क्या आप वह देख पा रहे हैं जो मैं देख रहा हूं? डायरी (28 सितंबर 2021)

नवल किशोर

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जर्मनी में एंजेला मर्केल का युग बीत गया है। अब वहां वामपंथी गुट का राज आएगा। करीब 16 साल तक जर्मनी की चांसलर रहीं एंजेला मर्केल के नाम कई उपलब्धियां रहीं। मेरे हिसाब से उनमें जो सबसे खास रहा, वह जर्मनी को साहसी और अपने तंत्र को जनपक्षीय बनाना। एंजेला मर्केल ने अमरीका की धौंस को खारिज किया। ईरान को अपना दोस्त माना। मर्केल ने चीन को भी पूरी हिम्मत के साथ समर्थन किया। भारत के साथ जर्मनी के रिश्ते के बारे में कोई खास टिप्पणी नहीं करना चाहता। वजह यह कि 2014 के बाद से भारत की विदेश नीति एक खेलमचवा के हाथ में है।

गौरतलब है कि खेलमचवा के कई रूप होते हैं। गांवों में नौटंकी होती तो उसमें जो विदूषक (कामेडियन) होता, उसे खेलमचवा कहते थे। हालांकि भिखारी ठाकुर के लौंडा नाच के विदूषक को तो लबरा कहते थे। कई बार मदारी अपने बंदर को खेलमचवा कहता था।

खैर, मैं मुल्क के खेलमचवा की बात कर रहा हूं और विदेश नीति के संबंध में कुछ बातें दर्ज करना चाहता हूं। यह संभवत: पहली बार हुआ है कि भारत के प्रधानमंत्री अमरीका गए और उनकी आगवानी एक जूनियर सेक्रेटरी रैंक के अधिकारी ने की। खैर, यह तो कोई बड़ी बात नहीं है। भारतीय प्रधानमंत्री को वहां के राष्ट्रपति बाइडेन ने राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित तक नहीं किया। फिर जैसे कि पहले यह परंपरा थी कि दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष प्रेस को संबोधित करते हैं (ऐसा 2018 में हुआ था जब ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति थे और ट्रंप व मोदी के गले मिलने की तस्वीर की खासी चर्चा भी हुई थी), इस बार नहीं हुई।

कुल मिलाकर यह कि इस बार अमरीका जाकर भारतीय प्रधानमंत्री ने क्या हासिल किया, यह एक रहस्य ही है। लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अमरीका में भारतीय प्रधानमंत्री की इतनी बेइज्जती क्यों की गयी? यहां तक कि वहां उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भारतीय प्रधानमंत्री को लोकतंत्र की नसीहतें दीं।

कुल मिलाकर यह कि इस बार अमरीका जाकर भारतीय प्रधानमंत्री ने क्या हासिल किया, यह एक रहस्य ही है। लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अमरीका में भारतीय प्रधानमंत्री की इतनी बेइज्जती क्यों की गयी? यहां तक कि वहां उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भारतीय प्रधानमंत्री को लोकतंत्र की नसीहतें दीं। वहीं अमरीका के राष्ट्रपति बाइडेन ने तो यह कहकर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वैचारिक थप्पड़ लगाया कि अमरीका भारतीय पुरोधाओं गांधी व नेहरू का सम्मान करता है।

यह महज संयोग नहीं है कि अमरीका में अपने प्रिय नरेंद्र मोदी की बेइज्जती का बदला आरएसएस अमरीकी कंपनी अमेजन से ले रही है। आरएसएस ने अपने मुखपत्र ‘पांचजन्य’ में अमेजन को ईस्ट इंडिया कंपनी की संज्ञा दी है और आरोप लगाया है कि यह कंपनी भारतीय बाजार पर एकाधिकार कर लेगी। इसके पहले आरएसएस को भारतीय आईटी कंपनी इंफोसिस से ऐतराज था। वजह केवल यह कि इंफोसिस के मालिकान ब्राह्मण-बनिया नहीं हैं और शायद चंदा देने में कंजूसी करते हैं।

