साहसी अर्चना गौतम के लिए और जातिवाद व यौन कुंठा की बीमारी से ग्रसित भारतीय मर्दों के लिए (डायरी 23 जनवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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यौन कुंठा एक तरह की बीमारी है। एक ऐसी बीमारी, जिसे आप चाहें तो मानसिक कह सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह एक सामाजिक बीमारी है। यदि भारतीय समाज के बारे में मैं इसकी व्याख्या करूं तो मुझे इस बीमारी की वजह हिंदू धर्म की खोखली मान्यताएं लगती हैं। इस बात से पहले एक घटना दर्ज करना चाहता हूं।

कांग्रेस ने इस बार यूपी के चुनाव में एक नया प्रयोग किया है। उसने 40 फीसदी सीटों पर महिलाओं को उम्मीदवार बनाया है। सबसे अधिक चर्चा इन दिनों जिस विधानसभा क्षेत्र की हो रही है, वह हस्तिनापुर है जो कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। यहां से अर्चना गौतम कांग्रेस की प्रत्याशी हैं। वे अभिनेत्री रही हैं। तो इन दिनों हो यह रहा है कि सोशल मीडिया पर लोग उनकी ग्लैमरयुक्त तस्वीरें व वीडियोज आदि अपलोड कर रहे हैं। ऐसा करनेवालों में तमाम जातियों के लोग हैं जिनके नाम के साथ झा, पांडेय, शर्मा, यादव, मौर्य, कुशवाहा आदि है।

मैं यह सोच रहा हूं कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। क्या यह केवल यौन कुंठा है, जिसका खुलेआम प्रदर्शन किया जा रहा है? या फिर इसमें कोई और बात है?

अर्चना गौतम के मामले कोई एक फैक्टर नहीं है। एक तो वह दलित समाज की बेटी हैं और उपर से कांग्रेस की उम्मीदवार हैं। तीसरी बात यह कि वह अभिनेत्री रही हैं और उनके फोटोशूट चर्चा में रहे हैं। आज के दौर में अभिनेत्रियों का ग्लैमर उनकी पहचान का हिस्सा है। पहले भी रहा ही होगा। इससे कहां इनकार किया जा सकता है। मैं यह बात 1990 के दशक के पहले के लिए भी कह रहा हूं जब भारतीय हुकूमत ने विश्व व्यापार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया था। यानी वैश्वीकरण से पहले की बात। तब भी महिलाओं के सौंदर्य का इस्तेमाल भारतीय बाजार में उत्पादों के विज्ञापनों में किया ही जाता था।

मुझे अपना पहला हवाईसफर याद आ रहा है। वह साल 2013 था और मुझे दिल्ली आना था। हवाईजहाज में सफर करने में डर भी लगता है। मेरे कुछ साथियों ने अपना अनुभव बताया था। फिर एक-दो साथियों ने मजाक में ही कहा कि डरने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि हवाईजहाज में सुंदर एयरहोस्टेस होती हैं। उनके मुताबिक महिलाओं को एयरहोस्टेस बनाया ही इसलिए जाता है ताकि लोग डरें नहीं। मुझे यह बात नहीं जंची कि डर का सुंदर महिलाओं से क्या संबंध हो सकता है। लेकिन मैं उनका आशय समझ गया था कि वे मर्दवादी अहंकारवश ऐसा कह रहे हैं और यह मुमकिन है कि वे यौन कुंठा की बीमारी से ग्रसित हों।

दरअसल, अर्चना गौतम के मामले कोई एक फैक्टर नहीं है। एक तो वह दलित समाज की बेटी हैं और उपर से कांग्रेस की उम्मीदवार हैं। तीसरी बात यह कि वह अभिनेत्री रही हैं और उनके फोटोशूट चर्चा में रहे हैं। आज के दौर में अभिनेत्रियों का ग्लैमर उनकी पहचान का हिस्सा है। पहले भी रहा ही होगा। इससे कहां इनकार किया जा सकता है। मैं यह बात 1990 के दशक के पहले के लिए भी कह रहा हूं जब भारतीय हुकूमत ने विश्व व्यापार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया था। यानी वैश्वीकरण से पहले की बात। तब भी महिलाओं के सौंदर्य का इस्तेमाल भारतीय बाजार में उत्पादों के विज्ञापनों में किया ही जाता था। वैश्वीकरण के बाद इसमें बहुत तेजी आयी। अब तो हालत यह है कि मर्दों के अंत:वस्त्र से लेकर शेविंग क्रीम आदि तक के विज्ञापन में महिलाओं को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो वे सेक्स के लिए लालायित हों।

यह सब हमारे इसी समाज में हो रहा है और निस्संदेह हमारी आंखों के सामने हो रहा है। अर्चना गौतम को गालियां दी जा रही हैं। भद्दे कमेंट किये जा रहे हैं। वह अकेली नहीं हैं, जिनके साथ ऐसा हो रहा है। सीएए और एनआरसी को लेकर अपनी आवाज पुख्ता तरीके से रखनेवाली अभिनेत्री स्वरा भास्कर के साथ भी ऐसे ही किया था यौन कुंठा और धार्मिक उन्माद के शिकार लोगों ने।

