संभूसेक का सौंदर्य : 6 जुलाई, 2021 की डायरी

नवल किशोर कुमार

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सौंदर्य का मापदंड भी सापेक्ष ही होता है। निरपेक्ष नहीं होता। यह संभव ही नहीं है। रंगभेद के आधार पर भेदभाव की बुनियाद यही है। वैसे तो यह पूरे विश्व में है लेकिन भारत में इसके साथ अन्य विभाजनकारी तत्व शामिल हो जाते हैं। इनमें सबसे अहम है जातिवाद। जातिवाद और रंगभेद के साथ नस्लवाद भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मतलब यह कि किसी का रंग केवल गोरा होने से खूबसूरत नहीं हो जाता। उसके लिए जाति और नस्ल भी मायने रखती है।

जब मैं छोटा था और भारत की दो महिलाओं सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय को वर्ष 1994 में क्रमशः मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड घोषित किया गया। उन दिनों तो वाकई मुझे भी ये दोनों महिलाएं बेहद खूबसूरत लगती थीं। ऐश्वर्य राय की तस्वीर तो बाद के दिनों में मेरी कॉपी में रहती थी। एक तरह का आकर्षण था। फिर बाद में आकर्षण इतना बढ़ा कि मैंने कमरे में उनकी एक बड़ी तस्वीर लगा ली। परंतु, यह सवाल मेरे जेहन में रहा कि हॉलीवुड की कई अभिनेत्रियां इतनी खूबसूरत हैं फिर सुष्मिता सेन व ऐश्वर्या ही क्यों?

वर्ष 2006 में मेरा कंप्यूटर साइंस में मोहभंग होना शुरू हो गया था। नागार्जुन की कविताएं, कहानियां और उपन्यास पढ़ने के बाद मार्क्स व एंगेल को पढ़ा। समाज और बाजार के बीच का अंतर्संबंध तब समझ में आया। फिर तबतक दुनियादारी भी आ चुकी थी। मैं यह मानने लगा कि बहुत बड़ी आबादी और जातिवादी अर्थ व्यवस्था के लिहाज से कोई भी देश भारत की अनदेखी नहीं कर सकता है। डॉ. मनमोहन सिंह का वह भाषण भी पढ़ा जब उन्होंने संसद में भारत द्वारा वैश्विक व्यापार नीति पर हस्ताक्षर करने की घोषणा की थी।

असल में1990 का दशक क्रांति वाला दशक रहा। मंडल कमीशन की अनुशंसा के मुताबिक पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा हो चुकी थी। करीब 40 वर्षों से इंतजार कर रहा पिछड़ा वर्ग इस घोषणा के बाद अचानक से जाग गया और राजनीति में परिवर्तनकारी हस्तेक्षेप करने लगा। कांग्रेस के लिए यह प्रतिकुल स्थिति थी। भाजपा जो कि ब्राह्मण और बनियों की पार्टी थी, उसे राम मंदिर के रूप में संजीवनी मिल गयी। वह पिछड़ों की जागृति हिंदुत्व के सांचे में ढालना चाहती थी। कांग्रेस के पास आरक्षण के विरोध का कोई मुकम्मल तर्क नहीं था। लेकिन उसे पिछड़ा वर्ग में बन रही जागरूकता और इसके कारण होने वाले राजनीतिक प्रभाव को न्यून करना ही था। इन्हीं परिस्थितियों के बीच कांग्रेसी हुकूमत ने भारत को विश्व व्यापार के लिए खोल दिया।

परिणाम सामने आया कि सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय क्रमश: ब्रह्मांड सुंदरी व विश्व सुंदरी घोषित हुईं। यह एक तरह से भारत को आर्थिक उपनिवेश बनाने की तैयारी थी। ये दोनों सुंदरियां इस औपनिवेशिक प्रयास की ब्रांड आंबेस्डर।

खैर, मैं भी कितना अजीब इंसान हूं। प्रारंभ सौंदर्य से किया था और कहां मैं अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के झमेले में आ फंसा। मैं आज सौंदर्य की बात ही करना चाहता हूं।

तो बात जब सौंदर्य की होती है तो इसमें कई सारे प्रतीक शामिल होते हैं। मुझे लगता है कि महिलाओं का सौंदर्य यदि नहीं होता तो निश्चित तौर पर साहित्य में कोई सौंदर्य नहीं होता। एकदम बेरूखी और निर्जीव सा होता साहित्य। जैसा कि मैंने पहले कहा कि सौंदर्य सापेक्ष ही होता है, महिलाओं के सौंदर्य के कारण ही यह संभव है। वर्ना गुलाब की पंखुड़ियां और लरजते होंठों का सौंदर्य का सिद्धांत कहां से लोगों के दिमाग में आ पाता। काले नयनों और काले बादल का संबंध। झील और आंखों की गहराई का संबंध। सुराहीदार गले का विचार तो निश्चित तौर पर रिंदों को नहीं आता यदि सौंदर्य के केंद्र में महिलाएं नहीं होतीं।

लेकिन सौंदर्य क्या केवल महिलाओं तक सीमित है? क्या पुरूषों के पास कोई सौंदर्य नहीं?

