आवाज की सीमाओं के बावजूद अहसास के बेमिसाल गायक थे मुकेश

विद्या भूषण रावत

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27 अगस्त 1976 को डेट्रायट (अमेरिका) में हजारों की संख्या में लोग मुकेश और लता मंगेशकर के शो में उन्हें सुनने के लिए एकत्र हुए थे लेकिन कॉन्सर्ट के दौरान ही समाचार मिला कि मुकेश को दिल का दौरा पड़ा है तो सारे लोग अस्पताल की ओर चल पड़े। मुकेश को शायद अहसास था और इसीलिए वह अपने बेटे नितिन मुकेश से कह रहे थे कि यदि उनका गला नासाज है तो वह लता जी के साथ उनकी जगह पर गाना गाए और इसके लिए उन्होंने लता मंगेशकर को मना भी लिया था। उनके बेटे नितिन मुकेश बताते हैं : हमें उनकी तबीयत के विषय में पहले से कुछ पता नहीं था। हम अमेरिका में लताजी के साथ एक कॉन्सर्ट टूर पर थे। वह मेरे साथ कुछ समय बिताना चाहते थे इसलिए मुझे छुट्टी पर ले गए। संगीत कार्यक्रम से पहले उन्होंने असहज महसूस किया और लताजी से पूछा कि क्या मैं इसमें शामिल हो सकता हूं। उनके साथ गाना गाना मेरे लिए एक सपने के सच होने जैसा था। वह सहज ही मान गईं। वह बहुत खुश हुए जब दर्शकों ने मेरे गायन को पसंद किया और दोहराना चाहा। खुशी के मारे उनकी आँखों में आँसू थे। डेट्रॉयट में एक शो था और उन्हें सर्दी-जुकाम हो गया था। शो से पहले वह उठे और मुझे जगाने के लिए कुछ पंक्तियां गाईं और फिर नहाने के लिए बाथरूम चले गए लेकिन फिर बाहर निकले तो बेहोश हो गए। वह रामायण से प्यार करते थे और यह पुस्तक उनके पास हमेशा रहती थी। वह समर्पित थे। हमने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। उनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा था। उन्होंने मुझे रोते हुए देखा और मुझे सांत्वना दी। उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया लेकिन अस्पताल के अंदर घुसने के कुछ मिनट बाद उनकी मौत हो गई। वह उनका पांचवां दिल का दौरा था। वह मधुमेह के रोगी थे लेकिन बहुत सक्रिय थे। ( द हिन्दू अखबार को दिए उनके इंटरव्यू से )

नितिन ने कार्यक्रम में मुकेश के अमर गीत को वहां पर गाया जो राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर से था I

इस दिल के आशिया में अब,/तेरे ख्याल ही रह गए,/तोड़ के दिल वो चल दिए,/हम फिर अकेले/रह गए/

जाने कहा गए वो दिन,/कहते थे तेरी राह में,/नज़रों को हम बिछाएंगे,/चाहे कहीं भी तुम रहो,/चाहेंगे तुम को उम्र भर/

तुमको न भूल पाएंगे।

मुकेश ने जो युगल गीत गाए वे भी बेहद मिठास लिए हुए है। लता मंगेशकर के साथ उनके अधिकांश युगल गीत बेहद हिट हुए। राज कपूर की फिल्मों के लिए तो उनके बहुत सारे युगल गीत हिट हुए ही लेकिन बाद के दौर में भी सुनील दत्त, मनोज कुमार, जितेंद्र, धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना जैसे नायकों के लिए भी उन्होंने बहुत ही मीठे और भावपूर्ण नगमे दिए।

और जैसे ही मुकेश की मौत की खबर देश में पहुंची तो सन्नाटा-सा छा गया। सबसे पहले लता मंगेशकर ने खबर अपनी बहन आशा भोंसले को दी और बाद में लता जी, नितिन मुकेश के साथ मुकेश के शव को बम्बई वापस लेकर आईं। लता मंगेशकर मुकेश को अपना भाई कहती थीं और दोनों के बीच बेहद मधुर संबंध थे।

मुकेश को अपनी आवाज मानने वाले राजकपूर ने कहा — जब शैलेन्द्र गए तो मेरी एक भुजा चली गई। जब जयकिशन गए तो मेरी दूसरी बांह चली गई लेकिन मुकेश के जाने से तो मेरी आवाज, मेरी आत्मा चली गई है। मैं अब बोल नहीं पाऊँगा।

