शिद्दत से याद किए गए कबीर और नागार्जुन

जनसंस्कृति मंच दरभंगा के तत्वावधान में मनाई गई संयुक्त जयंती

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मंगलवार को कबीर एवं नागार्जुन जयंती के अवसर पर प्राक परीक्षा प्रशिक्षण केंद्र, दरभंगा पर जनसंस्कृति मंच दरभंगा के तत्वावधान में पूरी शिद्दत से कबीर और नागार्जुन का जयंती समारोह एकसाथ मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत जनसंस्कृतिकर्मी एवं जनगायक कॉ. राजू रंजन द्वारा नागार्जुन और कबीर के पदों की गीति प्रस्तुति से हुई।

संगोष्ठी का विषय प्रवर्तन करते हुए जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने कहा कि ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ पर टिकी बर्बर फासिस्ट सत्ता से दो-दो हाथ करने के लिए कबीर और नागार्जुन हमारे समय के महत्वपूर्ण इंक़लाबी कवि हैं। हमारे देश में क्रांतिकारी सांस्कृतिक संघर्ष की लंबी ऐतिहासिक विरासत के रूप में ज्वालामुखी की तरह धधकने वाले कवि रहें हैं कबीर एवं नागार्जुन! सच पूछिए तो आधुनिक युग में प्रगति, समता और जनवाद को लक्ष्य करके जिस शोषणविहीन समाज की स्थापना के लिए आजीवन लहूलुहान होते हैं नागार्जुन, उन्हीं उसूलों के लिए 600 वर्ष पूर्व कबीर भी आजीवन सामन्तों एवं जमींदारों से मुठभेड़ करते रहे। सांस्कृतिक जनवाद का परचम लहराने वाले पहले क्रांतिकारी कवि कबीर हैं।”

कबीर कोई व्यक्ति नहीं हैं। वे हमारी लोक परंपरा है, जन संस्कृति की परंपरा हैं। आधुनिक काल में इसकी सबसे मुखर अभिव्यक्ति हम बाबा नार्गाजुन में पाते हैं। वे तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र की मुखर और प्रखर आवाज हैं। जनतांत्रिकता उनके रचनात्मक व्यक्तित्व में छलछलाती हुई नजर आती है। वही कविता जनतांत्रिक होती है जिसमें जनता का दुख-दर्द, उनका संघर्ष अभिव्यक्त हो, वह जनता की भाषा में संवाद करे और कवि का जनता के साथ भावनात्मक लगाव हो।

इस अवसर पर समकालीन हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर और हिंदी विभागाध्यक्ष, रीवा विश्वविद्यालय म.प्र. के प्रो. दिनेश कुशवाहा ने अपने वक्तव्य में कहा कि कबीर ने भारत की जनता को शास्त्र नहीं कविता से शिक्षित किया। साधुता को श्रम से जोड़ा और भिक्षा से मुक्त किया। उन्होंने अपनी कविता और जीवन से सिद्ध किया कि अपनी चादर खुद बनो, दूसरे की बुनी चादर ओढ़कर कबीर नहीं बना जा सकता। कविता सिर्फ करुणा से नहीं उपजती वह कर्म से भी पैदा होती है जैसे कृषि और बागवानी से अनाज और फल पैदा होते हैं। कबीर कर्म की कविता के आदि कवि हैं।

उन्होंने आधुनिक कबीर नागार्जुन पर बोलते हुए कहा कि नागार्जुन अलक्षित कवि हैं। हिंदी कविता में जिन विषयों पर किसी का ध्यान नहीं गया, उन विषयों पर नागार्जुन ने कविताएं लिखीं। अंत में उन्होंने अपनी कविता ‛भेड़िया आएगा मगर इसबार’ का पाठ किया।

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इस अवसर पर कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर ने कहा कि कबीर और बाबा नागार्जुन में अपने काल की अग्रगामी चेतना मिलती है। ये दोनों अपने समय की सबसे निश्च्छल, सबसे प्रखर, सबसे संघर्षशील, सबसे अग्रगामी चेतना के वाहक हैं। इनके यहां साफगोई, बेबाकपन, साहस, पक्षधरता, सामाजिकता और नवीनता मिलती है। इसी समानता के कारण बाबा में हमें आधुनिक कबीर का दर्शन होता है। दोनों जन संस्कृति के हमारे मॉडल हैं।

