शिक्षा ही स्त्री मुक्ति का एकमात्र उपाय – सुगंधि फ्रांसिस (भाग -दो)

सुधा अरोड़ा

0 469

दूसरा हिस्सा  

मेरा एक ही सपना था कि मेरे बच्चे मेरी तरह आधी अधूरी पढ़ाई न करे। मेरी बेटी पढ़ाई में तेज थी और उसने मेहनत करके दसवीं की परीक्षा पास कर ली। घर के माहौल में – जहां पिता शराब पीकर घर में आते थे और रोज़ लड़ाई -झगड़ा होता था – उसे पढ़ाई करने के लिए बड़ी मुश्किल से समय मिलता था।

झोपड़पट्टी में रहनेवाले अधिकांश बच्चों का यही हाल होता है। दसवीं पास करने के बाद मुझे लगा कि उसे आगे भी पढ़ाना चाहिए। उन्हीं दिनों ज्योत्स्ना कमल नाम की एक प्रगतिशील विचारों वाली महिला मेरी दोस्त बन गई थी। उसकी मदद से मैंने  घर से बाहर कदम रखना शुरू किया। उनकी भी एक बेटी थी। वह अपनी बेटी के साथ गोवा में रहती थी। ज्योत्स्ना की सलाह पर मैंने अपनी बेटी को उसके साथ गोवा में पढ़ने के लिए भेज दिया। हालांकि मेरी बेटी विज्ञान की पढ़ाई करना चाहती थी पर उसे विज्ञान में प्रवेश नहीं मिला, लिहाजा उसने कॉमर्स में प्रवेश लिया। बेटी को पढ़ाई के लिए गोवा भेजने पर फ्रांसिस ने बहुत विरोध किया। उनका कहना था कि आगे पढ़ाने की कोई जरुरत नहीं। अपनी दुकान (उन दिनों हमारे पास एक छोटी सी दुकान थी, जो आज भी है।) बेचकर मैं लड़की की शादी कर दूंगा। लेकिन मैने उसकी बात नहीं मानी और बेटी को पढ़ने के लिए गोवा भेज दिया।

उन दिनों मैं और मेरे दोनो बेटों  ने मिलकर भांडुप में अपनी दुकान में छोटा-मोटा होटल चलाना शुरु कर दिया। होटल चलाना कोई आसान काम नहीं था। होटल क्या था, चाय, भजिया, बटाटा वड़ा की छोटी-मोटी दुकान सी थी जिसमें चाय ठंडा के अलावा खाने के लिए नमकीन, बिस्किट्स वगैरह होते थे। आसपास की दुकानों में जाकर चाय पहुंचाना, हिसाब-किताब रखना, तरह-तरह के ग्राहकों से निपटना जैसे काम मैं बखूबी करने लगी थी। दुकान पर फ्रांसिस आता तो शराब पीने के लिये गल्ले में से पैसे ले जाता। अगले दिन सामान भरने के लिये फिर पैसे कहां से आते? बच्चे छोटे थे पर इतनी समझ उनमें आगई थी कि जैसे ही कुछ पैसे जमा होते उन्हें खीसे में भर लेते। कभी-कभी कुछ स्थानीय गुंडों से भी परेशानी होती। लोगों की अच्छी – बुरी नजरों की मुझे परवाह नहीं थी क्योंकि खुद उस इलाके की होने के कारण मैं हर एक की नस-नस से वाकिफ थी। वे भी मुझे अच्छी तरह जानते थे। मैं किसी भी तरह का अन्याय बर्दाश्त नहीं करती थी। गलत बात पर हमेशा भिड़ जाती थी। हमारी ही बस्ती का एक दादा अक्सर मेरी दुकान पर आकर चाय वगैरह पीता, खाने का सामान जबरन उठाकर खा जाता लेकिन पैसे मांगने पर दादागीरी दिखाता था। एक दिन मैने सख्ती से पैसे मांगे तो अकड़कर उल्टी सीधी बकने लगा। पैसे देने से उसने साफ इन्कार कर दिया और कहा, नहीं देता पैसे !  जा, जो करना है कर ले ! क्या कर लेगी तू ?  सुनकर मेरा खून खौल गया । एक तरफ घर में पिटो, बाहर काम करो तो ऐसे मवालियों की दादागीरी झेलो। मैने आव न देखा ताव, एक सोडावॉटर की बोतल उठाई और उसके सिर पर दे मारी।उसका सिर फूट गया और खून बहने लगा। खून देखकर वो डर के मारे भाग गया और फिर दोबारा मुझे परेशान करने नहीं आया। पास खड़े लोगों ने भी मुझे कुछ नहीं कहा क्योंकि सब उसके रंग-ढंग से वाकिफ थे लेकिन उससे डरते थे।