मुकेश की आवाज का यह जादू भारतीय सिनेजगत में चालीस के दशक से ही है, लेकिन वह पचास और बाद में साठ के दशक में बहुत फूला-फला। बम्बई सिनेमा की हिंदी गायकी में मुकेश की आवाज़ ऐसी है जिसके दर्द के आज भी लाखों दीवाने हैं। हो सकता है उन्होंने उतने गीत नहीं गाये हों जो आज के दौर में लोग गा रहे हैं। लोग उनकी गायकी की ‘सीमा’ भी निर्धारित करते हैं, लेकिन पार्श्व गायक मुकेश ने इन सबके बावजूद असीमित लोकप्रियता पायीI उनमें मोहम्मद रफ़ी या मन्ना डे जैसे क्लासिकल गाने की क्षमता नहीं रही हो और न ही किशोर कुमार जैसा अद्भुद टैलेंट, लेकिन मुकेश की आवाज हम सभी के दिलों को छूती है और इसलिए उनका गाया  लगभग हर एक गीत अपने आप में सुपरहिट था जो सीधे दिल में उतरता है।

मुकेश चंद्र माथुर का जन्म पुरानी दिल्ली के इलाके मे 22 जुलाई 1923 को  हुआ था। उनके पिता जोरावर चंद और माँ चंद्राणी माथुर थीं। दस भाई-बहनों के परिवार में उनका छठवाँ नंबर था। उनके घर पर संगीत के एक अध्यापक उनकी बहन को संगीत सिखाने आते थे और मुकेश भी धीरे-धीरे उनसे संगीत की शिक्षा लेने लगे। उस जमाने के प्रसिद्ध अभिनेता मोतीलाल की नजर एक कार्यक्रम में मुकेश पर पड़ी और फिर वह उन्हें बम्बई ले आए। 1941 में उन्हें फिल्म निर्दोष में बतौर अभिनेता लिया गया जहा उन्होंने स्वयं के लिए दिल ही बुझा हुआ तो गीत गाया जो उनके जीवन का प्रथम गीत माना जाता है। मुकेश का एक्टिंग का करिअर तो ज्यादा नहीं चल पाया लेकिन अभिनेता मोतीलाल ने उन्हें 1945 में अपनी फिल्म पहली नजर के लिए संगीतकार अनिल विश्वास के निर्देशन में दिल जलता है तो जलने दे, आँसू न बहा फ़रियाद न कर  गाया जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इस गाने में लोगों ने मुकेश में उस दौर के नामी गायक कुंदनलाल सहगल की छवि देखी। मुकेश की आवाज बेहतरीन थी लेकिन उनकी समझ में आ गया कि यदि अपनी कोई स्वतंत्र आवाज नहीं बनी तो वे बहुत दूर तक नहीं चल पाएंगे। दरअसल उस दौर में के एल सहगल सभी कलाकारों के हीरो होते थे और जो भी नया गायक बम्बई आता वह सहगल साहब की आवाज की ही ‘नकल’ करता। मुकेश तो छोड़िए, किशोर कुमार तक के पसंदीदा गायक कलाकार सहगल ही रहे और उन्होंने भी प्रारंभ में सहगल की नकल करने की कोशिश की।

मुकेश की आवाज को स्वतंत्र अभिव्यक्ति प्रदान कराने वालों में सबसे पहले आए नौशाद, जिनकी 1948 में आई फिल्म मेला ने उन्हें लोगों में लोकप्रिय बना दिया। इस फिल्म का गीत  गाए जा गीत मिलन के, तू अपनी लगन के, सजन घर जाना है  ने मुकेश की आवाज को घर-घर पहुंचा दिया। 1948 मे ही आई फिल्म अनोखी अदा में पुनः मुकेश की आवाज ने नौशाद के संगीत निर्देशन में धूम मचाई। इसका गीत  मंजिल की धुन में झूमते गाते चले चलो, बिछड़े हुए दिलों को मिलाते चले चलो और  ये प्यार की बाते, ये सफर भूल न जाना  बहुत लोकप्रिय हुए। मुकेश लोकप्रियता को छू रहे थे और इसीलिए 1949 महबूब खान की फिल्म अंदाज में संगीतकार नौशाद की धुनों पर मुकेश की आवाज ने सभी जगह धूम मचा दी। इस फिल्म में दिलीप कुमार और राजकपूर पहली बार साथ आए और यह उनकी एकमात्र फिल्म रही। हालांकि फिल्म में मोहम्मद रफी की आवाज भी थी लेकिन इस फिल्म के मुकेश के गाए सभी गीत जबरदस्त हिट रहे। झूम-झूम के नाचो आज, गाओ आज, गाओ खुशी के गीत, आज किसी की हार हुई है, आज किसी की जीत रे, गाओ खुशी के गीत रे  और तू कहे अगर, तू कहे अगर जीवन भर, मैं गीत सुनाता जाऊं, मन बीन बजाता जाऊं  लोकप्रियता के पायदान पर बहुत आगे चले गए।

