Saturday, March 2, 2024
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जातिवाद की बीमारी से बचाएगी जाति जनगणना

जाति जनगणना बेहद आवश्यक कार्य है, जिसे होना ही चाहिए। यह भारतीय समाज की सामाजिक बुनावट की विसंगतियों को नंगी आंखों से दिखाने वाला एक साहसिक दस्तावेज होगा,जिसे सामाजिक उच्चता और संसाधनों पर कुंडली मारकर बैठी जातियां देखने से परहेज करती रही हैं और आज उनके बुद्धिजीवी इसे जातिवाद के बढ़ने के खतरे के रूप […]

डॉ विंध्याचल यादव

जाति जनगणना बेहद आवश्यक कार्य है, जिसे होना ही चाहिए। यह भारतीय समाज की सामाजिक बुनावट की विसंगतियों को नंगी आंखों से दिखाने वाला एक साहसिक दस्तावेज होगा,जिसे सामाजिक उच्चता और संसाधनों पर कुंडली मारकर बैठी जातियां देखने से परहेज करती रही हैं और आज उनके बुद्धिजीवी इसे जातिवाद के बढ़ने के खतरे के रूप में व्याख्यायित करते नहीं थक रहे हैं, मानो जातिवाद की घृणा, भेद-भाव और शोषण मिटाना ही उनका हमेशा से उद्देश्य रहा हो! कहीं-कहीं तो वे लगभग धमकाते प्रतीत हो रहे हैं कि जाति जनगणना के परिणाम बड़े बुरे होंगे और लोग भुगतने के लिए तैयार हो जाएँ! मंडल कमीशन के लागू होने के वक्त इन्होंने ऐसा ही रवैया अख्तियार किया था लेकिन इस तरह की  गीदड़-भभकियां और आशंकाएं निर्मूल साबित हैं। जाति जनगणना हमारी विविधता में एकता के सांस्कृतिक बहुलतावाद का एक सजीव-पत्र होने जा रहा है।

सामाजिक दरार पैदा होने का प्रचार एक षड्यंत्र है

जो लोग इससे समाज में दरार पैदा होने का प्रचार कर रहे हैं उनसे मैं पूछना चाहता हूँ कि जाति जनगणना से सामाजिक दरार क्यों पड़ेगी ? क्या ज्यादातर ओबीसी और एससी जातियां एक ही गांव या पुरवे में साथ-साथ रहते नहीं आ रहे हैं ? तो क्या वे एक दूसरे की संख्या और हैसियत जान लेंगे तो लड़ मरेंगे? ऐसा कुछ नहीं है। ब्राह्मणों और ठाकुरों की आर्थिक-सामाजिक हैसियत किसे पता नहीं है! यहां तक कि नीची जातियों पर उनके शोषण और कहर का घिनौना इतिहास रहा है, फिर भी क्या ओबीसी एससी जातियां उनसे नफरत करने लगीं? उल्टे ओबीसी की ज्यादातर जातियों के दम पर ब्राह्मण परंपराएं जिंदा हैं और सत्ता पर कब्जेदारी में उनकी जोरदार वापसी हुई है।

यदि राजनीतिक पार्टियां जाति आधारित तथ्यों का इस्तेमाल सांप्रदायिक दंगों की तरह आंतरिक नफरत फैलाने के लिए करें भी तो भी इसका सामाजिक विघटन पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि भारत में जातियां परस्पर अलग होने के बावजूद धर्म और संस्कृति की सांझी छतरियां रखती हैं। जैसे कुछ मुस्लिम ओबीसी को छोड़कर ओबीसी की लगभग सभी जातियां हिंदू हैं। उनके रीति-रिवाज, पूजा पद्धतियों और  खानपान में काफी समानता है। तमाम जातियों में बंटे होने के बावजूद मुसलमान एक धर्म और एक तरह की जीवन शैली से बंधे हुए हैं। इसलिए जाति के आधार पर सांप्रदायिक दंगों जैसा नरसंहार कराना संभव नहीं होगा। छिटपुट टकराव हो सकते हैं जो कि अभी भी होते ही रहते हैं जिनका संबंध स्थानीय वर्चस्व और निजी दुश्मनी से होता है। इस प्रकार जाति जनगणना से कोई सामाजिक दरार पड़ने वाली नहीं।