इसी दौरान अंधाधुंध शराब, बीड़ी, सिगरेट यहां तक कि गांजा पीने से फ्रांसिस को लीवर और टी.बी की बीमारी हो गई। शुरू में स्थानीय अस्पतालों में इलाज के बाद भी फायदा न होने पर मुंबई के सायन अस्पताल और शिवड़ी के बड़े टी. बी अस्पताल में फ्रांसिस को भर्ती किया गया। टी. बी. की दवा बहुत महंगी थी। एक तरफ उनकी टी.बी. का इलाज चल रहा था तो दूसरी तरफ फ्रांसिस की शराबखोरी उन दिनों  भी जारी थी। इलाज और शराब का पलड़ा बराबर का था। यहां तक कि वॉर्ड में भी वह वॉर्ड बॉय को घूस देकर नारियल पानी की जगह शराब मंगवाकर वहीं वॉर्ड में ही पीता था। हालत यह थी कि टी. बी. की दवा वाले बैक्टीरिया को भी उस शराब की लत सी लग गई थी। मेरे दोनों बच्चे अंग्रेजी मीडियम में पढ़ रहे थे। घर खर्च, बच्चों की पढ़ाई का खर्च और पति की बीमारी के इलाज का खर्च पूरा करने के लिए आमदनी जरूरी थी। मेरे दोनों बेटे स्कूल से वापस आने के बाद होटल के काम में मेरी मदद करते। उस दौरान हमारा छोटा सा होटल गुज़ारे लायक चलने लगा था। लेकिन सारी आमदनी फ्रांसिस के इलाज में खर्च हो जाती थी। मेरे बच्चों ने इस दौर में मेरा बहुत साथ दिया। वे हालात को अच्छी तरह समझते थे। आखिर वे भी तो यह सब भुगत रहे थे। एक ओर जहां कठिन जिंदगी थी तो दूसरी तरफ पिंटो और विवेक के साथ आगे चलकर घर की दिक्कतों, बच्चों की पढ़ाई, उनके भविष्य के बारे में भी चर्चा होती थी। मुझे भी अपने दबे हुए विचारों को आगे लाने में मदद मिलती थी। कभी-कभी पिंटो और विवेक मुझे कुछ किताबें लाकर देते थे जो महिलाओं के बारे में और नारी मुक्ति के बारे में होती थी। जब भी मुझे समय मिलता मैं उन किताबों को पढ़ती थी। पिंटो और विवेक दोनो मुझे बताया करते कि औरतों को कैसे आगे आना चाहिए अपने अधिकारों के लिए कैसे लड़ना चाहिए, और समान अधिकार के लिए कैसे संघर्ष करना चाहिए आखिरकार जिसकी आशंका थी वही हुआ। 1986 के अप्रैल महीने में लंबी बीमारी के बाद शिवडी के टी. बी. अस्पताल में फ्रांसिस का देहांत हो गया। उस वक्त मेरी बेटी बारहवीं का इम्तिहान देकर आई थी। ऐसे समय पर मैने यह भी देखा कि पति के मरने के बाद किसी महिला के साथ लोग कैसा व्यवहार करते हैं। बहुत सारे रस्मों रिवाज या पाबंदिया औरत पर लाद दी जाती है। मैं जिस समाज की थी उस समाज की औरतों का कहना था कि मुझे चालीस दिन तक घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, किसी से बात नहीं करनी चाहिए, दुकान में नहीं जाना चाहिए, होटल नहीं चलाना चाहिए। विधवा होने के बाद परिवार वालों की तरफ से तमाम तरह के बंधन मुझ पर लादे जाने लगे। लेकिन एक पहाड़ जैसा सवाल मेरे सामने मुंह बाए खड़ा था कि मैं अपने बच्चों को क्या खिलाऊं, उन्हें आगे कैसे पढ़ाऊं।