राजकपूर की आवाज बन गए मुकेश 

हालांकि राजकपूर की पहली फिल्म नील कमल में मुकेश ने प्लैबैक दिया था,लेकिन वह राजकपूर की फिल्म आग से जिसका गीत ‘जिंदा हूँ इस तरह कि गमे-जिंदगी नहीं, जलता हुआ दिया हूँ मगर रौशनी नहीं लोगों के दिलों में पहुँच गया। लेकिन राज कपूर और मुकेश का चोली-दामन का रिश्ता बना, 1949 में आई राजकपूर की फिल्म बरसात से, जिसमे मुकेश का लता मंगेशकर के साथ  का  गीत छोड़ गए बालम, हाये प्यार भरा दिल तोड़ गए  में लोगों ने उनकी आवाज को सराहा। धीरे-धीरे मुकेश ने राजकपूर के लिए गाए गीत इतने लोकप्रिय हुए कि दोनों को एक दूसरे के बिना पहचानना संभव नहीं था और मुकेश को राजकपूर ने अपने बाहर की फिल्मों में भी प्लैबैक के लिए आमंत्रित किया। 1950 की फिल्म बावरे नैन में उनका ये गीत बेहद खुबसूरत है : तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं, वापस बुला ले, मैं सजदे गिरा हूँ, मुझे ए मालिक उठा ले। 

1951 में राज कपूर की फिल्म आवारा ने मुकेश के गायन को एक नई ऊंचाई दी। न केवल उनकी फिल्म आवारा विश्व पटल पर छा गई अपितु फिल्म का गीत, आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ, आसमान का तारा हूँ’ भी रूस, चीन और बहुत से अन्य देशों में बेहद लोकप्रिय हुआ। यह कह सकते हैं कि यह गीत भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय गीत बन गया। इसी फिल्म में राज कपूर पर फिल्माया मुकेश का एकल गीत हम तुझसे मुहब्बत करके सनम, रोते भी रहे, हँसते भी रहे  बहुत चला लेकिन जो दूसरा गीत मुकेश और लता मंगेशकर ने गया वह तो आज भी प्रेम का बेहतरीन नमूना है : दम भर जो उधर मुंह फेरे, ओ चन्दा, /मैं उनसे प्यार कर लूँगा, नजरे तो चार कर लूँगा। राज कपूर के लिए मुकेश ने बेहद संजीदा गीत गाए। श्री चार सौ बीस में  मेरा जूता है जापानी, फिल्म आह में आजा रे, अब मेरा दिल पुकार, रो-रो के गम भी हारा, फिल्म संगम में मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमना का, बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं,  दोस्त-दोस्त न रहा, प्यार-प्यार न रहा, जिंदगी हमें तेरा, एतबार न रहा,  ओ महबूबा, ओ महबूबा, तेरे दिल के पास ही मेरी मंज़िले मकसूद, वो कौन सी महफ़िल है जहाँ तू नहीं मौजूद । 

राजकपूर की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है में भी मुकेश ने अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरा। शैलेन्द्र का लिखा होंठों पे सच्चाई रहती है, जहाँ दिल में सफाई रहती है, हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है  ने देश के मन की बात समझी और उसकी भावनाओं को प्रकट किया और यह मुकेश के स्वर में ही सफल होता है और सच्चा लगता है, जब वह गाते हैं  कुछ लोग जो ज्यादा जानते हैं, इंसान को कम पहचानते हैं, ये पूरब है, पूरब वाले, हर जान की कीमत जानते हैं, हर जान की कीमत जानते हैं, मिल जुल के रहो और प्यार करो, एक चीज यही जो रहती है, हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है।

जिस देश मे गंगा बहती है में मुकेश अपने पूरे शबाब पर थे। शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन, मुकेश और राजकपूर ने अपने सार्थक गीतों, संगीत और आवाज से एक नई उम्मीद पैदा की। राज कपूर पर फिल्माया गया आ अब लौट चलें, नैन बिछाए, बाहें पसारे, तुझको पुकारे देश तेरा…. और इस गीत की इन पंक्तियों को जैसे शैलेन्द्र ने लिखा और मुकेश ने स्वर दिया वह अप्रतिम है : ‘आँख हमारी मंजिल पर है,/ दिल में खुशी की मस्त लहर है,/लाख लुभाए महल पराए,/अपना घर तो अपना घर है।

