ऊंट भी मनुष्य का मनोविज्ञान समझते हैं !

कर्ण सिंह चौहान

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जब हम बच्चे थे तो हमारे घर में कई ऊंट थे। केवल हमारे घर में थे सो बात नहीं, सभी किसानों के घर में एक तो होता ही था। हमारा परिवार क्योंकि संयुक्त परिवार था इसलिए उसी के हिसाब से ऊंटों की संख्या भी ज्यादा थी। जहां तक मुझे याद है तीन ऊंट तो थे ही।

वैसे हमारा गांव यमुना के किनारे पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में दिल्ली से सटा था और लोग कहते हैं कि यह इलाका ऊंट वाला नहीं है। हो सकता है अपने राजस्थान के उत्स से ऊंट रखने की परिपाटी हमारे गांव के किसानों में चली आ रही हो।

खेती किसानी करने के लिए बैल भी थे लेकिन फिर भी ऊंटों का अपना महत्व था। एक तो ऊंट को देखकर ऊंचाई का बोध होता। वे गर्दन उठाकर खड़े होते और चलते इसलिए ऐसा लगता जैसे उनमें स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा है। बैल थे तो अच्छे लेकिन बेचारे हमेशा दबे-दबे से रहते।

कामकाजी से भी लगते। उनके व्यक्तित्व में कोई खास बात दिखाई नहीं पड़ती सिवाय इसके कि वे बेहद मेहनती और अनुशासित थे।

एक बार कनाडा से मेरी मित्र मार्गारीटा और उसकी बहन दिल्ली में हमारे पास रह रहे थे। उन्हें जब पता लगा कि मेरा बचपन जिस गांव में बीता वह यहां से नजदीक है, तो उन्होंने वहां जाने की जिद ठान ली। मुझे उनके गांव जाने में कोई तुक नजर नहीं आई। एक तो विदेशी महिलाएं, उनका लिबास, सिगरट की लत। ' बावले गांव में ऊंट ' का मामला होने जा रहा था। मैं उनके आग्रह को किसी भी तरह टाल नहीं पाया।

लेकिन ऊंटों की तो बात ही निराली थी।

वैसे तो ऊंट रेगिस्तान में सवारी के लिए मशहूर हैं। लेकिन हमारा गांव न तो रेगिस्तान में था और न किसी को ऊंट की सवारी का ऐसा शौक था कि उनपर चढ़कर घूमे। गांव के आसपास कोई ऐसा पर्यटन स्थल भी नहीं था कि उसी में सैलानियों के मनोरंजन के लिए ऊंटों को ले जाया जाय।

फिर भी पीढ़ियों से ऊंट थे और वे वैसे ही परिवार का हिस्सा थे जैसे कोई भी अन्य पशु जैसे गाय, भैंस, बैल, कुत्ते वगैरह। सबके अपने नाम थे तो ऊंटों के भी थे।

और ऐसा भी नहीं था कि ऊंट कोई ठलुआ टाइप थे और यहां करने के लिए उनके पास कोई काम ही नहीं था ! उनके कई काम थे जिन्हें वे बड़ी ही शानो-शौकत से पूरा करते।

मसलन एक काम था खेतों में पानी देने के लिए हरट (या शायद रहट) चलाने का।

सारे इलाके के किसान लोग हरट चलाने के लिए बैलों का उपयोग करते। लेकिन कई सारे खेत होते थे और सिंचाई का काम कई दिन तक लगातार चलता था। बैलों के साथ दिक्कत यह थी कि उनको हांकने के लिए उनके पीछे पूरा दिन घूमना पड़ता था। गोल-गोल चक्कर काटने में आदमी कोल्हू का बैल हो जाता था। यह भी क्या बात हुई कि बस सारा समय हाथ में एक कमची लिए अह-ह करते बैलों के पीछे घूमो।

इससे अधिक ऊबाऊ काम दुनिया में कोई हो नहीं सकता। यह ‘मिथ ऑफ सिसिफस’ से भी ज्यादा अर्थहीन काम था।

