाता। पहले होता भी यही था। जिस जगदीशपुर में घटना घटी है, उसी जगदीशपुर के वीर कुंवर सिंह रहे। उनका बड़ा नाम था। मैं तीन बार जगदीशपुर गया हूं। वहां के दलित और पिछड़े वीर कुंवर सिंह को सम्मान के साथ याद नहीं करते। पूछने पर बताते हैं कि वहां कुंवर सिंह के खानदान वालों ने खूब कहर ढाया है।

मैं यह हमेशा सोचता हूं कि कानून के होने का मतलब तभी है जब उसका अनुपालन करने वाला तंत्र हो। नहीं तो फिर कानून का कोई मतलब नहीं। नीतीश कुमार के खिलाफ हत्या का एक मामला 1992 में दर्ज किया गया था। इसे पंडारक हत्याकांड कहते हैं। तब चुनावी रंजिश में दो यादवों की हत्या कर दी गयी थी। एक मृतक को तो सीधे उसकी खोपड़ी में गोली मार दी गयी थी। मुझे नहीं पता कि पुलिस की रिपोर्ट में किस तरह के हथियार से हत्या की बात दर्ज है, लेकिन मेरे संज्ञान में जो बातें आयीं, उसके हिसाब से जरूर राइफल रहा होगा। एकदम प्वाइंट जीरो के हिसाब से गोली मारी गयी होगी। तभी मृतक की खोपड़ी के परखच्चे उड़ गए। यह मामला मेरे संज्ञान में तब आया था जब पटना हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान नीतीश कुमार का नाम ही अभियुक्तों की सूची से हटा दिया।

सचमुच यदि कानून नहीं हो या कहिए कि कानून का खौफ न हो तो हमारी बहन-बेटियों का क्या हो? यह कानून का ही खौफ है कि आज भी कोई अपराध करने से पहले आदमी इतना समझता है कि उसे जेल हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि अपराधी अपराध नहीं करते। इसके पीछे भी कई वजहें हैं।

मैं तो कल पटना में हुई एक घटना के बारे में सोच रहा हूं। एक दलित आइएएस अधिकारी सुधीर कुमार की शिकायत एससी-एसटी थाने के कोतवाल ने दर्ज नहीं की। सुधीर कुमार ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उनकी नाक के बाल के जैसे कुछ अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कराना चाहा। अब चूंकि सुधीर आइएएस अधिकारी हैं तो हुआ यह कि उन्हें थाने में घुसने दिया गया। उन्हें बैठने के लिए कुर्सी दी गयी। लेकिन कोतवाल गायब रहे।

मैं यह हमेशा सोचता हूं कि कानून के होने का मतलब तभी है जब उसका अनुपालन करने वाला तंत्र हो। नहीं तो फिर कानून का कोई मतलब नहीं। नीतीश कुमार के खिलाफ हत्या का एक मामला 1992 में दर्ज किया गया था। इसे पंडारक हत्याकांड कहते हैं। तब चुनावी रंजिश में दो यादवों की हत्या कर दी गयी थी। एक मृतक को तो सीधे उसकी खोपड़ी में गोली मार दी गयी थी। मुझे नहीं पता कि पुलिस की रिपोर्ट में किस तरह के हथियार से हत्या की बात दर्ज है, लेकिन मेरे संज्ञान में जो बातें आयीं, उसके हिसाब से जरूर राइफल रहा होगा। एकदम प्वाइंट जीरो के हिसाब से गोली मारी गयी होगी। तभी मृतक की खोपड़ी के परखच्चे उड़ गए। यह मामला मेरे संज्ञान में तब आया था जब पटना हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान नीतीश कुमार का नाम ही अभियुक्तों की सूची से हटा दिया।

हालांकि ऐसा कोई कानून नहीं है कि हर व्यक्ति के मरने अथवा मारे जाने पर देश का प्रधानमंत्री शोक व्यक्त करे। यह तो उसकी सदिच्छा पर निर्भर करता है। लेकिन दानिश पुलित्जर सम्मान से सम्मानित था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके काम को सराहा जाता था। वह भारत का नौजवान था। क्या प्रधानमंत्री ने शोक इसलिए व्यक्त नहीं किया क्योंकि वह मुसलमान था?