यह आज भी हम सबके लिए एक ऐसा सच है जिसे जब परदेश में होते है तब समझते हैं।

राजकपूर के लिए मुकेश ने आर के बैनर्स के बाहर भी बहुत से खूबसूरत गीत गाए। फिल्म अनाड़ी में  सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालों के हम हैं अनाड़ी ,  या लता मंगेशकर के साथ  दिल की नजर से गीत बहुत पसंद आए लेकिन इस फिल्म का शैलेन्द्र का लिखा एक गीत मुकेश की इमॉर्टल आवाज ने अमर कर दिया —

किसी कि मुस्कुराहटों पे हो निसार,/किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,/किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार,/जीना इसी का नाम है।

राजकपूर की एक गुमनाम फिल्म थी दूल्हा-दुल्हन जिसके लिए कल्याणजी-आनंदजी के संगीत में मुकेश ने इतनी खूबसूरती से गाया कि आज भी हम उस दर्द को महसूस करते हैं —

हमने तुझको प्यार किया है जितना,/कौन करेगा उतना,/रोए भी तो दिल ही दिल में/महफ़िल में मुस्काए,/तुझसे ही हम,/तेरा ही गम,/बरसों रहे छुपाये,/प्यार में तेरे चुपके -चुपके,/जलते रहे हम जितना,/कौन जलेगा इतना।

ऐसा नहीं था कि मुकेश ने केवल राजकपूर के लिए ही गीत गाए। दिलीप कुमार के लिए भी उन्होंने बहुत हिट गीत दिए। फिल्म यहूदी में ये मेरा दीवानापन है, या मोहब्बत का सुरूर, तू न पहचाने तो है ये, तेरी नजरों का कुसूर, उस भाव को बेहतरीन तरीके से व्यक्त करता है जिसके लिए दिलीप कुमार पहचाने जाते थे। बाद में सलिल चौधरी के संगीत में मुकेश नेधुमती फिल्म के लिए अपनी आवाज दी और उनके सभी गीत उस दौर में सुपर-डूपर हिट हुए। सुहाना सफर और ये मौसम हंसीं, हमें डर है हम खो न जाए कहीं…..  या दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा, तू हमसे आँख न चुरा, तुझे कसम है आ भी जा….  ने लोकप्रियता के नए आयाम कायम किए।

संगीतकारों में मुकेश ने सबसे ज्यादा गीत शंकर-जयकिशन के लिए गाए। उनकी जोड़ी तो अमर थी लेकिन उसके अलावा उन्होंने कल्याणजी-आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में भी बहुत गीत गाए।

दर्द में आनंद की अनुभूति थे मुकेश

वैसे मुकेश ने देवानंद के लिए कोई गीत नहीं गाया लेकिन उनकी एक फिल्म बंबई का बाबू के लिए मुकेश का एक गीत जो बैकग्राउंड में फिल्माया गया था अमर हो गया हालांकि बंबई का बाबू नामक फिल्म को आज कोई याद नहीं रखता लेकिन चल री सजनी, अब क्या सोचे, कजरा न बह जाए रोते रोते  अभी भी लोगों में उस दौर के दर्द गहरे स्वर का एहसास दिलाता है।

1959 मे आई फिल्म छोटी बहन जिसमें शंकर-जयकिशन के संगीत निर्देशन में उन्होंने हसरत जयपुरी के बोल को बेहद खूबसूरत तरीके से गया। यह गीत था —

जाऊं कहाँ बता ऐ दिल/ दुनिया बड़ी है संगदिल,/चाँदनी आई घर जलाने,/सूझे न कोई मंजिल…. 

इसी वर्ष 1959 में उन्होंने राजकपूर के लिए फिल्म कन्हैया के लिए गाया — याद आई आधी रात को,/कल रात की तौबा,/दिल पूछता है झूम के,/किस बात की तौबा…. 

इस फिल्म का जो गीत बहुत हिट हुआ वह बहुत हल्का-फुल्का गाना था

रुक जा ओ जाने वाली रुक जा,/मैंतो राही तेरी मंजिल का,/नज़रों में तेरी मैं बुरा सही,/आदमी बुरा नहीं मैं दिल का …. 

