गर्दन काटना और बाल की रक्षा करना अर्थात अम्बेडकर को देवता बनाकर उनके सिद्धांतों की अवहेलना

राम पुनियानी

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पिछले सालों की तरह इस साल भी विभिन्न राजनैतिक दलों और संगठनों ने 14 अप्रैल को जोरशोर से अम्बेडकर जयंती मनाई। पिछले कुछ दशकों से लगभग सभी राजनैतिक दलों में सामाजिक न्याय के इस प्रतिबद्ध हिमायती के प्रति जबरदस्त श्रद्धा उत्पन्न हो गई है। अम्बेडकर फैन्स क्लब की सबसे ताजा सदस्य है आप, जो आरएसएस-समर्थित अन्ना हजारे आंदोलन की उपज है। आप ने बाबासाहेब को अपने दो नायकों में से एक घोषित किया है। हिन्दू राष्ट्रवाद के पैरोकार आरएसएस और उसके कुनबे ने भी अम्बेडकर जयंती पर विशाल आयोजन करने शुरू कर दिए हैं। इस साल भाजपा ने अम्बेडकर जयंती से ‘सामाजिक न्याय सप्ताह’ मनाने का निर्णय किया है। इस दौरान समाज कल्याण और दलितों के सशक्तिकरण व उन्हें सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था में उनका उचित स्थान दिलवाने हेतु अम्बेडकर द्वारा किए गए प्रयासों को जनता के सामने प्रस्तुत किया जाएगा। इसके अलावा, भाजपा कार्यकर्ता दलित परिवारों से उनके घरों पर जाकर मिलेंगे और उन्हें यह बताएंगे कि भारत सरकार ने उनकी भलाई के लिए कौन-कौनसी योजनाएं शुरू कीं हैं। संघ की विद्यार्थी शाखा एबीवीपी सामाजिक समावेशीकरण को बढ़ावा देने में अम्बेडकर की भूमिका के बारे में लोगों को बताएगी।

आरक्षण के मुद्दे पर अहमदाबाद में 1980 के दशक में पहले दलित-विरोधी और फिर ओबीसी-विरोधी दंगे हुए थे। संघ परिवार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को अमल में लाने का सीधे विरोध तो नहीं किया परंतु उसके जवाब में वह कमंडल ले आया और राम मंदिर के नाम पर देश का साम्प्रदायिक धु्रवीकरण करने में जुट गया।

संघ और उससे जुड़े संगठनों द्वारा अम्बेडकर का महिमामंडन अत्यंत विडंबनापूर्ण है। संघ, हिन्दू राष्ट्रवाद का पैरोकार है जो अम्बेडकर की भारतीय राष्ट्रवाद की परिकल्पना से तनिक भी मेल नहीं खाता। अम्बेडकर का राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, प्रजातंत्र और सामाजिक न्याय पर आधारित था। वे जाति एवं वर्ण व्यवस्था को ब्राम्हणवादी हिन्दू धर्म, जिसका हिन्दू राष्ट्रवादी प्रचार करते हैं, की रीढ़ मानते थे। उन्होंने हिन्दू समाज को बदलने के जो भी प्रयास किए उनका हिन्दू महासभा और आरएसएस ने कभी समर्थन नहीं किया। चाहे वह चावदार तालाब सत्याग्रह हो या कालाराम मंदिर आंदोलन, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने अम्बेडकर से हमेशा सुरक्षित दूरी बनाए रखी। अम्बेडकर ने जाति और लैंगिक पदक्रम के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक स्वरूप मनुस्मृति का दहन किया और स्वतंत्रता, समानता व भाईचारे पर आधारित भारतीय संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर, लैंगिक एवं जातिगत पदक्रम व भेदभाव ब्राम्हणवादी हिन्दुत्व का अभिन्न अंग हैं और ब्राम्हणवादी हिन्दुत्व, हिन्दू राष्ट्रवाद का वैचारिक आधार है।

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अम्बेडकर द्वारा सार्वजनिक रूप से ‘मनुस्मृति’ को जलाने के एक दशक बाद संघ के मुखिया गोलवलकर ने इस पुस्तक की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इस पुस्तक के अनुसार जाति-आधारित संरचना ने ही हिन्दू समाज को स्थायित्व प्रदान किया है। भारतीय संविधान का आरएसएस ने इस आधार पर विरोध किया था कि उसमें भारत के प्राचीन मूल्यों (जो मनुस्मृति में वर्णित हैं) को कोई स्थान नहीं दिया गया है। संघ परिवार आरक्षण का धुर विरोधी रहा है। आरक्षण के मुद्दे पर अहमदाबाद में 1980 के दशक में पहले दलित-विरोधी और फिर ओबीसी-विरोधी दंगे हुए थे। संघ परिवार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को अमल में लाने का सीधे विरोध तो नहीं किया परंतु उसके जवाब में वह कमंडल ले आया और राम मंदिर के नाम पर देश का साम्प्रदायिक धु्रवीकरण करने में जुट गया।

