शिक्षा और हमारे हुक्मरान (डायरी 2 मई, 2022)

नवल किशोर कुमार

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कल शाम से पहाड़ पर हूं। यह हिमाचल प्रदेश का मनाली है। यहां के समाज और संस्कृति के बारे में कुछ जानकारियां गूगल पर मिली हैं। जितना जान सका हूं, उससे अधिक जानने की इच्छा बढ़ गई है। हालांकि दो दिनों के अल्पप्रवास के दौरान करना यह मुमकिन नहीं। मनाली आते समय मैंने कुछ बातों पर गौर किया। यहां के सरकारी स्कूल जो मुझे रास्ते में दिखे, बेहद खूबसूरत थे। साथ यात्रा कर रहे कुछ स्थानीय लोगों से पूछा तो जानकारी मिली कि यहां के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई बहुत अच्छी है। मैदानी इलाकों के जैसे यहां के लोगों में यह होड़ नहीं है कि उनके बच्चे महंगे से महंगे निजी स्कूलों में पढ़ें।
पढ़ाई से ही एक बात याद आयी। यूजीसी ने एक जानकारी साझा की है। इसे दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। इसका शीर्षक है– वैध वीजा पर पाकिस्तान गए कश्मीरी युवक आतंकरोधी अभियानों में मारे गए। इसके पहले के उपशीर्षक में यह बताया गया है– अधिकारियों ने दी जानकारी, कहा 17 युवक मारे गए।
खबर उन नौजवानों को भयभीत करने के लिए है, जो पाकिस्तान जाकर किसी तरह की शिक्षा ग्रहण करना चाहते हैं। यूजीसी के अधिकारियों के हवाले से यह खबर लिखी गई है, लेकिन किसी भी अधिकारी का नाम खबर में नहीं है। फिर भी हम इसे फर्जी खबर की संज्ञा नहीं दे सकते। इसके मुताबिक यूजीसी ने कश्मीरी युवकों को चेताया है कि वे पाकिस्तान न जाएं। खबरों में बिना किसी ठोस संदर्भ के यह बताया गया है कि पाकिस्तान ने जानबूझकर साजिश के तहत भारतीय छात्रों के लिए सुविधाएं दीं और वहां उन्हें आतंकी गतिविधियों में शामिल किया गया।

मनाली आते समय मैंने कुछ बातों पर गौर किया। यहां के सरकारी स्कूल जो मुझे रास्ते में दिखे, बेहद खूबसूरत थे। साथ यात्रा कर रहे कुछ स्थानीय लोगों से पूछा तो जानकारी मिली कि यहां के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई बहुत अच्छी है। मैदानी इलाकों के जैसे यहां के लोगों में यह होड़ नहीं है कि उनके बच्चे महंगे से महंगे निजी स्कूलों में पढ़ें।

 

मैं इस खबर का विश्वास नहीं करता। नहीं करने की बड़ी वजह यह कि इस खबर का आधार संदेहास्पद है। लेकिन यदि यह बात सही है कि 2015 के बाद से पाकिस्तान जाकर पढ़नेवाले 17 नौजवान मारे गए हैं, तो यह बेहद चिंताजनक बात है।

आज भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्र पढ़ रहे हैं। मेरे पास इसका आंकड़ा नहीं है कि पाकिस्तानी मूल के कितने छात्रों को भारत के विश्वविद्यालयों में प्रवेश दिया गया है। इसलिए ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि पाकिस्तानी छात्र भारतीय विश्वविद्यालयों को किस निगाह से देखते हैं। मुमकिन है कि वहां की मीडिया भी यहां के विश्वविद्यालयों और हुकूमत के खिलाफ ऐसे ही दुष्प्रचार करती हो और वहां छात्रों के मन में भी जहर भर दिया गया हो।
पाकिस्तान को छोड़ते हैं। उसे तो हमारे देश की मीडिया ने बदनाम कर रखा है। मैं यह नहीं मान सकता कि कोई भी मुल्क वैसा ही होगा, जैसा कि उसके दुश्मन देश की मीडिया द्वारा दुष्प्रचारित किया जाता है। अब अपने मुल्क की बात करते हैं।

वहां चिकित्सा के लिए मंत्रों का उपयोग करता है और जटिल रोगों के इलाज के लिए यज्ञ-हवन भी। मेरे चौंकने की वजह यह है कि ऐसे व्यक्ति के बारे में क्या स्टालिन सरकार को पहले से जानकारी नहीं थी?

 

मामला तमिलनाडु का है। वहां की स्टालिन सरकार ने एक मेडिकल कॉलेज के डीन को बर्खास्त कर दिया है। डीन के ऊपर आरोप है कि उसने कथित तौर चरक के नाम पर छात्रों को शपथ दिलायी। हालांकि हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने संसद में कहा था कि चरक शपथ  वैकल्पिक होगी और छात्रों के लिए बाध्यकारी नहीं होगी।
दरअसल, मदुरै सरकारी मेडिकल कॉलेज के जिस डीन को हटाया गया है, उसका नाम डा. ए. रतिनवेल है। उनके बारे में सोशल मीडिया पर जो जानकारियां मिल रही हैं, वह चौंकानेवाली हैं। वहां चिकित्सा के लिए मंत्रों का उपयोग करता है और जटिल रोगों के इलाज के लिए यज्ञ-हवन भी। मेरे चौंकने की वजह यह है कि ऐसे व्यक्ति के बारे में क्या स्टालिन सरकार को पहले से जानकारी नहीं थी?
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बहरहाल, भारतीय समाज के कई पहलू हैं और निस्संदेह सत्ता इन्हें प्रभावित करती है। लेकिन मैं दो दिनों तक पहाड़ पर बसे इस शहर को देखना-समझना चाहता हूं। एक तरह का एकांत भी है यहां। लेकिन एकांत जैसा कुछ भी नहीं होता।
इश्क में आदमी
निर्वात में नहीं रह जाता
ठीक वैसे ही
जैसे इश्क करते हैं
एकांत में रहनेवाले पहाड़।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं

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