बिहार का अंधा हुक्मरान, बेजुबान अखबार (डायरी 4 नवंबर, 2021) 

नवल किशोर कुमार

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बचपन में यह नाटक पढ़ा था– अंधेर नगरी, चौपट राजा। यह कमाल का नाटक है। कमाल इसलिए कि यह हर समय प्रासंगिक है। आज के दौर में भी जबकि बिहार सहित पूरे देश में लोकतंत्र है। मौजूदा हालत यह है कि हुक्मरान अंधा है और अंधा कहने के बावजूद अपने अंधेपन को बनाए रखता है। वैसे कई बार मेरे जेहन में एक बात आती है आंखों की संरचना को लेकर। मनुष्यों के शरीर में आंखों का स्थान और अन्य जीव-जंतुओं के शरीर में आंखों का स्थान क्या बस ऐसे ही निर्धारित हैं? या फिर कोई तर्क इसके पीछे है।  कौवे की आंख और बाज की आंख में इतना अंतर क्यों है? उल्लू की आंख भी सवाल खड़ा करती है और चूहों की भी। बचपन में एक बार यह बात जब दिमाग में आयी तब मैंने एक प्रयोग किया। तब मेरे घर में चार भैंसें थीं। मैंने अपना प्रयोग भैंसों पर किया।

असल में भैंसों के शरीर में दोनों आंखें एक-दूसरे से दूर होती हैं। आंखें बड़ी होती हैं और घुमावदार भी।  प्रयोग के लिए मैंने खली-चुनी (एक विशेष पोषाहार) का उपयोग किया। मेरी एक भैंस दूर बंधी थी। वह जुगाली कर रही थी। मैंने यह खुद को आश्वस्त किया कि उसे मेरी भनक न लगे। मैं उसके पीछे करीब पांच मीटर दूर था। मैं विशेष पोषाहार तैयार कर रहा था। भैंस अचानक से उठ गयी और मेरी तरफ घूम गई। उसने बिना मुड़े देख लिया था कि मैं उसके लिए पोषाहार बना रहा हूं। इस प्रयोग से मैं तब इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि भैंसों की आंखें दूरी पर और ऐसी क्यों होती हैं कि वह पीछे भी देख सकें। एक तो यह कि वह दूर तक घास देख सके और पीछे देखने की वजह यह ताकि वह खतरे को भांप सके। मनुष्य चाहे भी तो बिना मुड़े पीछे नहीं देख सकता। मनुष्य इसके लिए बना ही नहीं है।

हमारे बिहार के हुक्मरान नीतीश कुमार को तो आंखें ही नहीं हैं। इस एक सप्ताह में जहरीली शराब से मौत की कल दूसरी घटना हुई है। इस बार गोपालगंज में चार लोगों की मौत हुई है और दो लोग अंधे हुए हैं।अभी तीन दिन पहले ही मुजफ्फपुर के सरैया में जहरीली शराब से 6 लोगों की मौत और तीन अंधे हो गए।

आदमी और जानवरों में एक बात और है। यह है दांतों की संरचना। भैंस चाहे भी तो मांसाहार नहीं कर सकती क्योंकि उसके दांत चौड़े होते हैं जो घास नोंचने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। शेर और आदमी के दांतों में समानता होती है। दोनों के पास नोंचने, छीलने और चबाने वाले दांत होते हैं। इसलिए मैं आदमी को मूल रूप से मांसाहारी ही मानता हूं। यह शाकाहार तो परिस्थितिजन्य मजबूरी है या फिर कुछ धर्मांध लोगों की बेवकूफी जो लोगों को ताकतवर नहीं बनने देना चाहते। भारत में वे शाकाहार का प्रचार सबसे अधिक दलित, पिछड़े और आदिवासियों के बीच करते हैं ताकि न वे पौष्टिक भोजन खाएं और न मजबूत बनें। इन वर्ग की मजबूती से समाज का द्विज वर्ग बहुत डरता है।