सुगंधि फ्रांसिस

फ्रांसिस के देहांत के बाद उसके भाई-बहन हमारी जो भी थोड़ी बहुत जायदाद थी, हथियाने के लिए आ गए। हमारे पास जो गुमटी नुमा दुकान थी उसे भी हड़पने की कोशिश की। मुझे उनके खिलाफ पुलिस में जाना पड़ा। पहले मैं पुलिस से बहुत डरती थी, लेकिन अपनी जरूरत के लिए और आगे चलकर प्रताड़ित महिलाओं के सवाल को लेकर पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाना एक आम बात हो गई। फिर मैने सोचा कि होटल किसी दूसरे को चलाने को दे दूं और घर में मेस शुरू कर दूं, जहां लोग महीना भुगतान करके नियमित तौर पर भोजन किया करें। लिहाजा मैने घर में एक साल तक मेस चलाकर देखा लेकिन मेस ठीक से चल नहीं पाया। उसे बाद में बंद कर देना पड़ा।

एक ओर जहां कठिन जिंदगी थी तो दूसरी तरफ पिंटो और विवेक के साथ आगे चलकर घर की दिक्कतों, बच्चों की पढ़ाई, उनके भविष्य के बारे में भी चर्चा होती थी। मुझे भी अपने दबे हुए विचारों को आगे लाने में मदद मिलती थी। कभी-कभी पिंटो और विवेक मुझे कुछ किताबें लाकर देते थे जो महिलाओं के बारे में और नारी मुक्ति के बारे में होती थी। जब भी मुझे समय मिलता मैं उन किताबों को पढ़ती थी। पिंटो और विवेक दोनो मुझे बताया करते कि औरतों को कैसे आगे आना चाहिए अपने अधिकारों के लिए कैसे लड़ना चाहिए, और समान अधिकार के लिए कैसे संघर्ष करना चाहिए

मुफलिसी के दौर में घर चलाने के लिए मैने और मेरे बच्चों ने घर के सामने वाली सड़क पर छोटेे मोटे सामान बेचना शुरू कर दिया। क्या क्या नहीं बेचा हमने। रक्षाबंधन के दिनों में राखियां, होली के समय रंग, प्लास्टिक की पिचकारियां, संक्रांति के समय गन्ना, कपड़े, साड़ियां वगैरह। इतनी मेहनत के बाद आखिर हमें गुजारा करने लायक पैसा मिल जाता था। यह सब करते समय यही सोचती थी कि काम तो काम है, उससे क्या शरमाना। अब मेरे सामने फिर से सवाल उठ खड़ा हुआ कि अब क्या करूं? उन्हीं दिनों मेरे सामने एक प्रस्ताव आया किसी ऑफिस में सप्ताह में तीन दिन जाकर बैठना। वेतन छह सौ रुपये। 1987 में मैंने जिंदगी में पहली बार भांडुप से वी.टी. अकेली यात्रा की। वह समय था जब मुझे लोकल ट्रेन में वी.टी तक अकेले यात्रा करने से बहुत डर लगता था।  वहां मैं इंडियन स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज़ के दफ्तर में जाने लगी। यह सिलसिला भी महज एक साल चला। 1988 में मैंने सोचा कि क्यों न मैं भी महिलाओं के लिए कुछ करुं। मेरी तरह कितनी ही ऐसी महिलाएं है जिन्हें  मदद की जरुरत होती है। अब मेरी बेटी भी काम करने लगी थी और मैं एक राष्ट्रीय महिला संगठन अखिल भारतीय जनवादी महिला संघटना के साथ जुड़ गई और उसके लिए काम करना शुरु कर दिया।

1987-1990 के बीच मेरा वैचारिक विकास होना शुरु हुआ। 1990 में मैं सीपीएम की पार्टी सदस्थ बनी, जिससे मुझे छोटे छोटे कमरों में रहनेवाले किरायेदारों की समस्याओं को समझने का मौका मिला। आज मैं सीपीएम की मुंबई कमिटी की सदस्य और जनवादी महिला संगठन मुंबई की सेक्रटेरी, राज्य कमेटी की कोषाध्यक्ष हूं।

मैंने डॉ. विवेक मॉन्टेरो से दूसरी शादी की और मेरी बेटी की शादी भी इसी विचारधारा से जुड़े ऐसे व्यक्ति के साथ हुई जहां पर दहेज का कोई सवाल ही नहीं आया। मेरे विचारोंको मजबूती प्रदान करने में और मुझे स्वतंत्र रुप से काम करने में प्रोत्साहन देनेवाले भी दो पुरुष ही रहे हैं। पहला व्यक्ति अठरह वर्षीय युवक था जो मुफलिसी के दिनों मे मेरी बहुत मदद करता था। आज भी वह व्यक्ति मेरे काम को आगे बढ़ाने में मेरा मददगार है। वह व्यक्ति है डेन्टल सर्जन डॉ. नंदकुमार जाधव जो आज मेरा दामाद है। दूसरा पुरुष है डॉ. विवेक मॉन्टेरो , जिनकी दी हुई किताबें पढ़कर मैंने स्त्री मुक्ति और स्त्री के अधिकारों के बारे में जाना, जिन्होंने मुझे संगठन में कैसे काम करना चाहिए

