फादर स्टैन स्वामी ने संविधान की पांचवीं अनुसूची के बुनियादी कानूनों की पैरवी की 

गाँव के लोग डेस्क 

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कल 84 साल के फ़ादर स्टेन स्वामी का निधन हो गया । उनको माओवाद से उनके कथित रिश्ते और भीमा-कोरेगाँव में संलग्नता के आरोप में एन आई ए द्वारा गिरफ्तार किया गया मुंबई की तलोजा जेल रखा गया था । वे लंबे समय से बीमार थे लेकिन उनके इलाज पर कोई ध्यान नहीं दिया गया । उनकी मौत न्यायिक हिरासत में हुई । उनकी शारीरिक हालत को देखते हुये जो जुल्म उनके ऊपर किए गए वह न सिर्फ सत्ता की क्रूरता बल्कि भारत की फासीवादी सरकार की कायरता का सबसे निकृष्ट उदाहरण है । इस घटना ने हम सबको हिलाकर रख दिया है । लोकतन्त्र में भरोसा रखनेवाला हर इंसान स्तब्ध है । कल से लगातार उनकी मौत पर लेखकों , पत्रकारों , सामाजिक कार्यकर्ताओं , मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की है । लोगों में भारी दुख और आक्रोश है । 

सुप्रसिद्ध कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा अरोड़ा ने एक मार्मिक कविता के साथ अपनी टिप्पणी में लिखा है ‘जब फादर स्टेन स्वामी कांपते हाथों से पानी का घूंट नहीं ले पा रहे थे तो उन्हें एक स्ट्रॉ तक देने में जेल के अधिकारियों ने महीनों लगा दिए , जब कोविड ग्रस्त होने की आशंका के बावजूद उनका टेस्ट तक करने में इतने दिन लगा दिए, हत्या की शुरुआत तो तभी हो गई थी ।  हम सब मूक दर्शक हैं । हर रोज़ पिछला नाटक कुछ कम वीभत्स लगता है क्योंकि हर नया प्रहसन पिछली सीमाओं का अतिक्रमण करता हमें सुन्न करता चला जा रहा है।

झारखंड में फादर स्टैन के काम के दो प्रमुख क्षेत्र रहे और दोनों ने ही उन्हें केंद्र सरकार द्वारा रक्षित शक्तिशाली हितों के खिलाफ खड़ा कर दिया। उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उस कॉर्पोरेट-राज्य गठबंधन को चुनौती देना रहा है जो आदिवासियों के पारंपरिक स्रोतों की लूट-खसोट करता है। झारखंड एक खनिज समृद्ध प्रांत है। देश के 40 प्रतिशत खनिज संसाधन यहीं हैं। फिर भी इसकी 39 प्रतिशत आबादी, ज़्यादातर आदिवासी, गरीबी रेखा से नीचे जीती है। प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के शोषण की दौड़ में अक्सर राज्य की मशीनरी आदिवासियों के खिलाफ खड़ी होती है। आदिवासियों को विस्थापन तथा और निर्धनीकरण का डर सताता है।

हममें से कुछ लोग 

हममें से कुछ लोग बहुत पहले से मरे हुए थे 

कुछ धीरे-धीरे मरते जा रहे थे

कुछ अब भी मरने की कगार पर है

एक दिन आएगा 

जब हम सब 

लाशों में तब्दील हो जाएंगे 

और हमारी पूरी कौम 

मुर्दा लोगों की कौम होगी

जिसे किसी के मरने से,

लहूलुहान होने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा 

जब रास्ते सूने होंगे 

और अनंत तक बंजर और लंबे

जब कहीं कोई फूल, कोई खुशबू, कोई चिड़िया, कोई चहक नहीं होगी

हम अपने आप को खोज रहे होंगे 

और अपना कोई निशान ढूंढ नहीं पाएंगे ….

इस धरती पर सिर्फ हत्यारे का अट्टहास गूंजता सुनाई देगा 

और ढेर सारे बौनों की भीड़ 

अपने आदमकद होने के मुगालते में उस अट्टहास के छत्र तले नाच रही होगी !  

लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ. रूपरेखा वर्मा लिखती हैं ‘स्टैन स्वामी की हिरासत में मौत। 85 वर्ष के युवा स्टैन आदिवासियों के अधिकारों के लिये आजीवन संघर्षरत रहे। देश के अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं की तरह उन्हें भी ग़रीबों-आदिवासियों के लिये आवाज़ उठाने की क़ीमत चुकानी पड़ी। लम्बे समय से जेल में थे। वहीं कोरोना हुआ और दवा इलाज लम्बे समय बाद तब मिला जब न्यायालय का हस्तक्षेप हुआ और उनके इलाज के लिये देश भर से आवाजें उठीं। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हालत बिगड़ती गयी और आज वो जीवन की लड़ाई अपने लिये ही नहीं हारे, तमाम आदिवासियों की आशायें हार गयीं। 

ये वही स्टैन स्वामी थे जिन्हें हाथ हिलने के कारण मात्र एक सिपर और स्ट्रॉ देने से जेल अधिकारिओं ने मना कर दिया था मानो स्ट्रॉ नहीं बंदूक हो। उसके लिये भी क़रीब महीने भर कार्यकर्ताओं ने कोशिशें की थीं। ये प्रकरण अमानवीयता, सम्वेदनहीनता और ज़ुल्म पसन्दगी की मिसाल बनेगा और आगे की नस्लें पढ़ेंगी कि कभी हिंदुस्तान में ऐसा भी होता था।

स्टैन स्वामी को श्रद्धांजलि, खेराजे अक़ीदत। जेल में बन्द सभी बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं को उनकी हिम्मत के लिये सैल्यूट।’

मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने लिखा है ,’झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टैन स्वामी जिन्हें फर्जी मामले में फंसा कर मोदी सरकार ने जेल में डाल दिया था 

आज उनकी मृत्यु हो गई है

वे 84 साल के थे और पार्किंसन की बीमारी से ग्रस्त थे

उन्होंने झारखंड की जेलों में गैरकानूनी तरीके से बंद 4000 आदिवासियों की सूची प्रकाशित करी थी 

तब से वे सरकार के निशाने पर थे

आदिवासियों के लिए आवाज उठाने की वजह से मोदी सरकार ने उन्हें भीमा कोरेगांव नाम के फर्जी मामले में फंसाया और जेल में डाल दिया

गिलास पकड़ कर पानी पीते समय उनके हाथ कांपते थे उन्होंने स्ट्रा की मांग करी जिसके लिए अदालत ने एनआईए से कहा कि वह आकर के इस मामले पर चर्चा करें 

इस तरह स्टैन स्वामी को छोटी-छोटी चीजों के लिए परेशान किया गया

कल उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था और आज वे चल बसे

यह एक राजनीतिक हत्या है

सरकार आदिवासियों की जमीनों पर पूंजी पतियों का कब्जा करा रही है

आदिवासी विरोध करते हैं तो उन्हें फर्जी मामलों में फंसाकर जेलों में डाल दिया जाता है

जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता उन आदिवासियों के लिए आवाज उठाता है तो उसे भी फर्जी मामलों में फंसाकर जेल में डाल दिया जाता है और इस तरह हत्या कर दी जाती है

जैसे फादर स्टैन स्वामी को मार डाला गया

यह सब गुस्सा दिलाने वाला और दिल में दुख पैदा करने वाला तो है

लेकिन भारत की जनता के लिए आवाज उठाने वाले लोग ना डरेंगे ना रुकेंगे ना झुकेंगे 

हम जान तो दे देंगे लेकिन न्याय और सच्चाई के लिए अपनी आवाज उठाते रहेंगे

फादर स्टैन स्वामी को हूल जोहार’

जाने-माने पत्रकार उर्मिलेश लिखते हैंस्टेन स्वामी नहीं रहे! लेकिन यह उनकी स्वाभाविक मौत नहीं, एक तरह की हत्या है, सिस्टम के हाथों हत्या ! 84 साल के आदमी को महामारी के दौर में किसी सबूत के बगैर लगातार जेल में रखना कितना बड़ा गुनाह है! भारत अब ऐसे व्यवस्थागत-गुनाहों का ख़तरनाक द्वीप बनता जा रहा है!  