खैर, आरएसएस की सोच ही गई-गुजरी रही है। हालांकि यह तो मानना ही पड़ेगा कि आरएसएस ने अब इस देश में अपना तंत्र स्थापित करना शुरू कर दिया है। यह आरएसएस की कामयाबी है। भारतीय पुलिस का ब्रेनवॉश किया जा चुका है। अब वह भारतीय पुलिस से अधिक हिंदू पुलिस है। नौकरशाह हाथ जोड़े गुलामों के जैसे खड़े हैं। इस बीच अदालतों पर आरएसएस के कब्जे की कोशिशें भी खूब तेजी से की जा रही है। हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच तीखे मुठभेड़ हुए हैं।

आरएसएस की सोच ही गई-गुजरी रही है। हालांकि यह तो मानना ही पड़ेगा कि आरएसएस ने अब इस देश में अपना तंत्र स्थापित करना शुरू कर दिया है। यह आरएसएस की कामयाबी है। भारतीय पुलिस का ब्रेनवॉश किया जा चुका है। अब वह भारतीय पुलिस से अधिक हिंदू पुलिस है। नौकरशाह हाथ जोड़े गुलामों के जैसे खड़े हैं।

एक तो एकदम हाल में जब सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक ईमेल के नीचे भारत सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर और एक सियासी नारा भेजना शुरू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण ने संज्ञान में लिया और आदेश पारित किया कि सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक ईमेल के नीचे केवल सुप्रीम कोर्ट की इमारत की तस्वीर जाएगी। हालांकि इसके बारे में उन्होंने भारत सरकार से पूछा तो अतिरिक्त महान्यायवादी ने उन्हें जानकारी दी कि यह एनआईसी (नेशनल इनफारमेशन सेंटर) की भूल के कारण हुआ है।तो मतलब यह कि बात यहां तक आ पहुंची है। मुख्य न्यायाधीश ने पेगासस वाले मामले में भी सरकार को खुली चुनौती दे रखी है कि वह इंसाफ करेंगे ही, फिर चाहे सरकार को पसंद हो या नहीं हो।

अब मजे की बात यह है कि आरएसएस ने सुप्रीम कोर्ट को जवाब त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देव के मुंह से दिलवाया है। कल बिप्लब देव ने अपने प्रांत के नौकरशाहों को संबोधित करते हुए कहा कि वे बाघ हैं, अदालतें बाघ नहीं हैं। उन्होंने कहा कि राज्य का पुलिस महकमा उनके हाथ में है और इसलिए पुलिस किसे गिरफ्तार करेगी और किसे नहीं, इसका फैसला वे करेंगे। बिप्लब देव ने ऐसा कहते हुए अपने नौकरशाहों को कहा कि वे अदालती अवमानना के डर से काम करना बंद ना करें। अदालतें बाघ नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वे आश्वस्त करते हैं कि किसी भी नौकरशाह को अदालती अवमानना के लिए जेल नहीं जाना होगा।बहरहाल, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच जंग का यह मंजर मुझ जैसे पत्रकार के लिए नया अनुभव है। अभी कुछ और दृश्य सामने आएं तो बातें परत-दर-परत साफ होंगी। फिलहाल एक कविता जो कल देर शाम जेहन में आई-

कई बार होता है

एक गंध बगल से गुजर जाती है

और मैं खोजता रह जाता हूं

गंध का स्रोत।

बाजदफा गंध आती है मेरी जेब से

और हाथ डालने पर निकलता है

कभी हंसता हुआ तो

कभी मुरझाया चांद।

कई बार गंध का उद्गम

गांव के दक्षिण में बहनेवाली नदी होती है

और मैं शहरों की परिक्रमा में

दिन-रात गुजारता रहता हूं।

कई बार गंध आती है

किसी जल रहे चूल्हे से

और मन हंसने लगता है

गोया अगले ही पल

पेट में होंगी भरपेट गर्मागर्म रोटियां।

कई बार तो गंध

शामिल रहती है मेरी रगों में

और मन को रहता है इत्मीनान कि

जब तक गंध है

शब्दों का महत्व बना रहेगा।

कई बार गंध का स्रोत होती है

मेरी प्रेमिका की देह

और मैं गंध को अपनी देह के

हर हिस्से में भर लेना चाहता हूं

परंतु, गंध और मुट्ठी में सूखी रेत

प्रतिस्पर्धा करते हैं।

लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता

कुछ गंध अजनबी होते हैं

जैसे पहाड़ों से आनेवाली हवा ने

भेजा हो अपना बहुरूपिया दूत

और एक टीस हृदय में उठने लगती है।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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