ब्राह्मणों ने आरक्षण को अपनी गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम बना दिया है

एचएल दुसाध

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सर्वोच्च न्यायालय ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए नौकरियों और विभिन्न शिक्षण संस्थानों के दाखिले में 10 प्रतिशत आरक्षण के संवैधानिक संशोधन पर मुहर लगा दी है। 103वें संशोधन के जरिये मिले इस आरक्षण पर पांच सदस्यीय पीठ एकमत नहीं रही। पांच में से दो जजों मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित और जस्टिस श्रीपति ने इस प्रावधान को गलत माना। पर, चूँकि पीठ के 3 सदस्यों जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, बेला त्रिवेदी और जेबी पारदिवाला ने इसे संविधानसम्मत माना, इसलिए निर्णय 2 के मुकाबले 3 के मत से 10 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में गया। चूँकि फैसला सर्वसम्मति से नहीं हुआ, इसलिए सम्भावना है कि कोर्ट इस पर पुनर्विचार कर सकता है! इस सम्भावना को देखते हुए तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने अपने राज्य में एक सर्वदलीय बैठक बुलाई। स्टालिन की अध्यक्षता में हुई इस बैठक का विपक्षी दल अन्नाद्रमुक और उसकी सहयोगी भाजपा ने बहिष्कार किया, किन्तु उसमें शामिल अन्य दलों ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि वह इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करें तथा गरीब सवर्णों के 10 फ़ीसदी आरक्षण (ईडब्ल्यूएस) का मजबूती से विरोध करें। इस बैठक के बाद स्टालिन सरकार ईडब्ल्यूएस आरक्षण के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने जा रही है। इससे जातिगत आरक्षण के समर्थकों में हर्ष की लहर है और वे हिंदी पट्टी के उन बहुजनवादी दलों की लानत-मलानत करने में जुट गए हैं, जिन्होंने कभी सवर्णों को आरक्षण देने की बढ़-चढ़कर हिमायत की थी और आज उस पर कोर्ट के समर्थन की मुहर लगने पर चुप्पी साधे हुए हैं।

सवर्ण आरक्षण ने आरक्षण की उस भावना की हत्या कर दी है, जो शक्ति के स्रोतों से वंचित किए गए तबकों को उनका प्राप्य दिलाने के मकसद से विकसित की गयी थी! हजारों साल शक्ति के स्रोतों का जमकर भोग करने वाले सवर्ण अगर निर्धन बने हैं तो उसके लिए जिम्मेवार है उनकी अकर्मण्यता! ऐसे अकर्मण्य लोगों को अशक्तों के लिए बने प्रावधान का भोग एक दंडनीय अपराध है।

बहरहाल, ईडब्ल्यूएस कोटा पर कोर्ट की मुहर लगने के बाद आरक्षण को लेकर नए सिरे से बहस तेज हो गयी है, खासतौर से तमाम बहुजन बुद्धिजीवी इस फैसले के खिलाफ मुखर हैं। वे इसे असंवैधानिक बताते हुए इसके खिलाफ खासतौर से जो अपना पुराना तर्क दे रहे हैं, वह यह है कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं, प्रतिनिधित्व व जातिगत असमानता से पार पाने से जुड़ा प्रावधान है, इसके पक्ष में दलील खड़ा करते सैकड़ों पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। बहरहाल, आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम क्यों नहीं है, इस पर लोगों की सोच का सबसे बलिष्ठ प्रतिबिम्बन दिवंगत पीएस कृष्णन के बयान में हुआ है। भारत सरकार के पूर्व सचिव पीएस कृष्णन सामाजिक न्याय के कई ऐतिहासिक कानूनों को लागू करने के पीछे महत्वपूर्ण लोगों में से एक थे। 2019 में मोदी सरकार द्वारा नौकरियों और शिक्षा में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को आरक्षण देने को लेकर उन्होंने कहा था कि यह विधेयक संविधान का उल्लंघन है और ये न्यायिक जांच का सामना नहीं कर सकता है। संविधान में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के लिए जो आरक्षण दिया गया है वो कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। उन्होंने कहा था कि आर्थिक रूप से पिछड़े उच्चजातियों को आरक्षण की ज़रूरत नहीं है। उन्हें स्कॉलरशिप, शिक्षा के लिए लोन, कौशल विकास सहायता और अन्य कल्याणकारी योजनाओं की आवश्यकता है।