अफसोस, स्वामी साहब, आपने गरीब लोगों को न्याय दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष किया पर लोकतांत्रिक कहे जाने वाले इस मुल्क के सिस्टम ने आपके साथ सरासर अन्याय किया! आपसे कभी मिलना नहीं हुआ लेकिन काफी सुन रखा था। 

सलाम और श्रद्धांजलि।

प्रसिद्ध साहित्यकार पंकज चतुर्वेदी ने अपनी लंबी टिप्पणी में लिखा हैबहुत दुखद समाचार- भीमा कोरेगांव केस में  यू ए पी ए के तहत महाराष्ट्र में जेल में बंद रांची के फादर स्टेन स्वामी का निधन हो गया। वे दो दिन से वेंटिलेटर पर थे। वे लंबे समय से बीमार थे और अदालत के आदेश के बाद ही उन्हें  इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया था। 84 साल के स्टेन स्वामी को पानी पीने के लिए सिपर देने तक का एनआईए ने विरोध किया था। फादर  स्टेन के प्राण तब निकले जब उनकी जमानत  पर सुनवाई चल रही थी। 

इस मामले में एक अन्य बुजुर्ग वरवर राव हैं  जिनका इलाज चल रहा है। सुधा भारद्वाज भी बुरे स्वास्थ्य से जूझ रही हैं।  दुर्भाग्य है कि इतने कमजोर मामले में लीगल टीम बेहतर तरीके से काम नहीं कर पा रही है और आज एक निर्दोष  को जेल में अपनी जान गंवानी पड़ी।

फादर स्टैन स्वामी एक बुज़ुर्ग पादरी थे जो पिछले पांच दशकों से आदिवासी मुद्दों पर काम करते रहे हैं। उन्हें 8 अक्टूबर, 2020 की रात में बदनाम भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद षड्यंत्र प्रकरण में गिरफ्तार किया गया। एक सच्चे कार्यकर्ता और प्रतिष्ठित विद्वान की इस गिरफ्तारी की व्यापक भर्त्सना हुई थी। यह आदिवासियों में आम धारणा थी कि इस दयालु व विनम्र व्यक्ति के खिलाफ लगाए सारे आरोप हास्यास्पद हैं। 

हम बताना चाहते हैं कि 1 जनवरी, 2018 के दिन हुई भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच दरअसल देश के अग्रणि मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को सताने का एक ज़रिया बन गई है। इस जांच के दौरान 15 अन्य वकीलों, कार्यकर्ताओं, लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों को इसी तरह के बेतुके आरोपों में बंदी बनाया गया है। कुछ तो दो साल से भी अधिक अवधि के लिए कारागार में बंद रहे हैं।

फादर स्टैन स्वामी मूलत: तमिलनाड़ु के त्रिची से थे । वे एक युवा पादरी के रूप में झारखंड आए थे ताकि आदिवासी लोगों की समस्याओं को समझ सकें। दो साल तक वे झारखंड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले के एक आदिवासी गांव में रहे। इस दौरान उन्होंने आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक हालात, उनके समुदायों और मूल्यों, तथा शोषण की उस व्यवस्था पर शोध किया जो उन्हें जकड़े हुए है। बैंगलुरु के इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में 15 साल सेवा देने, जिस दौरान 10 साल वे इंस्टीट्यूट के निदेशक भी रहे, के बाद वे एक बार फिर झारखंड लौटे। झारखंड में वे झारखंड ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (जोहार) से जुड़ गए तथा झारखंडी ऑर्गेनाइज़ेशन अगेन्स्ट युरेनियम रेडिएशन (जोअर) के साथ भी काम किया। जोअर युरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की वजह से हो रहे पर्यावरण विनाश तथा निर्धनीकरण के विरुद्ध काम करता है। वे रांची में बगाइचा केंद्र की स्थापना में भी शामिल रहे – यह आदिवासी युवाओं के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र है तथा साथ ही हाशियाकृत आबादियों की कार्य योजनाओं पर अनुसंधान व सहयोग का केंद्र भी है।  