सवर्ण बुद्धिजीवी आरोप लगा रहे हैं कि जाति व्यवस्था खत्म करने की मांग करने वाले लोग यानी अंबेडकरवादी और समाजवादी लोग आज जाति जनगणना की जातिवादी हरकत पर उतर आये हैं। सही भी है कि जाति जनगणना का मुद्दा वही लोग उठा रहे हैं जो जाति आधारित समाज व्यवस्था के खिलाफ रहे और उसके दंश के भुक्तभोगी रहे हैं। सवाल है ऐसा क्यों है? यह बहुत स्वाभाविक है कि जो जाति व्यवस्था के गलीज़ दंश का भुक्तभोगी होगा वह उसे बनाए तो नहीं रखना चाहेगा।पर वह क्या करे! अब तक की लड़ाई के अनुभव से उसने यह सीखा है कि ऊंची जातियां जाति व्यवस्था को या जातीय दंभ को कभी खत्म नहीं करेंगी। तब इन्होंने अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाते हुए उसी जाति को हथियार की तरह इस्तेमाल किया। यह लालू यादव,कांशीराम या मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं ने सिखाया। जो जातिवाद सवर्णों का विलास हुआ करता था वही उनके गले की हड्डी बन गया है। भाजपा जैसी मनुवादी पसंद की पार्टियां ओबीसी जातियों को लुभाने में यूं ही नहीं लगी हुई हैं,वे इसी हड्डी को साबुत निगलने की फिराक में हैं। जाति जनगणना इसमें रोड़ा बन सकती है।

[bs-quote quote=”जाति जनगणना के महत्व को मोटे तौर पर दो महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। पहला ‘जाति जनगणना और आरक्षण का सवाल’, और दूसरा ‘जाति जनगणना और भारत का राजनीतिक लोकतंत्र’। पहले परिप्रेक्ष्य में गौरतलब है कि आरक्षण को महज सरकारी नौकरी या उच्च शिक्षा पाने तथा लोकतंत्र में वंचितों के प्रतिनिधित्व तक सीमित न समझा जाए! यह सामाजिक संरचना के ढांचागत बदलाव के लिए भी महत्वपूर्ण है, जैसे वंचित तबकों से प्रतिरोधी आवाज और नेताओें का उभार, सामाजिक रसूख और शक्ति संतुलन (जहां ऐसे संतुलन हैं, वहां स्त्री और दलित उत्पीडन की घटनाएं कम होती हैं) तथा इन्हीं कारणों से आरक्षण गहरे अर्थों में सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए भी उत्तरदाई होता है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि जो सामाजिक समूह सबल व मुख्यधारा में होते हैं उसी की संस्कृति समाज में अपना सिक्का चलाती है। रही बात जाति जनगणना के दूसरे परिप्रेक्ष्य की तो एक तरफ जाति जनगणना से राजनीतिक पार्टियों की सोच और संरचना पर सीधा असर पड़ेगा, वहीं दूसरी ओर जनता को अपने जातीय समूह की राजनीतिक ताकत का ठीक-ठीक अंदाजा होगा जिससे वे सत्ताधारी दलों पर अपने लिए कल्याणकारी नीतियां बनाने हेतु ज्यादा कारगर दबाव बना सकेंगे। जाति जनगणना से न केवल विभिन्न जातियों की जनसंख्या का पता चलेगा बल्कि उससे उनके समूह की शिक्षा, संसाधनों में उनकी हिस्सेदारी, उनके स्वास्थ्य तथा प्रतिनिधित्व के स्तर का भी पता चलेगा। विभिन्न बराबरी की सामाजिक हैसियत वाली जातियों के बीच सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और प्रेरणा का संचार होगा।

इससे देश का भविष्य उज्ज्वल होगा

इससे देश के भविष्य पर बहुत अच्छा व स्वस्थ असर पड़ेगा। अलबत्ता जाति जनगणना न कराने पर देश लगातार बीमार होता जाएगा। जाति जनगणना के आंकड़े न केवल सरकारी नीतियों के सही जरूरतमंदों तक पहुंच को सुनिश्चित करेंगे बल्कि आरक्षण पर प्राय: उठने वाली कटु बहस को सरकार इन्हीं आंकड़ों के आधार पर आरक्षण को पुनर्आवंटित कर खत्म कर सकती है।राजव्यवस्था के सिद्धांत और व्यवहार दोनों के अनुभव कहते हैं कि हमारे समाज में वहीं क्लैसेज़ हुए हैं या होते हैं जहां न्याय और पारदर्शिता का अभाव होता आया है ।यहां तक कि आरक्षण के लागू होने के बाद भी व्यवस्था में बैठे प्रचुर सवर्णों ने  जनरल कैटेगरी के पक्ष में जिस प्रकार लूटा और छिपाया उसी से आरक्षित वर्ग ने विरोध किया और तब बदनाम किया गया कि आरक्षण एक विवादित मुद्दा है। इसे विवादित बनाया किसने?

डॉ विंध्याचल यादव युवा आलोचक और हिन्दी विभाग , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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1 COMMENT

  1. जरूरी लेख।
    विन्ध्याचल यादव भैया काशी हिंदू विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। यह माँग जब विश्वविद्यालयों से उठने लगीं तो निश्चय है कि सन्देश अति प्रभावशाली होगा।

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