Wednesday, February 28, 2024
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कांग्रेस ने ही बोए थे भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने वाले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बीज

26/11 के पंद्रह साल पूरा होने पर विशेष  मेरे पचास साल पुराने मित्र और कांग्रेस के नेता हुसैन दलवाई का आउटलुक अंग्रेजी पत्रिका में इंटरव्यू पढने के बाद लगा कि आज कांग्रेस पार्टी का ऑपरेशन किया जाए।  हालाँकि मेरे अन्य जो कांग्रेसी मित्र है, उन्हें यह बहुत ही नागवार लग सकता है। लेकिन हमारे आदर्श […]

26/11 के पंद्रह साल पूरा होने पर विशेष 

मेरे पचास साल पुराने मित्र और कांग्रेस के नेता हुसैन दलवाई का आउटलुक अंग्रेजी पत्रिका में इंटरव्यू पढने के बाद लगा कि आज कांग्रेस पार्टी का ऑपरेशन किया जाए।  हालाँकि मेरे अन्य जो कांग्रेसी मित्र है, उन्हें यह बहुत ही नागवार लग सकता है। लेकिन हमारे आदर्श संत कबीरदास हैं तो उनकी तरह से सच बोलने और लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।

सन 1885 के 28 दिसंबर के दिन कांग्रेस पार्टी की स्थापना हुई थी। 28 दिसंबर,2023  को कांग्रेस के 138 साल पूरे हो रहे हैं। जहाँ तक मुझे याद आ रहा है कि कांग्रेस के पहले भारत में कोई भी राजनीतिक दल नहीं था। अतः हम कह सकते हैं कि कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी भी है। इससे पूर्व जो भी था वह समाज सुधार के लिए बनाये गये विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे संघ या समितियां थीं।

वर्तमान भारत की सत्ताधारी पार्टी  बीजेपी शायद सबसे तरुण पार्टी कही जा सकती है। 1982 से देखें तो इसकी कुल उम्र 41 साल है। उसके पहले जनसंघ 1951 मे बना था और 1977 मे जनता पार्टी मे परिवर्तित हो गया था। जनता पार्टी दोहरी सदस्यता को लेकर टूट गई थी और पुराने जनसंघ के लोगों ने 1982 मे  भारतीय जनता पार्टी के नाम से अलग पार्टी की स्थापना की थी।

कांग्रेस पार्टी  के बाद बनी कम्युनिस्ट पार्टी 1925 में यानी संघ के स्थापना का साल और फिर सोशलिस्ट पार्टी 1933 में। इसलिए कांग्रेस को सबसे पुरानेऔर बूढ़े दल के रूप में गिना जाता है। बुढ़ापा जिसे अंग्रेजी मे एजिंग कहा जाता है। जैसे  एजिंग में जैसे नई पेशियाँ बनना बंद हो जाती हैं। चेहरे पर झुर्रियों दिखाई देने लगती है और शरीर के अन्य अवयवों में शिथिलता आने लगती है, वैसे ही स्थिति कांग्रेस पार्टी की हो चुकी है।

 हालाँकि कांग्रेस पार्टी की कुछ बुराइयां शुरुआत से है। उदाहरण के लिए जाति, धार्मिक और वैयक्तिक मिल्कियत जैसे विषयों पर शुरुआत से ही गफलत चली आ रही है। उसके पीछे शुद्ध रूप से सवर्ण समाज से आई हुई लीडरशिप है। शुरू में आर्य समाज के लाला लाजपत राय, हिंदू महासभा के संस्थापक मदनमोहन मालवीय एवं वर्तमान में अनगिनत लोग हैं, जिन्होंने काँग्रेस पार्टी का नेतृत्व किया। आपातकाल में राज्यसभा में नाना साहब गोरे का एक भाषण था, जिसे सेंसरशिप के कारण बाहर नहीं लाया जा सका लेकिन हम लोगों ने उसे सायक्लोस्टाइल करके वितरित किया था। उस भाषण में उन्होंने संघ को बैन करने को लेकर बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि ‘इंदिराजी आप संघ को बैन कर क्या हासिल करना चाहती हैं क्योंकि संघ तो कांग्रेस पार्टी के अंदर भी मौजूद है।’ कमलापति त्रिपाठी और उमा शंकर दीक्षित से लेकर ट्रेजरी बेंचेस की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि मैडम इंदिरा गाँधी आपकी स्वयं की पार्टी संघी मानसिकता के लोगों से भरी हुई है और उस मानसिकता का कुछ बंदोबस्त करने के बजाय संघ को बैन करने से क्या हासिल होगा?

