विज्ञापनों के बारे में कभी ऐसे भी सोचिए डायरी (29 सितंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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अखबारों का संबंध राजनीति से बहुत सीधा है। इसे स्थापित करने के लिए प्रमाणों की कोई कमी नहीं है। अखबारों में विज्ञापनों का प्रकाशन भी राजनीति से जुड़ा होता है। ऐसा नहीं होता है कि कोई भी आदमी कुछ भी लिखकर दे दे और विज्ञापन के बदले पैसा भी दे तो अखबार वाले उस विज्ञापन को छाप ही दें। यह बात डॉ. आंबेडकर के समय में भी थी और आज भी है। करीब सौ साल पहले पहले जब डॉ. आंबेडकर ने अपने द्वारा संपादित व प्रकाशित पत्रिका मूकनायक का विज्ञापन तब के समाचार पत्रों को देने का निर्णय लिया तब समाचार पत्रों ने विज्ञापन को ठुकरा दिया था। जबकि डॉ. आंबेडकर ने विज्ञापनों के एवज में पैसे भी देने की बात कही थी।
आज भी हालात ऐसे ही हैं। हर कोई अपने हिसाब से विज्ञापन नहीं छपवा सकता है। कल यह बात एक अखबार को देखकर जेहन में आयी। टाइम्स ऑफ इंडिया का वह अखबार बीते रविवार को प्रकाशित हुआ था। रविवार को होने की वजह से क्लासीफाइड्स की बाढ़ सी थी। तरह-तरह के विज्ञापन थे। कोई अपने नाम बदले की घोषणा कर रहा था तो कईयों को अपने बेटे के लिए खूबसूरत बहू चाहिए थी। कईयों ने खूब सुंदर बेटी के लिए स्मार्ट और शिक्षित व सरकारी नौकरी वाला दामाद के लिए विज्ञापन दिया था। अधिकांश ने अपनी जाति व गोत्र आदि का उल्लेख किया था तो कुछ लोगों ने जाति बंधन नहीं होने की बात कही।

एक प्रमाण है वर्ष 2008 का। तब कोसी नदी कहर बरपा चुकी थी और बाढ़ के उपरांत बीमारियों से कोसी के इलाके में हाहाकार जैसा दृश्य था। तब राजद के बड़े नेता श्याम रजक अखबारों में विज्ञापन देना चाह रहे थे। विज्ञापन में नीतीश कुमार की आलोचना की गई थी। पटना में सबसे बड़े विज्ञापन एजेंसी के मालिक ने हाथ खड़ा कर लिया। हालांकि हाथ खड़े करने से पहले उसने पटना के सभी अखबारों के मालिकों से बात की थी। अंतत: पटना से प्रकाशित एक छोटे अखबार ने उस विज्ञापन को छापा था।

दरअसल, ये क्लासीफाइड्स समाज की असली तस्वीर हैं। इन्हें पारामीटर भी कह सकते हैं। इनके जरिए हम यह जान सकते हैं कि हम जिस समाज में रह रहे हैं, वह सोचता कैसा है और जीता कैसे है। बेटा-बेटी का मामला बहुत निजी हो सकता है लेकिन जिस तरह से जातिगत सड़ांध सामने आती है, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि मजहबों ने इस देश का बेड़ा गर्क कर रखा है। बात केवल हिंदू धर्म की नहीं है। मैंने तो मुसलमानों के विज्ञापनों को भी देखा। अशराफ को अशराफ ही चाहिए। हालांकि विज्ञापन देने वालों में पसमांदा समाज के लोग कम ही दिखे, परंतु थे अवश्य। उन्हें भी पसमांदा ही चाहिए।
जब मैं क्लासाीफाइड्स को देख रहा था तो मेरी जेहन में यह सवाल था कि यदि कोई दलित यह विज्ञापन देना चाहे कि ‘उसके दलित बेटे के लिए सवर्ण बहू चाहिए’ तो क्या अखबार वाले प्रकाशित करेंगे?

कल से कुछ लोग मुझे यह कह रहे हैं कि बिहार के एक युवा भूमिहार नेता के बारे में कुछ लिखूं। ऐसा कहनेवाले भूमिहार ही हैं। वे चाहते हैं कि मैं चाहे युवा भूमिहार नेता की आलोचना ही करूं, लेकिन लिखूं जरूर। दरअसल, वे ऐसा इसलिए चाहते हैं ताकि भूमिहारों के नाम की चर्चा हो। वे केवल चर्चा में बने रहना चाहते हैं ताकि ब्राह्मणों व बनियों के गंठजोड़ को परास्त कर सकें।