कबीर के समय में धर्म की सत्ता थी, यही शासक सत्ता थी। पंडितों और मुल्लाओं का वर्चस्व था। ताजिन्दगी कबीर इनसे टकराते रहे। मिथ्या के खिलाफ सत्य के लिए लोगों को जागृत करते रहे। कबीर अपने समय के पहले कवि हैं जिन्होंने अपनी कविता में गरीबों, शोषितों, बुनकरों, किसानों, दासों स्त्रियों की पीड़ा और दुख-दर्द को वाणी दी। धोखा और पाखण्ड से भरे धार्मिक विचारों के विरुद्ध समाज में अलख जगाने का काम किया। स्वर्ग-नर्क, लोक-परलोक, जन्म-पुर्नजन्म के भ्रमजाल पर प्रहार किया। कबीर ने प्रेम का संदेश दिया। उनके लिए प्रेम जड़ता व भेदभाव से मुक्त हो लोगों को जोड़ने का सूत्र था तो वहीं यह ज्ञान का स्रोत भी था। यदि कबीर आज होते तो इस कथित लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके साथ क्या व्यवहार होता? कहने के लिए लोकसत्ता है, जनतंत्र है, चुनी हुई सरकार है पर हकीकत यह है कि अंधश्रद्धा-अंधविश्वास के उन्मूलन के लिए काम करने वालों को मौत मिल रही है। हत्यारे पकड़ से बाहर हैं।

कबीर कोई व्यक्ति नहीं हैं। वे हमारी लोक परंपरा है, जन संस्कृति की परंपरा हैं। आधुनिक काल में इसकी सबसे मुखर अभिव्यक्ति हम बाबा नार्गाजुन में पाते हैं। वे तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र की मुखर और प्रखर आवाज हैं। जनतांत्रिकता उनके रचनात्मक व्यक्तित्व में छलछलाती हुई नजर आती है। वही कविता जनतांत्रिक होती है जिसमें जनता का दुख-दर्द, उनका संघर्ष अभिव्यक्त हो, वह जनता की भाषा में संवाद करे और कवि का जनता के साथ भावनात्मक लगाव हो। नार्गाजुन के कवि की यह विशेषता ही उन्हें जनकवि के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं।

बाबा नागार्जुन भारत की दूसरी आजादी के वे प्रतिनिधि रचनाकार हैं। सत्ता में चाहे नेहरू रहे हों या मोरारजी देसाई व राजीव गांधी हो, उन्होंने इन्हें केन्द्र कर कविताएं लिखी। बाबा की ये कविताएं बहुत तात्कालिक लगती हैं। लेकिन उनके कहन की लोकशैली और व्यंग्य की धार इन्हें कालजई बना देती है। सोचता हूं आज बाबा होते और नरेन्द्र मोदी को केन्द्र कर ऐसी ही मारक कविता लिखते तो मौजूदा सरकार की इस पर क्या प्रतिक्रिया होती? अब तो ऐसे लोगों के लिए देशद्रोही,  टुकड़े-टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सल जैसे पद इजाद किए गए हैं।

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बाबा को हम एक सांस्कृतिक योद्धा की भूमिका में पाते हैं। जब नक्सलबाड़ी किसान आन्दोलन सत्ता के भारी दमन का शिकार हुआ और उसे मृत प्रायः मान लिया गया, वह फिनिक्स पंछी की तरह बिहार के भोजपुर में राख के ढेर से जी उठा। बाबा ने इस पर कालजई कविता लिखी भोजपुर। बाबा ने अपने काव्य में क्रान्तिकारी संघर्षों और आजादी के नये नायकों को प्रतिष्ठा दी है। आज जब मनुष्यता लहूलुहान हो रही है संविधान, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता पर सत्ता का बुलडोजर चल रहा हो, कबीर और नार्गाजुन हमें अपनी भूमिका के प्रति सजग और सचेत करते हैं। इनकी परंपरा व्यक्ति से अधिक जन संस्कृति की परम्परा है। यह स्वयं जगने और दूसरों को जगाने की परम्परा है।