झारखंड में फादर स्टैन के काम के दो प्रमुख क्षेत्र रहे और दोनों ने ही उन्हें केंद्र सरकार द्वारा रक्षित शक्तिशाली हितों के खिलाफ खड़ा कर दिया। उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उस कॉर्पोरेट-राज्य गठबंधन को चुनौती देना रहा है जो आदिवासियों के पारंपरिक स्रोतों की लूट-खसोट करता है। झारखंड एक खनिज समृद्ध प्रांत है। देश के 40 प्रतिशत खनिज संसाधन यहीं हैं। फिर भी इसकी 39 प्रतिशत आबादी, ज़्यादातर आदिवासी, गरीबी रेखा से नीचे जीती है। प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के शोषण की दौड़ में अक्सर राज्य की मशीनरी आदिवासियों के खिलाफ खड़ी होती है। आदिवासियों को विस्थापन तथा और निर्धनीकरण का डर सताता है।

इस संदर्भ में फादर स्टैन स्वामी ने उन कानूनों की पैरवी की जो भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची के धरातल पर टिके हैं। इनके अंतर्गत आदिवासी क्षेत्रों को कुछ स्वायत्तता तथा स्व-शासन का आश्वासन दिया गया है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि झारखंड में पेसा (पंचायती राज–अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम, 1996) सम्बंधी नियम ही नहीं हैं, जिसकी वजह से इस अधिनियम का क्रियान्वयन असंभव हो गया है।’

वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव ने दैनिक हिंदुस्तान के खबरी रवैये के बहाने  हिन्दी पत्रकारिता के कायरतापूर्ण , चापलूस और सत्ता को खुश करने की मानसिकता को लेकर गंभीर सवाल उठाया है । उन्होंने फेसबुक पर अपनी टिप्पणी में दर्ज किया है कि ‘आज ‘हिंदुस्तान’ के लखनऊ संस्करण ने पादरी स्टेन स्वामी के एनआईए की कस्टडी में निधन का समाचार पृष्ठ संख्या 9 पर विज्ञापनों के बीच  इस गैर-महत्वपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया  है कि जल्दी उस पर ध्यान नहीं जाएगा । जबकि इसी घराने के अंग्रेजी अखबार ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने इसे फ्रंट पेज बाटम पर लिया है. अंग्रेजी के इंडियन एक्सप्रेस, हिंदू, दि टेलिग्राफ, टाइम्स आफ इन्डिया ने तो इसे फ्रंट पेज लीड बनाया है. इन्डियन एक्सप्रेस ने तो इस पर संपादकीय भी लिखा है. आखिर उत्तर भारत के हिंदी के  एक प्रमुख अखबार ने पादरी स्टेन स्वामी के त्रासद  निधन के समाचार के  साथ यह सुलूक क्यों किया? क्या अखबार की दृष्टि में उसके पाठकों के लिए यह गैर जरूरी समाचार है या कि वह नहीं चाहता कि उसके पाठक इस समाचार के सत्ता विरोधी निहितार्थ को ग्रहण कर सकें। जो भी हो, इतना तय है कि अखबार पत्रकारिता के दायित्व का निर्वहन न करके पाठकों के साथ अन्याय कर  रहा है। अकारण नहीं है कि सजग पाठकों का बड़ा वर्ग अब हिंदी अखबारों से विमुख हो रहा है. इन अखबारों में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों द्वारा अपनी अंतरात्मा को इस तरह सुषुप्त कर देना  पत्रकारिता के मूल्यों का हनन होने के साथ नागरिक व  संवैधानिक दायित्व से विमुख होना भी है। आने वाला समय पत्रकारिता के इस पतन को भी दर्ज करेगा।’

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