इस विषय में उनकी युक्ति थी, ‘ऊंची जातियों में गरीब लोग हैं जिन्हें मदद की ज़रूरत है। यह उचित और संवैधानिक रूप से टिकाऊ होना चाहिए। हमारे संविधान ने आरक्षण और अन्य सामाजिक न्याय के उपायों की शुरुआत ऐसे लोगों के लिए की, जिन्हें सामूहिक रूप से शिक्षा और राज्य की सेवाओं में प्रवेश और जाति व्यवस्था के कारण बेहतर अवसरों से बाहर रखा गया था। हमारे संविधान निर्माताओं ने जाति व्यवस्था और उससे होने वाले नुकसान पर गहराई और मार्मिक ढंग से विचार किया। उन्होंने महसूस किया कि इसे समाप्त करना होगा और इससे पीड़ित लोगों को समानता हासिल करने के लिए समर्थन/ सहयोग की ज़रूरत थी।’ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग छुआछूत के शिकार थे। वे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के थे। आरक्षण गरीबी को खत्म करने का कार्यक्रम नहीं था। यह जाति व्यवस्था द्वारा बनाई गई विषमताओं को दूर करने के लिए किया गया था। सभी जातियों में गरीब लोग हैं। वे गरीब ब्राह्मण, गरीब ठाकुर, गरीब सईद और गरीब बनिया हैं जिन्हें अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए मदद की जरूरत है। इसलिए उन्हें स्कॉलरशिप, पढ़ाई के लिए लोन, कौशल विकास सहायता की आवश्यकता है। वे आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, सामाजिक रूप से नहीं। उन्हें केवल आर्थिक समर्थन की आवश्यकता है, आरक्षण की नहीं।’ लेकिन विद्वान पीएस कृष्णन की भविष्यवाणी को भ्रान्ति साबित करते हुए मोदी सरकार ने सफलता के साथ न्यायायिक जांच का सामना कर लिया है और कोर्ट फैसला ईडब्ल्यू के पक्ष में आ गया है, जिसके सोशल मीडिया इस टिप्पणी से भर गयी है कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है!

