आदिवासियों के जल जंगल ज़मीन की स्वायत्तता का सम्मान ही बिरसा मुंडा का सही सम्मान

विद्या भूषण रावत

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बिरसा मुंडा जयंती पर विशेष

धरती आबा बिरसा मुंडा के 146वें जन्म दिन पर सभी को हूल जोहार। झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासियों की अस्मिता और  अधिकारों के लेकर बिरसा मुंडा ने क्रांति की जो नींव रखी उसकी मंजिलों का निर्माण आज भी जारी है।  जब आदिवासियों ने दिकुओं द्वारा उनके जंगलों पर अनिधिकृत आक्रमण के विरोध में अपनी बुलंद आवाज लगातार उठाई। बिरसा का संघर्ष आज के दौर में तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब आदिवासियों को उनके ही अपने क्षेत्र से बाहर निकालने की अनेक प्रकार की साज़िशें हो रही हों या विकास के नाम पर सरकार द्वारा अपने चहेते उद्योगपतियों को वहाँ बैठाने की तैयारी हो। आदिवासियों ने हमेशा से ही प्रकृति और पर्यावरण के साथ अपनी जिंदगी गुजारी है। उन्होंने प्रकृति और पर्यावरण को ख़त्म करने या उसका शोषण करने वाले हर एक शक्ति का जमकर विरोध किया।  आदिवासियों का अपनी ज़मीन और संस्कृति बचाने का संघर्ष हमेशा से ही हमारे इतिहासकारों के एजेंडे से गायब रहा है। वे शायद उन्हें केवल म्यूजियम में ही देखना चाहते हैं।

दरअसल आदिवासियों के इलाकों तक तो हमारी सरकारें और बुद्धिजीवी पहले पहुंचे ही नहीं। वे न अस्पताल पहुंचे और न ही स्कूल। आदिवासी संस्कृति के नाम पर सत्ताधारी जातिवादी शक्तियों ने अपने अंधविश्वासों का प्रचलन बढ़ाने की कोशिश की और उनकी ज़मीन पर कब्जा करने के प्रयास किया। 1990 के बाद जब देश ने ‘उदारीकरण’ या यूँ कहिये कि ‘उधारीकरण’ को अपनाया तो अचानक लालची लोगों की नज़रें आदिवासी इलाकों पर पड़ी जहाँ उन्हें ‘सोना’ दिखाई दिया। आदिवासियों के लिए पहाड़, नदी, झरने उनकी संस्कृति और जीवन शैली थे लेकिन लालची व्यापारियों के लिए वह एक खजाना था जिसे केवल ‘विकास’ का सपना दिखा कर ही लूटा जा सकता था।

भारत सरकार ने इस वर्ष 10 नवम्बर को लिए गए एक फैसले में बिरसा मुंडा के जन्मदिन को ‘जनजातीय गौरव’ दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है। झारखण्ड में उन्हें भगवान बिरसा भी कहा जाता है लेकिन भाजपा की पिछली राज्य सरकार ने तो सी एन टी और एस पी टी एक्ट को बदलने का कुत्सित प्रयास किया

बिरसा का जन्म 15  नवम्बर 1875 को झारखण्ड राज्य के उलिहुतु गाँव में हुआ जो खूंटी जिले के अंतर्गत आता है।  उनका बचपन अपने माता-पिता भाई-बहिनों के साथ प्रकृति की खूबसरत गोद में गुजरा। हालांकि बिरसा के माता-पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और इसके चलते उनका बचपन अपने मामा के घर पर गुजरा। वहाँ उन्होंने स्कूल की पढ़ाई की और ईसाई मिशनरियों के संपर्क में आये और ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया।  लेकिन 1890 में चाईबासा से जर्मन क्रिस्चियन मिशनरी स्कूल छोड़ने के बाद बिरसा अपने आदिवासी धर्म में वापस आ गए।  बाद के दिनों में बिरसा ने आदिवासी धर्म और संस्कृति की वकालत की और यह प्रयास किया कि आदिवासी प्रकृति के पूजक हैं और उनका अपना विशिष्ट धर्म है।