और इस काम को कम बोझिल बनाने में न केवल बैल आपकी कोई सहायता नहीं करते बल्कि चिढ़ाने का काम करते। हांकते हुए भरी धूप में आप समझें कि पास के पेड़ के नीचे बैठकर वहीं से बैलों को देखते रहें और रुकने पर कुछ बोल दें। लेकिन बैल बहुत ही बदमाश थे। उन्हें जैसे ही पता चलता कि आप उनके पीछे नहीं चल रहे तो वे बस वहीं रुक जाते और पेड़ के नीचे से बहुत चिल्लाने पर भी टस से मस नहीं होते। अब चाहे गरमी हो, जाड़ा या बरसात, मन मारकर उनके पीछे घूमना ही पड़ता।

लेकिन ऊंट जब यह काम करते तो पूरा मजा आ जाता। उनकी आंख पर गहरा काला चश्मा लगा दिया जाता और बस। वे अपने आप घूमते रहते। लगता उनके लिए हरट का यह काम बाएं हाथ का मामूली था। वे अपनी लंबी टांगों से इतनी जोर से चलते कि हरट की बाल्टियों की घिर्री बन जाती। जो खेत बैलों से पूरा दिन लेता, ऊंटों की सिंचाई से आधा समय में ही भर जाता।

सबसे बड़ी बात थी कि उनके पीछे नहीं घूमना पड़ता था, वे अपने-आप पूरा दिन बिना थके चलते रहते। मेरे खयाल से इस काम के लिए ऊंट से बेहतर कोई और हो ही नहीं सकता था।

एक दूसरा काम था जुते हुए खेतों में पटरा चलाने का। इस काम को भी ऊंट उसी तरह से करता जैसे सिंचाई का काम।

लेकिन यह काम तो किसानी के थे। इसमें कोई खास मजे वाली बात नहीं थी। मजे वाली बात थी ऊंट की सवारी की। गांव से खेतों की दूरी कई कोस की थी और हमें वहां ऊंटों को लाना-लेजाना पड़ता था। इसमें हमें सवारी करने का मौका मिलता।

ऊंट की सवारी कोई आसान काम नहीं। नंगी पीठ पर सवार होना और फिर बैठे रहना एकदम कला थी। चढ़ने के लिए ऊंट को जमीन पर बिठाना पड़ता। वे बहुत बदमाश थे और हमारे इरादों को समझ जाते और हमें खूब छकाते। बार-बार कहने पर भी वे बस पलक झपकने तक ही बैठते और तुरत उठ खड़े होते। अगर आप बहुत अभ्यस्त सवार नहीं हैं तो उनके अचानक उठ जाने से गिर पड़ने का खतरा था। हम कई बार गिर जाते।

अगर ऊपर पहुंच भी गए तो बैठे रहने के लिए बस उनकी छोटी सी चोटी को ही पकड़कर रहना होता। वे इतने जोर से हिचकोले लेकर चलते कि अगर बहुत सावधानी नहीं बरती तो लुढ़कने की पूरी संभावना रहती। कई बार तो वे जान-बूझकर पीठ को ऐसे हिलाते कि अच्छा सवार भी लुढ़क जाय।

लेकिन बदमाशी की हद तो तब होती जब कोई पेड़ रास्ते में पड़ता। ऊंट पेड़ में बिना मुंह मारे नहीं रह सकते। हमारे लाख मना करने पर भी वे पेड़ की तरफ लपकते। जैसे ही वे पेड़ के पास पहुंचते तो अक्सर ऐसी मोटी डाल के नीचे से गुजरते जो उनकी पीठ की ऊंचाई के बराबर होती। इससे ऊपर बैठे हम या तो डाल से टकराकर धड़ाम से नीचे गिरते या गिरने से बचने के लिए डाल पर ही लटक जाते। इस बीच ऊंट हमारी मुसीबत से बेखबर आराम से पेड़ की हरी-हरी कोंपलों का भक्षण करते रहते।

मेरे खयाल से ऊंट जितनी गलत हरकतें कर सकते थे उनमें यह सबसे कमीनी थी। इसमें एक तो हमें हमेशा ही चोट लगती। अगर डाल पकड़ भी ली तो बाहें और छाती पर खरोंच लगतीं। कई बार तो डाल से उतरने में घंटों लग जाते। और अगर कहीं पेड़ कांटे वाला हुआ तब तो समझो कई हफ्तों का इंतजाम हो जाता।

हमें मालूम था कि वे यह हरकतें करेंगे और हम इसके उपाय भी करते लेकिन लगता वे पहले से ही हमारे सारे उपायों की काट सोच कर आए हैं। इसलिए हम अक्सर घायल अवस्था में रहते। जले पर नमक छिड़कने वाली हरकत यह थी कि जैसे ही हम गिरते या पेड़ पर लटकते, कई बार ऊंट तेजी से भाग खड़े होते। हमें कई मील की दूरी पैदल पार करनी होती।

