कुछ यादें, कुछ बातें (डायरी 1 मई, 2022)

नवल किशोर कुमार

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कल ऋषि कपूर और इरफान का स्मरण हुआ। दोनों की मौत कैंसर की वजह से दो साल पहले हुई थी। इन दोनों की वजह से मित्र लोकेश सोरी याद आये। लोकेश छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के रहने वाले थे। हमारी दोस्ती एकदम लीक से हटकर थी। हमने एक-दूसरे को कभी नहीं देखा। मोबाइल पर बात होती। पहली बार बात 28 सितंबर, 2017 को हुई जब उन्होंने ऐतिहासिक पहल किया था। ऐतिहासिक इसलिए कि उन्होंने दुर्गापूजा के उपासकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया था।

दरअसल लोकेश छत्तीसगढ़ में सांस्कृतिक आंदोलन चला रहे थे। वे मानते थे कि हिंदू धर्म के ग्रंथों में उनके पुरखों का अपमान किया गया है और अब भी उनका अपमान किया जा रहा है। पुरखे यानी रावण और महिषासुर। हालांकि जब उन्होंने मुकदमा दर्ज कराया तब कांकेर से लेकर रायपुर तक के अधिकारियों की जान संकट में आ गयी थी। तब वहां रमन सिंह की सरकार थी। आरएसएस की विचारधारा पूरे तंत्र पर हावी थी। उसे यह कैसे बर्दाश्त होता कि कोई दुर्गापूजा करने वालों के खिलाफ मुकदमा करे।

फिर शुरू हुई लोकेश के खिलाफ कार्रवाई की बारी। कायदे से होना तो यह चाहिए था कि लोकेश की प्राथमिकी पर अभियुक्तों को गिरफ्तार कर उनसे पूछताछ की जानी चाहिए थी। पुलिस को मामले की रिपोर्ट अदालत को भेजनी चाहिए थी और फिर अदालत यह तय करती कि छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की परंपराओं और मान्यताओं को ठेस पहुंचाने वाले हिंदू धर्मावलम्बी गलत हैं या नहीं। जाहिर तौर पर लोकेश की प्राथमिकी  संविधान में धर्म के संबंध में किये गये उल्लेख के विपरीत नहीं थी। लेकिन पुलिस ने पूरी प्रक्रिया को पहले ही चरण में रोक दिया। अगले दिन कुछ लोग तैयार किए गए और एक मुकदमा लोकेश सोरी के खिलाफ दर्ज की गयी। आरोप लगया गया कि दो साल पहले फेसबुक पर उन्होंने दुर्गा के खिलाफ कोई टिप्पणी की थी, जिससे हिंदू सवर्णों की भावना आहत हुई थी।

कैंसर आपके शरीर नहीं, सवर्ण हिंदुओं के दिमाग में है। फिर मैंने उन्हें कहा कि आज कैंसर पीड़ितों में मनोहर पारिकर भी हैं। सोनाली बेंद्रे जैसी अभिनेत्री भी है। और भी कई लोगों के नाम बताकर मैंने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि यह बीमारी किसी को भी हो सकती है। इसका धर्म से क्या लेना देना।

फिर तो पुलिस एकदम से एक्टिव हो गयी और उसने लोकेश सोरी को गिरफ्तार कर लिया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने उन्हें जेल भेजा। हालांकि 45 दिन बाद ही उन्हें जमानत मिल गयी और बाहर आए। लेकिन पुलिस कस्टडी में उन्हें बहुत प्रताड़ित किया गया। उन्हें मारा-पीटा गया। जब लोकेश जेल से बाहर आए तब उन्होंने कहा कि “सर, हिम्मत नहीं हारेंगे। लड़ेंगे”।

फिर अचानक उनका फोन आया। कहने लगे कि – सर, सब खत्म हो गया। मुझे कैंसर हो गया है। अब क्या करूं। आसपास के लोग कहते हैं कि मैंने दुर्गा का अपमान किया है, और वह अब बदला ले रही है।

पहले तो मेरा मन बैठ गया। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि उनके द्वारा दी गयी इस खबर कैसे रिएक्ट करूं। फिर मैंने उन्हें कहा कि कैंसर आपके शरीर नहीं, सवर्ण हिंदुओं के दिमाग में है। फिर मैंने उन्हें कहा कि आज कैंसर पीड़ितों में मनोहर पारिकर भी हैं। सोनाली बेंद्रे जैसी अभिनेत्री भी है। और भी कई लोगों के नाम बताकर मैंने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि यह बीमारी किसी को भी हो सकती है। इसका धर्म से क्या लेना देना।

अमेज़न लिंक :