1959 में ही मुकेश का एक गीत और बेहद लोकप्रिय हुआ जो उन्होंने राजकपूर के लिए गाया था, फिल्म थी मैं नशे में हूँ —

जाहिद शराब पीने दे,/मस्जिद में बैठ कर,/या वो जगह बता दे ,/जहाँ  पर खुदा न हो,/ मुझको यारो माफ करना,/मैं नशे में हूँ….. 

दरअसल दर्द मुकेश की सबसे बड़ी ताकत थी। उनके स्वर के दर्द को लोग रूह से महसूस करते थे इसलिए अगर उनके मीठे गीत थे तो उनके भी दर्द के सुर थे और कल्याणजी-आनंदजी की संगीत में वह बेहतरी से आया। 1960 में आई फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे का गीत मुझको इस रात की तनहाई में आवाज न दो, आवाज न दो, आवाज न दो …जिसकी आवाज रुला दे मुझे वो साज न दो, आवाज न दो ….. अभी भी उनके सबसे खूबसूरत दर्द भरे गीतों में से एक है। हिमालय की गोद में फिल्म के लिए उन्होंने मनोज कुमार के लिए बेहद भावपूर्ण गीत गाए। मैं तो एक ख्वाब हूँ, इस ख्वाब से तू प्यार न कर, प्यार हो जाए तो प्यार का इजहार न कर  या तेरी याद दिल से भुलाने चला हूँ, मै खुद अपनी हस्ती मिटाने चला हूँ’, या चाँद सी महबूबा हो मेरी कब, ऐसा मैंने सोचा था, हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो, जैसा मैंने सोचा था। मनोज कुमार की फिल्म उपकार के लिए कल्याणजी-आनंदजी के निर्देशन में उन्होंने दीवानों से ये मत पूछो, दीवानों पे क्या गुजरी है  गाया। कल्याणजी भाई के संगीत में उन्होंने ऐसे गीत दिए जिन्हें कोई भूल नहीं सकता। खुश रहो हर खुशी है तुम्हारे लिए  फिल्म सुहागरात, चांदी की दीवार न तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया … फिल्म विश्वास, कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे, तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे, तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए,  फिल्म पूरब और पश्चिमदर्पण को देखा, तूने जब जब किया सिंगार  फिल्म उपासना, जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे और  क्या खूब लगती हो, फिल्म सफर, वक्त करता जो वफा आप हमारे होते, हम भी औरों की तरह आपको प्यारे होते  फिल्म दिल ने पुकारा

अपने समकालीन कलाकारों में मुकेश की आवाज की एक सीमा थी लेकिन इसके बावजूद यह हकीकत है कि जितना उन्होंने गाया उनके हिट गानों का प्रतिशत बहुत ज्यादा है। सभी गायक कलाकारों ने अपने समय में बहुत से बेहूदा और बकवास गाने गाए, लेकिन मुकेश के संदर्भ में यह कहना पड़ेगा कि अपने अंत तक ऐसे गीतों की संख्या केवल उंगली पर गिनी जा सकती थी। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत में सरस्वतीचंद्र फिल्म के लिए उनके दो गाने आज भी हमारे दिलों पर राज करते हैं —  चन्दन सा बदन, चंचल चितवन, धीरे से तेरा ये मुस्काना, मुझे दोष न देना जग वालों, हो जाऊ अगर मैं दीवाना और दूसरा गीत लता मंगेशकर के साथ  फूल तुम्हें भेजा है खत में बेहद मधुर हैं। 1963 की फिल्म फूल बने अंगारे में कल्याणजी-आनंदजी ने मुकेश के साथ एक और जबरदस्त धुन बनाई। यह गीत था चाँद आहे भरेगा, फूल दिल थाम लेंगे, हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे।  ऐसे कितने ही गीत हैं जो मुकेश के मीठे गले से अमर हो गए चाहे फिल्म चली हो या न चली हो।

हम छोड़ चले हैं, महफ़िल को याद आए कभी तो मत रोना  फिल्म जी चाहता है, आया है मुझे अब याद वो जालिम, गुजरा- जमाना बचपन का …. फिल्म देवर, डम डम डिगा डिगा, मौसम भीगा भीगा, बिन पिए मैं तो गिरा, मैं तो गिरा, फिल्म छलिया। इसी फिल्म का एक और खूबसूरत गीत मेरे टूटे हुए दिल से कोई तो आज ये पूछे कि तेरा हाल क्या है ।  पुरानी फिल्म रानी रूपमती को शायद ही कोई याद रखे लेकिन इसका एक गीत मुकेश ने अमर कर दिया और वह है आ लौट के आज मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं। फिल्म संजोग 1961 में आई जिसका संगीत मदन मोहन ने दिया और राजेन्द्र कृष्ण के इस गीत में मुकेश की आवाज ने जो अभिव्यक्ति दी वो किसी दूसरे के बस की बात नहीं —