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मुझे लगता है कि यदि इस देश में अंग्रेज नहीं आए होते और यदि उन्होंने सीआरपीसी व आईपीसी आदि का निर्माण नहीं किया होता तो मुमकिन था कि इस देश की महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं रहतीं। उन्होंने कानून बनाकर भारतीय समाज को एक नई दिशा दी। हालांकि अब भी कानूनों का शतप्रतिशत अनुपालन नहीं होता है और इसके कारण महिलाओं के साथ बलात्कार आदि अपराधों को अंजाम दिया जाता है। लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि कानून का डर है लोगों में। यदि ऐसा नहीं होता तो कोई भी कहीं भी किसी भी महिला को नोंच डालता। और ऐसा इसलिए होता क्योंकि भारतीय समाज की बुनियाद ही सड़ी हुई मानसिकता पर आधारित है। यह बुनियाद है मनुस्मृति आधारित बुनियाद।

एक उदाहरण देखिए कि मनु किस तरह का हैवान था और वह महिलाओं के बारे में कैसा विचार रखता था।

स्वभाव एष नारीणां  नराणामिहदूषणम .

अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति, प्रमदासु विपश्चित:

अविद्वामसमलं लोके,विद्वामसमापि  वा पुनः

प्रमदा द्युतपथं नेतुं काम क्रोध वाशानुगम

मात्रस्वस्त्रदुहित्रा वा न विविक्तसनो भवेत्

बलवान इन्द्रिय ग्रामो विध्दांसमपि कर्षति !

यदि इस देश में अंग्रेज नहीं आए होते और यदि उन्होंने सीआरपीसी व आईपीसी आदि का निर्माण नहीं किया होता तो मुमकिन था कि इस देश की महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं रहतीं। उन्होंने कानून बनाकर भारतीय समाज को एक नई दिशा दी। हालांकि अब भी कानूनों का शतप्रतिशत अनुपालन नहीं होता है और इसके कारण महिलाओं के साथ बलात्कार आदि अपराधों को अंजाम दिया जाता है।

अर्थात पुरुषों को अपने जाल में फंसा लेना तो स्त्रियों का स्वभाव ही है! इसलिए समझदार लोग स्त्रियों के साथ होने पर चौकन्ने रहते हैं, क्योंकि पुरुष वर्ग के काम क्रोध के वश में हो जाने की स्वाभाविक दुर्बलता को भड़काकर स्त्रियाँ, मूर्ख  ही नहीं विद्वान पुरुषों तक को विचलित कर देती है! पुरुष को अपनी माता,बहन तथा पुत्री के साथ भी एकांत में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इन्द्रियों का आकर्षण बहुत तीव्र होता है और विद्वान भी इससे नहीं बच पाते।

एक उदाहरण यह भी देखिए।

अस्वतंत्रता: स्त्रियः  कार्या: पुरुषै स्वैदिर्वानिशम

विषयेषु च सज्जन्त्य: संस्थाप्यात्मनो वशे

पिता  रक्षति कौमारे भर्ता यौवने

रक्षन्ति  स्थाविरे पुत्र,न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति

सूक्ष्मेभ्योपि प्रसंगेभ्यः स्त्रियों रक्ष्या विशेषत:

द्द्योहिर कुलयो:शोक मावहेयुररक्षिता:

इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो  धर्ममुत्तमम

यतन्ते भार्या भर्तारो  दुर्बला अपि

अर्थात पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियन्त्रण में रखाना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप से वश में रखना चाहिए! बाल्य काल में स्त्रियों की रक्षा पिता करता है! यौवन काल में पति  तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है! इस प्रकार स्त्री कभी भी स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है! स्त्रियों के चाल-ढाल में ज़रा भी विकार आने पर उसका निराकरण करनी चाहिये! क्योंकि बिना परवाह किये स्वतंत्र छोड़ देने पर स्त्रियाँ दोनों कुलों (पति व पिता ) के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकती है! सभी वर्णों के पुरुष इसे अपना परम धर्म समझते है! और दुर्बल से दुर्बल पति भी अपनी स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करता है!

बहरहाल, मैं तो अर्चना गौतम की बात कर रहा हूं। वे उनमें हैं, जिन्होंने मनुवाद को खारिज किया है और हौसला दिखाया है। उन्हें हस्तिनापुर की जनता विजयी बनाएगी या नहीं, यह तो वही जाने। मैं तो केवल इतना कहूंगा कि अर्चना, आपने एक बड़ी लड़ाई जीत ली है। इस जीत की आपको खूब सारी बधाई। ऐसे ही लड़ते रहिए, जीतते रहिए।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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