खैर, मैं वापस आखों पर आता हूं। यह सही है कि आदमी को आंखें आगे देखने के लिए दी गयी हैं और वह देखता भी वही है। तभी वह मनुष्य कहलाता है। नहीं तो भैंस, गधा या फिर कोई अन्य जानवर ही बना रहता। मनुष्य की खासियत यह है कि उसने सभ्यता का विकास किया है और दस्तावेजीकरण सीखा है। यह इतिहास है। इस इतिहास से हम अतीत की ओर झांक सकते हैं। अतीत के आधार पर वर्तमान का विश्लेषण कर सकते हैं तथा भविष्य के लिए योजनाएं बना सकते हैं।

लेकिन हमारे बिहार के हुक्मरान नीतीश कुमार को तो आंखें ही नहीं हैं। इस एक सप्ताह में जहरीली शराब से मौत की कल दूसरी घटना हुई है। इस बार गोपालगंज में चार लोगों की मौत हुई है और दो लोग अंधे हुए हैं।अभी तीन दिन पहले ही मुजफ्फपुर के सरैया में जहरीली शराब से 6 लोगों की मौत और तीन अंधे हो गए।

एक खबर और है जो कि एक नजीर ही है। तीन दिन पहले बिहार के समस्तीपुर में एक पुलिसकर्मी ने एक सफाईकर्मी को केवल इसलिए पीट-पीटकर अधमरा कर दिया कि उसने उस पुलिसकर्मी के घर के बाहर ठीक से सफाई नहीं की। सफाईकर्मी को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। मामला रोसड़ा थाना का है। आक्रोशित दलितों ने थाने का घेराव किया और आरोपी पुलिसकर्मी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रहे थे। इस बीच समस्तीपुर के एसपी मानवजीत सिंह ढिल्लो के नेतृत्व में पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारी दलितों के उपर जमकर लाठीचार्ज किया। यहां तक कि महिलाओं के साथ पुलिसकर्मियों ने अभद्र व्यवहार भी किया।

हालांकि यह मानता हूं कि शारीरिक रूप से अंधा होना कोई अवगुण नहीं है। शारीरिक रूप से अंधे किसी भी आंख वाले से अधिक संवेदनशील और समझदार होते हैं। परंतु जिसके पास शारीरिक अक्षमता नहीं हैं और फिर भी उसे कुछ दिखाई न दे तो उसे गदहा ही कहा जाना चाहिए।

सबसे दिलचस्प यह है कि राष्ट्रीय स्तर के अखबारों के लिए ऐसी खबरें महत्व क्यों नहीं रखतीं। कभी-कभी तो सवाल यह भी जेहन में आता है कि राष्ट्रीय स्तर के अखबारों के लिए बिहार महत्व रखता भी है या नहीं? वजह यह कि जहरीली शराब से इस सप्ताह अबतक दस लोगों की मौत हुई है और पांच लोग अंधे हुए। क्या यह खबर राष्ट्रीय स्तर के अखबार के लिए खबर नहीं है?

मैं जनसत्ता को पढ़ता हूं। इसके पीछे मेरी मान्यता है (मैं गलत भी साबित होता हूं) कि यह अखबार अन्य हिंदी अखबारों की तुलना में अधिक रीढ़दार है। लेकिन बिहार के मामले में जनसत्ता का रुख भी अन्य हिंदी अखबारों के माफिक ही है। बिहार में प्रकाशित लगभग सभी अखबार गुलाम की स्थिति में हैं। यह साफ-साफ दिखता है।

कल एक पत्रकार मित्र ने सवाल किया कि इस बार भी जब नीतीश कुमार उपचुनाव के लिए प्रचार कर रहे थे तब उनका विरोध उनकी सभा में किया गया। और यह पहली बार नहीं हुआ। नीतीश कुमार जहां जाते हैं, उनका विरोध होता है। फिर उन्हें जीत कैसे मिल जाती है?