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यहीं से संघ परिवार की रणनीति में बदलाव शुरू हुआ। जातिगत और लैंगिक पदक्रम को बनाए रखने के अपने असली एजेंडे को छुपाते हुए परिवार ने दलितों और ओबीसी को हिन्दुत्व के झंडे तले लाने के लिए कई संगठनों की स्थापना की, जिनमें से एक सामाजिक समरसता मंच था। जहां अम्बेडकर जाति के उन्मूलन की बात करते थे वहीं संघ परिवार का कहना था कि जातियां एक-दूसरे की पूरक हैं। संघी चिंतक दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद इसी परिकल्पना पर आधारित है।

सोशल इंजीनियरिंग के सहारे वे दलितों और आदिवासियों को यह समझाने में सफल रहे कि उनके असली दुश्मन मुसलमान हैं। संघ परिवार का जोर ‘हिन्दुओं के दुश्मन’ मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुओं को एक करने पर है। वे हिन्दू समुदाय की सभी बुराईयों के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार बताते हैं। इसी सोशल इंजीनियरिंग का यह नतीजा था कि सन् 2002 के गुजरात कत्लेआम में मुख्य प्रायोजकों ने केवल हिट लिस्टें तैयार कीं और सड़कों पर खूनखराबा करने का काम दलितों और आदिवासियों से करवाया।

बाबासाहेब ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हिन्दू राष्ट्र दलितों सहित भारत की आबादी के सबसे बड़े हिस्से के लिए एक बड़ी आपदा होगा। परंतु यह विडंबना ही है कि दलित, हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए कार्यरत शक्तियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

उत्तरप्रदेश में सन् 2017 के चुनाव में यह प्रचार किया गया कि कांग्रेस व समाजवादी पार्टी मुस्लिम-परस्त हैं और केवल भाजपा ही दलितों, आदिवासियों व हिन्दुओं की रक्षा कर सकती है। संघ से जुड़े सामाजिक समरसता मंच, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, विहिप इत्यादि निरंतर दलित-आदिवासी इलाकों में हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रचार करते आ रहे हैं।

आदिवासी क्षेत्रों में शबरी और हनुमान का महिमामंडन किया जाता है। जिन इलाकों में अन्य हाशियाकृत समुदायों का बहुमत है वहां उन समुदायों के ऐसे नायकों को ढूंढ लिया गया है जिन्हें मुसलमानों के विरूद्ध योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। इसका एक उदाहरण है राजभर-पासियों के नायक सुहेल देव। ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर यह दिखाया जा रहा है कि सुहेलदेव हिन्दू धर्म के रक्षक थे और उन्होंने मुस्लिम गाजी मियां के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी।

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आरएसएस और उससे जुड़े संगठन दलित इलाकों में अपने काम को ‘सेवाश् बताते हैं। यह सेवा इन वर्गों का ‘उपकार’ करने पर आधारित है, उन्हें उनके अधिकार देने पर नहीं। इसके विपरीत, यूपीए सरकार ने वंचित वर्गों के सशक्तिकरण के लिए सूचना का अधिकार, भोजन का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार व शिक्षा का अधिकार जैसे कानून बनाए। सन् 2022 में उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में यह प्रचार किया गया कि भाजपा सरकार के कारण गरीब और वंचित वर्गों को मुफ्त राशन मिला।

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा वंचित वर्गों को तव्वजो दिए जाने से ये वर्ग भाजपा की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ये संगठन जिन इलाकों में काम करते हैं वहां वे ब्राम्हणवादी धार्मिकता को भी प्रोत्साहन देते हैं। हिन्दुत्ववादी संगठन दलितों व अन्य हाशियाकृत समुदायों को यह समझाने में भी सफल रहे हैं कि ऊँची जाति के हिन्दू कार्यकर्ताओं का उनके साथ मेलमिलाप ही उनके लिए सम्मान की बात है। इस तरह इन समुदायों को भाजपा को समर्थन देने के लिए राजी किया जा रहा है।

संघ परिवार का राजनैतिक एजेंडा हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है। बाबासाहेब ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हिन्दू राष्ट्र दलितों सहित भारत की आबादी के सबसे बड़े हिस्से के लिए एक बड़ी आपदा होगा। परंतु यह विडंबना ही है कि दलित, हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए कार्यरत शक्तियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। सन् 2014 से अब तक लगातार दलित व ओबीसी बहुल इलाकों में भाजपा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करती आ रही है।

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सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत में दलित वोटों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इन चुनावों में दलितों के लिए आरक्षित 84 सीटों में से 40 सीटों पर भाजपा विजयी हुई थी। सन् 2019 के चुनावों के बाद सेंटर फॉर द स्टडी अॉफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) द्वारा किये गए एक विश्लेषण के अनुसार, 2014 से 2019 के बीच दलितों, आदिवासियों और ओबीसी का भाजपा के प्रति समर्थन दोगुने से भी अधिक हो गया है।

यह इस तथ्य के बावजूद हो रहा है कि भाजपा की नीतियों के कारण दलितों को मिल रही आरक्षण की सुविधा में कमी आई है और उनके विरूद्ध अत्याचार बढ़े हैं। संघ ने इन वर्गों के प्रति अपनी नीतियों में जो परिवर्तन किया है उसका भाजपा को भरपूर फायदा मिला है।

अनुवाद – अमरीश हरदेनिया

लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्माेनी अवार्ड से सम्मानित हैं।

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