अब जब सूबे की शीर्ष अदालत ने अभियुक्तों की सूची से नीतीश कुमार का नाम ही हटा दिया तो बात ही खत्म हो जाती है। अब वे अपराधी हैं या नहीं, यह तो उनका जमीर ही जाने। जमीर मतलब अंतरात्मा। वैसे भी नीतीश कुमार के मामले में अंतरात्मा का बहुत महत्व है।

 

मैं दिल्ली से प्रकाशित दैनिक जनसत्ता को देख रहा हूं। पहले पन्ने पर दो कमाल की खबरें हैं। और जो खबर नहीं है, वह वाकई में खबर होकर भी खबर नहीं है। मैं दानिश सिद्दीकी की बात कर रहा हूं। वही दानिश, साहसी फोटो जर्नलिस्ट, जिसकी मौत दो दिन पहले अफगानिस्तान में हो गई। हालांकि विदेश मंत्रालय के हवाले से कुछ बातें कही गयी हैं। मसलन यह कि उसका पार्थिव शरीर तालिबान ने रेडक्रास सोसायटी को सौंप दिया है। जब मैं यह डायरी का पन्ना लिख रहा हूं तो यह मुमकिन है कि दानिश को सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया हो। लेकिन इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री की चुप्पी मुझे बेहद खतरनाक लग रही है।

पीठ ने कहा है कि ‘आम आदमी क्या खाएगा, यह तय करना राज्य का काम नहीं है।’ एक और टिप्पणी तो बेहद शानदार है – ‘लोकतंत्र का अभिप्राय है अल्पसंख्यकों की रक्षा। सभ्यता का आकलन केवल इस बात से किया जा सकता है कि अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।’

हालांकि ऐसा कोई कानून नहीं है कि हर व्यक्ति के मरने अथवा मारे जाने पर देश का प्रधानमंत्री शोक व्यक्त करे। यह तो उसकी सदिच्छा पर निर्भर करता है। लेकिन दानिश पुलित्जर सम्मान से सम्मानित था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके काम को सराहा जाता था। वह भारत का नौजवान था। क्या प्रधानमंत्री ने शोक इसलिए व्यक्त नहीं किया क्योंकि वह मुसलमान था?

मैं यह मानता हूं कि निश्चित तौर पर यही वजह रही। नहीं तो नरेंद्र मोदी का हृदय तो इतना कोमल है कि एक राजपूत क्रिकेटर के अंगूठे में चोट लगने पर भी बेचैन हो जाते हैं और ट्वीट करते हैं।

प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति को इतना संकीर्ण नहीं होना चाहिए। उसे उदार होना चाहिए। लेकिन यह बात किसी कानून में नहीं है। संविधान में प्रधानमंत्री पद के लिए जिन अर्हताओं का उल्लेख है, उसमें भी यह बात नहीं है कि प्रधानमंत्री उदार हृदय का स्वामी हो। कानून होता तो निश्चित तौर पर नरेंद्र मोदी दानिश की मौत पर शोक व्यक्त करते।

खैर, मैं तो दो खबरों की बात कर रहा था। एक खबर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण के हवाले से है। उन्होंने कहा है कि इंसाफ के लिए लोगों का सुप्रीम कोर्ट पर अटूट भरोसा है। दूसरी खबर उत्तराखंड उच्च न्यायालय की है। हरिद्वार के मुसलमान बहुल मंगलौर कस्बे के एक रहवासी की याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान और न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की पीठ ने कुछ ऐसा कहा है, जिसे पढ़कर वाकई में मैं खुश हो रहा हूं। याचिका इसी साल मार्च में हरिद्वार में बूचड़खानों पर रोक से संबंधित है। पीठ ने कहा है कि ‘आम आदमी क्या खाएगा, यह तय करना राज्य का काम नहीं है।’ एक और टिप्पणी तो बेहद शानदार है – ‘लोकतंत्र का अभिप्राय है अल्पसंख्यकों की रक्षा। सभ्यता का आकलन केवल इस बात से किया जा सकता है कि अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।’

चार दिन पहले बिहार में 11 जुलाई, 1996 को हुए बथानी टोला नरसंहार के याचिकाकर्ता नइमुद्दीन जी का फोन आया था। उन्होंने यह जानकारी दी कि स्थानीय माले विधायक ने बथानी टोला में बने शहीद स्मारक का रंग-रोगन करवाया है तथा संगमरमर लगवाया है। नरसंहार की बरसी पर इसका उद्घाटन भी किया गया। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि 12 दिसंबर, 2012 से नरसंहार की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि 2013 में एक बार सुनवाई की तब कहा गया कि इस मामले की सुनवाई कम से कम पांच जजों की पीठ करेगी। तब से सुप्रीम कोर्ट में जजों का अकाल है। इस बीच मुख्य याचिकाकर्ता किशुन ठाकुर का देहांत हो चुका है। दो और याचिकाकर्ताओं की भी मौत हो चुकी है।

मन खिन्न होता है जब अदालतों का यह स्वरूप सामने आता है। बिहार के जनकवि कृष्ण कुमार विद्रोही की एक पंक्ति है –बाथे-बथानी-नगरी, एके कहानी सगरी, कोर्ट से भइली निसहाय जी।

काश सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तक यह पंक्ति पहुंचे।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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