1882 में भारतीय वन अधिनियम लाया गया जिसमें पूरे वनों का नियंत्रण ‘वन विभाग’ या यूँ कहिये कि कंपनी सरकार के हाथ में आ गया। आदिवासियों की समझ में आ गया यह क़ानून और कुछ नहीं अपितु उनकी जीवन शैली पर नियंत्रण और जंगलों के दोहन के लिए ही लाया गया है इसलिए इसका जमकर विरोध हुआ।  आदिवासियों, विशेषकर मुंडा समुदाय के कई इलाको में संरक्षित वनों में आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों पर रोक लगाने या उन पर अंग्रेजों के अनुसार निर्धारित करने के कानून बना दिए गए। बिरसा ने शोषण को देखा और भुगता था इसलिए वह इन चीजों को समझ रहे थे। 1893-94  में  जंगलों की सभी ‘बंजर भूमि’ सरकार के हाथ में आ गयी और आदिवासियों ने अपने अधिकारों पर इस सीधे हमले को समझ लिया। बिरसा इन इसका प्रबल विरोध किया।  उनका ये नारा बहुत प्रचलित हुआ।  ‘अबुआ राज इते जाना, महारानी राज तुंडू जाना’ जिसके मायने थी के महारानी का राज ख़त्म हो और हमारा राज स्थापित हो।

ब्रिटिश शासन ने आदिवासियों के इलाको में उनके बाहरी सामंती लोगों को बुलाना शुरू किया ताकि उस क्षेत्र का शोषण कर उसके लाभ को अंग्रेजों तक पहुंचा सके। छोटानागपुर और संथाल परगना क्षेत्रों में ठेकेदारों और अन्य सामंतों को आदिवासियों के इलाको की जमीन ‘खेती’ के नाम पर दे दी गयी जैसे आदिवासी खेती नहीं जानते। पूरे कानूनों का नतीजा ये निकला के आदिवासियों के मुखियाओं की ज़मीनें ख़त्म हो गईं और सीधे-सीधे ‘दिकुओं’ के हाथ में आ गयी और आदिवासी अपनी की धरती पर भूमिहीन हो गए और मात्र खेतिहर मजदूर बन कर रहे गए।

आज के सन्दर्भ में बिरसा का आन्दोलन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब गोरे अंग्रेजों की जगह अपने ही शासक उनका शोषण कर रहे हैं। दिकुओं ने उनकी ज़मीनों को हड़पा है। बिरसा मुंडा ने लोगों का आवाहन किया कि वे आदिवासियों के मूल धर्म को अपनाएँ और एक ईश्वर को मानें। अपनी प्राकृतिक संस्कृति को न छोड़ें और प्रकति का संरक्षण करें। बिरसा की बातों का लोगों पर असर पड़ रहा था और लोग ब्रिटिश सरकार और उसके दलालों के खिलाफ संघर्ष में उतरे। 24 अगस्त 1875 को उन्हें दो साल की जेल की सजा हुई। वर्तमान झारखण्ड के कई इलाकों जैसे खूँटी, तमर, बसिया, रांची में उलगुलान या क्रांति की बाते हो रही थीं।

हम वाकई में बिरसा मुंडा और उनके विचारों का सम्मान करना चाहते हैं तो हमें जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों के अधिकारों और भावनाओं का सम्मान करना पडेगा। आदिवासियों को उनके जंगलों से बाहर करने के हरेक षड्यंत्र का मुकाबला करना होगा। आज आदिवासियों की संस्कृति पर हमला है और हमलावर किसी हथियार के जरिये नहीं, अपितु कानूनों के कवच के साथ भी आ रहे हैं। विकास से शायद ही किसी को परहेज होगा लेकिन विकास किसका और कहाँ पर?