इस बात को थोड़ा और विस्तारित करता हूं। कल पटना के पालीगंज विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे एन के नंदा जी का जन्मदिन था। उनकी कविताओं का पहला संग्रह जि़न्दा आदमी शीर्षक से शीघ्र प्रकाश्य है। कल वे दिल्ली में थे और मेरे रहवास से नजदीक ही थे तो उनसे मिलने चला गया। साधन के रूप में दिल्ली में मेट्रो बेहतर विकल्प है। तो हुआ यह कि अक्षरधाम मेट्रो पर पहुंंचा। वहां एक बड़े टीवी स्क्रीन पर विज्ञापन आ रहा था। विज्ञापन उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा जारी किया गया था और दिखाया दिल्ली के लोगों को जा रहा था। मतलब यह कि उत्तर प्रदेश की जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा दिल्ली में विज्ञापनों पर खर्च किया जा रहा है। यह कोई अनोखी बात नहीं है। आम जनता को वैसे भी अपनी गाढ़ी कमाई की चिंता कब रहती है। वह तो अपनी ही जाति और मजहब के नशे में चूर रहती है।
खैर, विज्ञापन में कुछ खास नहीं था। बस दो बड़े नेता हंस रहे थे और यह दावा कर रहे थे कि उत्तर प्रदेश देश का नंबर वन राज्य है। मैं यह सोच रहा था कि यदि कोई व्यक्ति यह विज्ञापन देना चाहे – नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद या फिर आरएसएस मुर्दाबाद – तो क्या मेट्रो के मालिकान इसे दिखाना चाहेंगे?
इससे वाकिफ हूं कि इसे हाइपोथेटिकल माना जाएगा, लेकिन यह हाइपोथेटिकल सवाल नहीं है। एक प्रमाण है वर्ष 2008 का। तब कोसी नदी कहर बरपा चुकी थी और बाढ़ के उपरांत बीमारियों से कोसी के इलाके में हाहाकार जैसा दृश्य था। तब राजद के बड़े नेता श्याम रजक अखबारों में विज्ञापन देना चाह रहे थे। विज्ञापन में नीतीश कुमार की आलोचना की गई थी। पटना में सबसे बड़े विज्ञापन एजेंसी के मालिक ने हाथ खड़ा कर लिया। हालांकि हाथ खड़े करने से पहले उसने पटना के सभी अखबारों के मालिकों से बात की थी। अंतत: पटना से प्रकाशित एक छोटे अखबार ने उस विज्ञापन को छापा था।

एक बड़े टीवी स्क्रीन पर विज्ञापन आ रहा था। विज्ञापन उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा जारी किया गया था और दिखाया दिल्ली के लोगों को जा रहा था। मतलब यह कि उत्तर प्रदेश की जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा दिल्ली में विज्ञापनों पर खर्च किया जा रहा है। यह कोई अनोखी बात नहीं है। आम जनता को वैसे भी अपनी गाढ़ी कमाई की चिंता कब रहती है। वह तो अपनी ही जाति और मजहब के नशे में चूर रहती है।

 

बहरहाल, बाजदफा लोग कहते हैं कि अखबारों में सरकारों का गुणगाण केवल विज्ञापनों के लिए किया जाता है, तो मैं उन्हें समझाने की काेशिश करता हूं कि यह मामला केवल विज्ञापनों का नहीं है। यह जाति और धर्म से जुड़ा मसला भी है। इसे केवल विज्ञापन तक सीमित न समझें।
खैर, कल से कुछ लोग मुझे यह कह रहे हैं कि बिहार के एक युवा भूमिहार नेता के बारे में कुछ लिखूं। ऐसा कहनेवाले भूमिहार ही हैं। वे चाहते हैं कि मैं चाहे युवा भूमिहार नेता की आलोचना ही करूं, लेकिन लिखूं जरूर। दरअसल, वे ऐसा इसलिए चाहते हैं ताकि भूमिहारों के नाम की चर्चा हो। वे केवल चर्चा में बने रहना चाहते हैं ताकि ब्राह्मणों व बनियों के गंठजोड़ को परास्त कर सकें।
सियासत छोड़ते हैं। कुछ मन की बात करते हैं। कल देर शाम कुछ विचार आए।

 

आज का दिन भी जल्दी बीत गया
जबकि हर दिन की तरह
मैं आज के दिन को भी 
जल्दी बीतने नहीं देना चाहता था
मन में थी ख्वाहिश कि
सूरज के जगने से पहले जागूं
और जब सूरज जगे
तब उसे आसमान दिखाऊं
धरती के दृश्य दिखाऊं
और यह जो शहर 
बिना सूरज का इंतजार किए जाग जाता है
और दौड़ने लगता है
उसके बारे में सूरज को बताऊं
लेकिन ख्वाहिशें और हालात
दोनों एक-दूसरे को 
विभाजक रेखा की तरह काटते हैं
आदमी सोचता कुछ है
और सामने का नजारा अलग होता है
फिर भी मैं निराश नहीं था
सूरज पर था यकीन कि
जहां तक उसकी किरणें जाती हैं
उसकी निगाह जरूर जाती होगी
वह देखता जरूर होगा
मेरे खेतों में लगी धान की फसल
और मेरे घर के अंदर भी
उस कमरे में जहां 
मेरी बूढ़ी मां की आंखों में जिंदा है एक सपना
मेरे बूढ़े पिता से वह संवाद जरूर करता होगा
मेरे बच्चों पर पड़ती होगी उसकी रोशनी
और मुझे रहा विश्वास कि
मेरी पत्नी की टिकुली की चमक
वह मुझे तोहफे में देगा
लेकिन बाजदफा सोचता हूं
सूरज को अपना काम करने देना चाहिए
वह कोई डाकिया नहीं है
और मैं इतना कल्पनाजीवी नहीं कि
सूरज की किरणों के कहे पर यकीन कर लूं
लेकिन मैं दिन को बड़ा करना चाहता था
अपने कमरे से बाहर निकल
संसद और अदालत को देखना चाहता था
सड़कों पर रहनेवाले लोगों से पूछना चाहता था कि
आज दिन के खाने में वे क्या खाएंगे- सूखी रोटी, दाल, सब्जी या 
कूड़े पर फेंका हुआ पिज्जा का कोई टुकड़ा?
लेकिन यह सब मैं नहीं कर सका
और आज का दिन भी जल्दी बीत गया
जबकि हर दिन की तरह
मैं आज के दिन को भी 
जल्दी बीतने नहीं देना चाहता था।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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