 दामन में लिए बैठा हूँ,/टूटे हुए तारे,/कब तक रहूँगा मैं यूँ ही,/ख्वाबों के सहारे,/दीवाना हूँ,/अब और न दीवाना बनाओ,/अब चैन से रहने दो,/मेरे पास न आओ,/भूली हुई यादों,/मुझे इतना न सताओ

इसमें कोई शक नहीं कि गीत के बोल बेहद महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन उतना ही महत्व का होता है गायक की समझ, उसके  उच्चारण और बोल के भावों पर उतार-चढ़ाव का। इस गीत को सुन लीजिए या फिर 1963 मे बनी फिल्म बंदिनी के इस गीत को जिसे एस डी बर्मन ने संगीतबद्ध किया तब पता चलेगा कि दर्द में मुकेश का कोई सानी नहीं था —

दे दे के ये आवाज कोई,/हर घड़ी बुलाए,/फिर जाए जो उस पार/ कभी लौट के न आए,/है भेद ये कैसा कोई,/कुछ तो बताना,/जाने वाले हो सके तो/लौट के आना।

मुकेश की आवाज में वो कशिश थी जो उन्हे दूसरों से अलग करती थी। ऐसा नहीं है कि उन्होंने दर्द के अलावा कुछ नहीं गाया। उनके अल्हड़पन के गीत भी बहुत खूबसूरत हैं। उन्होंने जो भी गाए, उनमें एक मिठास थी, एहसास था। मुकेश का यह एहसास का पक्ष बहुत ताकतवर रहा है और इसीलिए बहुत बड़े-बड़े क्लासिकल संगीत के दिग्गज गायकों के बावजूद, बहुत कम गाने पर भी, उन्हें लोग आज भी भारत के तीन सर्वश्रेष्ठ गायक कलाकारों में एक मानते है, ये हैं — मोहम्मद रफी मुकेश और किशोर कुमार।

मुकेश ने जो युगल गीत गाए वे भी बेहद मिठास लिए हुए हैं। लता मंगेशकर के साथ उनके अधिकांश युगल गीत बेहद हिट हुए। राजकपूर की फिल्मों के लिए तो उनके बहुत सारे युगल गीत हिट हुए ही लेकिन बाद के दौर में भी सुनीलदत्त, मनोज कुमार, जितेंद्र, धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना जैसे नायकों के लिए भी उन्होंने बहुत ही मीठे और भावपूर्ण नगमे दिए। सुनीलदत्त और नूतन की फिल्म मिलन का सावन का महीना पवन करे शोर तो आज भी सबसे लोकप्रिय गीतों में है लेकिन इसी फिल्म का दूसरा गीत सीधे दिल पर उतर जाता है वह है — राम करे ऐसा हो जाए, मेरी निंदिया तोहे मिल जाए, मै जागू तू सो जाए’।

1972 में आई फिल्म शोर के लिए संतोष आनंद द्वारा लिखित एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है को मुकेश की दिल छू लेने वाली आवाज ने अमर कर दिया। इसमे कोई शक नहीं कि संतोष जी ने इस गीत में पूरे जीवन का मंत्र भर दिया पर मुकेश की दिलकश वाणी ने इसे और अधिक अमर कर दिया। जब भी इस गीत की धुन बजती है और मुकेश का स्वर आता है तो वह क्षण सबकी आँखों मे आँसू ला सकता है।

मैं तो एक ख्वाब हूँ, इस ख्वाब से तू प्यार न कर

तू धार है नदिया की/मैं तेरा किनारा हूँ/तू मेरा सहारा है/मैं तेरा सहारा हूँ/आँखों में समंदर है/आशाओं का पानी है/ज़िंदगी और कुछ भी नहीं/तेरी मेरी कहानी है/एक प्यार का नगमा है…. 