मेरे जेहन में दो बिंब हैं। एक शंकर और दूसरा कृष्ण का। वैसे तो ये दोनों द्विजों के मिथकीय कल्पनाएं हैं। लेकिन बिना हकीकत के कल्पना का आधार नहीं होता। कुछ न कुछ सच्चाई जरूर होती है।

सचमुच शंकर एक ऐसे पुरूष के रूप में नजर आते हैं, जिनकी तुलना हम रॉयल इनफील्ड बुल्लेट से कर सकते हैं। मतलब जितना डेकोरेशन बुल्लेट में किया जा सकता है, उतना किसी और दो पहिया में संभव ही नहीं है। मुझे आज भी शौक है कि मेरे पास एक बुल्लेट हो और उसमें मैं तमाम प्रयोग करूं। ठीक वैसे ही जैसे द्वितों ने शंकर के साथ किया है। माथे पर चंद्रमा, गले में सांप, हाथ में डमरू, कमर में मृगछाला, त्रिशुल, जटा में गंगा। सोचकर देखिए तो कितने सारे बिंब हैं एक अकेले शंकर में। इनके आगे तो दुर्गा जैसी सुंदरी का सौंदर्य भी नहीं टिकता। यह अलग बात है कि वह गहने से लदी हुई दिखती है और उसके पास आक्रामक हथियार हैं और एक दर्जन बाहें हैं।

शंकर एक आम आदमी का प्रतिनिधित्व करता है। उसके पास ब्रह्मा की तरह चार मुंह नहीं है। उसके पास विष्णु के जैसा चार हाथ भी नहीं है। उसके माथे पर मुकुट तक नहीं है। है तो केवल एक जटा। जटा मुकुट पर भारी पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे कि पीला वस्त मृगछाला के आगे अपनी चमक खो देता है। शंकर रहता भी कहां है, यह भी देखिए। वह महलों में नहीं रहता। हिमालय पर रहता है। जंगलों का वासी है। उसके सहयोगी भी कौन हैं, यह भी देखिए। बैल है, भूत हैं, पिशाच हैं। पूरा का पूरा समाजशास्त्र है शंकर के बिंब में।

हालांकि यह सच है कि द्विज कमाल के चोर हैं। जब मैं उन्हें चोर कह रहा हूं तो मेरा आशय उनके इस गुण से है कि वह बड़ी खूबसूरती से दूसरों की अच्छाई पर कब्जा कर लेते हैं। शंकर का बिंब भी उनका ओरिजनल बिंब नहीं है। गोंड संस्कृति में संभूसेक एक पुरखा के रूप में उल्लेखित हैं। एक ऐसे पुरखा जो अपने लोगों के राजा हैं। वह बहादुर हैं। वह चांद को अपने माथे पर धारण करता है। नदियों का वह सबसे बड़ा संरक्षक है और इतना कि उसे सर्वोपरि मानता है। संगीत का स्वर जब उसके डमरू से निकलता है तो पूरा जंगल-पहाड़ नाच उठता है। ऐसे शंकर पर यदि द्विज कन्याएं गौरा और पार्वती रिझ गयीं तो आश्चर्य कैसा।

बचपन से एक लोकगीत सुनता आया हूं। यह विद्यापति का गीत है –

 

गौरा तोर अंगना।

बर अजगुत देखल तोर अंगना।

एक दिस बाघ सिंह करे हुलना।

दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना॥

हे गौरा तोर…

कार्तिक गणपति दुई चेंगना।

एक चढथि मोर एक मुसना॥

हे गौर तोर…

पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना।

सम्पति मध्य देखल भांग घोटना॥

हे गौरा तोर…

खेती न पथारि शिव गुजर कोना।

मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना॥

हे गौरा तोर।

भनहि विद्यापति सुनु उगना।

दरिद्र हरन करू धएल सरना॥

 

लेखक फारवर्ड प्रेस नई दिल्ली के संपादक हैं

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