बतौर मुख्य वक्ता लोकधर्मी चेतना के सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक प्रो. चौथीराम यादव ने कहा कि जिस तरह अप्रैल में फुले-आम्बेडकर की संयुक्त जयन्तियों का उत्सव एकसाथ मनाया जाता है, उसी प्रकार जसम, दरभंगा जून में कबीर और नागार्जुन का संयुक्त उत्सव साझा सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रतिवर्ष मनाता है। अकारण नहीं है कि लोक जागरण का प्रखर कवि कबीर अपनी जनवादी सांस्कृतिक विरासत के साथ आधुनिक नवजागरण के कविता-जनपद में आवाजाही का संबन्ध-सेतु है।कविता के भीतर खतरनाक ढंग से प्रवेश करने का अदम्य साहस या तो कबीर में था या फिर जन कवि नागार्जुन में। लेकिन कबीर की देशज आधुनिकता परलोकवाद से मुक्त नहीं है और उसमें ‘सचेतन परिवर्तनेच्छा’ का अभाव है, जबकि नागार्जुन में सचेतन रूप से समाज को बदल डालने का संकल्प है और उनकी कविता का संघर्ष जनता की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति का संघर्ष है। वस्तुतः भक्तिकाल हिंदी कविता का गाँव-घर है तो आधुनिककाल उसका शहर है।जनपदीय संवेदना के कवि नागार्जुन, केदार और त्रिलोचन को छोड़कर आधुनिक हिंदी कविता प्रायः शहरी मध्यवर्गीय जीवन को अभिव्यक्ति करने वाली कविता है। कबीर और नागार्जुन दोनों हकलाने वाले कवि नहीं हैं बल्कि उनका साहसिक लेखन दोटूक और बेलौस है। इन दोनों समानधर्मा प्रखर कवियों के एकसाथ संयुक्त आयोजन के लिए जसम, दरभंगा को हार्दिक बधाई।

अध्यक्षता करते हुए जसम दरभंगा के अध्यक्ष डॉ. रामबाबु आर्य ने कहा कि कबीर और नागार्जुन दोनों क्रांतिकारी थे। ग्राम्सी के शब्दों में वे दोनों ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल थे। इसलिए दोनों हीं समाज में परिवर्तन के लिए लिखकर, बोलकर आंदोलन कर समाज में समता और समानता लाना चाहते थे। और खुद आगे बढ़कर आंदोलन में भाग लेते थे।

इस मौके पर जसम दरभंगा के जिला उपाध्यक्ष कॉमरेड कल्याण भारती ने कहा कि कबीर को तो मैंने देखा नहीं मैंने। लेकिन कबीर पंथ के लोगों से संवाद रहा मेरा। कबीरपंथ को अन्य सभी पंथों से ज्यादा प्रगतिशील पाया मैंने। एक प्रगतिशील कवि के रूप में रूढ़िवादिता पर चोट करते हैं। नागार्जुन से जेलयात्रा के दौरान मुलाकात हुई उनसे मेरी। श्रमिक वर्ग के प्रति अटूट प्रतिबद्धता थी उनमें।

भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित कवि मनोज कुमार झा ने कहा कि कबीर और नागार्जुन दोनों ने भाषा के भूगोल को बदला साथ ही जनता के अंतःकरण को परिष्कृत किया।

समारोह में उपस्थित लोग

इस अवसर पर प्रो. मोइनुद्दीन अंसार, डॉ. आरएन कुशवाहा, एसएस ठाकुर आदि ने भी अपनी बातें रखीं। इस मौके पर कॉमरेड भोलाजी, डॉ. श्याम यादव, दिलीप कुमार, शशि शंकर, अंकित कुमार एवं अन्य छात्र-छात्राओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। संचालन जसम दरभंगा के जिलासचिव समीर ने किया। धन्यवाद ज्ञापन कॉमरेड मंजू कुमार सोरेन ने किया।

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