Friday, June 21, 2024
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बधाई हो दीपा, तुम रोहित बेमूला जैसी नहीं (डायरी 7 नवंबर, 2021) 

प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. कांचा इलैया शेपर्ड इन दिनों एक अभियान चला रहे हैं। उनका कहना है कि आजकल के उच्च शिक्षण संस्थानों में दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है। सरकार के अधीन वाले शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रमों में हिंदुत्व से जुड़ी सामग्रियों काे शामिल किया जा रहा है और हिंदी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को […]

प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. कांचा इलैया शेपर्ड इन दिनों एक अभियान चला रहे हैं। उनका कहना है कि आजकल के उच्च शिक्षण संस्थानों में दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है। सरकार के अधीन वाले शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रमों में हिंदुत्व से जुड़ी सामग्रियों काे शामिल किया जा रहा है और हिंदी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता दिया जा रहा है। वहीं गैर-सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों में अंग्रेजी को महत्व दिया जा रहा है। इसके अलावा गैर-सरकारी संस्थानों में अत्याधुनिक विषयों की पढ़ाई उपलब्ध करायी जा रही है। प्रो. इलैया आह्वान करते हैं कि अंग्रेजी को प्राथमिकता दी जाय तथा वे सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों को अत्याधुनिक बनाए जाने की मांग करते हैं।

निश्चित तौर पर प्रो. इलैया का यह आकलन सही है कि आजकल के निजी यानी गैर-सरकारी उच्च शिक्षण संस्थान पुराने गुरुकुलों के समान होते जा रहे हैं, जहां पढ़ने की अनुमति केवल खास वर्ग व समुदाय के बच्चों को ही है। कहने का मतलब यह है कि अब वे ही गुणवत्तायुक्त उच्च शिक्षा हासिल कर सकेंगे, जो आर्थिक रूप से सक्षम होंगे। यह एक तरह का भेदभाव ही है। यदि इस आधार पर हम आकलन करें तो इसका सबसे अधिक शिकार दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्ग के छात्र ही होते हैं।

मैं प्रो. इलैया की चिंता से खुद को जोड़ता हूं। लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि अभी की सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानें भी गुरुकुल से कम नहीं हैं। मैं तो बिहार की बात करता हूं। जिन दिनों प्रो. मुचकुंद दुबे ने समान स्कूल शिक्षा नीति के संबंध में अपनी रपट बिहार सरकार को समर्पित किया था, उन दिनों मैंने कुछ विशेष खबरें लिखी थी। पहली खबर थी– केवल 5-6 फीसदी बिहारी छात्र ही पीजी या इससे अधिक की पढ़ाई करते हैं। तकनीकी भाषा में इसे ड्रॉप आउट रेट कहा जाता है। बिहार सरकार की अपनी रिपोर्ट बताती है कि सातवीं तक की पढ़ाई करने वाले सौ में से करीब 15 छात्र मैट्रिक के पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़ देने वाले छात्रों की संख्या करीब 25 फीसदी है। इंटर पास कर पढ़ाई बीच में छोड़ देनेवाले छात्रों केी संख्या 30 फीसदी है। जबकि 25 फीसदी छात्र स्नातक के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। इस प्रकार केवल 5-6 फीसदी ही स्नातक के बाद की पढ़ाई करते हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि इनमें से 90 फीसदी से अधिक उच्च जातियों के हैं।

[bs-quote quote=”दीपा ने अपने केंद्र के निदेशक नंदकुमार पर जातिगत दुर्भावना से ग्रस्त होकर जातिसूचक टिप्पणी करने व शाेध में सकारात्मक सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया। अपनी शिकायत को दर्ज कराने के लिए दीपा ने 29 अक्टूबर को भूख हड़ताल की। करीब एक सप्ताह के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को होश आया और उसने नंदकुमार को हटा दिया” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

मेरा अनुमान है कि 2-3 फीसदी ही दलित, आदिवासी और पिछड़े उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं और यह भी ऊंची जाति के द्रोणाचार्यों को बर्दाश्त नहीं होता। एक मामला कोट्टायम के महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के नैनो टेक्नोलॉजी केंद्र में पीएचडी कर रही दलित छात्रा दीपा पी मोहनन का है। दीपा ने अपने केंद्र के निदेशक नंदकुमार पर जातिगत दुर्भावना से ग्रस्त होकर जातिसूचक टिप्पणी करने व शाेध में सकारात्मक सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया। अपनी शिकायत को दर्ज कराने के लिए दीपा ने 29 अक्टूबर को भूख हड़ताल की। करीब एक सप्ताह के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को होश आया और उसने नंदकुमार को हटा दिया तथा दीपा को आश्वस्त किया है कि उन्हें सभी आवश्यक संसाधन व सहूलियतें उपलब्ध करायी जाएंगीं।

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निश्चित तौर पर दीपा बहुत बहादुर हैं और मेरे लिए तो वह रोहित बेमूला से भी बहादुर हैं। वजह यह कि दीपा ने घुटने नहीं टेके। उसने संघर्ष का रास्ता चुना और विश्वविद्यालय प्रशासन को कार्रवाई करने के लिए बाध्य किया। परंतु सवाल अब भी शेष है कि भारत के द्रोणाचार्यगण सुधरेंगे कब?

बहरहाल, कल जब पटना से दिल्ली वापस आ रहा था तब एक कविता जेहन में आयी–

सुहाग और बाल-बच्चों के अलावा

अपने लिए अपना जीवन 

इस बार जरूर मांगना उससे

जिससे तुम हर साल मांगती हो

छठ करनेवाली औरतों।

देखो, तुम्हारा यह तर्क नहीं चलेगा कि

तुम्हारी छठ मैया

तुम्हें बेटा-बेटी ही दे सकती हैं

पति को अच्छा रोजगार और बरकत दे सकती हैं

वह तुम्हारी आजादी, 

तुम्हारी जिंदगी नहीं दे सकती।

और यदि वह

नहीं दे सकती तुम्हारी जिंदगी

तो गुलाम बने रहने या आजाद होने का

फैसला तुम्हें करना है 

छठ करने वाली औरतों।

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

गाँव के लोग
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3 COMMENTS

  1. जी हमने भी छात्र संगठन डॉ० अम्बेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ इंडिया(रजि०) के माध्यम से उक्त मामले में हाई कोर्ट केरला , राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग , भारत सरकार , यूजीसी आयोग , भारत सरकार , प्रधानमंत्री कार्यालय में केस फाइल किया हुआ है । सन्तुष्टि हुई है यह खबर जानकर की मामले के निदान हो चुका है और आरोपी के विरुद्ध भी सख्त कार्यवाही हुई है ।

    अमृत न्योली , जिलाध्यक्ष हिसार
    डॉ अम्बेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ इंडिया (रजि०)
    हरियाणा इकाई ।
    मो. न. – 9729580209

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