 इसलिए 1925 तक संघ मानसिकता वाले लोगों को अलग संगठन की जरूरत महसूस नहीं हुई क्योंकि ऐसी मानसिकता वाले काँग्रेस पार्टी में शामिल थे। लेकिन 1915  में  जब महात्मा गाँधी भारत आएऔर 1920 में नागपुर में काँग्रेस का अधिवेशन हुआ और इस अधिवेशन में गांधी के कारण ही अस्पृश्यता विरोधी प्रथम प्रस्ताव पारित हुआ। इस प्रस्ताव से डॉ. हेडगेवार और डॉ. बीजी  मुंजे के कान खड़े हो गये थे। (अस्पृश्यता विरोधी प्रथम प्रस्ताव को 103 साल पूरे हो रहे हैं और  ऊँची जाति के, विशेष रूप से एलीट क्लास के अलावा अन्य सभी लोगों और महिलाओं को कांग्रेस में शामिल करने का ऐतिहासिक श्रेय गाँधी को जाता है।)

 जब एक अगस्त, 1920 को जब बाल गंगाधर तिलक की मौत हुई तो उन्हें लगा कि अब कांग्रेस पार्टी के अंदर मौजूद रहने का कोई फायदा नहीं है। इसीलिए सन 1925 में दशहरे के दिन नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवा संघ की स्थापना की गई।

मदनमोहन मालवीय ने संघ और हिंदू महासभा की विशेष रूप से मदद की। यही  कांग्रेस में शुरू से हिंदुत्ववादी ताकतों के मौजूद रहने का कारण है। कांग्रेस के भीतर सांप्रदायिकता का जहर शुरू से ही मौजूद है। यह जरूर है कि नेहरू के कारण वह मौन रहे,  लेकिन उनके जीवन में ही पंडित गोविन्द वल्लभ पंत जैसे लोग अपनी मनमानी करने से बाज नहीं आते थे।

महात्मा गाँधी के रहते हुए, कांग्रेस पार्टी के अंदर मौजूद हिंदुत्ववादी ताकतें वहाँ रहते हुए संघ परिवार के साथ भी अपने संबंध बनाने की कोशिश कर रही थीं। मदनमोहन मालवीय ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के समय ही संघ को दो एकड़ जमीन विश्वविद्यालय के अंदर देने का काम किया।

[bs-quote quote=”मदनमोहन मालवीय ने संघ और हिंदू महासभा की विशेष रूप से मदद की। यही  कांग्रेस में शुरू से हिंदुत्ववादी ताकतों के मौजूद रहने का कारण है। कांग्रेस के भीतर सांप्रदायिकता का जहर शुरू से ही मौजूद है।  यह जरूर है कि  नेहरू के कारण वह मौन रहे हैं,  लेकिन उनके जीवन में ही पंडित गोविन्द वल्लभ पंत जैसे लोग अपनी मनमानी करने से बाज नहीं आते थे।” style=”style-6″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

केंद्र और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सरकार रहते हुए  22-23 दिसंबर, 1949 की आधी रात को  बाबरी मस्जिद के भीतर राम लला की मूर्ति रखने का काम हुआ था।  इसको लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पंडित गोविन्द वल्लभ पंत जो उन दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे को कई पत्र लिखे। लेकिन पंत जी ने कोई कार्रवाई नहीं की। बिल्कुल इसी तरह 6 दिसंबर,  1992 को नरसिंहा राव ने प्रधानमंत्री रहते हुए किया। कुलदीप नैयर ने अपनी किताब Beyond the line(एक ज़िंदगी काफी नहीं) में नरसिंह राव के लिए लिखा था कि कैसे 6 दिसंबर को दिन भर तथाकथित पूजा करने के नाटक में, प्रधानमंत्री आवास मे व्यस्त रहने की झूठी बात थी। आईबी, सीबीआई बराबर उन्हें मिनट-मिनट की खबर बता रहे थे, लेकिन नरसिंह राव खुद चाहते थे कि बाबरी मस्जिद ध्वंस हो जाये और उनके ही सहयोगी मणिशंकर अय्यर ने फ्रंटलाइन पत्रिका में, नरसिंह राव की  किताब कैसे झूठ का पुलिंदा है, में इस  किताब की समीक्षा करते हुए विस्तार से लिखा है।

कांग्रेस पार्टी एक होल्डाल जैसी पार्टी है, जिसके अंदर हर तरह के लोग भरे हुए हैं और सबसे ज्यादा प्रभावित वही करते हैं। यह मैं अपने खुद के अपने अनुभव से लिख रहा हूँ। मैंने नांदेड़ में 6 अप्रैल और  8 सितम्बर 2006 को मालेगाँव विस्फोट तथा 29 सितम्बर 2008 के दिन के दोनों विस्फोटों की जाँच की तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर के मुख्यालय के तथाकथित फिदाइन हमले (1 जून 2006) के दिन की भी घटना की जाँच करने के बाद, दिल्ली में कांग्रेस नेता, जिनकी कल मौत हुई पर, मृतात्मा को श्रद्धांजलि देने के पश्चात मैं यह लिख रहा हूँ।