वे घर पर खड़े मिलते और लगता हमें देख कर मुस्कुरा रहे हैं।

जो भी हो ऊंट हमारे बचपन के साथी थे और उनमें से सालाजार तो हमारा गहरा दोस्त था। दोस्त का मतलब यह नहीं कि वह ये सब हरकतें नहीं करता था, बस यही कि वह देखने में काफी दोस्ताना लगता था। हम सब उसपर सवारी के लिए एक-दूसरे से झगड़ते।

गांव से पढ़ने मैं शहर आ गया और फिर वहां कई महीनों में या कई बार तो कई सालों में जाना होता। ऊंट वैसे ही मिलते।

एक बार कनाडा से मेरी मित्र मार्गारीटा और उसकी बहन दिल्ली में हमारे पास रह रहे थे। उन्हें जब पता लगा कि मेरा बचपन जिस गांव में बीता वह यहां से नजदीक है, तो उन्होंने वहां जाने की जिद ठान ली। मुझे उनके गांव जाने में कोई तुक नजर नहीं आई। एक तो विदेशी महिलाएं, उनका लिबास, सिगरट की लत। ‘ बावले गांव में ऊंट ‘ का मामला होने जा रहा था। मैं उनके आग्रह को किसी भी तरह टाल नहीं पाया।

कर्ण सिंह चौहान

गांव गए तो वहां सबसे पहले उन्हें ऊंट के ही दर्शन हुए। वे हैरान थीं कि यहां ऊंट ऐसे लोगों के बीच में बैठे हैं जैसे कोई बात ही नहीं। उनके लिए पशुओं का मनुष्यों के साथ रहना बहुत ही विचित्र घटना थी।

और आखीर में वही हुआ जिस बात का मुझे डर था। उन्होंने ऊंट की सवारी करने की इच्छा प्रकट की। मैं बहुत डर रहा था कि अगर ऊंट अजनबी होने पर कोई बिदकने वाली हरकत कर दें। या कोई खास हरकत न भी करें, अपनी स्वाभाविक हरकतें ही करें और उन्हें रास्ते में गिरा दें या पेड़ पर लटका दें तो क्या होगा !

मैंने उन्हें बहुत समझाया पर वे नहीं मानीं। मैं जानता था कि वे कहने को बहुत बहादुरी दिखा रही थीं लेकिन थीं सुख-सुविधाओं में पली-बढ़ी बेहद कमनीय।

अब जो होगा सो देखा जायगा।

सालाजार के ऊपर ओहदा रखा गया जिसपर बैठने के लिए एक नरम गद्दा बिछाया गया। वे दोनों उसपर बैठीं। उन्हें दूर खेतों तक और यमुना के पाट तक घुमाने के लिए स्कूल का ही एक लड़का रस्सी थाम कर आगे-आगे चला। उन्होंने आग्रह किया कि रस्सी भी उन्हें ही थमाई जाय और वह लड़का केवल निगरानी के लिए साथ-साथ चले।

वे कोई दो घंटे बाद लौटीं और इस पूरे समय चिंता के मारे मेरा बुरा हाल था कि कहीं मनोरंजन के बहाने मुसीबत न खड़ी हो जाय।

लेकिन जब वे लौटीं तो उनके पीछे लोगों का हुजूम था। लगता यह पूरे गांव के लिए ही तमाशा बन गया। वे भी बहुत खुश जोर-जोर से चिल्ला रही थीं।

घर के आंगन में पहुंचने पर सालाजार को बैठने के लिए कहा तो एक आज्ञाकारी की तरह वह अपनी पूरी गरिमा के साथ बैठ गया। वे उतरीं और उतर कर उन्होंने सालाजार की गरदन से लिपट कर आभार व्यक्त किया। आज सालाजार हमें गिराने वाला और पेड़ पर टांगने वाला सालाजार नहीं था बल्कि मेहमान नवाजी के पूरे कायदों में दक्ष सालाजार था।

उसकी उस दिन वाली छवि ऐसी मन में बस गई कि लगता है कल की ही बात है।

कर्ण सिंह चौहान हिन्दी के सुप्रसिद्ध आलोचक हैं। Top of Form

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