मेरे पत्रकार मित्र का सवाल वाजिब सवाल था। लेकिन इसका जवाब बहुत आसान है और यह कि जब जनता जाति और धर्म के नशे में चूर हो तो गदहों को भी जीत मिल जाती है।अभी के दौर में यही स्थिति है। चूंकि यह एक अनौपचारिक बात थी तो मैंने गदहे का उदाहरण दिया। यदि यह औपचारिक बातचीत होती तो मैं अंधे का उदाहरण देता। हालांकि यह मानता हूं कि शारीरिक रूप से अंधा होना कोई अवगुण नहीं है। शारीरिक रूप से अंधे किसी भी आंख वाले से अधिक संवेदनशील और समझदार होते हैं। परंतु जिसके पास शारीरिक अक्षमता नहीं हैं और फिर भी उसे कुछ दिखाई न दे तो उसे गदहा ही कहा जाना चाहिए।

मेरे मित्र का सवाल था कि आखिर क्यों नीतीश कुमार का विरोध ही क्यों होता है? क्या वजह यह है कि वे ओबीसी वर्ग के हैं? और क्या इस वजह से कि वे कुर्मी जाति के हैं, जिनकी आबादी पूरे बिहार में केवल 4 प्रतिशत है?

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मुझे लगताहै कि जाति का सवाल नहीं है। वजह यह कि कर्पूरी ठाकुर और लालू प्रसाद जैसे ओबीसी नेताओं को भले ही द्विजवादी अखबारों की आलोचनाएं झेलनी पड़ी हों, लेकिन नीतीश कुमार की तरह जनता की नाराजगी का सामना नहीं करना पड़ा। कर्पूरी ठाकुर तो समस्तीपुर के जिस विधानसभा क्षेत्र से जीतकर विधानसभा सदस्य बनते थे, वह तो ब्राह्मण बहुल इलाका है। कर्पूरी ठाकुर को विरोध का सामना करना पड़ा जब उन्होंने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। लेकिन तब वह विरोध बिहार की जनता ने नहीं बल्कि ताकत के नशे में चूर सवर्णों ने किया था क्योंकि उन्हें पिछड़ों के आरक्षण से आपत्ति थी।

मैं भी सोच रहा हूं कि यदि आज जननायक होते तो क्या होता? मतलब यह कि जननायक की सभाओं में इस तरह घटना होती तो क्या होता? इसके पहले यह भी बताना जरूरी है कि नीतीश कुमार 2010 के बाद से जनता के निशाने पर रहे। 2012 में अधिकार यात्रा के दौरान उन्हें काले झंडे दिखाए गए। काले रंग के कपड़ों से तब उन्हें इस कदर भय हुआ कि बच्चियों के दुपट्टे तक उन्होंने उतरवा दिया था। खैर तब उनका समय था और आज जनता का समय है। जनता उनका पानी उतार रही है। यही लोकतंत्र है।

वापस फिर से उसी सवाल पर कि जननायक होते तो क्या करते? मेरा मन कहता है कि जब पहली बार उनका विरोध जनता करती तब वे सबसे पहले सीएम पद से इस्तीफा देते और ऐलान करते कि चुनाव बाद यदि उनकी पार्टी अथवा गठबंधन को बहुमत मिला तो वे सीएम पद स्वीकार करेंगे। वे जनता को सोचने का मौका देते कि क्या उनकी सभा में हंगामा, विरोध और प्याज फेंकने जैसी घटना जायज है।

खैर, कल क्रांतिकारी कवि वरवर राव का जन्मदिन था। वे जेल में हैं। भारत सरकार ने उन्हें जेल में डाल रखा है। उनके लिए एक कविता–

मेरे प्यारे कवि वरवर राव

तुम्हें जेल में देखकर हैरानी नहीं होती

बाजदफा तो सोचता हूं कि

तुम्हें जेल नहीं होती तो 

मुझे हैरानी जरूर होती।

तुम अपनी कविताओं में

रोटी की बात करते हो

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को गलत

और समतामूलक समाज को सही ठहराते हो

तुम जल-जंगल-जमीन को लेकर

कविताएं रचते हो

फिर तुम्हें तो जेल होनी ही चाहिए

इसमें हैरानी जैसी कोई बात नहीं

हैरानी तब होती जब

हुकूमत-ए-हिंद तुम्हारी कविताएं पढ़

मानवता का मर्म समझता।

सचमुच मुझे कोई हैरानी नहीं कि

अस्सी साल की उम्र में भी

तुम हमारे प्यारे कवि हो

हैरानी तब होती जब

हम कृतघ्न होते

और तुम्हारी पीड़ा से

खुद को अलग रखते।

हां, मेरे प्यारे कवि

तुम्हें जेल में देख हैरानी नहीं होती

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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