लोकेश का इलाज रायपुर के डॉ. आंबेडकर मेमोरियल हास्पीटल में चलता रहा। एक बार मैंने उनसे जिद की कि वे दिल्ली चले आएं। यहां उनका इलाज करवाने की कोशिश करूंगा। लेकिन लोकेश के पास तब इतने भी पैसे न थे कि वे कोई फैसला ले पाते। उनका शरीर रोज-ब-रोज कमजोर पड़ता जा रहा था। मैं उनसे जिद करता कि वे अपनी तस्वीरें भेजा करें। वे भेजते भी। 2018 के अक्टूबर महीने में एक खबर उन्होंने दी कि वे अब हास्पीटल से डिस्चार्ज कर दिए गये हैं। वे कांकेर जा रहे हैं। कीमो के लिए महीने में एक या दो बार आना पड़ेगा। उनकी इस खबर से मैं उत्साहित हो गया था। लेकिन मेरे कुछ चिकित्सक मित्रों ने बता दिया था कि लोकेश की बीमारी उन्हें नहीं छोड़ेगी।

मुझे लगता है कि लोकेश भी यह समझ गए थे। हमेशा कहते कि यदि मुझे दस साल और मौका मिल गया तो मैं छत्तीसगढ़ को हिंदू धर्म के पाखंड से मुक्त कर दूंगा।

साहित्य और संस्कृति के साथ छेड़छाड़ संभव है लेकिन यह भी इतना ही सच है कि साहित्य और संस्कृति में वही प्रसंगिक रहता है जो मानवता के पक्ष में हो। मानवता रहित साहित्य और संस्कृति की आयु अधिक नहीं होती।

खैर,11 जुलाई 2019 को लोकेश का निधन हो गया।  दो दिनों पहले ही 9 जुलाई 2019 को लोकेश सोरी से फोन पर बात हुई थी। आवाज साफ नहीं आ रही थी। जितना समझ सका उसका आशय यह था कि डाक्टरों ने कीमो लगा दिया है। इसलिए मुंह और नाक से खून का रिसाव हो रहा है। डाक्टरों ने कहा है कि वे जल्द ही ठीक हो जाएंगे।

लोकेश के निधन की खबर दुखदायी थी। लेकिन मैं खुश था क्योंकि मेरे दोस्त लोकेश कैंसर की बीमारी से लड़ते-लड़ते टूट चुके थे। उन्हें होनेवाली असह्य पीड़ा मैं उनकी आवाज में महसूस करता था।

लोकेश गरीब थे। उनके पास इलाज के पैसे नहीं थे। पहले मुझे लगता था कि उनकी जान गरीबी ने ले ली। लेकिन बीते 29 अप्रैल, 2020 को इरफान खान और 30 अप्रैल, 2020 को ऋषि कपूर के निधन से एक बात साफ हुई है कि कैंसर गरीबी-अमीरी में भेद नहीं करता। पैसे वाले यदि कर सकते हैं तो केवल इतना ही अपने लिए कुछ दिन अतिरिक्त हासिल कर सकते हैं।

खैर, मुझे ऋषि कूपर की फिल्में याद आ रही हैं। असल में ऋषि कपूर मेरे समय के अभिनेता नहीं रहे। पहली फिल्म जिसे मैं हमेशा याद रखता हूं, वह दामिनी है। पुरूष प्रधान समाज में एक पुरूष किस तरह दोहरा जीवन जीता है, यही दिखाया था ऋषि कपूर ने। एक तरफ तो वह अपनी पत्नी के साथ खड़ा होना चाहता था तो दूसरी तरफ मर्दाना घमंड व विरासत को बचाये रखने की इच्छा भी थी। जब मैंने इस फिल्म को देखा तो मैंने खुद से कहा कि सन्नी देओल वाली भूमिका किसी महिला को दी जानी चाहिए थी। तब यह फिल्म और बेहतर होती।

मैंने ऋषि कपूर की कई फिल्मों को देख रखा है। बॉबी से लेकर स्टूडेंट ऑफ द इयर और मुल्क तक। मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि अपने कैरियर के अंतिम दौर में वे एक शानदार अभिनेता साबित हुए। यहां तक कि अमिताभ बच्चन उनके सामने कहीं नहीं टिकते। आप यह देखिए कि किस तरह की विविधतापूर्ण भूमिकाएं निभायी। स्टूडेंट ऑफ द इयर में उनकी भूमिका तो सबसे अलग थी। उन्हें एक पुरूष से प्यार है और उस पुरूष की प्रेमिका से जलन। फिर मुल्क फिल्म में तो ऋषि कपूर ने कमाल ही ढाया है जब वे अदालत के कटघरे में खड़े हैं। मुसलमान वाली दाढ़ी उनके चेहरे पर है। वे कहते हैं – ‘मेरे ही घर में मेरा स्वागत करने का अधिकर किसने दिया। यह घर जितना आपका है,उतना ही मेरा भी।’

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साहित्य और संस्कृति के साथ छेड़छाड़ संभव है लेकिन यह भी इतना ही सच है कि साहित्य और संस्कृति में वही प्रसंगिक रहता है जो मानवता के पक्ष में हो। मानवता रहित साहित्य और संस्कृति की आयु अधिक नहीं होती।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं

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