मुकेश के युगल गीत लता मंगेशकर के अलावा आशा भोंसले और गीतादत्त के साथ भी हैं। लता के साथ, एक मंजिल राही दो, फिर प्यार न कैसे हो …. जाने न नजर, पहचाने जिगर, ये कौन जो दिल में समाया, मुझे रोज-रोज तड़पाया…. आ जा रे अब मेरा दिल पुकारा, रो-रो के गम भी हारा, बदनाम न हो दिल मेरा… 

आशा भोंसले के साथ मुकेश ने कुछ बेहद खास गीत गाए। 1961 में आई फिल्म कांच की गुड़िया में साथ हो तुम और रात जवाँ….  आपके दिल में प्यार की ताकत का अहसास कराता है। 1961 की ही फिल्म प्यार का सागर का टाइटल सॉन्ग भी आशा जी के साथ गया है। 1961 में शंकर-जयकिशन के संगीत में जंगली का गाना  नैन तुम्हारे मजेदार, ओ जनाब ए आली आदि हैं।

ऐसे ही गीतादत्त के साथ उनके कुछ गीत बेहद लोकप्रिय हुए। 1950 की फिल्म बावरे नैन में खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते, किसी को बेवफा आ-आ के तड़पाया नहीं करते, 1960 की फिल्म अपना घर में , तुमसे ही मेरी जिंदगी मेरी बहार तुम, अपने ही दिल से पूछ लो, किसका हो प्यार तुम आदि हैंI इतने युगल गीतों के बावजूद मुकेश सबसे अच्छे और भावपूर्ण अपने एकल गायन में लगते है, हालांकि युगल गीतों में भी उन्होंने अपने दिल से गाया है।

एक हकीकत यह है कि बंबई सिनेमा में मुकेश के स्वर से सबसे खूबसूरत और अमर गीत निकले और यह मान सकते हैं कि कोई दूसरा कोई उन्हें नहीं गा सकता था। उनकी तमाम सीमाओं के बावजूद मुकेश की आवाज में जो कशिश और दर्द था वह एक सुखद अनुभूति देता था। वह हर रोमांस के अंदर एक अलग किस्म की मिठास पैदा करता था।

फिल्म कभी-कभी के लिए खैय्याम के संगीत निर्देशन में उनके गीत आज तक संगीत के शिखर पर हैं।

कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है …..

कभी कभी मेरे दिल मे/ख्याल आता है,/कि जैसे तुझको बनाया गया है/मेरे लिए…. 

और साहिर के इन खूबसूरत बोलों को मुकेश ने कैसे अमर किया देखिए —

कल और आएंगे,/सुख दुख की/मीठी कालिया चुनने वाले,/मुझसे बेहतर कहने वाले,/तुमसे बेहतर सुनने वाले,/कल कोई मुझको याद करे,/क्यों कोई मुझको याद करे,/बेदर्द जमाना मेरे लिए,/क्यूँ वक्त अपना बर्बाद करें/मैं पल दो पल का शायर हूँ,/पल दो पल मेरी कहानी है,/पल दो पल मेरी हस्ती है,/पल दो पल मेरी  जवानी है …. 

भावपूर्ण गीत गाने में मुकेश का कोई सानी नहीं था। शैलेन्द्र भी उस बात को जानते थे और राजकपूर भी। शैलेन्द्र की फिल्म तीसरी कसम में उन्होंने जो गीत गाये वे आज भी हमारे होंठों पर हैं —

दुनिया बनाने वाले,/क्या तेरे मन मे समाई,/काहे को दुनिया बनाई

या

तुम्हारे महल चौबारे,/यही रह जाएंगे प्यारे,/अकड़ किस बात की प्यारे,/अकड़ किस बात की प्यारे,/ये सर फिर भी झुकाना है,/सजन रे झूठ मत बोलो,/खुदा के पास जाना है,/न हाथी है, न घोड़ा है,/वहाँ पैदल ही जाना है । इसी फिल्म में जो अन्य गीत हमारे दिलों पर उतरा वो था विरह का गीत —

सजनवा बैरी हो गए हमार,/चिठिया हो तो बाँचे कोई,/भाग न बाँचे कोय,/करमवा बैरी हो गए हमार … 

1958 में राजकपूर की आर के बैनर्स से बाहर की फिल्म फिर सुबह होगी में गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे और म्यूजिक खैयाम का था जिसके गीतों को मुकेश ने इतनी संजीदगी और भावपूर्ण तरीके से गाया कि वे आज भी हमारे होंठों पर होते हैं। साहिर की खूबसूरत नज़मों को मुकेश के सुरीले गले ने अमर कर दिया और ये गीत आज भी हमें उम्मीद देते हैं। वो सुबह कभी तो आएगी हर दौर के लिए एक आशा का संदेश देने वाला गीत बना। हमारे समाज की हकीकत को बयाँ करता एक और गीत था —