दिल्ली के कुछ मित्रों ने मुझे बगैर बताये एक लुटियंस की दिल्ली के बंगले पर लेकर गये थे। बंगले के बाहर गेट पर नाम देखते हुए मैंने कहा कि मुझे यहाँ क्यों लाये हो? मेरे सवाल का जवाब देने के पहले ही अहमद पटेल ने खुद बाहर आकर मेरा स्वागत  किया और घर के अंदर लेकर गये। उन्होंने कहा कि खैरनार साहब आपसे मेरी गुजारिश है कि ‘आप दिल्ली प्रेस की जाँच रिपोर्टिंग मत कीजिए।’ इस पर मैंने कहा कि ‘अहमद भाई सोनियाजी ने आपको अपने राजनीतिक सलाहकार के रूप में सिर्फ इसलिए नहीं रखा है कि आप बहुत ही सुंदर दिखते हैं बल्कि भारत के 20-25 करोड़ मुसलमानों के नुमाइंदगी के लिए आपको विशेष रूप से रखा गया है। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद यह हिंदुत्ववादी ताकतों की आतंकवादी घटनाएं होने के बाद आप मुझे प्रेस कांफ्रेंस न करने की सलाह क्यों दे रहे हैं जबकि महाराष्ट्र और केंद्र दोनों जगह आपकी सरकार हैं।

वैसे आपको बता दूं कि दिल्ली प्रेस क्लब की प्रेस कांफ्रेंस करने के बाद ही ये लोग मुझे आपके पास लेकर आये हैं। आप इनसे पत्रकारों के नाम ले लीजिए और उन्हें फोन कर दीजिये कि मेरी कहीं हुई कोई भी बात न छापें। दोनों हाथ कान पर लेकर वह बोले कि तौबा-तौबा यह कोई आपातकाल के दिन तो है नहीं। मैं ऐसी कोई हरकत करूँ।  उसके बाद मैंने अपनी रिपोर्टिंग की कॉपियाँ उनके सामने से उठाईं और चलने लगा। सुरेश पचौरी भी वहीं बैठे थे। वे उठकर मेरे साथ गेट तक चलते-चलते बोले कि ‘मैं संसदीय कार्य मंत्री हूँ, मुझे कॉपियाँ दीजिए। मैं इसे कुछ  सांसदों को बांटना चाहता हूँ।

आज की तारीख 26/11 है। पंद्रह साल हो चुके हैं। मेरी अपनी मान्यता है कि अगर नांदेड़, मालेगाँव, नागपुर, हैदराबाद, अजमेर शरीफ, समझौता एक्सप्रेस में हुए विस्फोट की सही जाँच की होती तो मुम्बई 26/11 नहीं हुआ होता।

यह सभी हादसे कांग्रेस की सरकार रहते हुए हुए हैं। 26/11 कांड के समय महाराष्ट्र और केंद्र  दोनों जगह कांग्रेस की सरकार रहते हुए, मेरे मित्र एसएम मुशरिफ़ ने हू किल्ड करकरे नामक किताब लिखी, जिसमें उन्होंने देश की प्रमुख जाँच एजेंसियों की और इशारा किया। किताब के अंग्रेजी, हिंदी और मराठी संस्करणों के प्रकाशन समारोह में मैंने एक वक्ता के रूप में तीनों बार लेखक और प्रकाशक पर कानूनी कार्रवाई करने की मांग की थी। विशेष रूप से कहा था कि हमारे देश की महत्वपूर्ण जाँच एजेंसियों पर बहुत ही संगीन आरोप लेखक ने लगाए हैं। इसलिए इन पर कार्यवाही होनी चाहिए। इस बात को दस साल से भी ज्यादा समय हो चुका है और यह किताब भारत हर प्रमुख भाषा में अनुदित होकर धड़ल्ले से बिक रही है। आज तेरह साल बीतने के बावजूद इस आतंकवादी घटना की जाँच पूरी नहीं हुई है।

भारतीय जनता पार्टी शत-प्रतिशत हिटलर की तर्ज पर अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ नफरत फैलाने के काम में आने वाले मुद्दों पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का काम कर रही है। देश के पूंजीपति उसी तरह काम कर रहे हैं, जिस तरह से हिटलर ने जर्मनी में सत्ताधारी बनने के पहले वहाँ के सभी प्रमुख उद्योगपतियों की बैठक बुलाकर मुनाफा कमाने की खुली छूट देकर अपनी राजनीतिक हैसियत बनाने का काम किया था। 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के लिए नरेंद्र मोदी ने तथाकथित गुजरात मॉडल के आधार पर काम किया। जो उन्होंने 2001 से ही गुजरात के उद्योगपतियों को प्रश्रय देकर और 2002 के दंगों से अपनी 44 इंची छाती को बारह इंच बढ़वाकर 56 इंच कर, ढिंढोरा पीटा।

 दंगे से लेकर, हिजाब, हलाल, मंदिर-मस्जिद तथा आतंकवाद का मामला सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए किया गया है। पुलवामा के तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक और हमारे देश के लोगों की आस्था (राम-कृष्ण जैसे पात्रों) को अपनी राजनीतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए इस्तेमाल कर रही है। जिसमें हमारे देश के मासूम लोगों से लेकर सुरक्षाकर्मियों की जान के एवज में यह पार्टियां राजनीतिक रोटी सेंकने का काम कर रहे हैं।

डॉ. सुरेश खैरनार
डॉ. सुरेश खैरनार जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं।

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