दलित चिन्तक चंद्रभान प्रसाद

बहरहाल, विगत वर्षों में आरक्षण को जब भी यह टिप्पणी वायरल होती कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं, मैं यह जानने की कोशिश करता कि आखिर यह कथन किसका है? पर, उत्तर नहीं मिलता और कुछ अन्तराल के बाद यह जानने का प्रयास छोड़ देता हूँ। किन्तु इस बार ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय की मोहर लगने के बाद जिस तरह टिप्पणी वायरल हुई, मैंने नए सिरे से जानने का प्रयास किया और कुछ सफलता भी मिली। मैंने कई लोगों के साथ इस बार यह प्रश्न फोन पर चर्चित दलित चिन्तक चंद्रभान प्रसाद के समक्ष रखा। मेरे सवाल पर कुछ क्षण सोचने के बाद उन्होंने कहा कि औरों के विषय में तो मैं नहीं कह सकता पर, मैंने 2007 से कई बार टिप्पणी की है कि आरक्षण गरीबी हटाने का माध्यम नहीं है!’ मैंने कहा कि अगर आप 2007 से यह बात कहे जा रहे हैं तो उसका कोई लिखित साक्ष्य है? मैं तो विगत तीन-चार सालों से ही बहुजन बुद्धिजीवियों को यह कहते सुन रहा हूँ कि आरक्षण… मेरा सवाल सुनने के बाद उन्होंने कहा कि प्रयास करता हूँ, अगर मिल गया तो मैं व्हाट्सप कर दूंगा और प्रायः चालीस मिनट बाद मेरे व्हाट्सप पर उनका एक मैसेज आया। जो मैसेज आया वह 24 जनवरी, 2007 को नवभारत टाइम्स अखबार में प्लीज, दलितों का रास्ता मत रोको शीर्षक से छपे उनके आलेख की कतरन थी, जिसमें एक जगह स्याही से घेरा बनाया गया था। घेरे में लिखा गया था, ‘लेकिन क्या भारत के सभी सामाजिक समूहों की गरीबी या दूसरी दिक्कतों का जवाब सिर्फ रिजर्वेशन ही है? क्या रिजर्वेशन का काम भारत से गरीबी दूर करना है? क्या भारत के बाकी गरीब भी दलितों जैसी ही सामाजिक स्थित के शिकार हैं? इस नए साल में रिजर्वेशन के पूरे सिस्टम पर नई बहस हो जाए तो अच्छा होगा! खासतौर पर जब प्राइवेट सेक्टर दलितों के लिए रिजर्वेशन जैसा ही अफरमेटिव एक्शन का एक पैकेज लेकर आ रहा है। प्राइवेट सेक्टर इस बात को लेकर फिक्रमंद है कि दलित आदिवासियों को दी गई सुविधा का क्लेम आरक्षण की होड़ में शामिल दूसरी जातियां भी करने लगी हैं।’

चंद्रभान प्रसाद का वह लेख विभिन्न जातियों में आरक्षण को लेकर बढती उग्र मांग पर केन्द्रित था। अपने उस लेख में उन्होंने यह सवाल उठाकर कर कि क्या रिजर्वेशन का काम भारत से गरीबी दूर करना है, वर्षों पहले बता दिया था कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं। उनके आलेख का वह अंश पढ़कर मुझे यकीन हो गया कि पिछले कई वर्षों से बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा जो यह बताने का प्रयास हो रहा है कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है, इस विचार को देने वाले चंद्रभान प्रसाद हैं! जिन्हें मेरी तरह यकीन नहीं है वे पता करें कि सबसे पहले किसने यह विचार दिया कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का…।

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बहरहाल, अगर आरक्षण को परिभाषित करते हुए अधिकांश बहुजन बुद्धिजीवी यह कहते रहे है कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन नहीं, प्रतिनिधित्व देने व जाति जन्य असमानता ख़त्म करने का कार्यक्रम है तथा सवर्णों के हिसाब से यह दया-खैरात है तो इस लेखक की राय औरों से बहुत जुदा रही। मैं प्रायः दो दशकों से जोर गले से कहते रहा हूँ कि आरक्षण और कुछ नहीं, जन्मगत (जाति/ नस्ल, लिंग, धर्म, भाषा इत्यादि) कारणों से शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक से बहिष्कृत किए गए तबकों को शक्ति के स्रोतों में कानूनन हिस्सेदारी दिलाने का औजार है। इसीलिए पुरुष सत्तात्मक समाज द्वारा आधी आबादी को शक्ति के स्रोतों बहिष्कृत किए जाने के कारण, उन्हें पुरुषों की बराबरी पर लाने के दुनिया में हर जगह आरक्षण का प्रावधान किया गया है। नस्ल के आधार पर शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत किये जाने के कारण ही अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील इत्यादि कई देशों में ब्लैक्स के लिए आरक्षण है। दुनिया के तमाम देशों में अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण है, जिसका लाभ कनाडा और अमेरिका में सिख समुदाय के लोग उठा रहे हैं। और इन सबकी जननी भारतीय संविधान में संयोजित आरक्षण का प्रावधान है, जो उन लोगों को सुलभ किया गया है जो हिन्दू धर्म का प्राणाधार वर्ण व्यवस्था के प्रावधानों द्वारा शक्ति से स्रोतों से सदियों से दूर रखे गए। वर्ण व्यवस्था मूलतः शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था के रूप में क्रियाशील रही है, जिसमें कर्म-शुद्धता की अनिवार्यता और कर्म-संकरता की निषेधाज्ञा के कारण दलित, आदिवासी, पिछड़े तथा महिलाएं हजारों साल से शक्ति के समस्त स्रोतों से बहिष्कृत रहे। इनके लिए सम्मानजनक अर्थोपार्जन की गतिविधियां, राजनीति, शिक्षा और शक्ति के अन्यतम प्रभावी स्रोत धार्मिक गतिविधियों में शिरकत करना अधर्म व निषिद्ध रहा। इसलिए उनको समानता प्रदान करने के लिए आरक्षण के दायरे में लाना जरूरी था और लाया भी गया।