चीनो अरब हमारा,/हिंदोस्ता हमारा,/रहने को घर नहीं है/सारा जहाँ हमारा।

मुकेश ने एक हजार के लगभग गीत गाए जो उनके समकालीन कलाकारों की तुलना में बहुत कम है, लेकिन जो भी गीत उन्होंने गाए वो क्वालिटी गीत थे और उनमें उन्होंने अपना पूरा जिगर खोल के रख दिया इसलिए उनके हिट गीतों का प्रतिशत ज्यादा है।

राजेश खन्ना के उस दौर में जब वे किशोर कुमार का ही गाना लेते थे तब मुकेश ने अपनी आवाज से ऐसे गीत दिए कि कोई उन्हें भुला नहीं सकता। फिल्म आनंद में योगेश के गीतों को सलिल चौधरी के संगीत में जिस प्रकार मुकेश ने गाया वह  अप्रतिम है और फिल्म की सफलता में इसके गीतों का बहुत बड़ा योगदान है। मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने, सपने सुरीले सपने और कहीं दूर जब दिन ढल जाए, साँझ की दुल्हन बदन चुराए, चुपके से आए। 

1968 में आई अनोखी रात  फिल्म का संजीव कुमार पर फिल्माया गीत ओ रे ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में, सागर मिले कौन से जल में, कोई जाने ना हो या 1967 में जितेंद्र की बूंद जो बन गए मोती फिल्म का भरत व्यास का लिखा ये दिल को छू लेने वाला गीत —

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हरी-हरी वसुंधरा पे,/नीला-नीला ये गगन,/कि जिसके बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन,/दिशाएं देखो रंगभरी/चमक रहीं उमंग भरी/ये किस ने फूल-फूल पे किया सिंगार है/ये कौन चित्रकार है/ये कौन चित्रकार है/ये कौन चित्रकार है… 

ऐसा ही एक अन्य खूबसूरत गीत जिसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा और मुकेश की आवाज ने अमर कर दिया —  तारों में सजके, अपने सूरज से/ देखो धरती चली मिलने

मुकेश की आवाज ने हम सबको प्रभावित किया। शैलेन्द्र और राजकपूर के लिए उन्होंने जो गाया वो गीत उनकी आवाज के बिना वैसे ही रहते शायद कहना मुश्किल होगा। लेकिन एक बात सत्य है कि मुकेश की गहरी आवाज, जिसे पहले लोग ये कह देते थे कि नाक से गाया है, उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।उनका भोलापन और सादगी उनके गानों में झलकती है। राजकपूर की फिल्म धरम करम का ये गीत आज भी हम सबको जीवन का संदेश देता है—

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एक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल,/जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल/दूजे को होंठों को देकर अपने गीत,/कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल….,

मुकेश हमारे बीच नहीं हैं लेकिन अपने गीतों से वो हमें प्यार और आशा का संदेश देते रहते हैं। मुकेश कभी मरते नहीं हैं, वे  तो लोगों को जीवन देते हैं। भारतीय क्रिकेट की स्पिन तिकड़ी के सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ भागवत चंद्रशेखर कर्नाटक से आते थे और हिन्दी से उन्हें कोई लेना-देना नहीं था लेकिन मुकेश की आवाज का जादू इतना था कि चंद्रशेखर उनके गानों से नई ऊर्जा लेते थे। मुकेश के निधन के बाद चंद्रशेखर की भी खेल मे दिलचस्पी कम हो गई और उन्होंने खेल से अवकाश ले लिया। मुकेश की मधुर आवाज ने हम सबको संगीत के जरिए जीने की कला दी, निराशा में आशा का संचार किया। ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्होंने दिल से गाया और लोगों ने उन्हे सर-आँखों पर बिठाया। मुकेश ऐसे ही थे और अपने गीतों के जरिए हमेशा हमारे बीच रहेंगे — कल खेल में हम हों न हों,/गर्दिश में तारे रहेंगे सदा,/भूलेंगे वो ,भूलोगे तुम/ पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा/रहेंगे यहीं अपने निशां/इसके सिवा जाना कहाँ …..

vidhya vhushan

 

 

 

विद्या भूषण रावत जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

2 Comments
  1. PRAMOD KUMAR BARNWAL says

    वाह!
    मुकेश पर लिखे लेख को पढ़कर आनन्द आ गया।

  2. […] आवाज की सीमाओं के बावजूद अहसास के बेमि… […]

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