बिरसा का नाम पूरे क्षेत्र में धरती आबा के नाम से प्रसिद्ध हो चुका था और लोगों में गुस्सा बहुत था। पुलिस पर भी हमले जारी थे।  7 जनवरी 1900 को खूँटी पुलिस थाने पर हमला हुआ जिसमें एक  पुलिस कांस्टेबल मारा गया। इससे दो दिन  पूर्व दो पुलिस वाले मारे गए थे। इसलिए पुलिस बिरसा को गिरफ्तार करने के लिए लोगों को परेशान कर रही थी। 3 फरवरी 1900 को बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया।  कई सौ आदिवासी पकड़े जा रहे थे और बहुतों को सजाएँ हो रही थीं या मारा जा रहा था। जेल में यातनाएँ देना आम था। 9 जून 1900 को जेल में ही बिरसा मुंडा की मृत्यु हो गयी।  हालांकि अंग्रेजों ने बिरसा की हत्या कर दी लेकिन उनके आन्दोलन की गूँज ने ब्रिटिश शासन को हिला दिया और उन्हें आदिवासियों के अधिकारों का सम्मान करने को मजबूर कर दिया।

झारखण्ड में आदिवासियों में बढ़ते असंतोष को रोकने के लिए अंग्रेजों ने 1908 में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट लागू किया जिसके तहत आदिवासियों की भूमि गैर आदिवासियों को स्थानांतरित नहीं की जा सकती। इसी प्रकार का एक कानून संथाल परगना टेनेंसी एक्ट के रूप में भी लाया गया ताकि बाहरी लोग आदिवासियों की जमीनों पर अतिक्रमण न कर सकें।

भारत सरकार ने इस वर्ष 10 नवम्बर को लिए गए एक फैसले में बिरसा मुंडा के जन्मदिन को ‘जनजातीय गौरव’ दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है।  झारखण्ड में उन्हें भगवान बिरसा भी कहा जाता है लेकिन भाजपा की पिछली राज्य सरकार ने तो सी एन टी और एस पी टी एक्ट को बदलने का कुत्सित प्रयास किया जिसे जनता के प्रबल प्रतिरोध के चलते राज्यपाल के विरोध का भी सामना करना पड़ा और बाद में राज्य में एक नयी सरकार के गठन के रूप में भी प्रकट हुआ।

यदि हम वाकई में बिरसा मुंडा और उनके विचारों का सम्मान करना चाहते हैं तो हमें जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों के अधिकारों और भावनाओं का सम्मान करना पडेगा। आदिवासियों को उनके जंगलों से बाहर करने के हरेक षड्यंत्र का मुकाबला करना होगा। आज आदिवासियों की संस्कृति पर हमला है और हमलावर किसी  हथियार के जरिये नहीं, अपितु कानूनों के कवच के साथ भी आ रहे हैं। विकास से शायद ही किसी को परहेज होगा लेकिन विकास किसका और कहाँ पर? जिन क्षेत्रों में भी ‘विकास’ के नाम पर संशाधनों का दोहन हो रहा है क्या वहाँ के लोगों को विकास के उस मॉडल के बारे में पूछने का अधिकार नहीं?  क्या किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले हमें आदिवासियों के कानूनों का सम्मान नहीं करना चाहिए?  और क्या उनके समुदायों से यह बात नहीं पूछनी चाहिए कि वाकई  वे क्या चाहते है? हकीकत यह है कि आज के दौर में जब फिर से निजी शक्तियाँ सरकार का इस्तेमाल कर हमारे जल-जंगल-ज़मीनों का दोहन करना चाहते हैं  क्योंकि जंगल उनके लिए लाभ का साधन है। जबकि वह आदिवासियों के लिए उनका जीवन और संस्कृति है।  हम आशा करते हैं कि  हमारे कानून और प्रशासन आदिवासियों के अधिकारों का सम्मान और सुरक्षा करते रहेंगे और उनके क्षेत्रों में विकास के लिए उनकी राय और अनुमति अवश्य लेंगे।

धरती आबा बिरसा मुंडा और उनके संघर्ष को हूल जोहार!!

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

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