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शुद्रातिशूद्रों के विपरीत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्ण समुदाय के साथ ऐसी कोई त्रासदी नहीं रही। ऐसा लगता है शक्ति के समस्त स्रोत चिरकाल के लिए ही सवर्णों के हित में आरक्षित करने के मकसद से ही वर्ण-व्यवस्था का प्रवर्तन किया गया। सारी दुनिया में शक्ति के समस्त भारत के सवर्णों की भांति किसी के लिए भी सुलभ नहीं रहे। इसलिए इस वर्ग के अपंगों को छोड़कर कोई भी जाति आरक्षण का पात्र बनने के लायक नहीं रही। यही कारण है जब नयी सदी में सवर्णों के लिए आरक्षण की मांग उठने लगी, तब इस पर विराम लगाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को कहना पड़ा था, ‘आरक्षण का आधार निर्धनता नहीं, सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ापन है। अतः निर्धन सवर्णों के लिए उठती आरक्षण की मांग पर स्वीकार दर्ज करने का कोई कारण नहीं!’ किन्तु वाजपेयी के एक अन्तराल के बाद जब देश की सत्ता मोदी जैसे दूसरे संघ प्रशिक्षित  प्रधानमंत्री के हाथ में आई। उन्होंने एक ओर जहाँ शक्ति के समस्त स्रोत हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे सवर्णों के हाथ में संकेंद्रित करने के लिए निजीकरण और विनिवेशीकरण को हथियार बनाते हुए सारा कुछ निजीक्षेत्र में देना शुरू किया। वहीं 2019 के जनवरी के पहले में सप्ताह भर के भीतर आनन–फानन में ईडब्ल्यूएस आरक्षण, जो प्रकारांतर में सवर्ण आरक्षण रहा, के लागू करने की सारी प्रक्रिया पूरी कर ली। तब पीएस कृष्णन जैसे ढेरों लोगों को यकीन था कि सुप्रीम कोर्ट में यह ख़ारिज हो जाएगा। किन्तु स्व-वर्णीय/वर्गीय सोच से ग्रस्त मनुवादी जजों ने इसके समर्थन पर मुहर लगा दी। किन्तु हमें मानकर चलना चाहिए कि भविष्य में कोई न्यायप्रिय सरकार जब केंद्र में मजबूती से काबिज होगी, वह न सिर्फ सवर्ण आरक्षण का खात्मा कर देगी। बल्कि इस आरक्षण का लाभ उठाने वालों पर आर्थिक दंड भी लगाएगी। कारण, सवर्ण आरक्षण ने आरक्षण की उस भावना की हत्या कर दी है, जो शक्ति के स्रोतों से वंचित किए गए तबकों को उनका प्राप्य दिलाने के मकसद से विकसित की गयी थी! हजारों साल शक्ति के स्रोतों का जमकर भोग करने वाले सवर्ण अगर निर्धन बने हैं तो उसके लिए जिम्मेवार है उनकी अकर्मण्यता! ऐसे अकर्मण्य लोगों को अशक्तों के लिए बने प्रावधान का भोग एक दंडनीय अपराध है। इसके लिए उनसे हर्जाना लिया ही जाना चाहिए!

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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