इस प्रक्रिया में डॉ. आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार रामस्वामी आदि के बारे में छोटी-छोटी किताबें पढ़ने को मिली। उनके विचार मुझे जंचते थे उन्हें मैं अमल में लाने की कोशिश भी करती थी। अंतर्जातीय, अंर्तधर्मीय, विधवा विवाह, दहेज न लेना – न देना जैसे विचारों को आगे ले आने और उन पर अमल करने में मैंने जरा भी संकोच नहीं किया। मैंने यह जाना कि अगर हम समाज को बदलना चाहते हैं तो पहले हमें खुद को बदलना होगा और यह प्रयोग खुद आजमाकर देखना होगा।

इसी सोच का एक हिस्सा रहा कि मैंने डॉ. विवेक मॉन्टेरो से दूसरी शादी की और मेरी बेटी की शादी भी इसी विचारधारा से जुड़े ऐसे व्यक्ति के साथ हुई जहां पर दहेज का कोई सवाल ही नहीं आया। मेरे विचारोंको मजबूती प्रदान करने में और मुझे स्वतंत्र रुप से काम करने में प्रोत्साहन देनेवाले भी दो पुरुष ही रहे हैं। पहला व्यक्ति अठरह वर्षीय युवक था जो मुफलिसी के दिनों मे मेरी बहुत मदद करता था। आज भी वह व्यक्ति मेरे काम को आगे बढ़ाने में मेरा मददगार है। वह व्यक्ति है डेन्टल सर्जन डॉ. नंदकुमार जाधव जो आज मेरा दामाद है। दूसरा पुरुष है डॉ. विवेक मॉन्टेरो, जिनकी दी हुई किताबें पढ़कर मैंने स्त्री  मुक्ति और स्त्री  के अधिकारों के बारे में जाना, जिन्होंने मुझे संगठन में कैसे काम करना चाहिए, संगठन में या लोगों के बीच अपनी बात को कैसे रखना चाहिए आदि सिखाया। उनकी हमेशा यही इच्छा रहती है कि मैं ज्यादा से ज्यादा समय पढ़ने में बिताऊं, लेकिन आगे चलकर संघटना के काम की व्यस्तता बहुत ज्यादा बढ़गयी और मुझे लगा कि जीवन के सीधे अनुभव किताबों से कहीं ज्यादा शिक्षा देते हैं।

यह भी पढ़ें :

गरीबों-मज़लूमों के लिए जिनका घर कभी बंद नहीं होता (भाग – एक)

विवेक एक उच्च मध्यमवर्गीय, बुद्धिजीवी कुलीन परिवार से हैं। उनके पिता मिलिट्री में ब्रिगेडियर थे उनकी मां गणित की शिक्षिका और एक स्कूल की प्रिंसिपल थी। विवेक के परिवार में उनके अलावा दो बड़ी बहनें और दो छोटी बहनें हैं। उनके माता पिता अब रिटायर हो चुके हैं और गोवा के एक संपन्न इलाके में रहते हैं। उनके पिता भारतीय सेना में उच्च अधिकारी थे और समय समय पर उनकी बदली होती रहती थी। इसलिए विवेक की पढ़ाई भारत के कई प्रांतों में कश्मीर से नेफा, दिल्ली, पुणे आदि जगहों में हुई। हाईस्कूल का इम्तिहान गोवा में देने के बाद वे मुंबई के सेंट जेवियर्स  कॉलेज में पढ़ने लगे। वहां बीएससी की पढाई पूरी करने के बाद वजीफा पाकर वे अमरीका पढ़ने गए और वहां पर उन्होने भौतिक शास्त्र में पीएचडी की। अमरीका में ही वे वामपंथी विचारधारा से प्रभावित हुए। भारत वापस आने के बाद वे सीपीआई (एम) में शामिल होकर ट्रेड यूनियन संगठन पर काम करने लगे।

क्रमशः

sudha arora

 

 

 

सुधा अरोड़ा जानी-मानी कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.